वर्ण व्यवस्था, जन्मना जाति व्यवस्था और महर्षि दयानन्द

 

वर्ण व्यवस्था, जन्मना जाति व्यवस्था और महर्षि दयानन्द

        महर्षि दयानन्द अपने समय के प्रमुख समाज सुधारक थे। उन्होंने अपने समय में जन्मना जातिवाद का विरोध किया था और सृष्टि की आदि से प्रचलित गुण-कर्म-स्वभाव पर आधारित वैदिक वर्ण व्यवस्था को व्यवहारिक घोषित कर उसका ही प्रचार व प्रसार किया था। इस सम्बन्ध में उन्होंने अपने विस्तृत साहित्य, मुख्यतः सत्यार्थ प्रकाश के चौथे समुल्लास में, अनेक स्थानों पर चर्चा की है। वेद आदि प्राचीन साहित्य के आधार पर वह वेदाध्ययन करने कराने, यज्ञ करने वा करवाने तथा दान देने व लेने को ब्राह्मण के मुख्य कर्तव्यों में शामिल करते थे। यदि किसी विप्र ब्राह्मण की सन्तान वेद ज्ञान से शून्य है तो वह वेदाध्ययन न करने व कराने सहित अन्य कर्तव्यों की पूर्ति में भी अक्षम होने से ब्राह्मण नहीं हो सकती। इसी प्रकार से यदि किसी अज्ञानी शूद्र का पुत्र व वा पुत्री ज्ञान की दृष्टि से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के तुल्य हो, तो वह शूद्र न होकर गुण-कर्म-स्वभावानुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ही होगा। यदि किसी घोर अज्ञानी में कोई विशेष योग्यता न हो तो फिर वह सन्तान शूद्र ही होगी। स्वामी दयानन्द के समाज सुधार का देशवासियों पर व्यापक प्रभाव पड़ा था। लोगों ने वर्णव्यवस्था के गुण-कर्म-स्वभाव के सिद्धान्त को युक्ति व तर्क संगत होने के कारण सैद्धान्तिक रूप में स्वीकार कर किया था। यह बात और है कि आज तक भी यह सिद्धान्त पूर्ण व्यवहारिक रूप नहीं ले सका। गुण-कर्म-स्वभाव पर आधारित वर्ण व्यवस्था वेदों पर आधारित उन्नत सामाजिक व्यवस्था है और जन्मना जाति व्यवस्था इस व्यवस्था के विपरीत कृत्रिम व अव्यवहारिक व्यवस्था है। जब तक यह जन्मना व्यवस्था समाप्त नहीं हो जाती, इसके विरूद्ध समाज सुधार प्रेमियों को निरन्तर प्रयत्न करने चाहिये। इससे देश व समाज को भारी क्षति हो रही है। जो लोग एक ही जाति में विवाह करते हैं, उस कारण उनसे कई योग्य सन्तानें जन्म लेने से वंचित होती हैं। यह दुःख का विषय है कि आर्य समाज ने महर्षि दयानन्द के अन्य कई आन्दोलनों की तरह ही वर्णव्यवस्था के प्रचार कार्य से स्वयं को न केवल दूर व पृथक किया है अपितु इस विषय पर सोचना भी छोड़ दिया है।

       महर्षि दयानन्द का गुण-कर्म-स्वभाव पर आधारित वर्ण व्यवस्था के महत्व, योगदान, उपयोगिता व प्रभाव के विषय में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के डारघुवंश ने श्री यदुवंश सहाय लिखित महर्षि दयानन्द की जीवनी में पुनरुत्थान युग का द्रष्टा शीर्षक से अपने प्राक्कथन में चर्चा की है। उनके इससे सम्बन्धित महत्वपूर्ण विचारों को हम पाठकों के लाभार्थ प्रस्तुत कर रहे हैं। वह लिखते हैं कि ‘भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के नेताओं ने, मुख्यतः गांधी जी ने देश का आह्वान करते समय अपने समाज की जिन समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित किया है और समाज के जिन क्षेत्रों में रचनात्मक कार्य के द्वारा गति प्रदान करने की चेष्टा की है, उन सभी समस्याओं को स्वामी दयानन्द ने बहुत बल देकर सामने रखा था और सभी क्षेत्रों में कार्य करना शुरू किया था। एक भी ऐसी समस्या नहीं हैजिसकी ओर उन्होंने संकेत  किया हो और कोई ऐसा क्षेत्र नहीं जिसे उन्होंने छोड़ा हो। समाज के वर्णभेदउनकी असमानताउनमें छूआछूतजन्म से वर्णों के विभाजन आदि के बारे में दयानन्द ने अपने प्रखर विचार रखे थे। उन्होंने इस प्रकार की असमानता कोछुआछूत कोजन्म से वर्ण के निर्धारण को धर्मविरुद्ध और असत्य प्रतिपादित किया। परन्तु उन्होंने कर्म पर आश्रित वैदिक वर्णव्यवस्था की स्वीकृति दी है। हम आधुनिकता के समर्थक यह कह सकते हैं कि कर्म (गुण-कर्म-स्वभाव) पर आश्रित वर्ण-व्यवस्था को स्वीकार कर लेना एक प्रकार का समझौता है, क्योंकि इस प्रकार हम दूसरे मार्ग से परम्परित वर्ण-व्यवस्था का समर्थन करते हैं। परन्तु स्थिति का यथार्थ-विवेचन करने से पता चलता है कि जिन्होंने वर्ण-व्यवस्था को पूरी तरह अस्वीकार करने का घोषणा की है, उन्होंने अपने जीवन में अभी तक जातिवाद को बहुत महत्व दे रखा है। भारतीय राजनीति के विभिन्न स्तरों पर जातिवाद का कितना प्रभाव है, इससे यह प्रमाणित हो जाता है। गांधी जी ने सन्त भाव से निम्न जातियों को हरिजन कहापर ‘हरिजन शब्द अछूत के समान एक पर्याय मात्र बन कर रह गया। इसकी तुलना में दयानन्द की दृष्टि अधिक स्पष्ट थी। पहले तो उन्होंने (स्वामी दयानन्द ने) कहा कि समाज के विविध अंग रूप उसके वर्णों में ऊंच-नीच का भाव ही अधर्म हैं, क्योंकि अंगों का ऊंचा-नीचा स्थान उनकी श्रेष्ठता का निर्धारक नहीं हो सकता। यह कहना नितान्त मूर्खता है कि पैरों से हाथ इसलिए श्रेष्ठ हैं, क्योंकि प्राणी के खड़े होने पर वे ऊपर स्थित होते हैं। समाज की व्यवस्था और सन्तुलन के लिए कार्यों का विभाजन किसी  किसी रूप में अनिवार्य है पर कार्य के सम्पादन की क्षमता जन्मतः सिद्ध नहीं हो सकती। अतः वर्ण का जन्म से कोई सम्बन्ध नहीं है। इस प्रकार के तर्क और व्यवस्था में कितना बल है, यह स्पष्ट है। साथ ही दयानन्द ने वर्णव्यवस्था के नाम पर जो सामाजिक अन्याय हो रहा थाउसका बड़ा विरोध किया था और इस विद्रोह भाव को समाज की नई रचना में समाहित करने का प्रयत्न भी किया था। बाद के समन्वयवादियों के दृष्टिकोण से उनका विचार कहीं अधिक क्रान्तिकारी रहा है। यह अलग बात है कि आधुनिक ज्ञानविज्ञान के प्रयोग से जिस प्रकार की आद्योगिक और यांत्रिक प्रगति हो रही हैउसमें समाजरचना का स्वरूप ऐसा बदल रहा हैजिसमें पिछली कर्माश्रित वर्णव्यवस्था असंगत हो गई है।‘ 

         डा. रघुवंश जी ने सामाजिक व्यवस्था का विश्लेषण कर अपना जो मन्तव्य प्रस्तुत किया है वह यथार्थ है। उन्होंने स्वामी दयानन्द के विचारों व कार्यों का स्तुति गान किया है जो कि सत्य व ग्राह्य है। आज जन्मना जाति व्यवस्था अप्रासंगिक हो गयी है। वर्तमान में गुण, कर्म व स्वभाव पर आधारित प्राचीन वर्ण व्यवस्था अपने मूल स्वरूप से परिवर्तित होकर आधुनिक रूप में विद्यमान है। आज की व्यवस्था में वर्ण समाप्त हो गये हैं और इनका स्थान डाक्टरइंजीनियरपुलिससेनासरकारी कर्मचारीनिजी व्यवसायीकृषकश्रमिक आदि शब्दों ने ले लिया है। आशा है कि भविष्य में जन्मना जातियां इसी व्यवस्था में विलीन हो जायेगी। यह भी उल्लेख करना उचित होगा कि आज समाज में गुण, कर्म व स्वभाव पर आधारित प्रेम विवाह और परिवारजनों द्वारा आयोजित विवाह भिन्न भिन्न जन्मना जातियों के वर-वधुओं में हो रहे हैं जिन्हें अन्तर्जातीय विवाह कहते हैं। समाज के एक बड़े भाग ने इन्हें स्वीकार भी कर लिया है। इससे जन्मना जातिवाद काफी शिथिल हुआ है। दुःख का विषय है कि आज भी लोग अपने अपने नामों के साथ जन्मना जाति सूचक शब्दों का प्रयोग करते हैं जिससे समाज में एकरसता उत्पन्न होने में बाधा होती है। यह जन्मना जाति लिखने की प्रथा यदि समाप्त हो जाये और केवल गोत्रों का ही प्रयोग विवाहार्थ किया जाये तो यह समाज, देश व मनुष्यता के लिए उत्तम हो सकता है। यही स्वामी दयानन्द जी को भी अभीष्ट था। हम आशा करते हैं कि भविष्य में यह व ऐसी सभी कृत्रिम प्रथायें दूर होंगी। लेख समाप्ति पर हम यह कहना चाहते हैं कि सामाजिक व्यवस्था में जो आज परिवर्तन देख रहे हैं, उसमें महर्षि दयानन्द का प्रमुख योगदान है जिससे आज का समाज परिचित नहीं है। स्वामीजी के अनेक देश व समाज हित के कार्यों के लिए उनका कोटि कोटि वन्दन है।

मनमोहन कुमार आर्य

नया सांस्कृतिक धार्मिक आक्रमण

नया सांस्कृतिक धार्मिक आक्रमण

        आर्यसमाज के जन्मकाल से ही इस पर आक्रमण होते आये हैं। राजनैतिक स्वार्थों के  लिए राजनेताओं तथा राजनीतिक दलों ने भी समय-समय पर आर्य समाज पर निर्दयता से वार किये। विदेशी शासकों, देसी रजवाड़ों व विरोधियों ने भी वार किये। कमी किसी ने नहीं छोड़ी। समाज सुधार विरोधी पोंगा-पंथियों ने भी समय -समय पर डट कर वार किये। घुसपैठ करके कई एक ने आर्यसमाज का विध्वंस करने के लिए पूरी शक्ति लगा दी। गांधी बापू ने वेद पर, सत्यार्थप्रकाश पर, ऋषि दयानन्द व स्वामी श्रद्धानन्द पर बहुत चतुराई से प्रहार किया था। आर्य नेताओं तथा विद्वानों ने बड़े साहस से यथोचित उत्तर दिया। जवाहर लाल नेहरु ने भी लखनऊ में आर्यसमाज के महासमेलन में आर्य समाज पर घिनौना आक्रमण किया था। यह सन् 1963 की घटना है। तब भी आर्य समाज ने नकद उत्तर दिया था।

         अब संघ परिवार एक योजनाबद्ध ढंग से अपनी पंथाई विचारधारा देश पर थोपने में लगा है। आर्यसमाज पर सीधा-सीधा आक्रमण होने लगा है। भाजपा के नये-नये मन्त्री-तन्त्री इस काम में जुट गये हैं। देहली में स्वामी विवेकानन्द की आड़ में श्री वी.के. सिंह ने अपनी सर्वज्ञता दिखाई। फिर गुरुकुल आर्यनगर हिसार के उत्सव पर हरियाणा के मन्त्रियों ने वही कुछ करते हुए संघ का जी भर कर बखान किया। इसके लिए गुरुकुल के प्रधान महाविद्वान्? सुमेधानन्द जी बधाई के पात्र हैं। वह भाजपा का ऋण चुकाने में लगे हैं।

  1. दत्त तथा चटर्जी नाम के दो बंगाली इतिहासकारों ने अपने ग्रन्थ में लिखा है कि महर्षि दयानन्द प्रथम भारतीय थे जिन्होंने भारत भारतीयों केलिए घोष लगाया या सुनाया। स्वदेशी व स्वराज्य के इस घोष लगाने से उस युग का कौन-सा नेता व धर्मगुरु ऋषि दयानन्द के समकक्ष था? बड़ा होने का तो प्रश्न ही नहीं।
  2. जब स्वामी विवेकानन्द को कोई नरेन्द्र के रूप में भी अभी नहीं जानता था तब मथुरा की कुटी से दीक्षा लेकर महर्षि दयानन्द पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्र में गायत्री व यज्ञ हवन प्रचार, स्त्रियों को वेद का अधिकार, जाति भेद निवारण, अस्पृश्यता उन्मूलन व स्वदेशी का शंखनाद करने में लगे थे। उस काल में विदेश में निर्मित चाकूके प्रयोग से महर्षि का मन आहत हुआ। विदेशी वस्त्रों को तजकर ऊधो को स्वदेशी वस्त्रों के धारण करने की इसी काल में प्रेरणा दी गई। इससे पहले किसने स्वदेशी आन्दोलन का शंखनाद किया? स्वदेशी वस्तुओं व वस्त्रों के प्रयोग में सभी नेता व विचारक ऋषि दयानन्द को नमन करते आये हैं। अब संघ परिवार ने नया इतिहास गढ़ना आरभ किया है। जो मैक्समूलर तथा नेहरु न कर पाया वह भागवत जी के चेले करके दिखाना चाहते हैं।
  3. उन्नीसवीं शतादी के बड़े-बड़े विद्वान्, सुधारक और नेता प्रायः करके गोरी सरकार व गोरों की सर्विस में रहे। पैंशनधारी भी कई एक थे। स्वामी विवेकानन्द जी ने तो अंग्रेज जाति की कभी भूरि-भूरि प्रशंसा भी की थी। गांधी जी की दृष्टि में सूर्य के तले और धरती के ऊपर अंग्रेज जाति जैसा न्यायप्रिय और कोई है ही नहीं। महर्षि दयानन्द ने किसी सरकार की, किसी राजा, महाराजा की नौकरी नहीं की। अंग्रेज जाति व अंग्रेज सरकार का कभी स्तुतिगान नहीं किया। हाँ। धर्मप्रचार की स्वतन्त्रता के लिए मुगलों की तुलना में वे अंग्रेजी राज की प्रशंसा करते थे।

         न जाने किस आधार पर संघ परिवार स्वामी विवेकानन्द को उन्नीसवीं शतादी का सबसे बड़ा महापुरुष बताते हुए ऋषि दयानन्द को नीचा दिखाने पर तुला बैठा है। आश्चर्य का विषय है कि समर्थ गुरु रामदास व छत्रपति शिवाजी का गुणकीर्तन छोड़कर संघ ने स्वामी विवेकानन्द को अपना आदर्श कैसे मान लिया?

         स्वामी विवेकानन्द ने एक बार यह भी कहा था कि मुझे कायस्थ होने पर अभिमान या गौरव है। जो जन्म की जाति-पाँति पर इतराता है वह कितना भी बड़ा क्यों न हो वह आदर्श साधु महात्मा नहीं हो सकता। साधु की कोई जात व परिवार नहीं होता।

  1. अंग्रेजी न्यायालय का (Contempt of court) अपमान करने वाला सबसे पहला भारतीय महापुरुष महर्षि दयानन्द था। उन्हीं से प्रेरणा पाकर महात्मा मुंशीराम जी (स्वामी श्रद्धानन्द जी महाराज) ने हुतात्मा कन्हाई लाल दत्त के अभियोग के समय बड़ी निड़रता से अंग्रेजी न्यायालय का अपमान ((Contempt of court)ç किया था। क्या किसी बड़े से बड़े नेता को इन दो ऐतिहासिक तथ्यों का प्रतिवाद करने की हिमत है?

          ऋषि दयानन्द के काल की तो छोड़िये, महर्षि के बलिदान के पच्चीस वर्ष पश्चात् तकाी कोई भी भारतीय नेता अंग्रेजी न्यायपालिका (British Judiciary)का अपमान नहीं कर सका। न जाने संघ परिवार को महर्षि दयानन्द की यह विलक्षणता, गरिमा, बड़प्पन, देशप्रेम व शूरता क्यों नहीं दिखाई देती?

  1. किसी भी अन्य भारतीय महापुरुष द्वारा उस युग में न्यायपालिका के अपमान की घटना सप्रमाण दिखाने की विवेकानन्दी बन्धुओं को हमारी खुली चुनौती है। लोकमान्य तिलक को उन्नीसवीं शतादी के अन्तिम वर्षों में क्राफर्ड केस में अंग्रेजी न्यायालय ने दण्डित किया था। उन्हें बन्दी बनाया गया। सब नेता न्यायालय के निर्णय को माँ का दूध समझकर पी गये। कांग्रेस तब देश व्यापी हो चुकी थी। कौन बोला न्यायालय के इस घोर अन्याय पर? देशवासी नोट कर लें कि तब शूरता की शान स्वामी श्रद्धानन्द जी ने महात्मा मुंशीराम के रूप में इस निर्णय पर विपरीत टिपणी की थी। महात्मा जी की वह सपादकीय टिप्पणी हमारे पास सुरक्षित है।
  2. महर्षि दयानन्द जी सन् 1877 के सितबर अक्टूबर मास में जालंधर पधारे थे। तब आपने एक सार्वजनिक सभा में अपनी निर्भीक वाणी से दुखिया देश का दुखड़ा रखते हुए अंग्रेजी राज के अन्याय, पक्षपात तथा उत्पीड़न को इन शदों में व्यक्त किया थाः- ”यदि कोई गोरा अथवा अंग्रेज किसी देशी की हत्या कर दे तथा वह (हत्यारा) न्यायालय में कह दे कि मैंने मद्यपान कर रखा था तो उसको छोड़ देते हैं।”

         इस व्यायान का सार सपूर्ण जीवन चरित्र महर्षि दयानन्द के पृष्ठ 73 पर कोई भी पढ़ सकता है। हुतात्मा पं. लेखराम जी ने स्वामी विवेकानन्द जी के जीवन काल में अपने ग्रन्थ में यह पूरी घटना दे दी थी।

          ऐसी निर्भीक वाणी उस युग के किसी भी साधु, सन्त व राजनेता के जीवन में दिखाने की क्या कोई हिमत करेगा?

          जालन्धर के इसी व्यायान में ऋषि दयानन्द जी ने सन् 1857 की क्रान्ति को गदर (Mutiny) न कहकर विप्लव कहकर अपने प्रखर राष्ट्रवाद का शंख फूं का था। स्वातन्त्र्य वीर सावरकर जी ने वर्षों बाद हमारा प्रथम स्वातन्त्र्य संग्राम ग्रन्थ लिखकर घर-घर ऋषि की हुँकार पहुँचा दी। अंग्रेजी जानने वाले किसी और बाबा व नेता में तो इतनी हिमत न हुई।

  1. जब देशभक्त सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी को कारावास का दण्ड सुनाया गया तब महर्षि दयानन्द के मिशन के एक मासिक पत्र में सरकारी न्यायालय के इस अन्याय की निन्दा की गई। क्या किसी सन्यासी महात्मा ने देश में सुरेन्द्रनाथ जी के पक्ष में मुँह खोला या लिखा । हम इस घटना के प्रमाण स्वरूप अलय Document दस्तावेज दिखा सकते हैं।

         दुर्भाग्य का विषय है कि आर्य समाज भी ऋषि की इन घटनाओं को विशेष प्रचारित (Highlight) नहीं करता।

  1. देश को सुनाना बताना होगा कि उन्नीसवीं शतादी के महापुरुषों में एकमेव सुधारक विचारक ऋषि दयानन्द थे जिन्होंने देश, धर्म व जाति हित में अपना बलिदान देकर बलिदान की परपरा चलाई। किसी और संगठन, किसी बाबा की परपरा में एक भी साधु, युवक, बाल, वृद्ध गोली खाकर, फांसी पर चढ़कर, छुरा खाकर, जेल में गल सड़कर देश धर्म के लिए बलिवेदी पर नहीं चढ़ा। यहाँ पं. लेखराम जी से लेकर वीर राम रखामल (काले पानी में), वीर वेदप्रकाश, भाई श्यामलाल और धर्मप्रकाश, शिवचन्द्र तक शहीदों की एक लबी सूची है। सेना प्रमुख श्रीयुत वी.के.सिंह तथा आर्यनगर हिसार में सुमेधानन्द महाराज की बुलाई नेता-पलटन इतिहास को क्या जाने?
  2. महर्षि दयानन्द का पत्र व्यवहार पढ़िये। प्रत्येक दो या तीन पत्रों के पश्चात् प्रत्येक पत्र में देश जाति के उत्थान कल्याण की ऋषि बात करते हैं। किसी अंग्रेजी पठित साधु, नेता के जीवन चरित्र व पत्रावली में ऐसा उद्गार, ऐसी पीड़ा और गुहार दिखा दीजिये। ऋषि दयानन्द की देन व व्यक्तित्व का अवमूल्यन करने वाले सब तत्त्वों को यह मेरी चुनौती है कि इन दस बिन्दुओं को सामने आकर झुठलावें।

संवेदनाओं में भी दोगलापन

संवेदनाओं में भी दोगलापन

   

      पिछले दिनों ईस्टर के मौके पर श्रीलंका के गिरजाघरों और लग्जरी होटलों में हुए विस्फोटों को स्थानीय इस्लामी आतंकवादियों ने अंजाम दिया था। श्रीलंकाई जाँच एजेंसी ये विस्फोट न्यूजीलैंड की मस्जिदों में की गई गोलीबारी का बदला बता रही हैं। इन विस्फोटों में मरने वालों की संख्या बढ़कर 300 से ज्यादा हो गई जिनमें 38 विदेशी शामिल हैं।

     इसे बिलकुल सरल उदहारण में ऐसे समझे जैसे दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद का विवादित ढांचा ढहा दिया गया था, जिसके बाद दाऊद इब्राहिम, टाइगर मेनन, मोहम्मद दोसा और मुस्तफा दोसा ने ‘बाबरी मस्जिद ढहाए जाने का बदला लेने के लिए  कुछ समय बाद ही 1993 में एक के बाद एक विस्फोट कर मुम्बई को दहला दिया था। जिसमें 257 मासूम लोग मारे गये और 713 अन्य घायल भी हुए थे।  बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचा गिराए जाने की आलोचना आज तक हो रही है लेकिन मुम्बई हमलों की आलोचना कभी सुनाई नहीं देती जबकि अयोध्या में मात्र कुछ पत्थर गिरे थे और मुंबई में लाशें। यही नही जब इन हमलों के हत्यारे को फांसी देने की बात आती है तब अनेकों लोग उसे बचाने भी सामने आते हैं। 

    ठीक इसी तरह पिछले महीने न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च की दो मस्जिदों में हुए हमले का बदला लेते हुए इस्लामवादियों ने एक के बाद हमले कर श्रीलंका के गिरजाघरों और लग्जरी होटलों में सेंकडों लाशें बिछा दी लेकिन राजनितिक आलोचना के अलावा कहीं से कोई संवेदना का स्वर दिखाई नहीं दिया। जबकि क्राइस्टचर्च हमले के बाद न्यूजीलैंड प्रधानमंत्री अर्डर्न ने हमले में मारे गए लोगों के परिवारों से मुलाकात की मुस्लिम परिवारों के पास हिजाब में पहुंचीं, उन्हें गले लगाया और मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि दी। उनके चेहरे पर मायूसी थी, आंखें नम थी अनेकों लोग दुनिया के दक्षिणपंथी नेताओं को उनसे करुणा और प्रेम का पाठ सीखने की नसीहत दे रहे हैं।

    इसके बाद वहां शुक्रवार की अजान का सीधा प्रसारण किया गया और मृतकों के लिए इस दौरान दो मिनट का मौन रखा गया। प्रधानमंत्री अर्डर्न ने कहा था कि पूरे देश में सरकारी टीवी और रेडियो पर जुमे की नमाज पर सीधा प्रसारण किया जाएगा, ताकि मुसलमानों को अपने अकेले होने का अहसास ना हो सके। उन्होंने कहा था कि हम सब उनके साथ हैं और मुसलमान हमारे हैं।

     भारत में भी न्यूजीलैंड में मुसलमानों पर हुए हमले के विरोध में एएमयू के छात्रों ने कैंडिल मार्च निकाला। बाबे सैयद पर नमाज ए जनाजा पढ़कर शोक व्यक्त करते हुए इसे मानवता के खिलाफ बताते हुए कहा कि यह हमला अमेरिका में हुए 9/ 11 से ज्यादा घातक है। हमला कराने वाले यह न समझें कि हम डरकर बैठने वाले नहीं हैं। जबकि देखा जाये तो अमेरिका में हुए 9/11 हमले 3 हजार से ज्यादा लोग मारे गये थे।

    पाकिस्तान समेत अनेकों मुस्लिम देशों के तरफ से इसे मानवता को शर्मशार करने वाला बताया किन्तु जब इसके जवाब में ईस्टर के मौके श्रीलंका के गिरजाघरों और लग्जरी होटलों को उड़ा दिया गया एक बार फिर सभी कथित मानवतावादी गायब मिले न किसी मुस्लिम देश में इसके लिए आंसू बहा और न ही श्रद्धाजलि सभा का आयोजन हुआ।

      इससे पहले जब फ्रांस की एक पत्रिका चार्ली हेब्दों इस्लाम विरोधी कंटेंट छाप देती है तब उसकी आलोचना सभी जगह सुनाई देती है। लेकिन जब आंतकी मैगजीन में छपे कंटेंट का बदला लेते हुए पत्रिका से जुड़ें 9 पत्रकार और 2 सुरक्षाकर्मियों की हत्या कर घटनास्थल पर नारे लगाते है कि हमने पैगबंर का बदला ले लिया तब भी पत्रकारों के प्रति संवेदना गायब दिखती हैं।

     आखिर कब हमारे विचारों में एकता आयेगी? कब तक एक पहलु को देखते रहेंगे क्या श्रीलंका में मरने वाले लोग इन्सान नहीं थे या न्यूजीलेंड में मरने वाले मुस्लिमों के मुकाबले उन्हें कम दर्द हुआ? आखिर क्यों एक कट्टर विचाधारा को राजनितिक और वैचारिक संरक्षण प्रदान किया जा रहा है! अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में मुसलमानों पर हुए हमले के विरोध में छात्रों ने कैंडिल मार्च निकाला लेकिन अब इनकी मानवता कहाँ गयी जब श्रीलंका में इससे कई गुना ज्यादा लोग मार दिए गये?

      हर एक हमले और इस्लामवाद के बदले के नाम पर हत्याओं से शिक्षा लेने की प्रक्रिया का आरम्भ पिछले सैंकड़ों वर्षों से जारी है। लोकतंत्र में जीवन व्यतीत करने वाले हमारे जैसे लोग इस्लामवाद के बारे में तब जान पाते हैं जब सडकों पर रक्त बहता है, घरों से चीखें निकलती है लेकिन एक बड़े धड़े के हलक से इसके बावजूद  भी संवेदना के दो शब्द नहीं निकल रहे है इसका कारण कौन बतायेगा और जवाब कौन देगा?

       मुंबई बम विस्फोट, ताज हमला, अमेरिका में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर से लेकर बाली, मैड्रिड, बेसलान लंदन ऐसी घटनायें हैं जिन्होंने समूचे विश्व को हिला दिया। लेकिन कभी भी संवेदना की वह लहर दिखाई नहीं दी जो न्यूजीलेंड हमले के बाद देखने को मिली? यही नहीं बड़ी सावधानी से हर बार घटनाओं को मरोड़ दिया जाता है जब क्राइस्टचर्च की दो मस्जिदों पर हमला होता है उसे इस्लाम पर हमले से जोड़ दिया जाता है। लेकिन जब हमला श्रीलंका के चर्च या अफगानिस्तान में बुद्ध की प्रतिमा या मुम्बई में विस्फोट होते है तब इसे आतंकवादियों से जोड़ दिया जाता है।

      पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने इसे इस्लाम्फोबिया बताया लेकिन जिहाद की घटनाओं के रोग को रोकने के लिये भी कोई भी विशेष बयान उनका नहीं आया। इससे क्या ये प्रकट नहीं होता है इस्लाम के नाम पर जिहाद हमले कर हत्या को मौन समर्थन प्राप्त है? यदि ऐसा है तो  पूरे विश्व में अन्य मतों लोगों का इस्लाम के प्रति विचार कठोर होता चला जायेगा और आने वाले समय में इस्लामवाद के विरुद्ध यह अधिक शत्रुवत होता जायेगा। जिस तरह पश्चिम से लेकर एशिया में चीन और बर्मा अब श्रीलंका में बुर्के पर प्रतिबंध लगने जा रहा है यानि आज इस्लामवाद के मुकाबले इस्लामावाद का विरोध कहीं अधिक दिख रहा है।

महर्षि को उसी अवस्था में छोड़कर प्रतापसिंह जुआ खेलने पूना क्यों चला गया

महर्षि को उसी अवस्था में छोड़कर प्रतापसिंह जुआ खेलने पूना क्यों चला गया

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         कारण क्या थे?ः- जोधपुर के कर्नल प्रतापसिंह के एक सुपरिचित व प्रशंसक उच्च शिक्षित व्यक्ति ने एक प्रश्न उठाया है। हमारीाी उत्कृष्ट इच्छा है कि कोई इतिहास प्रेमी विद्वान् विचारक उनके प्रश्न का सन्तोषजनक उत्तर दे। महर्षि दयानन्द जी महाराज को जोधपुर में विषय दिया गया। विष देने के षड्यन्त्र में कौन-कौन समिलित था, इस प्रश्न को आप एक बार छोड़ दीजिये। उपरोक्त विद्वान् का प्रश्न बड़ा गभीर व महत्त्वपूर्ण है। जब ऋषि को विष दिया गया तब कर्नल प्रतापसिंह महर्षि का पता करने क्यों न आया?

         आया तोकितने दिन के पश्चात् व कब आया? उसकी क्या विवशता थी जो महाराज का पता क रने न आ सका?

         इसके साथ हम एक प्रश्न और जोड़ देते हैं। महर्षि को उसी अवस्था में छोड़कर प्रतापसिंह जुआ खेलने पूना क्यों चला गया। प्रतापसिंह के प्रशंसक भक्त इस प्रश्न को पढ़ सुनकर चौंक जाते हैं। वे कहते हैं वह तो पोलेा खेलने गया था। लोगों को मूर्ख बनाने के लिये आप चाहे पोलो कहो, था तो जूआ ही। जूआ तो क्रि केट व ताश पर भी खेला जाता है। रैफल क्या जूआ नहीं? लाटरी क्या है?

         उसके वकील प्रताप सिंह की बढ़ाई करते हुए उसकी पूना यात्रा का वर्णन तक नहीं करते। इसका क्या कारण है? आशा है कि सत्यान्वेषी सज्जन प्रतापसिंह का गुणकीर्तन करने वाले वकीलों से इस प्रश्न का उत्तर लेकर रहेंगे। जिस विद्वान् सज्जन ने यह प्रश्न उठाया है उसका नाम हम आगे कभी बतायेंगे। था वह भी प्रतापसिंह प्रशंसक।

Why should we Join Arya Samaj

Why should we Join Arya Samaj

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        Well, Friends! we all want to do at least something for our society. In spite of bounded with many limitations, it must have come to your mind that you should return back something to society so as to make it a better place for generations to come which some of us are already doing in their own unique way. Joining a reputed organization with a glorious history in nation-building is something which you can think of! Let’s explore the reasons here-

        Arya Samaj is an organization which has traveled across the pages of Indian History and has seen closely the centuries. Its significance can not be confined to the social, spiritual, and cultural organization of India, rather it has its wings far beyond it. Tracing the history- this institution was build up for social reformation in the era when the Indian society was almost at the verge of collapse. Had there been no avatar in the form of this Samaj, many of the Social evils would have persisted till date.

       No one can deny the role of Arya Samaj in the process of building nation- uniting us under the one umbrella term of common identity, connecting the Indian when almost every force was absent, preparing Indian to think beyond the exploitative foreign forces and sowing the seed of self-respect and trust among Indian in Indian History.

        It was Arya Samaj who rejected the theory of the superiority of White skin over the Brown Skin Indian people. The unparallel deeds of Maharishi Dayanand Saraswati can never be forgotten who, in the 18th century, himself come forward to commence this movement. His actions and works were clearly based on the objective of social reformation and restoring the belief of Indian in their own glorious past.

       When the British administration was at the helm and the Indian masses were exploited continuously in social, political, economic and cultural form, and people were left with no choice, it was Arya Samaj who rescued people and become a torchbearer for the masses. The resonance of this eternal Vedic religion can be still heard.

      Arya Samaj has proudly achieved millions of success stories, worked for the poor and downtrodden, eradicated the superstition and hypocrisy, so all this has left the imprints of Arya Samaj permanently on Indian History.

      Arya Samaj has sailed through the time and has seen the changes which Indian Society has undergone, but it has never left the path of social service in one or another form. Post-Independence, it has been continuously putting in efforts without being tired.

      There are plenty of reasons to satisfy your mind and soul while choosing Arya Samaj as one of the organizations, you want to be associated with. People associated with Arya Samaj believe in the authority of Veda and a single God who protects and nurture us. Arya Samaj rejects the hegemony of superstitious practices and black magic. It believes in the purification of mind, body, and soul based on the principle and practices of Vedas. That’s why-

     1.    There will be no perceived flaws related to the planet’s position, constellations, horoscope, etc to the people and families associated with Arya Samaj.

     2.    On the people associated with the Arya Samaj, the black magic, and other superstitious practices of the alleged Baba do not work.

     3.    People associated with Arya Samaj do not even have to fear the ghosts, bad evils or vampires, etc.

     4.    Joining the Arya Samaj keeps you distant from the problems like ‘Manglik dosh’ etc from the horoscope.

         Above the fact it this that the followers of Arya Samaj do not believe in any hypocrite, hypocritical, practices prescribed by self-style Godmen or ‘alleged babas’. In the teaching of Arya Samaj, each cultural practice and fact are logical explained which saves you from being trapped in the irrational routine practices which are good for none. Its teaching tells the truth about the existence of life and beyond-life facts, hence it justifiably denies the acts like- ‘Pindandan’, ‘Shraddha Tarpan’ and explains their real motive.

        The spread of knowledge and wisdom of Arya Samaj empowers the knowledge and mindmap of the people which ultimately save it from economic and mental and physical exploitation that could be done in the name of religion by the self-made ‘Avatars’, ‘fake sages’, ‘Guru Ghantal’, ‘Mahant’ etc.

        The Arya Samaj appreciates the art of making but totally opposes the practice of idol worship because the latter one is nowhere going to benefit the society in the larger term. Rather it believes in the service of humanity to bring prosperity of the lives of people.

        According to the principles of Arya Samaj, God is pervading in each particle of the world. Therefore, confining God to the particles only one idol is equal to questioning the virtues, deeds, and existence of God. God dwells in the soul in our heart. Therefore, practically there is no need for idol or temple for worship, prayer, and worship of God. You can practice it whenever, and wherever you desire.

       The chief propaganda of Arya Samaj is to eliminate the hypocrisy, superstition, illogical & irrational practices from the society and to show them the right track where they can spiritually and socially blossom. Such teachings have given rise to the awakening of youth with respect to religious and cultural identity and hence, inculcated in them a sense of doing something for their country and society.

       Collating with the significance of teamwork and joint movement, one must join with an organization like Arya Samaj. Doing something for the society single handed is, in fact, a difficult task for many, that gives another valid reason for joining Arya Samaj- an organization with authenticity and past. Its followers work for the promotion of Vedic culture not only in India but also in 36 other countries of the world. Arya Samaji takes it as their duty to create a way for eternal religion and do social awakening. That this society arranges to transfer legacy of our proud cultural heritage for the next generations.

        In a variety of ways, Arya Samaj is the pillar who represent the past, present, and future of Indian society. Whosoever wants to assimilate himself with the eternal Santan religion, pure Vedic form;  they should join the Samaj to progress mutual endeavors.

       Taking the pledge of saving the existence of Indian hood, let’s join the Arya Samaj and also encourage other friends, relatives, and people to be a proud part of this organization. This way, we all can contribute to make India- ‘Jagat Guru’ and lead the world in accepting the authority of Vedas.

नारी जाति के उन्नायक महर्षि दयानन्द

नारी जाति के उन्नायक महर्षि दयानन्द

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         महाभारत काल से पूर्व हमारा देश भारतवर्ष शिक्षा, संस्कृति और सयता की दृष्टि से पूर्ण विकसित था। भारतीय संस्कृति और सयता विश्व की प्राचीनतम और सर्वोन्नत सयता-संस्कृति मानी जाती है। इसीलिए समस्त विश्व इस देश को जगद्गुरु मानता था। मनुमहाराज ने भी घोषणा की थी-

एतद्देश प्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः।

स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः।।

– मनु. (2.20)

       उस समय नारी की दशा भी समानित, प्रतिष्ठित ओर स्पृहणीय थी। लगभग पच्चीस मन्त्र द्रष्ट्री ऋषिकाओं का वैदिक साहित्य में उल्लेख मिलता है। गार्गी, मैत्रेयी, सीता, अनसूया, सावित्री और मदालसा आदि प्रमुख उदाहरण नारी की उन्नत अवस्था के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

      महाभारत काल से इस देश का सर्वाङ्गीण पतन प्रारभ हो गया था और उसके साथ ही नारी की दशा भी उत्तरोत्तर निम्न होती चली गयी। हमारी पौराणिक संकीर्ण विचारधारा ने इस पतन को और अधिक गतिशील कर दिया। वेदों और उपनिषदों के उद्भट विद्वान् स्वामी शंकराचार्य ने वेदोद्धार के बहुत प्रशंसनीय कार्य किये। परन्तु नारी के महत्व को उन्होंने भी नहीं समझा और उसे ‘नरक का द्वार’ जैसा निन्दनीय विशेषण दे डाला। इतना ही नहीं ‘स्त्रीशूद्रौ नाधीयताम्’ कहकर नारी को धार्मिक शिक्षा के अधिकार से भी वंचित कर दिया । इसी परपरा में उत्तर मध्यकाल में आकर सन्त तुलसीदास ने – ‘ढोल गंवार शूद्र पशु नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी’ कहकर नारी के समान को बहुत बड़ा आघात पहुँचाया। इन सबका परिणाम यह निकला कि सामान्य समाज में नारी को पैर की जूती समझा जाने लगा।

       जिस समय इस भारत भू पर महर्षि दयानन्द का आविर्भाव हुआ उस समय नारी की अवस्था अत्यन्त दयनीय एवं शोचनीय थी। उन्होंने यह भलिभाँति अनुभव कर लिया था कि स्त्री का उत्थान हुए बिना समाज अथवा राष्ट्र का उद्धार सभव नहीं, क्योंकि स्त्री भी पुरुष की भाँति समाज रूपी गाड़ी का एक पहिया है महर्षि दयानन्द पहले समाज सुधारक थे जिन्होंने नारी-उत्थान की क्रान्ति को जन्म दिया। महर्षि ने नारी के  उद्धार के लिए अनेक प्रयत्न किए जो यहाँ संक्षेप में प्रस्तुत है-

        स्त्री-शिक्षाः- स्वामी दयानन्द ने इस रहस्य को उद्घाटित किया कि शिक्षा के बिना व्यक्ति अधूरा है। नारी भी जब तक शिक्षित नहीं होगी तब तक जागरुक नहीं हो सकती, वह अपने अस्तित्व को, अपने महत्त्व को नहीं समझ सकती। अतः वेदों की विद्या जो ताले में बन्द थी देव दयानन्द ने उसकी कुञ्जी न केवल पुरुषों के लिए अपितु स्त्रियों के लिए भी सुलभ कराते हुए वेद का प्रमाण प्रस्तुत किया-

यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेयः।

ब्रह्म राजन्यायां शूद्राय, चार्याय च स्वाय चारणायच।।

– यजुः अ. 26-2

        अर्थात् परमात्मा ने वेदों का प्रकाश मानव मात्र के लिए किया है। स्वामी जी ने सबके लिए शिक्षा की अनिवार्यता सिद्ध करते हुए सत्यार्थ-प्रकाश के तृतीय-समुल्लास में लिखा है- ”इसमें राजनियम और जातिनियम होना चाहिए कि पांचवे अथवा आठवें वर्ष से आगे कोई अपने लड़के और लड़कियों को घर में न रख सके पाठशाला में अवश्य भेज देवे, जो न भेजे वह दण्डनीय हो।” स्त्रियों को सभी प्रकार के ज्ञान की आवश्यकता पर बल देते हुए वे आगे लिखते हैं- ”जैसे पुरुषों को व्याकरण, धर्म और अपने व्यवहार की विद्या न्यून से न्यून अवश्य पढ़नी चाहिए, वैसे स्त्रियों को भी व्याकरण, धर्म, वैद्यक, गणित, शिल्प-विद्या तो अवश्य ही सीखनी चाहिए।” स्वामी जी के उक्त कथन में उनकी इस भावना की अभिव्यक्ति है कि गृह-सबन्धी आय-व्यय क लिए गणित, सन्तान को सयक्  आचरण सिखाने के लिए धर्म, गृह के सभी प्राणियों के लिए पौष्टिक और स्वास्थ्यवर्धक भोजन-पान तथा रोगी के पथ्यापथ्य के हेतु वैद्यक, गृह-निर्माण तथा अन्य वस्त्र भूषणादि सबन्धी आवश्यकताओं के लिए शिल्प व कलाओं का ज्ञान प्राप्त करना प्रत्येक नारी के लिए उचित है।

        स्त्री और धर्म :- महर्षि दयानन्द धर्म के संबंध में भी स्त्रियों को पुरुषों के समान ही धर्म-ग्रन्थों के पठन-पाठन, धार्मिक क्रियाओं के सपादन और गायत्री मन्त्र जाप आदि तथा अग्निहोत्रादि की अधिकारिणी मानते थे। महर्षि के वैदिक सिद्धान्त के अनुसार कोई भी धार्मिक-अनुष्ठान पत्नी के बिना पूर्ण नहीं माना जाता । ‘इमं मन्त्रं पत्नी पठेत’ आदि श्रौतसूत्र में वर्णित यह वाक्य इसमें स्पष्ट प्रमाण हैं। वे नारी के धार्मिक कार्यों में पुरुषों की सहभागिनी होने के प्रबल समर्थक अवश्य थे किन्तु धार्मिक कार्यों की आड़ में गृहस्थ धर्म की उपेक्षा उन्हें अग्राह्म थी। दोनों प्रकार के कर्त्तव्यों के मध्य एक सामञ्जस्य सेतु आवश्यक है। स्वामी जी की प्रेरणा के कारण ही आज आर्य समाज साधारण प्रशिक्षण के बाद महिलाओं को भी पौरोहित्य की अनुमति देता है। वैदिक परपरा में स्त्रियों को ब्रह्मा पद पर आसीन करने का उल्लेख भी मिलता है।

       स्त्री और गृहस्थ धर्मः– महर्षि दयानन्द गृहाश्रम को विषयभोगों की पूर्ति का केन्द्र न मानकर जीवन के समस्त कर्त्तव्यों, लोकमंगल और पवित्रता का एक माध्यम मानते थे। उनकी ‘संस्कार विधि’ नामक पुस्तक के विवाह प्रकरण में उद्धृत मन्त्र दापत्य जीवन के उदान्त उद्देश्य और मर्यादा का परिचायक है-

समञ्जन्तु विश्वे देवाः समापो हृदयानि नौ।

सं मातरिश्वा संघाता समु देष्ट्री दधातु नौ।

– ऋग्वेद 20-85-47

       अर्थात् दपति इस शुभ संकल्प के साथ वैवाहिक जीवन में प्रवेश करते हैं कि उन दोनों का प्रत्येक शुभ कार्य में विचारों का पूर्ण सामञ्जस्य इस प्रकार होगा जैसे दो पात्रों का जल एक पात्र में मिलकर एकरूप हो जाता है।

        पुनर्विवाहः विधवाओं की दीनदशा देखकर ऋषि का हृदय रो उठा था। बाल-विवाह की कुप्रथा के कारण छोटी-छोटी कन्याएँ सारा जीवन वैधव्य से अभिशप्त होकर नरक भोगने के लिए बाध्य थीं। ऋषि ने पुनर्विवाह की अनुमति देते हुए उपदेश मञ्जरी के बारहवें व्यायान में बलपूर्वक यह कहा था- ”ईश्वर के समीप स्त्री-पुरुष बराबर हैं, क्योंकि वह न्यायकारी है उसमें पक्षपात का लेश नहीं है। जब पुरुषों को पुनर्विवाह की आज्ञा दी जावे तो स्त्रियों को दूसरे विवाह से क्यों रोका जावे।” महर्षि की इसी प्रेरणा से प्रेरित होकर आर्य समाज ने विधवा विवाह को समाज में प्रतिष्ठित कर दिया।

       पर्दा-प्रथा का विरोधः- इस कुरीति के उच्छेद के लिए महर्षि दयानन्द के समकालीन राजा राज मोहन राय भी बंगाल में प्रयत्नशील थे। परन्तु उन दोनों के  प्रयासों में पूर्व और पश्चिम का अन्तर था। राजा राममोहन राय पाश्चात्य सयता में रंगे थे और स्वामी दयानन्द के प्रयत्न भारतीय संस्कृति की सुदीर्घ परपरा के परिप्रेक्ष्य में किये जा रहे थे। अतः महर्षि दयानन्द पर्दा-प्रथा का विरोध और महिलाओं की पूर्ण स्वतन्त्रता का समर्थन करते हुए भी उनकी स्वेच्छाचारिता और उच्छ्रंखलता को स्वीकार नहीं करते थे।

        सती-प्रथा का विरोधः- स्वामी दयानन्द के आगमन के समय समाज के कई वर्गों में पति की मृत्यु होने पर जीवित पत्नी को पति की चिता में जला दिया जाता था। इस जघन्य, नृशंस और अमानवीय प्रथा का महर्षि ने प्रबल विरोध किया। उनके इस सुधार कार्य से प्रेरित होकर अंग्रेज सरकार ने भी इस कुप्रथा को मिटाने का प्रयास किया।

        वेश्यावृत्ति का विरोधः– भारतीय समाज के मस्तक पर लगे वेश्यावृत्ति के कलंक ने स्वामी दयानन्द का हृदय झकझोर दिया था। अशिक्षा, निर्धनता, वैघव्य और सामाजिक अत्याचारों से पीड़ित होकर अनचाहे अनेक नारियों को पेट पालने के लिए यह घृणित व्यवसाय अपनाने को विवश होना पड़ता है। स्वामी दयानन्द वेश्यावृत्ति को प्रश्रय देने वाले विलासी पुरुषों को इसका उत्तरदायी मानते थे। भारत के माथे से इस कलंक को मिटाने का उन्होंने बहुत प्रयास किया। फर्रूखाबाद निवासी सेठ दीनानाथ के कुपथगामी युवा पुत्र ने स्वामी जी के उपदेश से प्रभावित होकर वेश्यागमन छोड़ दिया था। नन्हींजान नामक वेश्या के चंगुल में फंसे महाराजा जोधपुर को महर्षि ने जो कड़ी फटकार दी थी, वह तो उनकी प्रमुख वेश्यावृत्ति विरोधी घटना है। भले ही यह घटना ऋषि के प्राणान्त का कारण बनी हो, परन्तु उन्होनें कभी किसी बुराई से समझौता नहीं किया।

        वर्तमान संदर्भ में नारीः– स्वामी दयानन्द ने नारी जागरण के लिए जिस वैचारिक एवं सामाजिक क्रान्ति का सूत्रपात किया, ऋषि के उस मिशन को आगे बढ़ाते हुए आर्य समाज ने अनेक कन्या विद्यालयों एव कन्या गुरुकुलों की स्थापना की। आज तो उसके सुन्दर परिणाम हमारे समुख हैं। शिक्षा के क्षेत्र में आज नारी पुरुष से पीछे नहीं है बल्कि पिछले दशक से तो ऐसा लगने  लगा है कि नारी इस प्रतिस्पर्धा में पुरुष से आगे निकलने लगी है। परन्तु खेद की बात यह है कि महर्षि दयानन्द के मस्तिष्क में जिस शिक्षा का कार्यक्रम था वह लुप्त होता जा रहा है।

         अतः समाज का यह दायित्व है कि उचित शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए वह कटिबद्ध हो। धर्म के क्षेत्र में आज की नारी के विचार सुलझे हुए नहीं है। साक्षर होते हुए भी नारी धार्मिक आडबरों की शिकार अधिक है। आवश्यकता है धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझने और तदनुरूप आचरण करने की ताकि घोर सांसारिकता के तनावपूर्ण क्षणों से मुक्ति पाई जा सके।

       स्वामी दयानन्द द्वारा प्रदत्त नारी जागृति का यह अभियान तभी सार्थक होगा जबकि स्वयं नारी बालक की प्रथम शिक्षिका बनने से लेकर सामाजिक चेतना को उचित दिशा देने का गुरुतर दायित्व वहन करे।

       नारी विषयक उक्त समस्त समस्याओं के मूल में अशिक्षा अथवा उचित शिक्षा का अभाव ही मुय कारण रहा है। अभी नारी की स्थिति में परिवर्तन का संघर्ष काल चल रहा है और समय की परिवर्तनशील गति के साथ समस्याएँ भी बदलती रही है। अब समय आ गया है कि समाज की जागरूक संस्थाओं के विद्वान् और चिन्तक आज की नारी समस्याओं को पहचान कर तद्विषयक उचित समाधानों के सुझाव और प्रसार का प्रयत्न करें। स्वामी दयानन्द के नारी सबन्धी क्रान्तिकारी कार्यक्रम आधुनिक प्रगतिशील संस्कृति में और भी अधिक प्रासंगिक सिद्ध हो रहे हैं। इसलिए हम निर्विवाद रूप से यह घोषणा कर सकते हैं कि वर्तमान युग की नारी – उत्थान क्रान्ति के सर्वाधिक सक्रिय उन्नायक महर्षि दयानन्द ही थे । परवर्ती सभी सुधारकों ने उन्हीं के कार्यक्रम का अनुगमन किया है।

‘मैं और मेरा आचार्य दयानन्द’

‘मैं और मेरा आचार्य दयानन्द’

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         देश व संसार में अनेक मत-मतान्तर हैं फिर हमें उनमें से ही किसी एक मत को चुन कर उसका अनुयायी बन जाना चाहिये था। यह वाक्य कहने व सुनने में तो अच्छा लगता है परन्तु यह एक प्रकार से सार्थक न होकर निरर्थक है। हमें व प्रत्येक मनुष्य को यह ज्ञान मिलना आवश्यक है कि वह कौन है, कहां से आया है, मरने पर कहां जाता है, किन कारणों से उसे अपने माता-पिता से जन्म मिला, किसी धनिक के यहां जन्म क्यों नहीं हुआ, धनिक का निर्धन के यहां क्यों नहीं हुआ, किसने इस संसार को बनाया है और कौन इसका धारण, पोषण व संचालन करता है? संसार को बनाने वाली वह सत्ता कहां है, दिखाई क्यों नहीं देती, उसका नाम क्या है? क्या किसी ने कभी उसको देखा है? हम स्वयं अपनी मर्जी से पैदा नहीं हुए हैं, जिसने हमें उत्पन्न किया है, उसका हमें जन्म देने का उद्देश्य क्या था व है? ऐसे अनेकानेक प्रश्नों के सही  समाधानकारण उत्तर जहां से प्राप्त हों  जिनसे जीवन का उद्देश्य जानकर उसकी प्राप्ति के सरल  समुचित साधनों का ज्ञान मिलता हैमनुष्य को उसी धर्म का धारण  पालन करना चाहिये। ऐसा न करके मनुष्य अपने जीवन का सदुपयोग नहीं करता और हो सकता है व होता है, वह सुदीर्घ काल, सैकड़ों, हजारों व लाखों वर्ष तक नाना प्रकार के दुःखों व निम्न से निम्न योनियों में जन्म लेकर दुःखों से आक्रान्त रहे।

        हमने अपने मित्रों की प्रेरणा से पौराणिक परिवार में जन्म लेने पर भी आर्यसमाज के सत्संगों में भाग लेना आरम्भ किया और उसके साहित्य मुख्यतः सत्यार्थ प्रकाश, पंच-महायज्ञविधि आदि का अध्ययन किया। वैदिक विद्वानों व सच्चे महात्माओं के प्रवचनों को सुनकर व साहित्य को पढ़कर हमारे उपर्युक्त सभी प्रश्नों वच भ्रमों का समाधान हो गया जो अन्यथा नहीं हो सकता था। अतः हमारा कर्तव्य बनता था कि हमें जो सत्य ज्ञान मिला है, उससे हम अपने मित्रों व अन्यों को भी लाभान्वित करें। अतः इस कर्तव्य भावना से अधिकारी विद्वान न होने पर भी हमने अपना स्वाध्याय जारी रखा और लेखन के द्वारा अनेकानेक विभिन्न विषयों पर, जो जो हमें सत्य प्रतीत हुआ, उसे लोगों तक पहुंचाने का प्रयास किया। आज हम अपने बारे में यह कह सकते हैं कि हम स्वयं से परिचित हैं। मैं कौन हूं, क्या हूं, कहां से आया हूं, कहां-कहां जा सकता हूं, मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है, उसकी प्राप्ति के साधन क्या हैं, यह संसार किससे बना और कौन इसे चला रहा है? ऐसे सभी प्रश्नों का उत्तर मिला जिसका पूर्ण श्रेय मेरे आचार्य महर्षि दयानन्द सरस्वती को है। संक्षेप में हम इन सभी प्रश्नों के उत्तर इस संक्षिप्त लेख में देने का प्रयास करते हैं।

        मैं जीवात्मा हूं जो कि एक चेतन तत्व है। चेतन होने के कारण ही मुझे सुख व दुःख की अनुभूति होती है। मैं एकदेशी हूं अर्थात् व्यापक नहीं हूं। शास्त्रों ने जीवात्मा का परिमाण बताया है। यह अत्यन्त सूक्ष्म है। एक शास्त्रकार ने कहा है कि हमारे सिर के बाल का अग्रभाग लें, फिर उसके 100 टूकड़े करें, फिर इन सौ में से एक टुकडें के भी सौ टुकड़े करें, इसका एक टुकड़ा अर्थात् सिर के बाल के अग्रभाग का दस सहस्रवां टुकड़ा जीवात्मा के लगभग बराबर व उससे भी सूक्ष्म होगा। यह बात विचार, चिन्तन व गवेषणा से सत्य सिद्ध होती है। मैं अर्थात् जीवात्मा अनादिनित्यअजरअमरअविनाशी  सत्यासत्य का जानने वाला होता है परन्तु अविद्यादि कुछ दोषों से सत्य को छोड़ असत्य में झुक जाता है। ज्ञान  कर्म जीवात्मा के दो लक्षण कहे जा सकते हैं। सृष्टिकाल में सभी जीवात्माओं को उनके पूर्व कर्मानुसार जन्म  भोग प्राप्त होते हैं। इस जन्म में हमें जो माता-पिता, संबंधीं व अन्य परिस्थितियां, सुख-दुःख आदि मिले हैं वह अधिकांशतः पूर्व जन्मों के कर्मों के फलों जिसे प्रारब्ध कहते हैं व इस जन्म के क्रियमाण कर्मों के कारण प्राप्त हुए  हैं। हमें जन्म, सुख-दुःख रूपी भोगों को देने वाली, वस्तुतः एक सत्ता ईश्वर है। ईश्वर ही सृष्टि को बनाने व धारण-पोषण अर्थात् संचालित करने वाली सत्ता है। ईश्वर परम धार्मिक है। वह सत्य, दया व करूणा से सराबोर है। उसके गुण, कर्म, स्वभाव सर्वदा समान रहते हैं, उनमें विपरीतता कभी नहीं आती। संसार में ईश्वर से इतर अत्यन्त सूक्ष्म मूल प्रकृति है, यह चेतन न होकर जड़ है।  यह प्रकृति ईश्वर व जीव की ही तरह अनादि, नित्य, अविनाशी है तथा अत्यन्त सूक्ष्म, सत्व-रज-तम गुणों वाली है। यइ ईश्वर के अधीन होती है। इसे सृष्टि का उपादान कारण कहते हैं। ईश्वर इस सृष्टि का निमित्त कारण है। इस प्रकृति को ही ईश्वर परिवर्तित कर वर्तमान सृष्टि अर्थात् नाना सूर्य, चन्द्र, ग्रह, उपग्रह, पृथिवी आदि का निर्माण सृष्टि काल के आरम्भ में करता है। इसी प्रकार के निर्माण वह इससे पूर्व के कल्पों में करता रहा है तथा इस कल्प के बाद के कल्पों में भी करेगा। यह सृष्टि 4 अरब 32 करोड़ वर्षों तक इसी प्रकार से विद्यमान रहती है। इस गणना का आरम्भ ईश्वर द्वारा सृष्टि का निर्माण करने के दिन से होता है। इसके बाद पुरानी हो जाने के कारण इसकी प्रलय अवस्था आती है जब यह छिन्न भिन्न होकर अपनी मूल अवस्था, जो सत्व, रज व तम गुणों वाली अत्यन्त सूक्ष्म होती है, में परिवर्तित हो जाती है। यह प्रलयावस्था भी 4 अरब 32 करोड़ वर्षों तक रहती है, जो कि ईश्वर की रात्रि कहलाती है तथा जिसके पूरा होने पर ईश्वर पुनः सृष्टि बनाता है और प्रलय से पूर्व की जीवात्माओं को उनके कर्मानुसार वा प्रारब्ध के अनुसार मनुष्य, पशु, पक्षी आदि के रूप में जन्म देता है।

         ईश्वर के बारे में यह जानना भी उचित होगा कि ईश्वर सत्य, चित्त व आनन्द स्वरूप है। वह निराकार व सर्वव्यापक है। वह किसी एक स्थान, आसमान, समुद्र आदि में नहीं रहता अपितु सर्वव्यापक है। वह सर्वज्ञ अर्थात् सभी विषयों का पूर्ण ज्ञान रखता है और सर्वशक्तिमान है। वह न्यायकारी व दयालु भी है। वह सनातन, नित्य, अनादि, अनुत्पन्न, अजर, अमर, अभय, नित्य व पवित्र है। वह सर्वव्यापक व अतिसूक्ष्म होने के कारण सब जीवात्माओं के भीतर भी विद्यमान व प्रविष्ट है। अतः जीवात्मा का कर्तव्य है कि वह स्वयं व ईश्वर के सत्य स्वरूप को जाने। यह सत्य स्वरूप हमने सत्यार्थ प्रकाश आदि ग्रन्थों से ही जाना है। अन्य सभी ग्रन्थों व मत-मतान्तरों की पुस्तकों को पढ़ने से अनेक सन्देह उत्पन्न होते हैं जिनका वहां निवारण नहीं होता। सत्यार्थ प्रकाश में सभी बातें, मान्यतायें व सिद्धान्त महर्षि दयानन्द जी ने वेदों व वैदिक ग्रन्थों से लेकर मानवमात्र के हित व सुख के लिए सरल आर्यभाषा हिन्दी में वेद प्रमाण, युक्ति व प्रमाणों आदि सहित प्रस्तुत की हैं। यदि वह यह ग्रन्थ संस्कृत में लिखते तो फिर हम संस्कृत  जानने के कारण उससे लाभान्वित  हो पाते और तब हम अज्ञानी ही रहते और मतमतान्तरों का अपना कारोबार यथापूर्व चलता रहता। हमारा कर्तव्य है कि हम ईश्वर को जानकर उसकी उपासना करें। यद्यपि ईश्वर हमारी आत्मा में व्यापक है, अतः उपासना अर्थात् वह हमारे निकट तो सदा से है परन्तु उपासना में ईश्वर की स्तुति व प्रार्थना भी सम्मिलित है। यह स्तुति, प्रार्थना व उपासना ईश्वर के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन ही है जैसे कि किसी से उपकृत होने पर हम धन्यवाद कहते हैं। उपासना करने से हमारे गुण-कर्म-स्वभाव सुधर कर ईश्वर के गुणों के अनुरूप यथासम्भव हो जाते हैं। ईश्वर ने हमारे लिये यह विशाल संसार बनाया, इसे चला रहा है, इसमें हमारे सुख के लिए नाना प्रकार की भोग सामग्री बनाई है और हमें मानव जन्म व माता-पिता-बन्धु-बान्धव-इष्टमित्र-आचार्य-ऋषि आदि प्रदान किये हैं। अतः कृतज्ञता ज्ञापन करना हमारा कर्तव्य है अन्यथा हम कृतघ्न होंगे। यदि हम किसी की कोई सहायता करते हैं तो हम भी चाहते हैं कि वह हमारे प्रति कृतज्ञता का भाव रखे। इस भावना की अभिव्यक्ति का नाम ही उपासना है जिसमें स्तुति व प्रार्थना भी सम्मिलित है। नियमित  यथार्थ विधि से उपासना करने से ही ईश्वर का जीवात्मा में साक्षात्कार भी होता है। यह अतिरिक्त फल उपासना का होता है। ईश्वर साक्षात्कार की अवस्था के बाद जीवन मुक्ति का काल होता है जिसमें मनुष्य उपकार के कार्यों को करता हुआ कर्मों के बन्धन में नहीं फंसता और मृत्यु आने पर जन्म मरण से मुक्त होकर ब्रह्मलोक अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति करके ईश्वर के सान्निध्य से आनन्द का भोग करता है। यही जीवन का अन्तिम लक्ष्य है जो सच्चे ईश्वर को जानकर उपासना करने से प्राप्त होता है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ही हमारा जन्म हुआ है। सृष्टि के आरम्भ से सभी ऋषिमुनि  विद्वान इस पथ पर चले हैं और हमें भी उनका अनुकरण  अनुसरण करना है। इस पथ पर चलने के लिए महर्षि दयानन्द की शिक्षा है कि हमारे सभी कार्य व व्यवहार सत्य पर आधारित होने चाहिये। वह सत्याचार को ही मनुष्यों का यथार्थ व अनिवार्य धर्म बताते हैं। इसके विपरीत असत्य व दुष्टाचार ही अधर्म है।

        ईश्वर, जीव व प्रकृति विषयक यह समस्त ज्ञान सृष्टि क्रम के अनुकूल व साध्य कोटि का है और वेदों व ऋषि मुनियों के जीवन व उनके सत्य उपदेशों से प्रमाणित है। इसके विपरीत ज्ञान व क्रियायें अज्ञान व मिथ्याचार हैं। यह ज्ञान मुझे मेरे आचार्य महर्षि दयानन्द सरस्वती से प्राप्त हुआ है। महर्षि दयानन्द का जन्म गुजराज के राजकेाट जिले के एक कस्बे टंकारा में पिता श्री कर्षनजी तिवारी के यहां 12 फरवरी, सन् 1825 को हुआ था। 14 वर्ष की आयु में शिवरात्रि के दिन उन्होंने पिता के कहने से कुल परम्परा के अनुसार शिवरात्रि का व्रत किया था। देर रात्रि शिवलिंग पर चूहों को उछलते-कूदते देखकर उन्हें मूर्तिपूजा की असारता व मिथ्या होने का ज्ञान हुआ था। कुछ काल बाद उनकी एक बहिन व चाचा की मृत्यु होने पर उन्हें वैराग्य हो गया था। 21 वर्ष तक उन्होंने माता-पिता के पास रहते हुए संस्कृत, यजुर्वेद व अन्य ग्रन्थों का अध्ययन किया था। 22 वर्ष की अवस्था में वह सच्चे ईश्वर व मुक्ति के उपायों की खोज व उनके पालन के लिये गृहत्याग कर देशभर में विद्वानों, साधु-सन्यासियों, योगियों के सम्पर्क में आये। मथुरा में प्रज्ञाचक्षु गुरू विरजानन्द से उन्होंने आर्ष संस्कृत व्याकरण अष्टाध्यायी-महाभाष्य-निरुक्त प़द्धति से अध्ययन कर सन् 1863 में गुरू की आज्ञा से संसार से धार्मिक व सामाजिक क्रान्ति सहित समग्र अज्ञान व अन्धकार दूर करने के लिये कार्य क्षेत्र में प्रविष्ट हुए। उन्होंने मौखिक प्रवचन, उपदेश, व्याख्यान, शास्त्रार्थ, शंका समाधान, ग्रन्था लेखन द्वारा देश भर में घूम घूम कर प्रचार किया। प्रचार के निमित्त ही उन्होंने सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय, ऋग्वेद-यजुर्वेद भाष्य संस्कृत व हिन्दी में, पंचमहायज्ञविधि, व्यवहारभानु, गोकरूणानिधि आदि अनेक ग्रन्थों का प्रकाशन किया। नवम्बर, 1869 में उन्होंने काशी के 30 से अधिक शीर्षस्थ सनातनी विद्वानों से मूर्तिपूजा पर शास्त्रार्थ कर उन्हें पराजित किया था। मूर्तिपूजा वेद सम्मत सिद्ध नहीं हो सकी थी न ही आज तक हो पायी है। उनके अनेक विरोधियों ने उन्हें जीवन में अनेक बार विष दिया। ऐसी ही विष देने की एक घटना जोधपुर में घटी। स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती के अनुसार इस षडयन्त्र में अंग्रेज सरकार भी सम्मिलित रही हो सकती है। इसके परिणाम स्वरूप 30 अक्तूबर, 1883 को दीपावली के दिन अजमेर में उनका देहावसान हो गया। उन्होंने जिस प्रकार से अपने प्राण त्यागे उससे लगता है कि यह कार्य उन्होंने शरीर के जीर्ण होने पर ईश्वर की प्रेरणा से स्वतः किया। स्वामी जी ने अज्ञान, अंधविश्वासों का खण्डन किया, सामाजिक विषमता को दूर किया, स्त्री व शूत्रों को वेदाध्ययन का अधिकार दिया, विधवाओं को पुनर्विवाह का अधिकार तथा समाज से सामाजिक विषमता और अस्पर्शयता को समाप्त किया। लोगों को ईश्वर व जीवात्मा का ज्ञान कराकर सच्ची ईश्वर भक्ति सिखाई और जीवन मुक्ति के लिए मृत्यु व मोक्ष के सत्य स्वरूप का प्रचार किया। देश की आजादी भी उनके प्रेरणाप्रद विचारों व आर्यसमाज के सदस्यों वा अनुयायियों के पुरूषार्थ की देन है।

 मेरे आचार्य दयानन्द मेरे ही नहीं अपितु सम्पूर्ण संसार के आचार्य हैं। उन्होंने अज्ञानान्धकार में डूबे विश्व को सत्य ज्ञान रूपी अमृत ओषधि का पान कराया और उसे मोक्ष मार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा की। मैं अपने आचार्य का कोटि कोटि ऋणी हूं। संसार के सभी लोग भी उनके ऋणी हैं परन्तु अपनी अविद्याअपने प्रयोजन की सिद्धिहठ  दुराग्रह आदि कारणों से उससे लाभ नहीं ले पा रहे हैं। संसार के प्रत्येक मनुष्य को महर्षि दयानन्द रचित साहित्य का अध्ययन करमतमतान्तरों  अज्ञानी धर्मगुरूओं के चक्र में  फंस करअपने जीवन को सफल करना चाहिये। ईश्वर सबको सदबुद्धि प्रदान करें। महर्षि दयानन्द को कोटिशः नमन।

मनमोहन कुमार आर्य

स्वराज्य वा स्वतन्त्रता के प्रथम मन्त्र-दाता महर्षि दयानन्द

स्वराज्य वा स्वतन्त्रता के प्रथम मन्त्र-दाता महर्षि दयानन्द

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        महाभारत काल के बाद देश में अज्ञानता के कारण अन्धविश्वास व कुरीतियां उत्पन्न होने के कारण देश निर्बल हुआ जिस कारण वह आंशिक रूप से पराधीन हो गया। पराधीनता का शिंकजा दिन प्रतिदिन अपनी जकड़ बढ़ाता गया। देश अशिक्षा, अज्ञान, अन्धविश्वास, पाखण्ड व सामाजिक विषमताओं से ग्रस्त होने के कारण पराधीनता का प्रतिकार करने में असमर्थ था। सौभाग्य से सन् 1825 में गुजरात में महर्षि दयानन्द का जन्म होता है। लगभग 22 वर्ष तक अपने माता-पिता की छत्र-छाया में उन्होंने संस्कृत भाषा व शास्त्रीय विषयों का ज्ञान प्राप्त किया। इससे उनकी तृप्ति नहीं हुई। ईश्वर के सच्चे स्वरूप का ज्ञान और मृत्यु पर विजय कैसे प्राप्त की जा सकती है, इसके उपाय ढूंढने के लिये वह घर से निकल गये और लगभग 13 वर्षों तक धार्मिक विद्वानों व योगियों आदि की संगति तथा धर्म ग्रन्थों का अनुसंधान करते रहे। इसी बीच सन् 1857 ईस्वी का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम भी हुआ जिसे अंग्रेजों ने कुचल दिया। इसमें महर्षि दयानन्द की सक्रिय भूमिका होने का अनुमान है परन्तु इससे सम्बन्धित जानकारियां उन्होंने विदेशी राज्य होने के कारण न तो बताई और न ही उनका किसी ने अनुसंधान किया। इसके बाद सन् 1860 में मथुरा में दण्डी गुरू स्वामी विरजानन्द के वह अन्तेवासी शिष्य बने और उनसे आर्ष संस्कृत व्याकरण और वेदादि शास्त्रों का अध्ययन किया। गुरु व शिष्य धार्मिक अन्धविश्वासों, देश के स्वर्णिम इतिहास व पराधीनता आदि विषयों पर परस्पर चर्चा किये करते थे। अध्ययन पूरा करने पर गुरु ने स्वामी दयानन्द को देश से अज्ञान, अन्धविश्वास, सामाजिक असमानता व विषमता दूर करने का आग्रह किया। स्वामी दयानन्द जी ने गुरु को इस कार्य को प्राणपण से करने का वचन किया और सन् 1863 में इस कार्य को आरम्भ कर दिया।

        स्वामी जी सन् 1874 में काशी में यथार्थ वेदोक्त धर्म का प्रचार, समाज सुधार के कार्य व अन्धविश्वासों का खण्डन कर रहे थे। उनके एक भक्त राजा जयकृष्ण दास ने उन्हें अपने समस्त विचारों, वैदिक मान्यताओं व सिद्धान्तों का एक ग्रन्थ लिखने का आग्रह किया। अल्प काल में ही महर्षि दयानन्द ने यह ग्रन्थ लिख कर पूरा कर दिया जिसको सत्यार्थ प्रकाश नाम दिया गया। लेखक ने इस ग्रन्थ का पुनः एक नया संशोधित संस्करण तैयार किया जो अक्तूबर, सन् 1883 में पूर्ण हो कर छपना आरम्भ हो गया था और सन् 1884 में प्रकाशित हुआ। इससे पूर्व यह जानना आवश्यक है कि महर्षि दयानन्द वेद एवं समस्त वैदिक वांग्मय के पारदर्शी व अपूर्व विद्वान थे। उन्होंने अपने दिव्य ज्ञान चक्षुओं से जान लिया था कि ईश्वर, जीव व प्रकृति के समस्त सत्य रहस्य वेद और वैदिक साहित्य में निहित हैं। अन्य जितने में भी मत-मतान्तर उनके समय में प्रचलित थे वह सभी अज्ञान व असत्य मान्यताओं से युक्त थे व आज भी हैं। सभी मतों के धर्म ग्रन्थों में असत्य व अन्धविश्वासयुक्त मान्यताओं की भरमार थी जिसका दिग्दर्शन उन्होंने सत्यार्थ प्रकाश में किया है। देश की पराधीनता और इस कारण देश व देशवासियों के शोषण व उन पर होने वाले अत्याचारों से भी वह परिचित थे। वह जान गये थे कि पराधीनता का भी मुख्य कारण एक सत्य वेदोक्त मत का पराभव व नाना वेद विरुद्ध मतों का आविर्भाव, उनका प्रचलन व सामाजिक विषमता आदि थे। अतः सत्यार्थ प्रकाश के आठवें समुल्लास में सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति व प्रलय पर विचार करते हुए उन्होंने पराधीनता पर अपना ध्यान केन्द्रित कर व अपनी जान जोखिम में डालकर देश की स्वतन्त्रता का मूल मन्त्र देशवासियों को दिया। इस घटना के प्रकाश के कुछ समय बाद ही एक षडयन्त्र के अन्तर्गत उनका विषपान कराये जाने व समय पर समुचित चिकित्सा न होने के कारण देहावसान हो गया।

         सन् 1883 में जिन दिनों महर्षि दयानन्द ने देश की आजादी विषयक यह पंक्तियां लिखी जिनकी चर्चा हम आगे करेंगे, उस समय देश में सजग धार्मिक संस्था के रूप में हम ब्रह्म समाज को पाते हैं जिसके संस्थापक राजा राममोहन राय रहे हैं। यह मत व सम्प्रदाय तथा इसके संस्थापक अंग्रेजों के राज्य को भारत पर वरदान के रूप में देखता था। इससे आजादी विषयक विचार मिलने की सम्भावना नहीं थी। हमारे सनातन धर्म के विद्वानों की क्या स्थिति थी, इसका वर्णन वीर सावरकर जी ने किया है जो कि आर्य जगत प्रख्यात विद्वान प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु जी के शब्दों में प्रस्तुत करते हैं। वह अपनी पुस्तक इतिहास प्रदूषण में लिखते हैं कि वीर सावरकर जी ने अपनी आत्मकथा में ऋषि दयानन्द तथा आर्य समाज से प्राप्त ऊर्जा व प्रेरणा की खुलकर चर्चा की है। यदि ये बन्धु (श्री आर्यमुनि, मेरठ और उनका वेदपथ पत्रिका में प्रकाशित एक लेख) लार्ड रिपन के सेवा निवृत्त होने पर काशी के ब्राह्मणों द्वारा उनकी शोभा यात्रा में बैलों का जुआ उतार कर उसे अपने कन्धों पर धर कर उनकी गाड़ी को खींचने वाला प्रेरक प्रसंग उद्धृत कर देते तो पाठकों को पता चल जाता कि इस विश्व प्रसिद्ध क्रान्तिकारी को देश के लिए जीने मरने के संस्कार व विचार देने वालों में ऋषि दयानन्द अग्रणी रहे। अतः सनातन धर्म के विद्वानों से भी अंग्रेजों के भारत से वापिस जाने और देश को स्वतन्त्र करने की मांग की आशा नहीं की जा सकती थी। यह महर्षि दयानन्द ही थे जिन्होंने अपने गुरू विरजानन्द प्रदत्त वैदिक संस्कारों के आधार पर परतन्त्रता का विरोध किया और सत्यार्थ प्रकाश में लिखा कि ”कोई कितना ही करे परन्तु जो स्वदेशीय राज्य होता है वह सवार्वेपरि उत्तम होता है। अथवा मत-मतान्तर के आग्रहरहित, अपने और पराये का पक्षपातशून्य, प्रजा पर पिता माता के समान कृपा, न्याय और दया के साथ विदेशियों का राज्य भी पूर्ण सुखदायक नहीं है। परन्तु भिन्न-भिन्न भाषा, पृथक्-पृथक् शिक्षा, अलग व्यवहार का विरोध छूटना अति दुष्कर है। बिना इसके छूटे परस्पर का पूरा उपकार और अभिप्राय (देश में स्वराज्य, अज्ञान व अन्धविश्वास रहित वैदिक धर्म का पालन) सिद्ध होना कठिन है।” इससे पूर्व महर्षि दयानन्द ने भारत में विदेशी शासन का कारण बताते हुए लिखा है कि अब अभाग्योदय सेऔर आर्यों के आलस्यप्रमादपरस्पर के विरोध से अन्य देशों के राज्य करने की तो कथा ही क्या कहनीकिन्तु आर्यावत्र्त में आर्यों का अखण्डस्वतन्त्रस्वाधीननिर्भय राज्य इस समय नहीं है। जो कुछ हैसो भी विदेशियों के पादाक्रान्त हो रहा है। कुछ थोड़े राजा स्वतन्त्र है। दुर्दिन जब आता हैतब देशवासियों को अनेक प्रकार का दुःख भोगना पड़ता है।

        महर्षि दयानन्द लिखित यह स्वर्णिम शब्द ही देश की आजादी के आधार वाक्य बने। इस समय तक देश में किसी राजनीतिक दल का कोई नेता नहीं था। कांगे्रस की स्थापना सन् 1885 में महर्षि दयानन्द के इन वाक्यों के कई वर्ष बाद हुई। अतः आज देश भर में जो स्वतन्त्रता दिवस की अड़सठवीं वर्षगांठ बनाई जा रही है उसकी प्राप्ति के लिए सन् 1883 में मन्त्र व विचार प्रस्तुत करने का श्रेय महर्षि दयानन्द को है। दुःख है कि सारा देश महर्षि दयानन्द के इस योगदान पर मौन है। 21 वीं शताब्दी में इससे बड़ा आश्चर्य क्या हो सकता है? स्वामी दयानन्द के स्वदेशीय राज्य को सर्वोत्तम बताने पर टिप्पणी करते हुए आर्यजगत के विख्यात विद्वान स्वामी विद्यानन्द सरस्वती ने अपनी टिप्पणी में लिखा है कि भारत में अंग्रेज व्यापारी बन कर आये। व्यापार के लिए उन्होंने ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना की। धीरे-धीरे यही कम्पनी भारत में अंग्रेजी राज्य का आधार बन गई। उसकी अपनी सेना थी। इस सेना और भारतीय रियासतों के परस्पर संघर्ष के फलस्वरूप किसी भी एक पक्ष के सैनिक बल की सहायता से वह देश पर अधिकार करती गई। 1849 में पंजाब की विजय के साथ उसका यह अभियान पूरा हो गया और समूचे देश में यूनियन जैक फहराने लगा, परन्तु विज्ञान का नियम है–’To every action there is an equal and opposite reaction’ अर्थात प्रत्येक क्रिया की उतनी ही जोरदार और विरोधी प्रतिक्रिया होती है। भारतीयों के भीतर विद्रोह की आग सुलगने लगी, और 10 मई 1857 को ज्वाला बनकर भड़क उठी और देश के कोने-कोने में फैल गई। परन्तु कुछ ही दिनों में यह आग ठण्डी पड़ गई और भारतीय लोग खून का घूंट पीकर रह गये। इस क्रिया की प्रतिक्रिया भी अवश्यंभावी थी। ब्रिटिश सरकार ने कूटनीति का सहारा लिया। महारानी विक्टोरिया ने एक घोषणापत्र (Proclamation) जारी किया। उसकी भाषा बड़ी लुभावनी थी, पर एक व्यक्ति इस कूटनीतिक चाल को भांप गया। उसने अपने ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश में एक घोषणा की जिसे उपर्युक्त पंक्तियों प्रस्तुत किया गया है।

         सुराज्य भी स्वराज्य का विकल्प नहीं होता–’Good government is no substitute for self-government.’ इसके उद्घोषक ग्रन्थकार दयानन्द ने अपनी प्रार्थना पुस्तक (Prayer book) आर्याभिविनय के माध्यम से अपने अनुयायियों को आदेश दिया कि वे प्रतिदिन प्रार्थना किया करें कि अन्य देशवासी राजा हमारे देश में  हों तथा हम पराधीन कभी  रहें। भारत के सन्दर्भ में कहा जा सकता है कि यह पूरी तरह वही घोषणा थी जिसके द्वारा 8 अगस्त 1929 को महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो और 31 दिसम्बर 1929 को लाहौर में उसके लिए संघर्ष करने की घोषणा की थी। इससे पूर्व 1906 में दादाभाई नौरोजी ने इसका उच्चारण किया था। किन्तु स्वामी दयानन्द ने 1875 में जब स्वराज्य का विचार भी किसी के मस्तिष्क में भी नहीं उपजा या पूर्ण स्वराज्य ही नहीं, चक्रवर्त्ती साम्राज्य की घोषणा की थी। आज जबकि अंग्रेज भारत छोड़ कर जा चुके हैं और हम स्वाधीनता का रसास्वादन कर रहे हैं तो कितने लोग है जो यह जानते हैं कि एक बार एक अंग्रेज कलक्टर ने स्वामी दयानन्द जी का भाषण सुनने के बाद कहा था कि यदि आपके भाषण पर लोग चलने लग जाएं तो इसका परिणाम यह होगा कि हमें अपना बोरिया बिस्तर बांधना पड़ेगा। स्वामी दयानन्द के ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश के वचनों तथा भावनाओं का गम्भीर अध्ययन करनेवाले 1911 की जनसंख्या के अध्यक्ष मिस्टर ब्लण्ट ने लिखा था-“Dayanand was not merely a religious reformer, he was also a great patriot.  It would be fair to say that with him religious reform was a mere means to national reform.” (Census Report of 1911, Vol. XV, Part I, Chap. IV, P. 135) अर्थात् दयानन्द केवल धार्मिक सुधारक नहीं थे, वे एक महान् देशभक्त भी थे। यह कहना ठीक ही होगा कि उन्होंने धार्मिक सुधार को राष्ट्रीय सुधार के साधनरूप में ही अपनाया था।

         इस लेख के माध्यम से हम यह बताना चाहते हैं कि महर्षि दयानन्द ही देश की आजादी के प्रथम मन्त्रदाता वा स्वराज्य और स्वतन्त्रता का विचार देने वाले महापुरूष थे। स्वामी दयानंद ने अपने ग्रन्थों व प्रवचनों में व अन्यत्र भी देशभक्ति के नाना विचार प्रस्तुत किये। देश की स्वतन्त्रता में उनका व उनके अनुयायी आर्यसमाजियों का प्रमुख योगदान है। अतः आज स्वतन्त्रता दिवस के दिन महर्षि दयानन्द और आर्य समाज के योगदान की भी चर्चा करना आवश्यक है। यह बताना भी उचित होगा कि क्रान्तिकारी के आद्य गुरू पं. श्यामजी कृष्ण वम्र्मा, श्री गोपाल कृष्ण गोखले के राजनीतिक गुरू महादेव गोविन्द रानाडे, समाज सुधारक व आजादी के प्रमुख नेता स्वामी श्रद्धानन्द, लाला लाजपतराय, भाई परमानन्द, पं. राम प्रसाद बिस्मिल आदि भी महर्षि दयानन्द की शिष्य मण्डली के ही व्यक्ति थे। देश की आजादी के आन्दोलन में देश के सभी आर्यसमाजियों ने किसी न किसी रूप में भाग लिया था जिस कारण देश आजाद हुआ। महर्षि दयानन्द ने देश की आजादी, धार्मिक व समाज सुधार में जो योगदान किया उसके लिये देशवासियों ने उनका सही मूल्यांकन कर उनके साथ न्याय नहीं किया। देखें, कि कब तक देश उनकी उपेक्षा करता है? आज स्वतन्त्रता दिवस पर भी हमें उनकी उपेक्षा स्पष्ट दिखाई दे रही है। यदि यही शब्द किसी अन्य व्यक्ति ने कहे होते व उनके व आर्यसमाज जैसा योगदान किसी अन्य संस्था ने किया होता तो आज उसकी देश भर में जयजयकार हो रही होती। इसी के साथ हम इस लेख को विराम देते हैं।

मनमोहन कुमार आर्य

वेदो का विज्ञानं मानवमात्र के लिए

वेदो का विज्ञानं मानवमात्र के लिए

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।। ओ३म ।।

अयं त इध्म आत्मा जातवेदः।

“हे अग्ने ! तेरे लिए सबसे पहला ईंधन “अयं आत्मा” – अर्थात यह यजमान – स्वयं है।”

      वेदो का विज्ञानं मानवमात्र के लिए :

क्षयरोग (TB – Tuberculosis) से बचाव और उपचार करता है यज्ञ।

सूर्य का प्रकाश मनुष्य के लिए वैसे भी लाभदायक है। इससे शरीर में विटामिन डी बनता है, जिससे हड्डियां पुष्ट होती हैं। उदय और अस्त होने वाले सूर्य की किरणे तो और भी अधिक गुणकारी होती हैं।

उद्यन्नादित्यः क्रिमिहन्तु निम्रोचन्हन्तु रश्मिभिः।
ये अन्तः क्रिमयो गवि।।

(अथर्ववेद २।३२।१)

         “उदय होता हुआ और अस्त होने वाला सूर्य अपनी किरणों से भूमि और शरीर में रहने वाले रोगजनक कीटो का नाश करता है।”

सूर्य का प्रकाश कृमिनाशक है। रोबर्ट काउच ने सन १८९० में अनेको प्रयोगो द्वारा यह सिद्ध किया की क्षयरोग (फेफड़ो के क्षयरोग को छोड़कर) के कीटाणु इस प्रकाश में दस मिनट से अधिक समय तक जीवित जीवित नहीं रह सकते। इसलिए क्षयरोग से ग्रस्त व्यक्ति को धुप सेकनी चाहिए।

संभवतः जनसाधारण में इसको यह कहकर मान्यता प्रदान की जाती है की अँधेरे में क्षयरोग फूलता फलता है तथा प्रकाश में यह दम दबाकर भाग जाता है।

अतः यज्ञ के लिए सूर्योदय के पश्चात तथा सूर्यास्त से पूर्व का समय ही ठीक है।

आधुनिक विज्ञानं के अनुसार सूर्य की धुप क्षयरोग के लिए बचाव और उपचार दोनों है

अब इस समय पर यज्ञ करना लाभदायक ही होगा क्योंकि यज्ञ में प्रयुक्त होने वाली सामग्री में मुख्य रूप से गौघृत, खांड अथवा शक्कर, मुनक्का, किशमिश आदि सूखे फल जिनमे शक्कर अधिक होती है, चावल, केसर और कपूर आदि के संतुलित मिश्रण से बनी होती है।

अब इस विषय पर कुछ वैज्ञानिको के विचार :

१. फ्रांस के विज्ञानवेत्ता ट्रिलवर्ट कहते हैं : जलती हुई शक्कर में वायु – शुद्ध करने की बहुत बड़ी शक्ति होती है। इससे क्षय, चेचक, हैजा आदि रोग तुरंत नष्ट हो जाते हैं।

२. डॉक्टर एम टैल्ट्र ने मुनक्का, किशमिश आदि सूखे फलो को जलाकर देखा है। वे इस निर्णय पर पहुंचे हैं की इनके धुंए में टायफाइड ज्वर के रोगकीट केवल तीस मिनट तथा दूसरी व्याधियों के रोगाणु घंटे – दो घंटे में मर जाते हैं।

३. प्लेग के दिनों में अब भी गंधक जलाई जाती है, क्योंकि इसमें रोगकीट नष्ट होते हैं। अंग्रेजी शासनकाल में डाकटर करनल किंग, आई एम एस, मद्रास के सेनेटरी कमिश्नर थे। उनके समय में वहां प्लेग फ़ैल गया। तब १५ मार्च १८९८ को मद्रास विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के समक्ष भाषण देते हुए उन्होंने कहा था – “घी और चावल में केसर मिलकर अग्नि में जलाने से प्लेग से बचा जा सकता है।” इस भाषण का सार श्री हैफकिन ने “ब्यूबॉनिक प्लेग” नामक पुस्तक मे देते हुए लिखा है, “हवन करना लाभदायक और बुद्धिमत्ता की बात है।”

महर्षि दयानंद ने अपने ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है :

“जब तक इस होम करने का प्रचार रहा ये तब तक ये आर्यवर्त देश रोगो से रहित और सुखो से पूरित था अब भी प्रचार हो तो वैसा ही हो जाए।”

(स. प्र. तृतीय समुल्लास)

यहाँ ऋषि इसी विज्ञानं को समझाने की कोशिश कर रहे हैं जो आज का आधुनिक विज्ञानं मानता है।

Why every nun should only be unmarried

Why every nun should only be unmarried

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        Be there be any religion, caste or creed, if there is any flaw then it is always fatal to civil society. Actually, this was the February month of the year 2014 and the Supreme Court of India giving instructions to the Chief Secretary of Karnataka Government that all necessary steps should be taken to prevent the women from becoming ‘Devadasi’ forcibly in a temple in Devnagar district of the state.

        Not only this, in the petition filed in the Supreme Court Devdasi tradition was said to be a subject of national shame. At that time, many intellectuals appeared on the ground and questioned the religion as if they are digging the paper with their pen and then put the miscreants in the Hindu religion in front of all.

        Possibly, people living in northern India may not know about this devadasi system but to the people living in southern India, the devadasi concept is not new. In fact, in the 6th century, In South Indian temples, this tradition was started to marry the virgin girls to the Gods of the temple. After this, she had to dedicate her whole life to that God. Although it was not a part of a Sanatan Vedic religion, neither did we found mention of this practice in the Vedas and or in Upanishads.

       For this reason, in the Renaissance period of the 19th century, Hindus society itself questioned this tradition which was later brought to the category of crime by law. If this practice is still alive somewhere in the corners of the country then its main reason is the self-acceptance of women engaged in this work themselves.

       Indeed, this was the result of the effect of the awakened consciousness of the Hindu society that in the name of religion or in the name of antiquity, we cannot carry forward these misleading practices.

       But in another form, this practice continues to exist in Christian society so far. In Christian society, women also devote their whole life in the name of religion and remain unmarried throughout their lives. Such women are called “nun”.

      During the oath ceremony of the making of nun they have to wear a wedding dress at a formal ceremony, and they have to marry to- “Jesus Christ”. But against this practice, no social organization so far has raised the courage to file a petition, and no direction has been issued by the High Court.

       Perhaps because the matter is connected to the Vatican and no one can dare to speak against the authoritarianism of Vatican bishops Church. While many nuns are annoyed with the system of churches, they are questioning why a married Christian woman can not become a nun?

      Actually friends, speaking on her suffocation, the autobiography of a nun whose name is- Sister Jasmine, came to the market. The name of this book was “Amin- A Nun’s Autobiography”, the story of his own life experiences. This is a frightening experience. In real, reading this ‘so’ horrifying experience will make you feel furious with the priests. Fully devoted to his fictional husband, Jesus, when a seventeen-year-old sister Jasmine, who had entered the convent at the age of seventeen, and saw the evils of his church with open eyes, she would have to take the audacious decision of breaking out of the convent.

      She came in front of the media and spoke openly about the flaws of the church, and presented the examples of the lust of the priests who are considered to be sacred to be dressed in white clothes. Then she wrote openly about the homosexual conduct of Nunes. This decision of her decision was not the result of sudden impulse but while remaining in this for a long time and kept bearing on this exploitation, which she later brought on paper.

     Not only Jasmine, who was not only exposed to the untimely bitter truth behind these strong steel curtains of the religious and fairness of the Christian society but also- Mary Chandy, a former Kerala nun, by autobiography, described the sexual autonomy of priests in Catholic churches and exposed the truth. In his autobiography ‘Nunma Niranjewe Swasti’, Sister Mary Chandy wrote that due to her opposition to a rape attempt by clergy, she had to leave the church 12 years ago. In her autobiography, Sister Mary, who tried to highlight ‘darkness’ in the church and its educational centers, also wrote that the life within the church was full of lust, rather than spirituality.

      I eloped at 13 years of age to become ‘nun’ and in return, I got only- exploitation and loneliness. She further wrote, ‘I thought that both the priest and the nun have been engaged in the fulfillment of their physical needs by deviating from their resolve to serve humanity. Upset with these experiences, I left the church and the convent”.

      Once Jasmine and Mary Chandi were immersed in full faith in Jesus, accepting him as her husband on becoming nuns as lifelong unmarried, but she did not even dream that she would be exploited and will have to divorce her god one day.

     These nuns remained the victim of homosexual exploitation for a long time. They were sexually exploited by the corrupt priests. After which these Nuns thought of whistleblowing to expose the inside story running in name of purity, and religion.

     It is said that the struggle of faith is old in this institution. Jasmine’s struggle is similar. Even after the disclosure of one nun after the other, such mischievous practices are being still carried out in the name of purity.

     Now the biggest question is- Why a nun cannot be married? When will these Christian organization, who always shouts at the world’s welfare and the well-being of the humanity would agree that a woman is also a human being and her marriage should be done only to the human beings rather than a statue or an idol. Everyone believes that religion is not a bad thing in its basic sense but the opposition starts there where one starts exploiting the other by doing the misinterpretation of religion. In the end, the question is that  why the writers who wrote against the religious hypocrisy, the evils of religion, and the ostensibly are always silent on such matters.