तीर्थराज पुष्कर में महर्षि के प्रचार का प्रभाव

तीर्थराज पुष्कर में महर्षि के प्रचार का प्रभाव

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         महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का प्रभाव केवल धनी-मानी सम्पन्न लोगों एवं राजा महाराजाओं पर ही नहीं पड़ा, अपितु सामान्य लोगों पर भी पड़ा। ”आर्य प्रेमी” पत्रिका के फरवरी-मार्च १९६९ के महर्षि श्रद्धाञ्जलि अंक में प्रकाशित आलेख हम पाठकों के लाभार्थ प्रकाशित कर रहे हैं।                     

        ‘मेरी अन्त्येष्टि संस्कार विधि के अनुसार हो’

        वेदोद्धारक महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जब तीर्थराज पुष्कर पधारते थे तब सुप्रसिद्ध ब्रह्मा जी के मन्दिर में विराजते थे।

        मन्दिर के महन्त पारस्परिक मतभेदों की उपेक्षा करते हुए संन्यासी मात्र का स्वागत सत्कार करते थे।

        महर्षि का आसन दक्षिणाभिमुख तिबारे में लगता था और महर्षि इसी तिबारे में विराजकर वेदभाष्य करते थे। सांयकालीन आरती के पश्चात् महर्षि के प्रवचन ब्रह्मा जी के घाट पर होते थे पुष्कर के पण्डे पोपलीला का खण्डन सुन बहुत ही कुढ़ते थे परन्तु ब्रह्मा जी के मन्दिर के महन्त के आतंक के कारण कुछ कर नहीं पाते थे। मन्दिरों में पुरुषों की अपेक्षा देवियाँ अधिक आती हैं।

        इन देवियों में पुष्करवासिनी एक देवी जब-जब मन्दिर आती अथवा घाट पर महर्षि के प्रवचन सुनती उनसे उसकी श्रद्धा महर्षि के प्रति बढ़ती गई।

      कालान्तर में वह देवी वृद्धा हुई और अन्तिम काल निकट आ गया। परन्तु अत्यन्त छटपटाने पर भी प्राण नहीं छूटते थे।

      देवी के पुत्र ने अत्यन्त कातर हो माता से पूछा कि माँ तेरे प्राण कहाँ अटक रहे हैं। देवी ने उत्तर  दिया- बेटा यह न बताने में ही मेरा और तेरा भला है। बताकर मैं तुझे काल के गाल में नहीं डालूँगी।

       पुत्र ने जब अत्यन्त आग्रह किया तो देवी ने कहा कि ब्रह्मा जी के मन्दिर में जो तेजस्वी महाराज तिबारे में बिराज कर शास्त्र लिखते थे और घाट पर पोपों का खण्डन करते थे, उनकी लिखी संस्कार विधि के अनुसार मेरा दाग करे तो मेरे प्राण छूटे। पर बेटा ऐसा नहीं होने पावेगा। दुष्ट पण्डे तेरा अटेरण कर देगें। पुत्र ने कहा- माँ तू निश्चिन्त हो प्राण छोड़। अथवा तो तेरी अन्त्येष्टि संस्कारविधि के अनुसार होगी और नहीं तो मेरा और तेरा दाग साथ ही चिता पर होगा। वृद्धा ने शरीर त्याग दिया। उन दिनों पुष्कर में आर्य समाज का कोई चिह्न नहीं था।

      अजमेर के तत्कालीन आर्य समाज में संभवतया अधिक से अधिक १०-१५ सभासद होंगे। वृद्धा के पुत्र ने अजमेर आर्य समाज के मन्त्री जी के पास अपनी माता की अन्तिम इच्छा की सूचना भिजवाई और कहलाया कि आपके सहयोग की प्रतीक्षा उत्कंठापूर्वक करुँगा। मंत्री जी ने उत्तर भिजवाया कि निश्चित रहो, प्रातः काल होते हम अवश्य आवेंगे और जैसी परिस्थिति होगी उस का सामना करेंगे। मंत्री जी ने स्थानीय सब सभासदों को सूचना भिजवाई।

     इन सभासदों में एक सभासद ऐसे थे कि जो तुर्रा गाने वालों और खेल-तमाशों के स्थानीय अखाड़ों के उस्ताद थे।

     इन सभासद के पास जब सन्देश पहुँचा तो उन्होंने अखाड़ों के चौधरी से कहा कि तुम मेरी जगह किसी और को अखाड़ों का उस्ताद बनाओ। मैं पुष्कर जा रहा हूँ और सम्भव है जीवित नहीं आऊँ। चौधरी ने पूछा क्या बात है और वास्तविकता जान कर कहा, ये देवी तो हमारी बिरादरी की है। तत्काल चौधरी जी ने बिरादरी में खबर कराई और लगभग ३००-३५० व्यक्ति रातोंरात पुष्कर पहुँचे। इधर अन्य आर्य सभासद भी हवन सामग्री लेकर प्रातःकाल होते ही पहुँच गये। इतना समारोह और बलिदान भाव देख कर पण्डों का साहस विरोध करने को नहीं हुआ। अन्त्येष्टि किस धूमधाम से हुई होगी इस का अनुमान पाठक स्वयं कर लें। कहते हैं उस दिन पुष्करराज की किसी दुकान में घृत और नारियल नहीं बचे सब खरीद लिये गये। इस अन्त्येष्टि का प्रभाव चिरकाल तक रहा।

 

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