पुलिन बिहारी दास

पुलिन बिहारी दास

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         24 जनवरी ढाका अनुशीलन समिति के संस्थापक क्रांतिकारी पुलिन बिहारी दास का जन्मदिवस है जिनका जन्म 24 जनवरी 1877 में बंगाल में शरीयतपुर जिले के फरीदपुर में लोनसिंह गाँव में उन नाबा कुमार दास के पुत्र के रूप में हुआ था, जो मदारीपुर के उपखंड न्यायालय में वकील थे। 1894 में फरीदपुर जिला स्कूल से पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने ढाका कालेज में प्रवेश लिया और विद्यार्थी रहते हुए ही प्रयोगशाला सहायक और प्रदर्शक का दायित्व भी संभालने लगे। बचपन से ही उन्हें लाठी चलाने का जबरदस्त शौक था और कोलकाता के प्रसिद्द सरला देवी अखाड़ा की सफलता से प्रेरित होकर उन्होंने भी 1903 में तिक्तुली में अपना अखाड़ा शुरू किया था।

         सितम्बर 1906 में उस जमाने के जाने माने नेता बिपिन चन्द्र पाल और प्रमाथा नाथ मित्र ने नव निर्मित पूर्वी बंगाल और आसाम राज्यों का दौरा किया और उन युवाओं से आगे आने का आव्हान किया जो देश के लिए सर्वस्व समर्पण करने को तैयार हों। इस आव्हान के जवाब में आगे आये युवाओं में से एक थे पुलिन, जिन्हें ढाका में अनुशीलन समिति का काम खडा करने का गुरुतर उत्तरदायित्व सौंपा गया। पुलिन ने इस काम को बखूबी निभाया और अक्टूबर 1906 में ही 80 युवाओं के साथ ढाका अनुशीलन समिति को खड़ा कर दिया। अपने शानदार संगठन कौशल के दम पर उन्होंने शीघ्र ही पूरे राज्य में समिति की 500 शाखाओं को खड़ा कर दिया। पुलिन ने ढाका में नेशनल स्कूल की भी स्थापना की जिसका उद्देश्य क्रांतिकारी बल का निर्माण करना था और जिसमें विद्यार्थियों को अस्त्र-शस्त्र का प्रशिक्षण दिया जाता था।

      अपने पहली बड़ी कार्यवाही में पुलिन ने ढाका के कुख्यात पूर्व कलेक्टर कोप्लेस्टन एलेन को मारने का प्लान बनाया और 23 दिसंबर 1907 को उसे गोलुन्दो रेलवे स्टेशन पर गोली मारी गयी पर दुर्भाग्यवश वह बच गया। इस घटना के कुछ दिनों बाद ही प्रशासन की शह पर लगभग 400 मुसलमानों की भीड़ ने हिन्दू विरोधी नारे लगाते हुए पुलिन के घर पर हमला कर दिया, जिसका उन्होंने अपने कुछ एक साथियों के सहयोग से मुंहतोड़ जवाब दिया। 1908 के प्रारम्भ में पुलिन ने ढाका के नवाबगंज पुलिस स्टेशन के अंतर्गत एक ज़मीदार के यहाँ दिन दहाड़े डकैती डाली और इस पैसे का उपयोग हथियार खरीदने में किया गया। कुछ समय बाद वे अपने कुछेक साथियों के साथ गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें मोंटगोमरी जेल में रखा गया।

       1910 में जेल से छूटने के बाद उन्होंने फिर से क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम देना शुरू कर दिया। जुलाई 1910 में उन्हें 46 साथियों सहित राजद्रोह के आरोप में फिर से गिरफ्तार कर लिया गया, जिसे ढाका षड़यंत्र केस कहा जाता है। उम्र कैद की सजा मिलने के बाद उन्हें अंडमान की सेल्युलर जेल भेज दिया गया, जहाँ उन्हें हेमचन्द्र दास, बारीन्द्र कुमार घोष और वीर सावरकर जैसे क्रातिवीरों का साथ मिला। प्रथम विश्व युद्ध के बाद उनके कारावास की अवधि घटा दी गयी और उन्हें 1918 में रिहा कर दिया गया पर 1919 तक घर में नजरबन्द रखा गया, जिसके बाद उन्हें पूरी तरह से किया गया।

       एक बार फिर से उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों को करने की कोशिश की पर संगठन पर प्रतिबन्ध, साथियों के तितिर-बितिर हो जाने के कारण सफल ना हो सके। अनेकों क्रांतिकारियों द्वारा गाँधी जी के असहयोग आन्दोलन को सहयोग करने और उनका नेतृत्व स्वीकार करने के बाबजूद पुलिन ने अपने सिद्धांतो से समझौता करने से इनकार कर दिया और गाँधी जी के नेतृत्व को कभी नहीं माना। क्रांतिकारी विचारों को आगे बढाने के लिए उन्होंने 1920 में भारत सेवक संघ की स्थापना की और हक कथा और स्वराज नामक पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू किया जिसमें गाँधी जी के अहिंसात्मक आन्दोलन की कटु आलोचना की जाती थी।

        कुछ एक साथियों से मतभेदों के चलते उन्होंने अनुशीलन समिति से दूरी बना ली, भारत सेवक संघ को समाप्त कर दिया और 1922 में सक्रिय राजनीति से दूर हो गए। 1928 में उन्होंने कोलकाता में बंगीय व्यायाम समिति का गठन किया जहाँ लोगों को शारीरिक प्रशिक्षण दिया जाता था। बाद में उन्होंने विवाह किया और उनके 3 पुत्र और 2 पुत्रियाँ हुए, जिनमें से दूसरे पुत्र सुरेन्द्र उनके द्वारा स्थापित समिति को 2005 तक चलाते रहे। 17 अगस्त 1949 को इस क्रान्तिधर्मा की मृत्यु हो गयी। शत शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।

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प्रीतिलता वाडेदार

प्रीतिलता वाडेदार

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      5 मई अमर क्रांतिकारी मास्टर सूर्यसेन की सहयोगी और ब्रिटिश भारत में नारी शक्ति की प्रतीक प्रीतिलता वाडेदार का जन्मदिवस है| उनका जन्म 5 मई 1911 को वर्तमान बंगलादेश के चटगाँव जिले के पाटिया प्रखंड के धलघाट गाँव में चटगाँव नगरपालिका के क्लर्क जगबंधु वाडेदार एवं उनकी गृहणी पत्नी प्रतिभामई देवी के घर हुया था। जगबंधु का सरनेम यूँ तो दासगुप्ता थे पर परिवार के किसी पूर्वज को वाडेदार उपाधि मिलने के कारण अब ये परिवार इसी शब्द का प्रयोग अपने सरनेम के रूप में करता था। प्यार से रानी के नाम से पुकारी जाने वाली प्रीतिलता के तीन बहनें और दो भाई भी थे, जिनके नाम है–कनकलता, शान्तिलता, आशालता, मधसूदन एवं संतोष।

       शिक्षा को पर्याप्त महत्व देने वाले जगबंधू बाबू ने प्रीतिलता का प्रवेश चटगाँव के प्रसिद्द डाक्टर खास्तगीर गवर्नमेंट गर्ल्स स्कूल में कराया था जहाँ की एक शिक्षिका जिन्हें सब प्यार से उषा दी कहते थे, से प्रीतिलता अत्यंत प्रभावित हुयीं। उषा दी अपनी छात्राओं को रानी लक्ष्मीबाई, रानी चेनम्मा जैसी वीरांगनाओं की कहानियां सुनाया करती थी, जिसने प्रीतिलता और उनकी जैसी कई अन्य लड़कियों के मन में राष्ट्रवाद की उदात्त भावना को उत्पन्न कर दिया। प्रीतिलता की सहपाठी और क्रांतिकारी गतिविधियों में उनकी साथी कल्पना दत्त ने एक साक्षात्कार में बताया था कि स्कूल के प्रारम्भिक दिनों में इन सब के सामने ना कोई उद्देश्य था और ना कोई दिशा, परन्तु उषा दी के प्रभाव और उनकी शिक्षाओं ने इन लड़कियों के मन में रानी लक्ष्मीबाई की तरह बनने और देश के लिए कुछ कर गुजरने का संकल्प उत्पन्न किया।

       प्रीतिलता अत्यंत कुशाग्र बुद्धि के छात्रा थीं और 1928 में उन्होंने मैट्रीकुलेशन की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। 1929 में ईडेन कालेज, ढाका से पढ़ाई करते हुए उन्होंने इंटर की परीक्षा में पूरे ढाका बोर्ड में प्रथम स्थान प्राप्त किया था| अध्ययन के साथ साथ अन्य पाठ्य सहगामी क्रियायों और सामाजिक कार्यों में भी वे बढ़ चढ़ कर भाग लेती थीं। दो वर्ष बाद उन्होंने कोलकाता के बेथ्युन कालेज से दर्शनशास्त्र में स्नातक की परीक्षा डिस्टिंक्शन के साथं उत्तीर्ण की पर कोलकाता विश्वविद्यालय ने उनकी डिग्री रोक ली, जो स्वतंत्र भारत में उन्हें, एक अन्य क्रांतिकारी बीना दास के साथ, मरणोपरांत 2012 में इस विश्वविद्यालय द्वारा प्रदान की गयी|

       उन दिनों चटगाँव और आस पास के क्षेत्रों में मास्टर सूर्यसेन और उनके संगठन का अच्छा खासा प्रभाव था और ये लोग अनेकों क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम देते रहते थे। प्रीतिलता जब आठवीं की छात्रा थीं, तब उन्होंने रेलवे का धन लूटने के आरोप में हथकड़ियों और बेड़ियों में जकड़े मास्टर सूर्यसेन को पहली बार देखा और इसने उनके मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डाला और उनके अन्दर की देशभक्ति की भावना को हवा दी। उन्होंने क्रांतिकारी साहित्य को पढना और गुनना शुरू कर दिया जिसने उनके मन में कुछ कर गुजरने के संकल्प पैदा किया। ढाका में रहते हुए वे राष्ट्रवादी विचारों वाले महिला संगठन दीपाली संघ से जुड़ गयीं जिसकी सदस्याएं कई क्रांतिकारियों को हर संभव सहायता दिया करती थीं। बाद में क्रांतिकारी विचारों वाले अपने एक भाई के जरिये प्रीतिलता भी मास्टर दा के संगठन के संपर्क में आयीं और समूह के कार्यों में थोडा बहुत सहयोग करने लगीं।

       उन्ही दिनों चटगाँव के इन्स्पेक्टर जनरल मिस्टर क्रैग के काले कारनामों के कारण इस समूह ने उसकी हत्या करने का निश्चय किया और इसका उत्तरदायित्व रामकृष्ण विश्वास और कलिपदा चक्रवर्ती को सौंपा गया। इन दोनों ने भूलवश क्रैग के स्थान पर इंस्पेक्टर तारिणी मुखर्जी को मार डाला। विश्वास और चक्रवर्ती दोनों को ही 2 दिसंबर 1931 को गिरफ्तार कर लिया गया और मुक़दमे के बाद विश्वास को फांसी और चक्रवर्ती को काला पानी की सजा सुनाई गयी। निर्धनता के कारण रामकृष्ण विश्वास के परिजन और मित्र कलकत्ता की अलीपुर जेल में बंद उनसे मिलने आने में असमर्थ थे अतः संगठन द्वारा चटगाँव की ही निवासी और उस समय कलकत्ता में रह रही प्रीतिलता से उनसे मिलने जाने के लिए कहा गया और यही सच्चे अर्थों में प्रीतिलता के क्रांतिकारी जीवन का प्रारम्भ सिद्ध हुआ। वे फांसी की प्रतीक्षा करते रामकृष्ण विश्वास से उनकी बहन बन कर लगभग 40 बार मिलीं और रामकृष्ण और उनके क्रांतिकारी विचारों से अत्यंत प्रभावित हुयीं और इसी संपर्क ने उनके मन में देश की आज़ादी के लिए सशस्त्र क्रान्ति का मार्ग अपनाने का विचार उत्पन्न कर दिया।

       स्नातक की पढ़ाई के उपरान्त वो चटगाँव लौट आयीं और एक स्थानीय अंग्रेजी माध्यम विद्यालय नंदनकानन अपर्णा चरण बालिका विद्यालय की प्रथम प्रधानाचार्या नियुक्त की गयीं पर ये सब उन्हें संतुष्टि नहीं दे सका| उनके मन को ये बात मथथी थी कि आज़ादी की लड़ाई में और खासकर सशस्त्र विद्रोह में महिलाओं का योगदान इतना कम क्यों है और क्यों ऐसा सोचा जाता है कि महिलाएं इस तरह की गतिविधियों में भाग लेने में असमर्थ हैं। उनका विश्वास था कि आज़ादी की लड़ाई तब तक अधूरी है जब तक महिलाएं भी पुरुषों की भाँति इसमें सक्रिय रूप से भाग नहीं लेतीं। यद्यपि मास्टर सूर्यसेन और उनके कुछ वरिष्ठ साथी प्रारम्भ में प्रीतिलता को संगठन में शामिल करने के अनिच्छुक थे पर अंग्रेजी राज्य को समाप्त करने के लिए किसी भी हद से गुजर जाने के उनके जज्बे को देखते हुए मास्टर दा ने उन्हें अपने संगठन में शामिल कर लिया। अब वो सक्रिय रूप से मास्टर सूर्यसेन के समूह से जुड़ गयीं और क्रांतिकारी निर्मल सेन से अनेक तरह के हथियारों का प्रशिक्षण लेने लगीं, जो बाद में एक हमले में शहीद हो गए और जिनका भी प्रीतिलता पर बहुत प्रभाव था|

       वो मास्टर सूर्यसेन के संगठन द्वारा किये गए अनेकों हमलों जैसे डाक तार कार्यालय पर हमला और जलालाबाद संघर्ष में शामिल रहीं| चटगाँव शस्त्रागार पर हमले के बाद मास्टर दा ने अंग्रेजों से गुरिल्ला युद्ध पद्धति से लड़ने का निश्चय किया। विचार विमर्श के लिए प्रीतिलता उनसे मिलने उनके छिपने के ठिकाने धलघाट गयीं पर अंग्रेजों को किसी तरह भनक लग गयी और उन्होंने इन मास्टर दा को घेर लिया। इस संघर्ष में मास्टर दा और प्रीतिलता तो किसी तरह बच कर निकल गए पर प्रीतिलता को शस्त्र प्रशिक्षण देने वाले निर्मल सेन और अपूर्व सेन मरे गए। अब तक प्रीतिलता का नाम मोस्ट वांटेड की सूची में शामिल हो चुका था और इसलिए वो कल्पना दत्त के साथ भूमिगत हो गयीं।

       1932 में मास्टर दा ने कुख्यात पहारताली यूरोपियन क्लब पर हमला करने के योजना बनायीं, जिसके प्रवेश द्वार पर लगा ये बोर्ड कि कुत्तों और भारतीयों का प्रवेश वर्जित है, हर भारतीय के हृदय को चोट पहुंचाता था। मास्टर दा ने इस मिशन का नेतृत्व एक महिला को देने का मन बनाया हुआ था और कल्पना दत्त की गिरफ्तारी के कारण ये उत्तरदायित्व प्रीतिलता को सौंपा गया, जिन्होंने मिशन की सफलता के लिए कई दिनों तक शस्त्र प्रशिक्षण लिया और हमले की पूरी योजना बनायी। हमले के लिए 23 सितम्बर 1932 का दिन निश्चित किया गया और हमला करने वाले दल के सभी सदस्यों को पोटेशियम सायनाइड इस निर्देश के साथ दिया गया कि पकडे जाने की स्थिति आने पर उसे निगल कर प्राणोत्सर्ग कर दें पर किसी भी कीमत पर अंग्रेजों के हाथ ना आयें।

       नियत दिन प्रीतिलता ने स्वयं को एक पंजाबी पुरुष का रूप दिया, उनके साथियों कालीशंकर डे, बीरेश्वर रॉय, प्रफुल्ल दास, शान्ति चक्रवर्ती ने धोती और शर्ट तथा महेंद्र चौधरी, सुशील डे और पन्ना सेन ने लुंगी और शर्ट पहनी। रात 10.45 को इस दल ने तीन तरफ से क्लब पर हमला कर दिया। उस समय क्लब में लगभग 40 लोग थे जिनमें कुछ पुलिस अधिकारी भी थे। उन्होंने भी पोजीशन संभाल अपनी रिवाल्वरों से प्रत्युत्तर देना शुरू कर दिया। जबरदस्त गोलीबारी के बीच प्रीतिलता जब गोलियों से बुरी तरह से घायल हो गयीं और पूरी तरह से घिर गयीं तो उन्होंने अपने साथियों को वहां से फरार होने के लिए पूर्व निर्धारित संकेत किया और धूर्त अंग्रेजी अधिकारियों की पकड़ से बचने के लिए स्वयं पोटेशियम साइनाइड खा कर आत्मोत्सर्ग कर दिया| अगले दिन पुलिस को उनका पार्थिव शरीर पड़ा मिला जिसकी तलाशी लेने पर गोलियां, कुछ पत्रक, हमले की योजना का खाका, सीटी और रामकृष्ण विश्वास के चित्र मिले।

       इस तरह मात्र 21 वर्ष की आयु में वो देश के लिए अपने जीवन का बलिदान कर गयीं और प्रेरणा दे गयीं अनगिनत युवाओं और युवतियों को देश पर सर्वस्व न्योछावर करने की| प्रीतिलता ने आज़ादी की लड़ाई में महिलाओं की भूमिका को एक नयी दिशा और नयी पहचान दी। उन्हें शस्त्र संघर्ष करते हुए देश की स्वतंत्रता के लिए बलिदान देने वाली प्रथम महिला माना जाता है। उन्होंने अंग्रेजों पर हमले में महिलाओं की सहायक भूमिका से अलग एक नयी भूमिका का सृजन किया और सीधे सीधे संघर्षों में शामिल हुयीं। 

       बंगलादेशी लेखिका सेलिना हुसैन ने प्रीतिलता को प्रत्येक स्त्री का आदर्श बताया है। उनकी स्मृति में वीरकन्या प्रीतिलता ट्रस्ट नामक न्यास का निर्माण किया गया जिसके द्वारा हर वर्ष बंगलादेश और भारत के कई स्थानों पर प्रीतिलता का जन्मदिवस मनाया जाता है। चटगाँव के बोलखाली प्रखंड में एक सड़क का नाम उनकी याद में प्रीतिलता वाडेदार रोड रखा गया है और साथ ही प्रीतिलता वाडेदार नाम से एक विद्यालय की स्थापना की गयी है। चटगाँव विद्रोह को दर्शाने वाली 2010 में प्रदर्शित फिल्म ‘खेलें हम जी जान से’ और 2012 में प्रदर्शित फिल्म ‘चटगाँव’ में भी उनके चरित्र को बखूबी दिखाया गया। इन दोनों फिल्मों में उनका चरित्र क्रमशः विशाखा सिंह और वेगा तामोतिया ने निभाया है। इस अमर वीरांगना को कोटिशः नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि|

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प्रफुल्ल चाकी

प्रफुल्ल चाकी

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       सन 1888 में 10 दिसम्बर के दिन जन्मे क्रांतिकारी प्रफुल्ल चाकी का नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। प्रफुल्ल का जन्म उत्तरी बंगाल के जिला बोगरा के बिहारी गाँव (अब बांग्लादेश में स्थित) में हुआ था। जब प्रफुल्ल दो वर्ष के थे तभी उनके पिता जी का निधन हो गया। उनकी माता ने अत्यंत कठिनाई से प्रफुल्ल का पालन पोषण किया। विद्यार्थी जीवन में ही प्रफुल्ल का परिचय स्वामी महेश्वरानंद द्वारा स्थापित गुप्त क्रांतिकारी संगठन से हुआ और उनके अन्दर देश को स्वतंत्र कराने की भावना बलवती हो गई। इतिहासकार भास्कर मजुमदार के अनुसार प्रफुल्ल चाकी राष्ट्रवादियों के दमन के लिए बंगाल सरकार के कार्लाइस सर्कुलर के विरोध में चलाए गए छात्र आंदोलन की उपज थे।

       वो सन् 1907 का समय था। बंगाल को तत्कालीन लार्ड कर्जन ने विभाजित कर रखा था और मातृभूमि को प्रत्यक्ष माता का स्वरूप मानकर “वन्देमातरम्’ गीत से उसकी वन्दना करने वाले युवक और छात्र-दल, जिनके नेता अरविन्द घोष और बारीन्द्र घोष थे, अपना घर-परिवार त्यागकर अंग्रेजों से जूझ रहे थे। 16-17 वर्ष के छात्र अंग्रेजों और उनके पिट्ठू सरकारी अधिकारियों पर प्रहार कर रहे थे। ये नवयुवक ‘छात्र-भंडार’ खोलकर नगरों में स्वदेश की बनी वस्तुएं बेचते थे और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करते थे। अरविन्द घोष ने स्वयं ही मिदनापुर के सत्येन्द्र नाथ बसु जैसे युवकों को क्रांति की शिक्षा दी थी। मिदनापुर के मियां बाजार में किराए के मकान में एक अखाड़ा चलता था, जिसमें लाठी, तलवार चलाने के साथ ही बंदूक से लक्ष्य भेद और घुड़सवारी का प्रशिक्षण दिया जाता था। यही अखाड़ा गुप्त क्रांतिकारी समिति के रूप में सक्रिय हुआ।

       पूर्वी बंगाल में छात्र आंदोलन में प्रफुल्ल चाकी के योगदान को देखते हुए क्रांतिकारी बारीद्र घोष उन्हें कोलकाता ले आए जहाँ उनका सम्पर्क क्रांतिकारियों की युगांतर पार्टी से हुआ। उन दिनों सर एंड्रयू फ्रेजर बंगाल का राज्यपाल था जिसने लार्ड कर्जन की बंग-भंग योजना को क्रियान्वित करने में भरपूर उत्साह दिखाया था। फलत: क्रांतिकारियों ने इस अंग्रेज को मार देने का निश्चय किया। अरविन्द के आदेश से समिति के यतीन्द्रनाथ बसु, प्रफुल्ल चाकी के साथ दार्जिलिंग गए, क्योंकि वह राज्यपाल वहीं था परन्तु वहां जाकर देखा गया कि राज्यपाल की रक्षार्थ सख्त पहरा है और कोई उसके पास तक पहुंच नहीं सकता। अतः ये लोग लौट आए और यह योजना सफल नहीं हुई। 

       मारने का दूसरा प्रयास सन् 1907 के अक्तूबर में भी हुआ, जब उसकी रेल को बम से उड़ाने गए अरविन्द घोष के भाई बारीन्द्र घोष, उल्लासकर दत्त, प्रफुल्ल चाकी और विभूति सरकार ने चन्दननगर और मानकुंड रेलवे मार्ग के बीच एक गड्ढा खोदकर उसमें बम रखा, परन्तु वह उस रेल मार्ग से गया ही नहीं। आगे उसी साल 6 दिसम्बर को भी बारीन्द्र घोष, प्रफुल्ल चाकी और दूसरे कई साथियों को लेकर खड्गपुर गए और नारायण गढ़ जाने वाले मार्ग से एक मील दूर खड्गपुर के रेल मार्ग पर एक सुरंग रात के 11-12 बजे के बीच लगायी किन्तु रेल के क्षतिग्रस्त होने पर भी वह राज्यपाल बच गया। 7 नवम्बर, 1908 को भी इसी एंड्रयू फ्रेजर को कलकत्ते के ओवरटून हाल के एक बड़े जलसे में क्रांतिकारी जितेन्द्र नाथ राय ने पिस्तौल से गोली मारने की चेष्टा की, पर 3 बार घोड़ा दबाने पर भी गोली न चलने से वह पकड़े गए और उन्हें 10 वर्ष की सजा मिली।

       क्रांतिकारियों को अपमानित करने और उन्हें दण्ड देने के लिए कुख्यात कोलकाता के चीफ प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड को जब क्रांतिकारियों ने जान से मार डालने का निर्णय लिया तो यह कार्य प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस को सौंपा गया। दोनों क्रांतिकारी इस उद्देश्य से मुजफ्फरपुर पहुंचे जहाँ ब्रिटिश सरकार ने किंग्सफोर्ड के प्रति जनता के आक्रोश को भाँप कर उसकी सरक्षा की दृष्टि से उसे सेशन जज बनाकर भेज दिया था। खुदीराम मुजफ्फरपुर आकर महाता वार्ड स्टेट की धर्मशाला में दुर्गादास सेन के नाम से और प्रफुल्ल चाकी दिनेशचंद्र राय के छद्म नाम से ठहरे। दोनों ने किंग्सफोर्ड की गतिविधियों का बारीकी से अध्ययन किया एवं 30 अप्रैल 1908 ई० को किंग्सफोर्ड पर उस समय बम फेंक दिया जब वह बग्घी पर सवार होकर यूरोपियन क्लब से बाहर निकल रहा था। पर दुर्भाग्य से उस बग्घी में मिसेज कैनेडी और उसकी बेटी क्लब से घर की तरफ़ आ रहे थे। उनकी बग्घी का लाल रंग था और वह बिल्कुल किंग्सफ़ोर्ड की बग्घी से मिलती-जुलती थी। खुदीराम बोस तथा उनके साथी प्रफुल्ल चाकी ने उसे किंग्सफ़ोर्ड की बग्घी समझकर ही उस पर बम फेंक दिया था। देखते ही देखते बग्घी के परखचे उड़ गए और उसमें सवार मां बेटी दोनों की मौत हो गई। दोनों क्रांतिकारी इस विश्वास से भाग निकले कि किंग्सफ़ोर्ड को मारने में वे सफल हो गए हैं।

       जब प्रफुल्ल और खुदीराम को ये बात पता चली कि किंग्स्फोर्ड बच गया और उसकी जगह गलती से दो महिलाएं मारी गई तो वो दोनों दुखी और निराश हुए और दोनों ने अलग अलग भागने का विचार किया। खुदीराम बोस तो मुज्जफरपुर में पकडे गए और उन्हें इसी मामले में 11 अगस्त 1908 को फांसी हो गयी। उधर प्रफुल्ल चाकी जब रेलगाडी से भाग रहे थे तो समस्तीपुर में एक पुलिस वाले को उन पर शक हो गया और उसने इसकी सूचना आगे दे दी। जब इसका अहसास प्रफुल्ल को हुआ तो वो मोकामा रेलवे स्टेशन पर उतर गए पर तब तक पुलिस ने पूरे मोकामा स्टेशन को घेर लिया था।

        1 मई 1908 की सुबह मोकामा में रेलवे की एक पुलिया पर दोनों और से दना दन गोलियाँ चल रही थी। जो लोग उस समय वहां रेलवे स्टेशन पर अपनी अपनी गाड़ियों का इन्तजार कर रहे थे, उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था और जिसको जहाँ जगह मिली वहीँ छुप गया। लगभग 2.30 घंटा गोलियों की गूंज से गुंजायमान रहा वो रेलवे स्टेशन और एक बहादुर जाबांज 2.30 घंटे तक अपनी छोटी सी रिवाल्वर से लड़ता रहा अंग्रेजों से। अपने आप को चारों और से घिरा जानकर भी उसने न तो अपने कदम पीछे खींचे और न ही आत्मसमर्पण किया। अपने बहादुरी के दम पर उसने लगभग 6 अंग्रेज पुलिस वाले को घायल कर दिया। वो लड़ता रहा आखिरी दम तक पर जब उसने देखा कि अब आखिरी गोली बची है और अंग्रेज अभी भी चारों और से गोलियाँ चला रहे हैं तो उस तरुण ने माँ भारती को नमन किया। अपने आप को भारत माँ के चरणों में कुर्बान करने की कसम तो वो पहले ही ले चुका था पर उसकी आँखों से बहते आंसू ये बयान कर रहे थे कि वो जो अपनी धरती माँ के लिए करना चाहता थे, वो अधूरा रह गया। 

       पर उसका वो संकल्प कि जीते जी कभी भी किसी अंग्रेज के हाथों नहीं आएगा, पूरा होने जा रहा था। उसने अपनी आखिरी गोली को चूमा, वहां की धरती का आलिंगन किया और उस गोली से अपने ही सर को निशाना बना के रिवाल्वर चला दी। अंग्रेज भी हक्के बक्के रह गए और वहां मौजूद लोगों के मुंह खुले के खुले रह गए। जब गोलियों की आवाज़ आनी बंद हुई तो लोगों ने देखा कि पुलिया के उत्तर भाग में एक 20-21 साल का लड़का लहूलुहान गिरा पड़ा है और अंग्रेज पुलिस उसे चारों और से घेरे हुए है। कोई कुछ समझ पता उससे पहले ही अंग्रेज ने उस लड़के की लाश को अपने कब्जे में लेकर चलते बने। आज़ादी का ये दीवाना कोई और नहीं, प्रफुल्ल चंद चाकी ही थे|

       आज़ादी का ये वीर सपूत अपने बलिदान से मोकामा की धरती को भी अमर बना गया। अपने माँ –बाप की एकमात्र संतान होने के बाबजूद चाकी ने देश की खातिर अपने को कुर्बान कर दिया। बिहार के मोकामा स्टेशन के पास प्रफुल्ल चाकी की मौत के बाद पुलिस उपनिरीक्षक एनएन बनर्जी ने चाकी का सिर काट कर उसे सबूत के तौर पर मुजफ्फरपुर की अदालत में पेश किया। यह अंग्रेज शासन की जघन्यतम घटनाओं में शामिल है। चाकी का बलिदान जाने कितने ही युवकों का प्रेरणाश्रोत बना और उसी राह पर चलकर अनगिनत युवाओं ने मातृभूमि की बलिवेदी पर खुद को होम कर दिया| मगर अन्य क्रांतिकारियों की ही भांति आज़ादी के इस दीवाने का जितना तिरस्कार हो रहा है, वो असहनीय है। हाँ, सन 2010 में चाकी के जन्म दिवस पर भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक डाक टिकट अवश्य जारी किया था पर इसके अतिरिक्त उनकी स्मृति को अक्षुण बनाये रखने के लिए कुछ नहीं किया गया। 

       किसी ने सच की कहा है—–
उनकी तुर्बत पर नहीं हैं एक भी दीया, जिनके लहू से रोशन हैं चिरागे वतन ,
जगमगा रही हैं कब्रे उनकी बेचा करते थे जो शहीदों के कफ़न !!
महान हुतात्मा को उनके बलिदान दिवस पर कोटिशः नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि|

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परमवीर अब्दुल हमीद

परमवीर अब्दुल हमीद

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       1 जुलाई 1933 के दिन उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के धामूपुर गाँव के एक साधारण दर्जी परिवार में एक ऐसे बालक ने जन्म लिया, जिसने आगे चलकर अपने पराक्रम और अदम्य साहस के बल पर भारतीय सेना के इतिहास और परमवीरों की सूची में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित करा दिया। वो बालक आगे चलकर कहलाया–वीर अब्दुल हमीद जिन्होंने प्राण देकर भी भारतीय सेना की महान परंपरा को आँच नहीं आने दी|

       आजीविका के लिए कपड़ों की सिलाई का काम करने वाले मोहम्मद उस्मान के पुत्र अब्दुल हमीद की रूचि अपने इस पारिवारिक कार्य में बिलकुल नहीं थी। कुश्ती के दाँव पेंचों में रूचि रखने वाले पिता का प्रभाव अब्दुल हमीद पर भी था। लाठी चलाना, कुश्ती का अभ्यास करना, पानी से उफनती नदी को पार करना, गुलेल से निशाना लगाना एक ग्रामीण बालक के रूप में इन सभी क्षेत्रों में हमीद पारंगत थे।

        उनका एक बड़ा गुण था सबकी यथासंभव सहायता करने को तत्पर रहना। किसी अन्याय को सहन करना उनको नहीं भाता था। यही कारण है कि एक बार जब किसी ग़रीब किसान की फसल बलपूर्वक काटकर ले जाने के लिए जमींदार के 50 के लगभग गुंडे उस किसान के खेत पर पहुंचे तो हमीद ने उनको ललकारा और उनको बिना अपना मन्तव्य पूरा किये ही लौटना पड़ा। इसी प्रकार बाढ़ प्रभावित गाँव की नदी में डूबती दो युवतियों के प्राण बचाकर अपने अदम्य साहस का परिचय दिया।

       21 वर्ष के अब्दुल हमीद जीवन यापन के लिए रेलवे में भर्ती होने के लिए गये थे परन्तु उनके संस्कार उन्हें प्रेरित कर रहे थे, सेना में भर्ती होकर देश सेवा के लिए। अतः उन्होंने एक सैनिक के रूप में 1954 में अपना कार्य प्रारम्भ किया। हमीद 27 दिसंबर 1954 को ग्रेनेडियर्स इन्फैन्ट्री रेजिमेंट में शामिल किये गये थे। जम्मू कश्मीर में तैनात के दौरान अब्दुल हमीद पाकिस्तान से आने वाले घुसपैठियों की अच्छी खबर लेते थे। ऐसे ही एक आतंकवादी डाकू इनायत अली को जब उन्होंने पकड़वाया तो प्रोत्साहन स्वरूप उनको प्रोन्नति देकर सेना में लांस नायक बना दिया गया।

       1962 में जब चीन ने भारत की पीठ में छुरा भोंका तो अब्दुल हमीद उस समय नेफा में तैनात थे, पर उनको अपने अरमान पूरे करने का विशेष अवसर नहीं मिला। उनका अरमान था कोई विशेष पराक्रम दिखाते हुए शत्रु को मार गिराना। अधिक समय नहीं बीता और 1965 में पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण कर दिया। अब्दुल हमीद को सुअवसर प्राप्त हुआ अपनी जन्मभूमि के प्रति अपना कर्तव्य निभाने का। मोर्चे पर जाने से पूर्व, उनके अपने भाई को कहे शब्द ‘पल्टन में उनकी बहुत इज्जत होती है जिन के पास कोई चक्र होता है, देखना झुन्नन हम जंग में लड़कर कोई न कोई चक्र जरूर लेकर लौटेंगे”, उनकी भावनाओं को अभिव्यक्त करते हैं।

       1965 का युद्ध शुरू होने के आसार बन रहे थे। कंपनी क्वार्टर मास्टर अब्दुल हमीद गाज़ीपुर ज़िले के अपने गाँव धामूपुर आए हुए थे कि अचानक उन्हें वापस ड्यूटी पर आने का आदेश मिला। उनकी पत्नी रसूलन बीबी ने उन्हें कुछ दिन और रोकने की कोशिश की, लेकिन हमीद मुस्कराते हुए बोले- देश के लिए उन्हें जाना ही होगा। अब्दुल हमीद के बेटे जुनैद आलम बताते हैं कि जब वो अपने बिस्तरबंद को बांधने की कोशिश कर रहे थे, तभी उनकी रस्सी टूट गई और सारा सामान ज़मीन पर फैल गया। उसमें रसूलन बीबी का लाया हुआ मफ़लर भी था जो वो उनके लिए एक मेले से लाईं थीं। रसूलन ने कहा कि ये अपशगुन है, इसलिए वो कम से कम उस दिन यात्रा न करें, लेकिन हमीद ने उनकी एक नहीं सुनी।

       ‘द ब्रेव परमवीर स्टोरीज़’ की लेखिका रचना बिष्ट रावत कहती हैं, ”इतना ही नहीं जब वो स्टेशन जा रहे थे तो उनकी साइकिल की चेन टूट गई और उनके साथ जा रहे उनके दोस्त ने भी उन्हें नहीं जाने की सलाह दी, लेकिन हमीद ने उनकी भी बात नहीं सुनी। ”जब वो स्टेशन पहुंचे, उनकी ट्रेन भी छूट गई थी। उन्होंने अपने साथ गए सभी लोगों को वापस घर भेजा और देर रात  जाने वाली ट्रेन से पंजाब के लिए रवाना हुए। ये उनकी और उनके परिवार वालों और दोस्तों के बीच आख़िरी मुलाक़ात थी।

        8 सितम्बर 1965 की रात में पाकिस्तान द्वारा भारत पर हमला करने पर, उस हमले का जवाव देने के लिए भारतीय सेना के जवान उनका मुकाबला करने को खड़े हो गए। वीर अब्दुल हमीद पंजाब के तरन तारन जिले के खेमकरण सेक्टर में सेना की अग्रिम पंक्ति में तैनात थे। पाकिस्तान ने उस समय के अपराजेय माने जाने वाले अमेरिकन पैटन टैंकों के के साथ, खेम करन सेक्टर पर हमला कर दिया। भारतीय सैनिकों के पास न तो टैंक थे और नहीं बड़े हथियार लेकिन उनके पास था भारत माता की रक्षा के लिए लड़ते हुए मर जाने का जज्बा। भारतीय सैनिक अपनी साधारण थ्री नॉट थ्री रायफल और एल.एम्.जी. के साथ ही पैटन टैंकों का सामना करने लगे।

       हवलदार वीर अब्दुल हमीद के पास गन माउनटेड जीप थी जो पैटन टैंकों के सामने मात्र एक खिलौने के सामान थी। सुबह 9 बजे, जगह चीमा गाँव का बाहरी इलाक़ा, जहाँ गन्ने के खेतों के बीच अब्दुल हमीद जीप में ड्राइवर की बग़ल वाली सीट पर बैठे हुए थे कि अचानक उन्हें दूर आते टैंकों की आवाज़ सुनाई दी। थोड़ी देर में उन्हें वो टैंक दिखाई भी देने लगे। उन्होंने टैकों के अपनी रिकॉयलेस गन की रेंज में आने का इंतज़ार किया, गन्ने की फ़सल का कवर लिया और जैसे ही टैंक उनकी आरसीएल की रेंज में आए, फ़ायर कर दिया। पैटन टैंक धू-धू कर जलने लगा और उसमें सवार पाकिस्तानी सैनिक उसे छोड़कर पीछे की ओर भागे।

       वीर अब्दुल हमीद ने अपनी जीप में बैठ कर अपनी गन से पैटन टैंकों के कमजोर अंगों पर एकदम सटीक निशाना लगाकर एक -एक कर धवस्त करना प्रारम्भ कर दिया। उनको ऐसा करते देख अन्य सैनिकों का भी हौसला बढ़ गया और देखते ही देखते पाकिस्तान फ़ौज में भगदड़ मच गई। वीर अब्दुल हमीद ने अपनी गन माउनटेड जीप से सात पाकिस्तानी पैटन टैंकों को नष्ट कर दिया। उन्होंने अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को दिए गए अजेय माने जाने वाले पैटन टैंकों के एक एक कर अपने गोलों से परखच्‍चे उड़ा दिए थे और सारी दुनिया को भारतीय सेना के जवानों के पराक्रम का लोहा मानने पर मजबूर कर दिया था| देखते ही देखते भारत का असल उताड़ गाँव पाकिस्तानी पैटन टैंकों की कब्रगाह बन गया।

       पाक अधिकारी क्रोध और आश्चर्य में थे कि उनके मिशन में बाधक अब्दुल हमीद पर उनकी नज़र पड़ी और उनको घेर कर गोलों की वर्षा प्रारम्भ कर दी। जब वो एक और टैंक को अपना निशाना बना रहे थे, तभी एक पाकिस्तानी टैंक की जद में आ गए। दोनों ने एक-दूसरे पर एक साथ फ़ायर किया। वो टैंक भी नष्ट हुआ और अब्दुल हमीद की जीप के भी परखच्चे उड़ गए और वो बुरी तरह घायल हो गये। अगले दिन 9 सितम्बर को उनका स्वर्गवास हो गया लेकिन उनके स्वर्ग सिधारने की आधिकारिक घोषणा 10 सितम्बर को की गई थी।

       अब्दुल हमीद के शौर्य और बलिदान ने सेना के शेष जवानों में जोश का संचार किया और दुश्मन को खदेड दिया गया। उन्होंने अपनी अद्भुत वीरता से पाकिस्तानी शत्रुओं के खतरनाक,कुत्सित इरादों को ध्वस्त करते हुए अपना नाम इतिहास में सदा सर्वदा के लिए अमर कर दिया और साथ ही एक सन्देश भी दिया कि केवल साधनों के बलबूते युद्ध नहीं जीता जाता वरन उसके लिए देशप्रेम, साहस और मर मिटने की भावना आवश्यक होती है|

       इस युद्ध में साधारण गन माउनटेड जीप के हाथों अपराजेय समझे जाने वाले पैटन टैंकों की हुई बर्बादी को देखते हुए अमेरिका में पैटन टैंकों के डिजाइन को लेकर पुन: समीक्षा करनी पड़ी थी। लेकिन वो अमरीकी पैटन टैंकों के सामने केवल साधारण गन माउनटेड जीप जीप को ही देख कर समीक्षा कर रहे थे, उसको चलाने वाले वीर अब्दुल हमीद के हौसले को नहीं देख पा रहे थे।

       इस लड़ाई को ‘असल उताड़’ की लड़ाई कहा जाता है क्योंकि पाकिस्तानियों को उनके नापाक इरादों और कुत्सित चालों का असल उत्तर दिया गया था। रचना बिष्ट रावत कहतीं हैं कि ये जवाब था पाकिस्तान को उनके टैंक आक्रमण का| उनके परमवीर चक्र के आधिकारिक साइटेशन में बताया गया था कि उन्होंने चार पाकिस्तानी टैंकों को नष्ट किया था। हरबख़्श सिंह भी अपनी किताब ‘वॉर डिस्पेचेज़’ में लिखते हैं कि हमीद ने चार टैंकों को अपना निशाना बनाया था, लेकिन मेजर जनरल इयान कारडोज़ो ने अपनी किताब में लिखा है कि हमीद को परमवीर चक्र देने की सिफ़ारिश भेजे जाने के बाद अगले दिन उन्होंने तीन और पाकिस्तानी टैंक नष्ट किए।

         इस युद्ध में असाधारण बहादुरी के लिए उन्हें पहले महावीर चक्र और फिर सेना का सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से अलंकृत किया गया, जिसकी घोषणा 16 सितम्बर 1965 को, युद्ध के समाप्त होने के एक सप्ताह में कर दी गयी थी। इसके अतिरिक्त भी उनको समर सेवा पदक, सैन्य सेवा पदक और रक्षा पदक प्रदान किये गए थे। अब्दुल हमीद की मौत और भारत का सबसे बड़ा वीरता पुरस्कार पाने की ख़बर उनके परिवार को रेडियो से मिली। उनकी पत्नी रसूलन बीबी कभी वो दिन नहीं भूली, जब राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अब्दुल हमीद का जीता हुआ परमवीर चक्र उनके हाथों में दिया था।

       रसूलन के शब्दों में–”मुझे बहुत दुख हुआ लेकिन ख़ुशी भी हुई, हमारा आदमी इतना नाम करके इस दुनिया से गया। दुनिया में बहुत से लोग मरते हैं, लेकिन उनका नाम नहीं होता लेकिन हमारे आदमी ने शहीद होकर न सिर्फ़ अपना बल्कि हमारा नाम भी दुनिया में फैला दिया।”

       28 जनवरी 2000 को भारतीय डाक विभाग द्वारा वीरता पुरस्कार विजेताओं के सम्मान में पांच डाक टिकटों के सेट में 3 रुपये का एक सचित्र डाक टिकट जारी किया गया। इस डाक टिकट पर रिकाईललेस राइफल से गोली चलाते हुए जीप पर सवार वीर अब्दुल हामिद का रेखा चित्र उदाहरण की तरह बना हुआ है। चौथी ग्रेनेडियर्स ने अब्दुल हमीद की स्मृति में उनकी क़ब्र पर एक समाधि का निर्माण किया है। हर साल उनकी शहादत के दिन यहां पर मेले का आयोजन किया जाता है। वहाँ के निवासी उनके नाम से गांव में एक डिस्पेंसरी, पुस्तकालय और स्कूल चलाते हैं। सैन्य डाक सेवा ने 10 सितंबर, 1979 को उनके सम्मान में एक विशेष आवरण जारी किया था।

       छोटे थे, तब से ही जान गए थे वीर अब्दुल हमीद के बारे में और उन्हीं की तरह बनने के स्वप्न देखा करते थे क्योंकि पूरा एक पाठ ही समर्पित था उनको पर बसपा सरकार में वो पाठ हटा दिया गया पाठ्यक्रम से| सत्ता तंत्र इससे ज्यादा कर भी क्या सकता है| शहीदों का अपमान और भ्रष्ट नेताओं की मूर्तियाँ और उन पर पाठ| वरना क्या कारण था कि उनकी बेवा रसूलन बीबी को हमेशा संघर्ष करना पड़ा और सत्ता प्रतिष्ठानों ने उनसे किये एक भी वादे को पूरा नहीं किया| खैर, नाकारा नेताओं को क्या दोष देना| हम तो ऐसे वीरों को याद कर ही सकते हैं| आज वीर अब्दुल हमीद के बलिदान दिवस पर उन्हें कोटिशः नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि|

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पांडुरंग महादेव बापट

पांडुरंग महादेव बापट

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       28 नवम्बर स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानी पांडुरंग महादेव बापट का निर्वाण दिवस है जो ‘सेनापति बापट’ के नाम से जाने जाते हैं। 12 नवम्बर,1880 को महादेव व गंगाबाई के घर पारनेर, महाराष्ट्र में में जन्में बापट उच्च शिक्षा हेतु मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने स्काटलैण्ड गये जहाँ वह भारतीय क्रान्ति के प्रेरणाश्रोत श्री श्यामजी कृष्ण वर्मा और वीर सावरकर के सम्पर्क में आये। मजदूरों-मेहनतकशों-आम जनों को एकता के सूत्र में बांघने तथा क्रांति की ज्वाला को तेज करने के उद्देश्य से श्यामजी कृष्ण वर्मा व सावरकर की सलाह पर बापट भारत वापस आये।

       शीव बन्दरगाह पर उतरने के पश्चात् धुले-भुसावल होते हुए कलकत्ता के हेमचन्द्र दास के घर माणिकतल्ला में पहुँचे। यहां कई क्रांतिकारियों के साथ आपकी बैठक हुई। इन्ही क्रान्तिकारियों में से एक क्रान्तिकारी बम प्रकरण में दो माह बाद गिरफतार हो गया, जो मुखबिर बन गया। बापट की भी तलाश प्रारम्भ हो गई और साढ़े चार वर्ष बाद इन्दौर में वो गिरफ्तार हो गए। इसी बीच मुखबिर बने नरेन्द्र गोस्वामी को क्रान्तिकारी चारू चन्द्र गुहा ने मार गिराया फलतः बापट पर कोई अभियोग सिद्ध नहीं हो सका।

       पांच हजार की जमानत पर छूटकर बापट पारनेर अपने घर आकर सामाजिक सेवा, स्वच्छता जागरूकता, महारों के बच्चों की शिक्षा, धार्मिक प्रवचन आदि कार्यों में जुट गये।इसके पश्चात् अण्ड़मान में कालेपानी की सजा भोग रहे क्रान्तिकारियों की मुक्ति के लिए स्वातंत्र्य वीर सावरकर के छोटे भाई डा. नारायण दामोदर सावरकर के साथ मिलकर आन्दोलन किया। इसी बीच टाटा कम्पनी ने महाराष्ट में सह्याद्रि पर्वत की विभिन्न चोटियों पर बाँध बाँधने की योजना बनायी। मुलशी के निकट मुला व निला नदियों के संगम पर प्रस्तावित बाँध से 54 गाँव और खेती डूब रही थी।इसके विरोध में हुए सत्याग्रहों में बापट कई बार गिरफ्तार हुए।

       रिहाई के बाद रेल रोको आन्दोलन किया जिसमें गिरफतारी के बाद 7 वर्ष तक सिंध प्रांत की हैदराबाद जेल में बापट अकेले कैद रहे। मुलसी आन्दोलन से ही बापट को सेनापति का खिताब मिला। रिहाई के बाद 28 जून 1931को महाराष्ट कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये। विदेशी बहिष्कार के आन्दोलन में अपने भाषणों के कारण बापट फिर जेल पहुँच गये और उन्हें 7 वर्ष के काले पानी तथा 3 वर्ष की दूसरे कारावास में रहने की दूसरी सजा मिली।

       सुभाष चन्द्र बोस के द्वारा फारवर्ड ब्लाक की स्थापना करने पर बापट को महाराष्ट शाखा का अध्यक्ष बनाया गया। फारवर्ड ब्लाक ने द्वितीय विश्व युद्ध में भारत को शामिल करने का विरोध किया। इसके विरोध में किये गये आन्दोलनों में बापट को कई बार गिरफ्तार किया गया पर इससे उनके जज्बे में कोई कमी नहीं आई। मातृभूमि की सेवा करने की जो शपथ 1902 में छात्र जीवन में बापट ने ली थी, आजन्म उसका अक्षरशः पालन किया। देश के लिए पूरा जीवन व्यतीत कर देने वाले इस सेनापति का अधिकांश समय जेल में ही बीता। 28 नवम्बर 1967 को उनका शरीरांत हो गया।

       संयुक्त महाराष्ट की स्थापना व गोवा मुक्ति आन्दोलन के योद्धा बापट सदैव हमारे मध्य सदैव प्रेरणा बन करके रहेंगे। इनके विषय में साने गुरू जी ने कहा था – ‘सेनापति में मुझे छत्रपति शिवाजी महाराज, समर्थ गुरू रामदास तथा सन्त तुकाराम की त्रिमूर्ति दिखायी पड़ती है। साने गुरू जी बापट को लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गाँधी तथा वीर सावरकर का अपूर्व व मधुर मिश्रण भी कहते थे। बापट को भक्ति, ज्ञान व सेवा की निर्मल गायत्री की संज्ञा देते थे-साने गुरू जी। ऐसे सेनापति बापट के निर्वाण दिवस पर उन्हें कोटिशः नमन ।

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पं० गेंदालाल दीक्षित

पं० गेंदालाल दीक्षित

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       जंग-ए-आजादी की लड़ाई की बात चले और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अप्रतिम योद्धा, महान क्रान्तिकारी व उत्कट राष्ट्रभक्त जांबाज पं. गेंदालाल दीक्षित के नाम का जिक्र न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता, जिन्होंने आम आदमी की बात तो दूर, डाकुओं तक को संगठित करके ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध खडा करने का दुस्साहस किया। दीक्षित जी उत्तर भारत के क्रान्तिकारियों के द्रोणाचार्य कहे जाते थे। ऐसे पं० गेंदालाल दीक्षित का जन्म ३० नवम्बर सन् १८८८ को आगरा जिले की तहसील बाह के ग्राम मई में पं० भोलानाथ दीक्षित के घर हुआ था। मुश्किल से ३ वर्ष की आयु रही होगी जब उनकी माता का निधन हो गया और बचपन संगी साथियों के बीच निरंकुश बीता जिसने उनके अन्दर वीरता कूट कूट कर भर दी। सन १९०५ में बंगाल के विभाजन के बाद जो देशव्यापी स्वदेशी आन्दोलन चला उससे पंडित जी भी अत्यधिक प्रभावित हुए। उन्होंने शिवाजी समिति के नाम से डाकुओं का एक संगठन बनाया और डाकुओं की दुष्प्रवृत्ति को भी राष्ट्रीय भावना में परिवर्तित कर उनकी शक्ति को देश की स्वतंत्रता के लिए प्रयोग कराने का काम किया। शिवाजी की भांति छापामार युद्ध करके अंग्रेजी राज्य के विरुद्ध उत्तर प्रदेश में एक अभियान प्रारम्भ करने के लिए मातृवेदी संस्था का निर्माण किया, जिसकी शाखाएं मैनपुरी सहित आगरा, मथुरा, इटावा, शाहजहांपुर, बरेली, फर्रूखाबाद, पीलीभीत, लखीमपुरखीरी, कानपुर में आदि में स्थापित की। खूंखार डाकू पंचम सिंह को भी उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ा और उसे मातृवेदी संस्था का कमांडर इन चीफ बनाया, जो देश की आजादी की लड़ाई के लिए अपनी अंतिम सांस तक लड़ता रहा। दल के एक सदस्य दलपतसिंह की मुखबिरी के कारण पंडित जी को गिरफ्तार करके पहले ग्वालियर लाया गया फिर वहाँ से आगरा के किले में कैद कर दिया गया। आगरे के किले में राम प्रसाद बिस्मिल से हुयी मुलाकात के बाद अपनी सूझ के बल पर वो आगरा से मैनपुरी की जेल पहुँच गए उन्हें मैनपुरी षड्यन्त्र का सूत्रधार समझ कर पुलिस ने उन पर कार्यवाही प्रारंभ कर दी किन्तु वे अपनी सूझबूझ और प्रत्युत्पन्न मति से जेल से निकल भागे और साथ में उस मुखबिर रामनारायण पंडित को भी ले उड़े, जिसके बयान से देश के महान क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल व कृष्णदत्त पालीवाल की गिरफ्तारी संभावित थी। पुलिस ने सारे हथकण्डे अपना लिये परन्तु उन्हें अन्त तक खोज नहीं पायी। आखिर में कोर्ट को उन्हें फरार घोषित करके मुकदमे का फैसला सुनाना पडा। अहर्निश कार्य करने व एक क्षण को भी विश्राम न करने के कारण आपको क्षय रोग हो गया था.। पैसे के अभाव में घर वालों ने आपको दिल्ली के एक सरकारी अस्पताल में भर्ती करा दिया गया जहाँ इस अदम्य साहसी व्यक्ति ने २१ दिसम्बर १९२० को अंतिम सांस ली पर हमारे हृदयों में वो सदैव जीवित रहेंगे। उन्हें कोटिशः नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस

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       जिन लोगों ने देश की स्वतन्त्रता के लिए अपना सर्वस्व यहाँ तक कि प्राण तक न्यौछावर कर दिए, हम लोगों में से अधिकतर लोग उनके विषय में, दुर्भाग्य से, बहुत कम जानते हैं। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस भी उन महान सच्चे स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों में से एक हैं जिनके बलिदान का इस देश में सही आकलन नहीं हुआ क्योंकि आज़ादी के तुरंत बाद हुए सत्ताधीशों ने कभी चाहा ही नहीं कि उनके अलावा ये देश और किसी को आज़ादी की लड़ाई का सिपाही समझे। देखा जाए तो अपनी महान हस्तियों के विषय में न जानने या बहुत कम जानने के पीछे दोष हमारा नहीं बल्कि हमारी शिक्षा का है जिसने हमारे भीतर ऐसा संस्कार ही उत्पन्न नहीं होने दिया कि हम उनके विषय में जानने का कभी प्रयास करें।

       होश सम्भालने बाद से ही जो हमसे “महात्मा गांधी की जय”, “चाचा नेहरू जिन्दाबाद” जैसे नारे लगवाए गए हैं उनसे हमारे भीतर यह गहरे तक पैठ गया है कि देश को स्वतन्त्रता सिर्फ गांधी जी और नेहरू जी के कारण ही मिली। हमारे भीतर की इस भावना ने अन्य सच्चे स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों को उनकी अपेक्षा गौण बना कर रख दिया। हमारे समय में तो स्कूल की पाठ्य-पुस्तकों में यदा-कदा “खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी…”, “अमर शहीद भगत सिंह” जैसे पाठ होते भी थे किन्तु आज तो वह भी लुप्त हो गए हैं। ऐसी शिक्षा से कैसे जगेगी भावना अपने महान हस्तियों के बारे में जानने की?

       खैर, यहाँ बात करेंगे आज़ादी की लड़ाई के सबसे बड़े सेनानायक नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की जिनका जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा में कटक के एक संपन्न बंगाली परिवार के मशहूर वकील पिता जानकीनाथ बोस और माता प्रभावती के यहाँ हुआ था। प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कुल मिलाकर 14 संतानें थी, जिसमें 6 बेटियाँ और 8 बेटे थे। सुभाष चंद्र उनकी नौवीं संतान और पाँचवें बेटे थे। नेताजी ने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई कटक के रेवेंशॉव कॉलेजिएट स्कूल में हुई। तत्पश्चात् उनकी शिक्षा कलकत्ता के प्रेज़िडेंसी कॉलेज और स्कॉटिश चर्च कॉलेज से हुई और बाद में भारतीय प्रशासनिक सेवा (इण्डियन सिविल सर्विस) की तैयारी के लिए उनके माता-पिता ने बोस को इंग्लैंड के केंब्रिज विश्वविद्यालय भेज दिया। अँग्रेज़ी शासन काल में भारतीयों के लिए सिविल सर्विस में जाना बहुत कठिन था किंतु उन्होंने सिविल सर्विस की परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त किया परन्तु उन्होंने देश सेवा हेतु इसमें शामिल होना उचित नहीं समझा और भारत लौट कर वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए।

       सक्रिय राजनीति में आने से पहले नेताजी ने पूरी दुनिया का भ्रमण किया और वह 1933 से 36 तक यूरोप में रहे। यूरोप में यह दौर था हिटलर के नाजीवाद और मुसोलिनी के फासीवाद का जिसका निशाना इंग्लैंड था, जिसने पहले विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी पर एकतरफा समझौते थोपे थे। वे उसका बदला इंग्लैंड से लेना चाहते थे। भारत पर भी अँग्रेज़ों का कब्जा था और इंग्लैंड के खिलाफ लड़ाई में नेताजी को हिटलर और मुसोलिनी में भविष्य का मित्र दिखाई पड़ रहा था क्योंकि वो इस सिद्धांत पर यकीन करते थे कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। उनका मानना था कि स्वतंत्रता हासिल करने के लिए राजनीतिक गतिविधियों के साथ-साथ कूटनीतिक और सैन्य सहयोग की भी जरूरत पड़ती है।

       वापस लौटकर सुभाष बाबू कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय हो गए। वो गाँधी जी का युग था और कांग्रेस में वही होता था जो गाँधी जी चाहते थे पर सुभाष की अपनी एक अलग विचारधारा थी और वो गाँधी के अहिंसा के विचारों से सहमत नहीं थे इसलिए उन दोनों के बीच मतभेद होने लगे। 1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष निर्वाचित होने के बाद एक बार फिर से 1939 में सुभाष गाँधी जी के प्रबल विरोध के बाबजूद उनके उम्मीदवार पट्टाभि सीतारमैय्या को हराकर कांग्रेस के अध्यक्ष बने, पर गाँधी जी ने इसे अपनी हार की तरह लिया और कांग्रेस कार्यसमिति में भरे अपने समर्थकों के दम पर वह स्थिति उपन्न कर दी कि सुभाष को अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देना पड़ा। पर यह सुभाष बाबू की महानता ही थी कि अपनी राह में कांटे बिछाने वाले गाँधी जी को उन्होंने हमेशा सम्मान दिया और सबसे पहले उन्हें राष्ट्रपिता कह कर संबोधित किया।

       त्यागपत्र देने के बाद सुभाष बाबू नें कांग्रेस के अंतर्गत फॉरवर्ड ब्लॉक के नाम से अपनी पार्टी की स्थापना की पर कुछ दिन बाद ही उन्हें कांग्रेस छोडनी पड़ी और फॉरवर्ड ब्लॉक अपने आप में एक स्वतंत्र पार्टी बन गयी जो पश्चिम बंगाल में आज भी कुछ प्रभाव रखती है। द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने से पहले से ही, फॉरवर्ड ब्लॉक ने स्वतंत्रता संग्राम अधिक तीव्र करने के लिए जनजागृति शुरू की, इसलिए अंग्रेज सरकार ने सुभाषबाबू सहित फॉरवर्ड ब्लॉक के सभी मुख्य नेताओ को कैद कर दिया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सुभाषबाबू जेल में निष्क्रिय रहना नहीं चाहते थे इसलिए सरकार को उन्हें रिहा करने पर मजबूर करने के लिए सुभाषबाबू ने जेल में आमरण उपोषण शुरू कर दिया। तब सरकार ने उन्हे रिहा तो कर दियापर उनके ही घर में नजरकैद कर के रखा पर वह अपने भतीजे शिशिर कुमार बोस की सहायता से वहां से भाग निकले और वह अफगानिस्तान और सोवियत संघ होते हुए जर्मनी जा पहुंचे।

       बर्लिन में सुभाष बाबू जर्मनी के कई नेताओं से मिले और 29 मई, 1942 के दिन एडॉल्फ हिटलर से उनकी मुलाक़ात हुयी लेकिन सुभाषबाबू को जल्दी ही समझ आ गया कि हिटलर और जर्मनी से उन्हे कुछ और नहीं मिलने वाला है इसलिए वे वहां से पूर्व एशिया के देशों की तरफ निकल गए। जापान से मदद का आश्वासन हासिल कर सुभाषबाबू ने सर्वप्रथम वयोवृद्ध क्रांतिकारी रासबिहारी बोस से भारतीय स्वतंत्रता परिषद का नेतृत्व सँभाला। 21 अक्तूबर, 1943 के दिन नेताजी ने सिंगापुर में अर्जी-हुकुमत-ए-आजाद-हिंद (स्वाधीन भारत की अंतरिम सरकार) की स्थापना की तथा ‘आज़ाद हिन्द फ़ौज’ का गठन किया। वे खुद इस सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और युद्धमंत्री बने और आज़ाद हिन्द फ़ौज के प्रधान सेनापति भी। इस सरकार को कुल नौ देशों ने मान्यता दी। नेताजी अपनी आजाद हिंद फौज के साथ 4 जुलाई 1944 को बर्मा पहुँचे और यहीं पर उन्होंने अपना प्रसिद्ध नारा “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” दिया।

       आज़ाद हिन्द फौज ने जापानी सेना के सहयोग से भारत पर आक्रमण किया और अंग्रेजों से अंदमान और निकोबार द्वीप जीत लिए जो अर्जी-हुकुमत-ए-आजाद-हिंद के अनुशासन में रहें। नेताजी ने इन द्वीपों का शहीद और स्वराज द्वीप ऐसा नामकरण किया। दोनो फौजो ने मिलकर इंफाल और कोहिमा पर भी आक्रमण किया परन्तु प्रारंभिक सफलताओं के बाद अंग्रेजों का पलड़ा भारी पड़ने लगा और दोनो फौजो को पीछे हटना पडा। जापानी सेना ने नेता जी के वहां से निकलने की व्यवस्था की और कहा जाता है कि 18 अगस्त 1945 को तोक्यो जाते समय ताइवान के पास नेताजी की हवाई दुर्घटना में मृत्यु हो गई, लेकिन उनका शव नहीं मिल पाया।

       नेताजी की मौत के कारणों पर आज भी विवाद बना हुआ है और एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जो ये मानता है कि नेता जी आज़ादी के बाद बहुत समय तक जीवित रहे। 18 अगस्त, 1945 के दिन नेताजी कहाँ लापता हो गए और उनका आगे क्या हुआ, यह भारत के इतिहास का सबसे बडा अनुत्तरित रहस्य बन गया हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में आज भी नेताजी को देखने और मिलने का दावा करने वाले लोगों की कमी नहीं है। फैजाबाद के गुमनामी बाबा से लेकर छत्तीसगढ़ के रायगढ़ तक में नेताजी के होने को लेकर कई दावे हुये हैं लेकिन इनमें से सभी की प्रामाणिकता संदिग्ध है। प्रख्यात पत्रकार अनुज धर की हालिया प्रकाशित पुस्तक Back from Dead: Inside the Subhash Bose Mystery में इस रहस्य पर से पर्दा उठाने की कोशिश करते हुए सरकारी दस्तावेजों की मदद से नेता जी से सम्बंधित प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास किया गया है । सच जो भी हो पर एक बात अटल सत्य है कि नेता जी हम सबके हृदयों में सदैव जीवित रहेंगे और हमें प्रेरणा देते रहेंगे। कोटि कोटि नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि ।

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रामचंद्र नारायण द्विवेदी (कवी प्रदीप)

रामचंद्र नारायण द्विवेदी (कवी प्रदीप)

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       देश प्रेम और देश-भक्ति से ओत-प्रोत भावनाओं को सुन्दर शब्दों में पिरोकर जन-जन तक पहुँचाने वाले कवि प्रदीप का आज निर्वाण दिवस है। 6 फ़रवरी 1915 में मध्य प्रदेश में उज्जैन के बड़नगर नामक क़स्बे में औदीच्य ब्राह्मण परिवार में नारायण भट्ट के पुत्र के रूप में जन्मे कवि प्रदीप का असली नाम रामचंद्र नारायण द्विवेदी था। शुरुआती शिक्षा इंदौर के शिवाजी राव हाईस्कूल में में करने के बाद उनकी शिक्षा इलाहाबाद के दारागंज हाईस्कूल में संपन्न हुई, जो उन दिनों साहित्य का गढ़ हुआ करता था। वर्ष 1933 से 1935 तक का इलाहाबाद का काल प्रदीप जी के लिए साहित्यिक दृष्टिकोण से बहुत अच्छा रहा और उनकी अंतश्चेतना में दबे काव्यांकुरों को फूटने का पर्याप्त अवसर मिला।

       यहाँ उन्हें हिन्दी के अनेक साहित्य शिल्पियों का स्नेहिल सान्निध्य मिला। वे गोष्ठियों में कविता का पाठ करने लगे। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी ने लखनऊ की पत्रिका ‘माधुरी’ के फ़रवरी, 1938 के अंक में प्रदीप पर लेख लिखकर उनकी काव्य-प्रतिभा पर स्वर्ण-मुहर लगा दी। उन्हीं के आशीर्वाद से रामचंद्र ‘प्रदीप’ कहलाने लगे। 1939 में उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की एवं अध्यापक प्रशिक्षण पाठ्‌यक्रम में प्रवेश कर शिक्षक बनने का प्रयास किया, लेकिन इसी दौरान उन्हें मुंबई में हो रहे एक कवि सम्मेलन में भाग लेने का न्योता मिला। कवि सम्मेलन में उनके गीतों को सुनकर ‘बाम्बे टॉकीज स्टूडियो’ के मालिक हिंमाशु राय काफ़ी प्रभावित हुए और उन्होंने प्रदीप को अपने बैनर तले बन रही अशोक कुमार एवं देविका रानी अभिनीत फ़िल्म ‘कंगन’ के गीत लिखने की पेशकश की।

       1939 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘कंगन’ में उनके गीतों की कामयाबी के बाद प्रदीप बतौर गीतकार फ़िल्मी दुनिया में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए। सन 1943 में ‘बॉम्बे टॉकीज’ की ही पांच फ़िल्मों- ‘अंजान’, ‘किस्मत’, ‘झूला’, ‘नया संसार’ और ‘पुनर्मिलन’ के लिये भी कवि प्रदीप ने गीत लिखे। इसी बीच 1942 में कवि प्रदीप का विवाह मुम्बई निवासी गुजराती ब्राह्मण चुन्नीलाल भट्ट की पुत्री सुभद्रा बेन से हुआ और वे दो पुत्रियों ‘मितुल’ और ‘सरगम’ के पिता बने।

       प्रारम्भ में वे अपना पूरा नाम रामचन्द्र नारायण दिवेदी ‘प्रदीप’ लिखते थे, किन्तु एक बार हिमांशु राय ने कहा कि ये रेलगाड़ी जैसा लम्बा नाम ठीक नही है, तभी से उन्होंने अपना नाम केवल ‘प्रदीप’ रख लिया। परंतु बाद में अभिनेता और कलाकार प्रदीप कुमार के इसी नाम की वजह से लोगों में भ्रम होते देख उन्होंने प्रदीप के पहले ‘कवि’ शब्द जोड़ दिया और यहीं से कवि प्रदीप के नाम से वे प्रख्यात हुए। कवि प्रदीप अपनी रचनाएं गाकर ही सुनाते थे और उनकी मधुर आवाज़ का सदुपयोग अनेक संगीत निर्देशकों ने अलग-अलग समय पर किया।

       वर्ष 1940 में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम अपने चरम पर था। देश को स्वतंत्र कराने के लिय छिड़ी मुहिम में कवि प्रदीप भी शामिल हो गए और इसके लिये उन्होंने अपनी कविताओं का सहारा लिया। 1940 में ज्ञान मुखर्जी के निर्देशन में बनी फ़िल्म ‘बंधन’ के ‘चल चल रे नौजवान…’ के बोल वाले गीत ने आजादी के दीवानों में एक नया जोश भरने का काम किया। उस समय स्वतंत्रता आन्दोलन अपनी चरम सीमा पर था और हर प्रभात फेरी में इस देश भक्ति के गीत को गाया जाता था। इस गीत ने भारतीय जनमानस पर जादू-सा प्रभाव डाला था। सिंध और पंजाब की विधान सभा ने इस गीत को राष्ट्रीय गीत की मान्यता दी और ये गीत विधान सभा में गाया जाने लगा।

       अपने गीतों को प्रदीप ने ग़ुलामी के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने के हथियार के रूप मे इस्तेमाल किया| वर्ष 1943 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘किस्मत’ में प्रदीप के लिखे गीत ‘आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है, दूर हटो ए दुनियां वालों हिंदुस्तान हमारा है’ जैसे गीतों ने जहां एक ओर स्वतंत्रता सेनानियों को झकझोरा, वहीं अंग्रेज़ों की तिरछी नजर के भी वह शिकार हुए और उनकी गिरफ्तारी का वारंट भी निकाला गया। गिरफ्तारी से बचने के लिये कवि प्रदीप को कुछ दिनों के लिए भूमिगत रहना पड़ा।

       इसके बाद वर्ष 1950 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘मशाल’ में उनके रचित गीत ‘ऊपर गगन विशाल नीचे गहरा पाताल, बीच में है धरती ‘वाह मेरे मालिक तुने किया कमाल’ भी लोगों के बीच काफ़ी लोकप्रिय हुआ। इसके बाद कवि प्रदीप ने पीछे मुड़कर नही देखा और एक से बढ़कर एक गीत लिखकर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। वर्ष 1954 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘नास्तिक’ में उनके रचित गीत ‘देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान कितना बदल गया इंसान’ समाज में बढ़ रही कुरीतियों के ऊपर उनका सीधा प्रहार था।

       वर्ष 1954 में ही फ़िल्म ‘जागृति’ में उनके रचित गीत की कामयाबी के बाद वह शोहरत की बुंलदियो पर जा बैठे। इस फ़िल्म के ‘हम लाए हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के’ और ‘दे दी हमें आज़ादी बिना खडग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल’ जैसे गीत आज भी लोगों के बीच काफ़ी लोकप्रिय हैं।

       पर सबसे अधिक अगर प्रदीप जी को किसी गीत के लिए याद किया जाता है तो वो है, ‘ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा आंख में भर लो पानी’ जिसे साठ के दशक में चीनी आक्रमण के बाद 26 जनवरी 1963 को लता मंगेशकर द्वारा गाया गया था। इस गीत के कारण ‘भारत सरकार’ ने कवि प्रदीप को ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि से सम्मानित किया था। इस गीत से मिलने वाली रॉयल्टी की राशि शहीद सैनिकों की विधवा पत्नियों को देने के लिए आग्रह कर प्रदीप जी ने अपने विशाल हृदय का ही परिचय दिया था।

       पहली ही फ़िल्म में कवि प्रदीप को गीतकार के साथ-साथ गायक के रूप में भी लिया गया था, परंतु गायक के रूप में उनकी लोकप्रियता का माध्यम बना `जागृति’ फ़िल्म का गीत जिसके बोल हैं – आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ झांकी हिंदुस्तान की| संगीत निर्देशक हेमंत कुमार, सी. रामचंद्र, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल आदि ने समय-समय पर कवि प्रदीप के लिखे कुछ गीतों का उन्हीं की आवाज में रिकॉर्ड किया। `पिंजरे के पंछी रे तेरा दर्द न जाने कोय’, `टूट गई है माला मोती बिखर गए’, कोई लाख करे चतुराई करम का लेख मिटे न रे भाई’, जैसे भावना प्रधान गीतों को बहुत आकर्षक अंदाज में गाकर कवि प्रदीप ने फ़िल्म जगत के गायकों में अपना अलग ही महत्त्वपूर्ण स्थान बना लिया था।

       कवि प्रदीप को अनेक सम्मान प्राप्त हुए थे, जिनमें ‘संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार’ (1961) तथा ‘फ़िल्म जर्नलिस्ट अवार्ड’ (1963) शामिल हैं। यद्यपि साहित्यिक जगत में प्रदीप की रचनाओं का मूल्यांकन पिछड़ गया तथापि फ़िल्मों में उनके योगदान के लिए भारत सरकार, राज्य सरकारें, फ़िल्मोद्योग तथा अन्य संस्थाएँ उन्हें सम्मानों और पुरस्कारों से अंलकृत करते रहे। 1995 में राष्ट्रपति द्वारा ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि दी गई और 1998 में प्रतिष्ठित ‘दादा साहब फाल्के पुरस्कार’ दिया गया। खेद का विषय यह है कि ऐसे महान देश भक्त, गीतकार एवं संगीतकार को भारत सरकार ने ‘भारत रत्न’ से सम्मानित नहीं किया।

       कवि प्रदीप ने अपने जीवन में 1700 गाने लिखे। ‘बंधन’ के अपने गीत ‘रुक न सको तो जाओ तुम’ को यथार्थ करते हुए 11 सितम्बर, 1998 को राष्ट्रकवि प्रदीप का कैंसर से लड़ते हुए 83 वर्ष की आयु में निधन हो गया। संगीत निर्देशक सचिन देव बर्मन ने उनके गीत, उनका गायन और स्वर संयोजन देखकर कहा था कि- “तुम्हें कोई ‘आउट’ नहीं कर सकता।“ प्रदीप मर कर भी आउट नहीं हुए हैं। वे अब अपने गीत की पंक्तियों में अमर हो गए हैं। उन्हें शत शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।

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नाना पाटिल

नाना पाटिल

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         क्रान्ति सिंह की उपाधि जिनके नाम का एक अभिन्न भाग ही बन गयी थी, ऐसे क्रान्ति सिंह नाना पाटिल का नाम महाराष्ट्र में स्वतंत्रता संग्राम के उन योद्धाओं में सर्वप्रमुख रूप से लिया जाता है, जिन्होंने सतारा और सांगली जिलों में ब्रिटिश शासन के विरोध में प्रति सरकार का एक बिलकुल अनूठा और नया प्रयोग किया और एक समानांतर सत्ता तंत्र खड़ा कर ब्रिटिश सत्ता को सीधे चुनौती दे डाली।

        क्रान्तिसिंह नाना पाटिल के रूप में जाने गए नानासाहेब रामचंद्र पाटिल का जन्म 3 अगस्त 1900 में वर्तमान महाराष्ट्र के सांगली जिले के बाहेगांव में हुआ था। बचपन से ही उनका शरीर शक्तिशाली था, जिसे अपने परिश्रम और अभ्यास से उन्होंने और दृढ और सुगढ़ बना लिया था। बाद में उनकी इसी सुगठित देहयष्टि और प्रभावी व्यक्तित्व ने लोगों को उनकी तरफ आकर्षित करने में उनकी अत्यंत सहायता की, जिसके बल पर वो अपने समर्थकों की एक श्रृंखला तैयार कर सके।

       अपना अध्ययन समाप्त करने के पश्चात उन्होंने कुछ समय तक सरकारी नौकरी की, परंतु सामाजिक सेवा और राजनीति में उनकी तीव्र रूचि ने इसमें उनका मन अधिक समय तक नहीं लगने दिया और शीघ्र ही उन्होंने नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया। देश और क्षेत्र में चल रहे ब्रिटिश विरोधी आन्दोलनों और अभियानों से वे अछूते ना रह सके और 1930 में उन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन में बढ़चढ़ कर भाग लिया और इसी के साथ प्रारम्भ हुआ उनका स्वतंत्रता आंदोलन के साथ गहरा जुड़ाव। गाँधी जी के अहिंसक तरीकों के प्रति उनकी रंचमात्र भी श्रद्धा नहीं थी और इसीलिये उन्होंने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोशियेशन के स्थापक सदस्य के रूप में हिंसक तरीकों को इस्तेमाल किया।

        उन्होंने ग्रामीणों को उनकी गुलाम स्थिति और अंग्रेजों के हाथों उनके उत्पीडन के प्रति जागरूक करने के अथक एवं अनवरत प्रयास किये और लोगों के अंदर से भय निकालने के लिए दिन रात एक कर दिया। उनके अंदर लोगों को उनकी ही भाषाशैली में समझाने और उन्हें प्रेरित-प्रभावित करने की ईश्वरप्रदत्त क्षमता थी और इसी के बल पर उन्होंने वारकरी समुदाय के लोगों के दिलों में अपना एक अलग ही स्थान बनाया। नाना पाटिल का स्वतंत्रता आंदोलन में अप्रतिम योगदान ये था कि उन्होंने ग्रामीण समुदाय के लोगों के मन में आत्मसम्मान का भाव जगाकर उन्हें आज़ादी की लड़ाई के आंदोलन का भाग बनाया।

       उनका मत था कि अत्याचारी ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक समानान्तर सत्ता स्थापित करना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि यही अंग्रेजों के मन में भारतीयों का भय उत्पन्न करेगा। इसी उद्देश्य को दृष्टिगत रखते हुए उन्होंने 1942 के भारत छोडो आंदोलन में ‘आपुला आपण कारु कारभार’ (हम अपना प्रशासन स्वयं करेंगे) जैसे नारे को जन जन तक पहुँचाया। ब्रिटिश सत्ता को सीधे चुनौती देते हुए उन्होंने अंग्रेजी शासन प्रशासन को अस्वीकार कर दिया और 1940 में ही सांगली में ‘प्रति सरकार’ नाम से एक स्वतंत्र सरकार की स्थापना की। उनकी इस प्रति सरकार का प्रचार प्रख्यात कवि जी. डी. माडगूळकर के लिखे और स्वरबद्ध किये एवं शाहिर निकम के ओजपूर्ण स्वर में गाये पोवाड़ा (कथागीतों) के माध्यम से दूर-सुदूर तक किया गया।

        नाना पाटिल की इस प्रति सरकार ने आम जनता के हितार्थ अनेकानेक कार्य किये और बाजार व्यवस्था, अनाजों की आपूर्ति-वितरण व्यवस्था आदि के साथ साथ लोगों के विवादों का निपटारा करने और डकैतों, साहूकारों एवं महाजनों को दण्डित करने के लिए एक न्यायिक तंत्र की भी स्थापना की। अपनी इस सरकार के अंतर्गत उन्होंने तूफ़ान सेना नाम से एक आर्मी का भी गठन किया। अपनी इस सेना के जाबांज योद्धाओं के बलबूते उन्होंने ब्रिटिश सरकार के रेलवे और डाक जैसे प्रमुख संस्थानों पर लगातार हमले कर अंग्रेजों को लगातार परेशान रखा। नाना पाटिल की ये प्रति सरकार 1943 से 1946 के मध्य सांगली और सतारा जिलों के लगभग 150 कस्बों और उनसे जुड़े इलाकों में पूरी तरह कार्यशील रही। बाद में प्रति सरकार के इस प्रयोग से प्रेरणा लेकर आंदोलनकारियों ने पूरे देश में अनेकों स्थानों पर इस प्रयोग को दोहराया और अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देते हुए प्रति सरकारें स्थापित कीं।

       देश की आज़ादी के संघर्षों में 1920 से 1942 के मध्य नाना पाटिल को अट्ठारह बार जेल जाना पड़ा। 1942 से 1946 तक वो भूमिगत रहे और उनको पकड़ने के लिए सरकार ने उनके सर पर अच्छा ख़ासा इनाम रखा, परंतु उनके प्रति जनता के अपार प्रेम और उनकी सतर्कताओं के कारण लाख प्रयासों के बाबजूद अंग्रेजी सरकार उन्हें पकड़ नहीं सकी। जब वो भूमिगत थे, तब सरकार ने उन पर दबाव बनाने के लिए उनके घर व संपत्ति को जब्त कर लिया और इसी दौरान उनकी माता जी का निधन हो गया, परंतु ये उनकी हिम्मत ही थी अंग्रेजी सरकार के तमाम प्रयासों को धता बताकर और अपने जीवन को खतरे में डालकर उन्होंने अपनी माताजी का अंतिम संस्कार किया और जब तक अंग्रेजी पुलिस उन्हें पकड़ पाती, वो फिर गायब हो गए। उसके बाद फिर वो कराड तालुके में 1946 के अंत में सार्वजनिक रूप से तब नज़र आये, जब देश को स्वतंत्रता मिलना निश्चित हो गया था।

      नाना पाटिल, महात्मा फुले के सत्यशोधक समाज के दर्शन एवं शाहू जी महाराज के सामाजिक कार्यों से गहरे तक प्रभावित थे और इसी के चलते उन्होंने अनेकों माध्यमों से सामाजिक परिवर्तन एवं सुधार लाने का प्रयास किया। उनके सामाजिक कार्यों में प्रमुख हैं–मितव्ययी विवाह समारोहों (गांधी विवाह पद्धति) का प्रचार, शिक्षा का प्रचार-प्रसार, पुस्तकालयों की स्थापना, अंधविश्वासों का निर्मूलन, ग्रामीण जनता को नशे से मुक्ति दिलाना आदि आदि। उनके संपर्क और सानिध्य में आकर शाहिर निकम और नागनाथ अण्णा जैसे सामजिक कार्यकर्ता देश को मिले, जिन्होंने आजीवन समाज के लिया कार्य किये।

       देश की स्वतंत्रता के बाद उन्होंने आचार्य अत्रे के साथ संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन में बढ़चढ़ कर भाग लिया और शेतकारी कामगार पक्ष एवं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जरिये राजनैतिक आन्दोलनों एवं क्रियाकलापों में अपनी भूमिका निभाई। उन्होंने सतारा और बीड क्षेत्रों का विधानसभा में प्रतिनिधत्व किया और लोकसभा के सदस्य के तौर पर भी अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन किया। 1957 में चुने जाने के बाद लोकसभा में उनके मराठी में दिए गए भाषणों ने उनकी एक अलग पहचान बनायी। स्वतंत्रता के पूर्व से ही ना केवल सतारा, बल्कि पूरे महाराष्ट्र को प्रभावित करने वाले इस ख्यात व्यक्तित्व का 6 दिसंबर 1976 में निधन हो गया। उनके यशस्वी जीवन को जन जन तक पहुंचाने के लिए मराठी फिल्मों के जाने माने निर्देशक गजेंद्र अहीर ने ए एस आर मीडिया द्वारा निर्मित फिल्म प्रति सरकार में इस क्रांति सिंह के जीवन को पूरी ईमानदारी के साथ परदे पर उतारने का प्रयास किया है। आज उनकी पुण्यस्मृति में विनम्र श्रद्धांजलि एवं शत शत नमन।

मास्टर सूर्यसेन

मास्टर सूर्यसेन

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         12 जनवरी प्रसिद्द क्रन्तिकारी अमर बलिदानी एवं अंग्रेजों को हिला कर रख देने वाले चटगाँव शस्त्रागार काण्ड के मुख्य शिल्पी मास्टर सूर्यसेन का बलिदान दिवस है जिन्हें 1934 में 12 जनवरी के दिन ही फांसी पर लटका दिया गया था| चटगाँव (वर्तमान में बंगलादेश का जनपद) के नोआपारा में कार्यरत एक शिक्षक श्री रामनिरंजन के पुत्र के रूप में 22 मार्च 1894 को जन्में सूर्यसेन की प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा चटगाँव में ही हुई थी| जब वह इंटरमीडिएट में थे तभी अपने एक राष्ट्रप्रेमी शिक्षक की प्रेरणा से वह बंगाल की प्रमुख क्रांतिकारी संस्था अनुशीलन समिति के सदस्य बन गए और क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेने लगे लगे। इस समय उनकी आयु 22 वर्ष थी। आगे की शिक्षा के लिए वह बहरामपुर गए और उन्होंने बहरामपुर कॉलेज में बी.ए. में दाखिला ले लिया। यहीं उन्हें प्रसिद्ध क्रांतिकारी संगठन “युगांतर” के बारे में पता चला और वह उससे अत्यधिक प्रभावित हुए। युवा सूर्य सेन के हृदय में स्वतंत्रता प्राप्ति की भावना दिन-प्रति-दिन बलवती होती जा रही थी और इसीलिए 1918 में चटगाँव वापस आकर उन्होंने स्थानीय स्तर पर युवाओं को संगठित करने के लिए “युगांतर पार्टी ” की शाखा की स्थापना की।

         अधिकांश लोग समझते हैं की तत्कालीन युवा सिर्फ हिंसात्मक संघर्ष ही करना चाहते थे, जो की पूर्णत: गलत है। स्वयं सूर्य सेन जी ने भी जहाँ एक और युवाओं को संगठित किया था, वहीँ वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जैसे अहिंसक दल के साथ भी जुड़े थे और इसकी चटगाँव जिला कमेटी के अध्यक्ष भी चुने गए। अपने देशप्रेमी संगठन के कार्य के साथ ही साथ वह नंदनकानन के सरकारी स्कूल में शिक्षक भी बन गए और अपनी कर्त्तव्यपरायणता और उत्तम शिक्षण के चलते यहीं से वह अपने विद्यार्थियों में “मास्टर दा” के नाम से विख्यात हो गए। नंदनकानन के बाद में वह चन्दनपुरा के उमात्रा स्कूल के भी शिक्षक रहे।

       मास्टर सूर्यसेन न केवल निर्भीक बल्कि आदर्शवादी भी थे, जिसका परिचय उनके जीवन में घटी एक घटना से मिलता है। हुआ ये कि स्कूल में वार्षिक परीक्षा चल रही थी और जिस परीक्षा भवन में उन्हें नियुक्त किया गया था, उसी भवन में उस स्कूल के प्रधानाचार्य का पुत्र भी परीक्षा दे रहा था। यह संयोग ही था कि उन्होंने प्रधानाचार्य के पुत्र को नकल करते हुए पकड़ लिया तथा परीक्षा देने से वंचित कर दिया। परीक्षाफल निकला तो वह लड़का अनुत्तीर्ण हो गया। दूसरे दिन जब सूर्यसेन स्कूल में पहुंचे, तो प्रधानाचार्य ने उन्हें अपने कक्ष में बुलाया। यह जानकर अन्य सभी शिक्षक कानाफूसी करने लगे कि अब सूर्यसेन का पत्ता साफ हुआ समझो। इधर जब सूर्यसेन प्रधानाचार्य के कक्ष में पहुंचे तो उन्होंने आशा के विपरीत उनका न केवल सम्मान किया, बल्कि स्नेहवश बोले, ‘मुझे गर्व है कि मेरे इस स्कूल में आप जैसा कर्तव्यनिष्ठ व आदर्शवादी शिक्षक भी है, जिसने मेरे पुत्र को भी दंडित करने में कोताही नहीं बरती। नकल करते पकड़े जाने के बावजूद यदि आप उसे उत्तीर्ण कर देते, तो मैं आपको अवश्य ही नौकरी से बर्खास्त कर देता। मास्टर दा ने जवाब दिया ‘यदि आप मुझे अपने पुत्र को उत्तीर्ण करने के लिए विवश करते तो मैं स्वयं ही इस्तीफा दे देता, जो इस समय मेरी जेब में पड़ा है।’ मास्टर सूर्यसेन का जवाब सुनकर प्रधानाचार्य बहुत खुश हुए और उनकी दृष्टि में सूर्यसेन की इज्जत दोगुनी हो गई और साथ ही विद्यार्थियों में के बीच भी।

         1923 तक मास्टर दा ने चटगांव के कोने-कोने में क्रांति की अलख जगा दी और अपने विद्यार्थियों में उग्र राष्ट्रवाद की भावना को बलवती किया। साम्राज्यवादी सरकार क्रूरतापूर्वक क्रांतिकारियों के दमन में लगी थी। साधनहीन युवक एक और अपनी जान हथेली पर रखकर निरंकुश साम्राज्य से भिड़ रहे थे तो वहीँ दूसरी और उन्हें धन और हथियारों की कमी भी सदा बनी रहती थी। ऐसे में मास्टर दा ने उन्हें गुरिल्ला पद्धति से लड़ने को प्रशिक्षित किया क्योंकि वो समझते थे कि कम संसाधनों के चलते शक्तिशाली अंग्रेजी सरकार से आमने सामने की लड़ाई करना असंभव है| उनका पहला बड़ा सफल अभियान 23 दिसंबर 1923 को चिटगांव में बंगाल आसाम रेलवे के ट्रेजरी आफिस में दिन दहाड़े डाका था परन्तु उनका सबसे बड़ा क्रांतिकारी अभियान था–18 अप्रैल 1930 को चिटगांव शस्त्रागार पर हमला जिसने अंग्रेजी सरकार को हिला कर रख दिया, जिसने अंग्रेजी सरकार को खुला सन्देश दिया कि भारतीय युवा मन अब अपने प्राण देकर भी दासता की बेड़ियों को तोड़ देना चाहता है और जिसने मास्टर सूर्यसेन का नाम सदा के लिए इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में दर्ज कर दिया|

       इस अभियान के लिए सन 1929 की मई कांफ्रेंस में पाँच प्रमुख व्यक्तियों मास्टर दा, अंबिका चक्रवर्ती, निर्मल सेन, गणेश घोष और अनंत सिंह के बीच लगभग पांच घंटे चली चर्चा में निम्नलिखित कार्यक्रम बनाये गए–

अचानक शस्त्रागार पर अधिकार करना।
हथियारों से लैस होना।
रेल्वे की संपर्क व्यवस्था को नष्ट करना।
अभ्यांतरित टेलीफोन बंद करना।
टेलीग्राफ के तार काटना।
बंदूकों की दूकान पर कब्जा।
यूरोपियनों की सामूहिक हत्या करना।
अस्थायी क्रांतिकारी सरकार की स्थापना करना।
इसके बाद शहर पर कब्जा कर वहीं से लड़ाई के मोर्चे बनाना तथा मौत को गले लगाना।

       इसके अलावा कुछ बुनियादी संकल्प भी लिए गए–

अब से डकैती नहीं करेंगे।
अपने-अपने घरों से अर्थ-संग्रह करेंगे।
गुप्तरूप से थोड़े से हथियार एकत्र कर उनकी सहायता से अस्त्रागार पर हमला करेंगे।
इसके अलावा जिस-जिस के घरों में बंदूकें हैं, उन्हें लाएँगे।
अस्त्रागार पर अधिकार पाने के लिए जितनी ज़रूरत हो, उतना बारूद और बम तैयार करेंगे।
व्यक्तिगत हत्या के बदले संगठित रूप में हमला या विद्रोह के विकास के लिए आयोजन करेंगे।

        15 अक्तूबर 1929 को सभी ने ने शपथ ली कि ये ही हमारे भविष्य के कार्यक्रम होंगे और सब कुछ भूलकर इसी एक काम को सफल बनाने के लिए अपनी सारी ताक़त लगाएँगे। इसके बाद मास्टर दा ने मंत्र दिया—’करो या मरो’ नहीं ‘करो और मरो’।

        इस हमले के लिए मास्टर दा ने युवाओं को संगठित कर ‘भारतीय प्रजातान्त्रिक सेना’ (Indian Republican Army, Chittagong Branch) नामक सेना बनायी। उनके नेतृत्व में क्रांतिकारियों के इस दल में गणेश घोष, लोकनाथ बल, निर्मल सेन, अम्बिका चक्रवर्ती, नरेश राय, शशांक दत्त, अरधेंधू दस्तीदार, तारकेश्वर दस्तीदार, हरिगोपाल बल, अनंत सिंह, जीवन घोषाल, आनंद गुप्ता जैसे वीर युवक और प्रीतिलता वादेदार व कल्पना दत्त जैसी वीर युवतियां भी शामिल थीं। यहाँ तक कि एक 14 वर्षीय किशोर सुबोध राय उर्फ़ झुंकू भी अपनी जान पर खेलने गया था।

          योजना के अनुसार 18 अप्रैल 1930 को सैनिक वस्त्रों में इन युवाओं ने दो दल बनाये, एक गणेश घोष के नेतृत्व में और दूसरा लोकनाथ बल के नेतृत्व में। गणेश घोष के दल ने चटगाँव के पुलिस शस्त्रागार (Police Armoury) पर और लोकनाथ बल के दल ने चटगाँव के सहायक सैनिक शस्त्रागार (Auxiliary Forces Armoury) पर कब्ज़ा कर लिया किन्तु दुर्भाग्यवश उन्हें बंदूकें तो मिलीं पर उनकी गोलियां नहीं मिल सकीं। क्रांतिकारियों ने टेलीफोन और टेलीग्राफ के तार काट दिए और रेलमार्गों को अवरुद्ध कर दिया। एक प्रकार से चटगाँव पर क्रांतिकारियों का ही अधिकार हो गया। तत्पश्चात यह दल पुलिस शस्त्रागार के सामने इकठ्ठा हुआ जहाँ मास्टर दा ने अपनी इस सेना से विधिवत सैन्य सलामी ली, राष्ट्रीय ध्वज फहराया और भारत की अस्थायी सरकार की स्थापना की।

          इस लोमहर्षक घटना का प्रभाव यह हुआ कि इसके बाद बंगाल से बाहर देश के अन्य हिस्सों में भी स्वतंत्रता संग्राम उग्र हो उठा। इस घटना का असर कई महीनों तक रहा। पंजाब में हरिकिशन ने वहां के गवर्नर की हत्या की कोशिश की। दिसंबर 1930 में विनय बोस, बादल गुप्ता और दिनेश गुप्ता ने कलकत्ता की राइटर्स बिल्डिंग में प्रवेश किया और स्वाधीनता सेनानियों पर जुल्म ढ़हाने वाले पुलिस अधीक्षक को मौत के घाट उतार दिया।

         दल को अंदेशा था कि इतनी बड़ी साहसिक घटना पर सरकार तिलमिला उठेगी और इसीलिए वह गोरिल्ला युद्ध हेतु तैयार थे और इसी उद्देश्य के लिए यह लोग शाम होते ही चटगांव नगर के पास की पहाड़ियों में चले गए। किन्तु स्थिति दिन पर दिन कठिनतम होती जा रही थी। बाहर अंग्रेज पुलिस उन्हें हर जगह भूखे कुत्तों की तरह ढूंढ रही थी और वहीँ जंगली पहाड़ियों पर उन्हें भूख-प्यास व्याकुल किये हुए थी।

         अंतत: 22 अप्रैल 1930 को हजारों अंग्रेज सैनिकों ने जलालाबाद पहाड़ियों को घेर लिया जहाँ क्रांतिकारियों ने शरण ले रखी थी। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भी समर्पण के बजाय क्रांतिकारियों ने हथियारों से लैस अंग्रेज सेना के विरुद्ध गोरिल्ला युद्ध छेड़ दिया। उनकी वीरता और गोरिल्ला युद्ध-कौशल का अंदाजा इसी से लग जाता है कि इस जंग में जहाँ 80 से भी ज्यादा अंग्रेज सैनिक मारे गए, वहीँ मात्र 12 क्रांतिकारी योद्धा ही शहीद हुए। इसके बाद मास्टर दा किसी प्रकार अपने कुछ साथियों सहित पास के गाँव में चले गए, उनके कुछ साथी कलकत्ता चले गए लेकिन दुर्भाग्य से कुछ पकडे भी गए|

         पुलिस किसी भी सूरत में मास्टर दा को पकड़ना चाहती थी और हर तरफ उनकी तलाश कर रही थी। सरकार ने मास्टर दा पर 10,000 रु. का इनाम घोषित कर दिया परन्तु जिस व्यक्ति को सभी चाहते हों तो उसका सुराग भला कौन देता? जब मास्टर दा पाटिया के पास एक विधवा स्त्री सावित्री देवी के यहाँ शरण लिए थे, तभी 13 जून 1932 को कैप्टेन कैमरून ने पुलिस व सेना के साथ उस घर को घेर लिया। दोनों तरफ से जबरदस्त गोलीबारी हुई जिसमें कैप्टेन कैमरून मारा गया और मास्टर दा अपने साथियों के साथ इस बार भी सुरक्षित निकल गए। इतना दमन और कठिनाइयाँ भी इन युवाओं को डिगा नहीं सकीं और जो क्रांतिकारी बच गए उन्होंने फिर से खुद को संगठित कर लिया और दोबारा अपनी साहसिक घटनाओं द्वारा सरकार को छकाते रहे। ऐसी अनेक घटनाओं में 1930 से 1932 के बीच 22 अंग्रेज अधिकारियों और उनके लगभग 220 सहायकों को मौत के घाट उतारा गया।

         इस दौरान मास्टर दा ने अनेक संकट झेले, उनके अनेक प्रिय साथी पकडे गए और अनेकों ने यातनाएं सहने के बजाय आत्महत्या कर ली। स्वयं मास्टर दा सदैव एक स्थान से दूसरे स्थान बदलते रहते और अपनी पहचान छुपाने के लिए नए-नए वेश बनाया करते जैसे कभी किसान, कभी दूधिया, कभी पुजारी, कभी मजदूर तो कभी मुस्लिम बन जाते। न खाने का ठिकाना था न सोने का पर इस अप्रतिम योद्धा ने कभी हिम्मत नहीं हारी।

         परन्तु 16 फरवरी 1933 को नेत्र सेन नामक व्यक्ति, जिसके यहाँ सूर्यसेन छिपे हुए थे, द्वारा दस हजार रूपये के इनाम के लालच में विश्वासघात किये जाने के कारण वे पकडे गये| नेत्र सेन भी इस इनाम के लेने से पहले ही सूर्यसेन के किसी साथी द्वारा उसके घर में घुसकर नरक पहुंचा दिया गया और उसकी पत्नी ने, जिसके सामने ही नेत्र सेन को मारा गया था, अपने विश्वासघाती पति के हत्यारे की पहचान करने से इनकार करते हुए कहा कि ऐसे गद्दार की सधवा होने से अच्छा है विधवा होना| जब पुलिस जांच करने आई तो उसने निडरता से कहा ‘तुम चाहों तो मेरी हत्या भी कर सकते हो किन्तु तब भी मैं अपने पति के हत्यारे का नाम नहीं बता सकती क्योंकि मेरे पति ने सूर्यसेन जैसे भारत माता के सच्चे सपूत को धोखा दिया था जिसे सभी प्रेम करते हैं और सम्मान देते हैं। ऐसा करके मेरे पति ने भारतमाता का शीश शर्म से झुका दिया है।’ कितने विचार की बात है कि काश यदि उस समय अंग्रेजों के सभी समर्थकों, भारतीय अधिकारीयों व सैनिकों की स्त्रियाँ भी ऐसा ही सोचतीं तो शायद हमें स्वाधीनता बहुत पहले ही मिल जाती और इतने युवा पुष्पों को खिलती उम्र में असमय इस तरह मुरझाना नहीं पड़ता।

         मास्टर दा के अभिन्न साथी तारकेश्वर दस्तीदार जी ने अब युगांतर पार्टी की चटगाँव शाखा का नेतृत्व संभाल लिया और मास्टर दा को अंग्रेजों से छुड़ाने जेल पर हमले की योजना बनाई लेकिन योजना पर अमल होने से पहले ही यह भेद खुल गया और तारकेश्वर, कल्पना दत्त एवं अन्य कई क्रांतिकारी पकडे गए और सब पर मुक़दमे चलाये गए|अनन्तर अपने दल के नेता को फांसी देने का प्रतिशोध अंग्रेजों से लेने के लिए 4 क्रांतिकारी नवयुवक जिनकी आयु 26-27 वर्ष से अधिक नहीं थी, पिस्तौलें भरकर चटगांव के क्रिकेट मैदान पहुंचे, जहां वही अंग्रेज अफसर क्रिकेट देख रहे थे जिन्होंने मास्टर दा को गिरफ्तार करने में प्रमुख भूमिका निभायी थी। उन क्रांतिकारियों ने उन अंग्रेजों पर बम फेंके और साथ ही गोलियां चलाईं जिससे कई अंग्रेज धराशायी हो गये। परन्तु जवाबी गोलाबारी में दो क्रांतिकारी हिमांशु चक्रवर्ती और नित्यसेन वहीं बलिदान हो गए। क्रिकेट मैदान में भारी संख्या में मौजूद सशस्त्र पुलिस दल ने अन्य दोनों साथियों हरीन चक्रवर्ती और कृष्ण चौधरी को गिरफ्तार कर लिया जिन्हें बहरामपुर के कारागार में फांसी दे दी गई।

         कालान्तर में इसी दल के तीन फरार युवक शांति चक्रवर्ती, मणिदत्त और कालीकिंकर डे भी गिरफ्तार हो गये और उन्हें भी अंग्रेजों ने लम्बी सजाएं दीं। इसी दल के एक अन्य अतीव कर्मठ विप्लवी, जिनका नाम त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती था और जो अपने दो छद्म नामों ‘अनन्तकुमार’ और ‘कालीचरण’ (काली बाबू) से लंबे समय तक फरार रहकर कई पुलिस अधिकारियों को अपनी गोली का निशाना बना चुके थे, एक दिन गंगा नदी के घाट पर खड़ी अपनी नाव के पास कालीचरण मल्लाह के रूप में पकड़ लिए गए और उन्हें अंग्रेजों ने 30 वर्षों तक अण्डमान आदि की जेलों में कैद रखा। यही त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती (त्रैलोक्य महाराज) थे, जिन्होंने कोलकाता में डा. केशव बलिराम हेडगेवार को क्रांतिकारी दल में भर्ती किया था और सन् 1940 में विश्वयुद्ध के समय एक अन्य साथी योगेशचन्द्र चटर्जी के साथ नागपुर आकर डा. हेडगेवार से मिले थे।

          स्पष्ट है कि उस युग में विप्लवी युवक जो प्राय: कालेज-छात्र ही होते थे, अपने साथियों के दमन और अपमान का प्रतिशोध उस अंग्रेज सरकार से लेना खूब जानते थे जिसके बारे में तब यह कहा जाता था कि ब्रिटिश राज्य में कहीं सूरज नहीं डूबता। उन दिनों ब्रिटिश शक्ति विश्व में प्रथम मानी जाती थी परंतु क्रांतिकारी छात्र उनकी चुनौती का उत्तर अनवरत निर्भयतापूर्वक देते रहे थे। मास्टर सूर्यसेन की फांसी का बदला चुकाने में 4 युवक बलिदान हुए और 3 काले पानी की सजा काटने अंडमान पहुंच गए किन्तु अंग्रेजों पर बम-पिस्तौलों से प्रहार करने में उन्होंने कभी हिचकिचाहट नहीं दिखाई। आज भी शत्रुओं, आई.एस.आई. एजेन्टों और देश की आस्तीनों में पल रहे गद्दारों की भरमार से मातृभूमि त्रस्त है, परन्तु हमारे युवा रक्त में कहीं उबाल नजर नहीं आता। देश के टुकड़े करने की वक़ालत करने वाले युवाओं के नायक बन कर उभर रहे हैं और भारतमाता सिसकने पर मजबूर है।

           खैर, हम पुनः आते हैं अपने नायक मास्टर दा पर। अंग्रेजी सरकार ने मास्टर सूर्यसेन, तारकेश्वर दस्तीदार और कल्पना दत्त पर मुकद्दमा चलाने के लिए विशेष न्यायालयों की स्थापना की और 12 जनवरी 1934 को सूर्यसेन जी को तारकेश्वर जी के साथ फाँसी दे दी गयी। पर फांसी देने के पहले अंग्रेजी सरकार ने मास्टर सूर्यसेन पर भीषण अत्याचार किये और उन्हें ऐसी अमानवीय यातनाएं दी गयीं कि रूह काँप जाती है| हथोडों के प्रहार से उनके सभी दांत, सभी जोड़ और हाथ-पैर तोड़ दिए गये और सारे नाखून उखाड़ दिए गए, रस्सी से बांध कर उन्हें मीलों घसीटा गया और जब वह बेहोश हो गए तो उन्हें अचेतावस्था में ही खींच कर फांसी के तख्ते तक लाया गया। क्रूरता और अपमान की पराकाष्टा यह थी कि उनकी मृत देह को भी उनके परिजनों को नहीं सौंपा गया और उसे धातु के बक्से में बंद करके बंगाल की कड़ी में फेंक दिया गया|

          11 जनवरी को उन्होंने अपने मित्र को अपना अंतिम पत्र लिखा ”मृत्यु मेरा द्वार खटखटा रही है और मेरा मन अनंत की और बह रहा है। मेरे लिए यह वो पल है जब मैं मृत्यु को अपने परम मित्र के रूप में अंगीकार करूं। इस सौभाग्यशील, पवित्र और निर्णायक पल में मैं तुम सबके लिए क्या छोड़ कर जा रहा हूँ? सिर्फ एक चीज —मेरा स्वप्न, मेरा सुनहरा स्वप्न, स्वतंत्र भारत का स्वप्न। प्रिय मित्रों, आगे बढ़ो और कभी अपने कदम पीछे मत खींचना। उठो और कभी निराश मत होना। सफलता अवश्य मिलेगी। ” अंतिम समय में भी इस अप्रतिम सेनानी की आँखें स्वर्णिम भविष्य का स्वप्न देख रही थीं।

          इस महान हुतात्मा की स्मृति में भारत सरकार ने 1977 में और बंगलादेश सरकार ने 1999 में डाक टिकट जारी किये| चिटगांव जेल के जिस स्थान पर सूर्यसेन को फांसी दी गयी थी, बंगलादेश सरकार ने उसे उनके स्मृति स्थान के रूप में समर्पित कर उनकी याद को सहेजने का प्रयास किया है| कोलकाता मेट्रो का एक स्टेशन भी उनके नाम पर है| सिलीगुड़ी में उनके नाम पर एक पार्क है ‘सूर्य सेन पार्क’, जहाँ उनकी मूर्ति भी स्थापित की गयी है। 18 अप्रैल 2010 को चत्तल सेवा समिति ने बारासात स्टेडियम में उनकी कांस्य प्रतिमा स्थापित की जिसका लोकार्पण मास्टर दा के ही साथी, जिनकी आयु 100 वर्ष से अधिक है, श्री विनोद बिहारी चौधरी जी ने किया। कल्पना दत्त जो बाद में कल्पना जोशी हुयी की बहू मानिनी डे ने इस महान बलिदानी पर ‘डू ऑर डाई’ नामक पुस्तक की रचना कर उन्हें श्रद्धांजलि दी है जिस पर कुछ समय पहले ही निर्देशक आशुतोष गोवारिकर ने ‘खेले हम जी जान से’ नामक फिल्म का भी निर्माण किया गया था, जिसमें मास्टर दा का चरित्र अभिषेक बच्चन ने निभाया था|

           मास्टर दा के चरित्र और उनकी वीरगाथा ने 1986 में आइआइटी खड़गपुर से इलेक्ट्रानिक्स में डिग्री हासिल करने के बाद पीएचडी करने कोलंबिया यूनिवर्सिटी चले गए और वहाँ से पढ़ाई के बाद नासा में बतौर वैज्ञानिक जुड़कर सीनियर रिसर्च साइंटिस्ट के पद तक पहुंचे वेदव्रत पाइन को इस कदर प्रभावित किया कि उन्होंने अपनी सारी जमापूँजी लगाकर मास्टर दा और चटगांव शस्त्रागार मामले के ऊपर फ़िल्म बना डाली जिसने सिनेप्रेमियों के रोंगटे खड़े कर दिए। वर्ष 1932 की पृष्ठभूमि पर आधारित ‘चिटगांव’ नामक इस फिल्म में भी चिटगांव शस्त्रागार हमले के सबसे कम आयु के सेनानी सुबोध राय उर्फ़ झुनकू की जुबानी मास्टर सूर्यसेन की बहादुरी को बखूबी उकेरा गया था, जिसमें मनोज वाजपेयी ने क्रांतिकारी सूर्यसेन उर्फ मास्टर दा की भूमिका निभाई है, जबकि राजकुमार यादव, नवाजुद्दीन सिद्दिकी समेत अन्य कई अभिनेताओं ने भी दमदार भूमिका निभाई है। चौदह वर्षीय सुबोध रॉय का चरित्र 3000 बाल कलाकारों में से चुने गए पुणे के नाट्यकला संस्थान से संबद्घ बाल कलाकार देलजाद हिवाले ने निभाया। इस फिल्म को कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में पुरस्कृत व प्रशंसित किया गया और फिल्म को 2013 में सर्वश्रेष्ठ पहली फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला।

        मास्टर दा के साथी क्रांतिकारी अनंत सिंह ने अपने एक लेख में उनके बारे में लिखा है कि ”चटगाँव क्रांति में मास्टर दा का नेतृत्व अपरिहार्य था। मास्टर दा के क्रांतिकारी चरित्र वैशिष्ट्य के अनुसार उन्होंने जवान क्रांतिकारियों को प्रभावित करने के लिए झूठ का आश्रय न लेकर साफ़ तौर पर बताया था कि वे एक पिस्तौल भी उन्हें नहीं दे पाएँगे और उन्होंने एक भी स्वदेशी डकैती नहीं की थी। आडंबरहीन और निर्भीक नेतृत्व के प्रतीक थे मास्टर दा। ” इस महान क्रांतिकारी, हुतात्मा और अमर बलिदानी को कोटि कोटि नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि|