शहीद-ए-आजम भगतसिंह

शहीद-ए-आजम भगतसिंह

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       सशस्त्र क्रान्ति की बात हो और उसमें शहीद-ए-आजम भगतसिंह का नाम ना आये, ये असंभव है क्योंकि केवल भारत ही नहीं बल्कि विश्व इतिहास में भी शायद ही ऐसा कोई उदाहरण हो, जहाँ मात्र तेईस वर्ष पाँच माह और सत्ताईस दिन की अल्पायु में ही कोई युवा क्रान्तिपथ के राही के रूप में अपना एक अलग ही स्थान बना गया हो। शहीद-ए-आजम भगतसिंह का जन्म पंजाब के जालंधर जिले की नवाँनगर तहसील के बंगा थाने के एक छोटे से गाँव खटकरकलां में अश्विन शुक्ल त्रयोदशी संवत् 1964 विक्रमी यानि 28 सितम्बर 1907 को दिन शनिवार प्रात: नौ बजे सरदार किशनसिंह एवं उनकी पत्नी विद्यावती के द्वितीय पुत्र के रूप में हुआ था। वीरता और मातृभूमि के लिए समर्पण उन्हें विरासत में मिला था।

         जब महाराज रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद पंजाब पर अंग्रेजों की गिद्ध दृष्टि जमने लगी थी तो सरदार भगतसिंह के प्रपितामह सरदार फ़तेहसिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष करने के की शपथ लेते हुए स्वयं को पूरी तरह अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध में झोंक दिया था। बाद में 1857 की क्रान्ति के समय कई अन्य प्रमुख व्यक्तियों की भाँति सरदार फ़तेहसिंह को भी अंग्रेजों की सहायता के लिए ये कहते हुए आमंत्रित किया गया कि इसके ऐवज में उन्हें अंग्रेज-सिख युद्ध में भाग लेने के कारण जब्त की गयी सारी जमींदारी वापस मिल जाएगी। पर अपने परिवार की परम्परा के अनुरूप सरदार फ़तेहसिंह ने बिना एक क्षण लगाये अपने ही देशवासियों के विरुद्ध अंग्रेजों की सहायता करने से साफ़ इनकार कर दिया। इस सबने सरदार फ़तेहसिंह में जो विद्रोही घृणा जगा दी थी, वह पारिवारिक धरोहर के रूप में उनके पुत्र सरदार अर्जुनसिंह को मिली। यह धरोहर ही थी जो परिवर्तन की प्यास बनकर उन्हें सामाजिक क्रान्ति के यज्ञ-मण्डप में ले आई।

         उस दौर में अधिकांश भारतीय सोचते थे कि हम कमजोर हैं, अलग-अलग हैं, निहत्थे हैं। इसके विरुद्ध अंग्रेज शक्तिशाली हैं; संगठित हैं, इसलिए हम उनका कुछ नहीं कर सकते, कुछ बिगाड़ नहीं सकते। कोई देश गिरकर उठता है स्वदेशाभिमान और जातीय गर्व के प्रकाश में पनपे आत्मगौरव से, पर हीनता की उस घनी आंधी में स्वदेशाभिमान और जातीय गौरव के दीपक कहां जल सकते थे? ऋषि दयानन्द के आत्मतेज की बलिहारी कि उन्होंने नई पृष्ठभूमि की खोज की और अतीत गौरव की उपजाऊ भूमि में स्वाभिमान और स्वदेशाभिमान के वृक्ष रोपे। शीघ्र ही इन पर जागरण और उद्बोधन के पुष्प महके और देश विचार-क्रान्ति से उद्बुद्ध हो उठा।

        सरदार अर्जुनसिंह ने ऋषि दयानन्द को देखा तो आकर्षित हुए, उनका भाषण सुना तो प्रभावित हुए और बातचीत की तो पूरी तरह उनके हो गए। सरदार अर्जुनसिंह इस विशाल देश के पहले सिख नागरिक थे, जो इस विचार क्रान्ति में भागीदार हुए। उनमें धुन थी, देशभक्ति की, आस्था की, कर्मठता थी; वे शीघ्र ही अपने क्षेत्र में इस विचार क्रान्ति का यज्ञ-मण्डप बन गए। सरदार अर्जुनसिंह के घर में तीन पुत्र जन्मे—सरदार किशनसिंह, सरदार अजीतसिंह, सरदार स्वर्णसिंह और तीनों ही ने देश के लिए किये गए संघर्षों में सर्वस्व समर्पित कर दिया।

        ये कहना अतिश्योक्ति ना होगी कि महर्षि दयानंद की शिक्षाओं से प्रभावित होकर सरदार अर्जुनसिंह ने साहस कर अन्धविश्वास और परम्परावाद की जड़ता से बन्द अपने घर के द्वार खोल दिए और ऊबड़-खाबड़ मार्ग को साफ कर अपने आंगन में यज्ञवेदी बना दी। सरदार किशनसिंह ने उस द्वार के आंगन तक के क्षेत्र को लीप-पोत कर उस यज्ञवेदी पर एक विशाल हवन-कुण्ड प्रतिष्ठित कर दिया। सरदार अजीतसिंह ने उस हवन-कुण्ड में समधाएं सजा कर एक दहकता अंगारा रख दिया। सरदार स्वर्णसिंह ने उसे झपटकर लपट में बदल दिया। बस फिर क्या था, लपटें उठीं और खूब उठीं। सरदार अजीतसिंह उन लपटों के लिए ईंधन की तलाश में दूर चले गए और जल्दी लौट न सके। वे लपटें बुझ जातीं, पर सरदार किशनसिंह उनके अंगरक्षक बने रहे, उन्हें बचाए रहे। भगतसिंह ने इधर-उधर ईंधन की तलाश न कर अपने जीवन को ही ईंधन बना झोंका और लपटों को पूरी तरह उभारकर इस तरह उछाल दिया कि वे देश-भर में फैल गईं, देश का हर आंगन एक हवन-कुण्ड बन गया।

         भगतसिंह की प्रारंभिक शिक्षा गाँव के प्राइमरी स्कूल में हुई। बाद में उनके माता-पिता लाहौर चले गए और वहाँ भगतसिंह का नाम डी.ए.वी. कॉलेज में लिखा दिया गया, जबकि ज़्यादातर सिख खालसा स्कूलों में ही पढ़ते थे। भगतसिंह को कॉलेज के माहौल तथा घर के वातावरण ने वैचारिक रूप से परिपक्व बना दिया और धीरे-धीरे वे क्रांति की दहलीज पर अपनी पेंग बढ़ाने लगे। 13 अप्रैल सन् 1919 को जालियाँवाला बाग़, अमृतसर में जो कुछ हुआ उससे बारह वर्षीय भगतसिंह का मन उद्वेलित हो उठा। शायद यही पहला अवसर था जब भगतसिंह ने निश्चय कर लिया था कि उन्हें आज़ादी की लड़ाई में कूदना है।

        1921 में जब वे नौंवी कक्षा में पढ़ रहे थे तो उन्हें लगा कि अब वक़्त आ गया है कि अंग्रेजों के अत्याचारों का उत्तर पुरज़ोर तरीक़े से दिया जाए। उन्होंने हिम्मत तो कर ली पर अपने पिता से कहने का साहस नहीं जुटा पाए। परंतु जब उनके पिता को पता चला कि भगतसिंह आज़ादी की लड़ाई में शामिल होना चाहते हैं तो उन्होंने बड़े उत्साह से इजाज़त दे दी। बस, यहीं से भगतसिंह का क्रांति का सफ़र आरंभ हुआ। भगतसिंह अपने आसपास होने वाले घटनाक्रम से जुड़ने लगे जिनमें विदेशी वस्त्रों तथा चीजों का बहिष्कार तथा स्वदेशी का प्रचार मुख्य था। इसी दौरान भगतसिंह ने एफ.ए. पास किया और बी.ए. में दाख़िला लाहौर के प्रसिध्द नेशनल कॉलेज में ले लिया। नेशनल कॉलेज उस समय भारत की आज़ादी के लिए संघर्ष करने वालों के लिए कार्यशाला के रूप में जाना जाता था। यहाँ से भगतसिंह भी आग में तप कर खरे सोने की भाँति निकले।

         इस उम्र में भगत सिंह अपने चाचाओं की क्रान्तिकारी किताबें पढ़ कर सोचते थे कि इनका रास्ता सही है कि नहीं ? गांधी जी का असहयोग आन्दोलन छिड़ने के बाद वे गान्धी जी के अहिंसात्मक तरीकों और क्रान्तिकारियों के हिंसक आन्दोलन में से अपने लिये रास्ता चुनने लगे। गान्धी जी के असहयोग आन्दोलन को रद्द कर देने के कारण देश के तमाम नवयुवकों की भाँति उनमें भी रोष हुआ और अन्ततः उन्होंने देश की स्वतन्त्रता के लिये क्रान्ति का मार्ग अपनाना अनुचित नहीं समझा। उन्होंने जुलूसों में भाग लेना प्रारम्भ किया तथा कई क्रान्तिकारी दलों के सदस्य बने। कुछ समय बाद भगत सिंह अमर शहीद करतार सिंह सराभा के संपर्क में आये जिन्होंने भगत सिंह को क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल होने की सलाह दी और साथ ही वीर सावरकर की किताब 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम पढने के लिए दी| भगत सिंह इस किताब से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने इस किताब के बाकी संस्करण भी छापने के लिए सहायता प्रदान की|

       वर्ष 1923 में भगतसिंह के जीवन में एक तूफ़ान आया। उन्होंने अपना घर छोड़कर आज़ादी के लिए संघर्ष करने हेतु कानपुर जाने का फ़ैसला कर लिया। इस कठिन फ़ैसले के पीछे भी एक विशेष कारण था। उनकी दादी ने भगतसिंह को विवाह के बंधन में जकड़ने के लिए पिता किशनसिंह को राज़ी कर लिया था और उनकी सगाई भी लहौर के एक धनी व्यक्ति की बेटी से तय हो गई थी। भगतसिंह उन दिनों प्रसिध्द क्रान्तिकारी शचीन्द्रनाथ सान्याल के सान्निध्य में थे। जब सान्याल दादा से भगतसिंह ने अपनी सगाई की बात बताई तो उन्होंने भगतसिंह से कहा कि यदि तुम्हें विवाह के बंधन में बंधना है तो बेशक़ सगाई करो, अन्यथा अपने लक्ष्य की ओर बढ़ो। जून 1924 में भगत सिंह वीर सावरकर से येरवडा जेल में मिले और क्रांति की पहली गुरुशिक्षा ग्रहण की, यही से भगत सिंह के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन आया|

         वे कानपुर आ गए, जहाँ उनकी मुलाक़ात बटुकेश्वर दत्त, योगेशचन्द्र चटर्जी, अजय घोष तथा गणेशशंकर विद्यार्थी से हुई। गणेशशंकर विद्यार्थी ने अपने पत्र ‘प्रताप’ के संपादन विभाग से जोड़कर भगतसिंह के खाने-पीने की मुश्क़िल भी आसान कर दी। प्रताप में भगतसिंह के लेख बलवन्त सिंह के नाम से छपते थे। भगतसिंह ने कानपुर के अलावा दिल्ली में भी वहाँ से छपने वाले पत्र ‘दैनिक अर्जुन’ के संपादकीय विभाग में काम किया और अपने क्रांतिकारी विचारों को रखने के लिए बलवंत सिंह के नाम से ही लेख लिखते रहे। कुछ दिन दिल्ली में रहकर भगतसिंह लाहौर लौट आए और अपने साथ कानपुर और दिल्ली की क्रान्ति की तपिश भी लेते आए।

        यहाँ आकर उन्होंने ‘नौजवान भारत सभा’ की स्थापना की और प्रथम जनरल सेक्रेटरी बने। अब तक भगतसिंह जो भी कार्य कर रहे थे उनसे उन्हें लेखक, विचारक तथा चिन्तक के रूप में पारिभाषित किया जा रहा था। उसी दौरान काकोरी काण्ड में राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ सहित 4 क्रान्तिकारियों को फाँसी व 16 अन्य को कारावास की सजाओं से भगत सिंह इतने अधिक उद्विग्न हुए कि पण्डित चन्द्रशेखर आजाद के साथ उनकी पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन से जुड गये और उसे एक नया नाम दिया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन। इस संगठन का उद्देश्य सेवा,त्याग और पीड़ा झेल सकने वाले नवयुवक तैयार करना और सशस्त्र क्रान्ति के जरिये देश को दासता के बंधनों से मुक्त कराना था।

       अक्टूबर 1928 को भारत में साइमन कमीशन आया, जिसका विरोध पूरे देश में होना था। लाहौर में लाला लाजपतराय के नेतृत्व में विरोध जुलूस निकला। पुलिस अधीक्षक स्कॉट के कहने पर सांडर्स ने लाठियाँ चलाईं और लालाजी बुरी तरह घायल हो गए और 17 नवंबर 1928 को उनकी मृत्यु हो गई। भगतसिंह और साथियों ने इसे देश का अपमान माना और सांडर्स को गोली मारकर लालाजी की मौत का बदला ले लिया। रातों-रात भगतसिंह अंग्रेजों के लिए चुनौती बन गए। चूँकि सांडर्स को मारते समय एक सिख नवयुवक को अंग्रेजों ने देख लिया था, अत: तय किया गया कि भगतसिंह को लाहौर में ख़तरा है, इसलिए उन्हें यहाँ से कलकत्ता भेज दिया जाए। उसी समय भगतसिंह को अपने बाल कटवाने पड़े और उनकी फेल्ट कैप वाली नई छवि लोगों के सामने आई।

       भगतसिंह कलकत्ता पहुँच तो गए परंतु उनका मन दिल्ली के आसपास होने वाली गतिविधियों पर लगा रहता था। उनके मन में यही तड़प थी कि कुछ ऐसा काम किया जाए जिससे पूरे राष्ट्र के नौजवान प्रभावित होकर क्रान्ति की राह में कूद पड़ें। ठीक उसी समय वायसराय भारत के दौरे पर आने वाले थे और असेंबली में जनसुरक्षा बिल तथा औद्योगिक विवाद बिल भी पेश होने वाले थे, जिसके लिए वायसराय ने असेंबली में आने का न्यौता स्वीकार कर लिया था।

       भगतसिंह, राजगुरु, आज़ाद तथा जयदेव कपूर ने एक कार्य-योजना बनाई कि केन्द्रीय असेंबली में बम फेंका जाए, जो सिर्फ़ बहरों को जगाने के मक़सद से हो न कि किसी को आहत करने के लिए। भगतसिंह को छोड़कर सभी साथ चाहते थे कि बम फेंककर भाग लिया जाए, लेकिन भगतसिंह की सोच ये थी कि यदि इस सोये हुए राष्ट्र को जागृत करना है तो बम फेंकने के बाद उस व्यक्ति को अपने-आप को गिरफ़्तार कराना चाहिए, ताकि केस चलने पर अदालतों के ज़रिए पूरे राष्ट्र को जागृत किया जा सके।

        8 अप्रैल 1929 को जयदेव कपूर, भगतसिंह और बटुकेशवर दत्त को केन्द्रीय असेंबली में बैठा आए और जैसे ही पहला बिल पेश हुआ भगतसिंह तथा बटुकेश्वर दत्त ने बम फेंकना शुरू किया और इंक़लाब ज़िन्दाबाद, साम्राज्यवाद का नाश हो के नारे लगाने शुरू कर दिए। वे चाहते तो भाग सकते थे क्योंकि पूरा अंग्रेजी प्रशासन सकते में आ गया था परन्तु अपनी नीति के अनुसार दोनों ने गिरफ़्तारी दी। उनके ऐसा करने से वास्तव में तूफ़ान आ गया और भगतसिंह एक नायक बन गए। भगतसिंह को अन्य साथियों के साथ गिरफ़्तार कर लिया गया और लाहौर जेल भेज दिया गया। उन पर सांडर्स-वध तथा असेंबली बम कांड के लिए मुक़द्दमे दायर किए गए।

       अंग्रेज समझते थे कि उन्होंने भगतसिंह पर मुक़द्दमा चलाकर भारत में चल रहे क्रांतिकारी आन्दोलन को दबा दिया है, पर भगतसिंह अपने मक़सद में क़ामयाब होते जा रहे थे। जो काम वे लाखों रुपये ख़र्च करके नहीं कर सकते थे वही विचार उन्होंने अदालतों के माध्यम से जन-जन तक पहुँचा दिया था। अब पूरा देश क्रांति की आग में धधकने लगा था। भगतसिंह अपनी पैरवी के ज़रिए भारतवर्ष में अपना संदेश पहुँचा रहे थे। जेल में भगत सिंह ने करीब 2 साल रहे। इस दौरान वे लेख लिखकर अपने क्रान्तिकारी विचार व्यक्त करते रहे। जेल में रहते हुए उनका अध्ययन बराबर जारी रहा। उनके उस दौरान लिखे गये लेख व सगे सम्बन्धियों को लिखे गये पत्र आज भी उनके विचारों के दर्पण हैं। अपने लेखों में उन्होंने कई तरह से पूँजीपतियों को अपना शत्रु बताया है। उन्होंने लिखा कि मजदूरों का शोषण करने वाला चाहें एक भारतीय ही क्यों न हो, वह उनका शत्रु है। उन्होंने जेल में अंग्रेज़ी में एक लेख भी लिखा जिसका शीर्षक था मैं नास्तिक क्यों हूँ?” जेल में भगत सिंह व उनके साथियों ने 64 दिनों तक भूख हडताल की। उनके एक साथी यतीन्द्रनाथ दास ने तो भूख हड़ताल में अपने प्राण ही त्याग दिये थे।

        अन्त में अंग्रेजों ने भगतसिंह, राजगुरु तथा सुखदेव को फाँसी की सज़ा सुनाई और बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास दिया। इन लोगों की फाँसी का दिन 24 मार्च 1931 तय हुआ था लेकिन अंग्रेज उस समय भारत में चल रहे आंदोलनों तथा क्रान्तिकारियों की गतिविधियों से इतना डर गए थे कि इन तीनों को 23 मार्च 1931 की शाम को ही लाहौर में फाँसी दे दी गई। फाँसी पर जाने से पहले वे लेनिन की नहीं बल्कि राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ की जीवनी पढ़ रहे थे जो सिन्ध (वर्तमान पाकिस्तान का एक सूबा) के एक प्रकाशक भजन लाल बुकसेलर ने आर्ट प्रेस, सिन्ध से छापी थी। कहा जाता है कि जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दी कि उनके फाँसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा था- “ठहरिये! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले।”

         फाँसी के बाद अंग्रेजों ने इन तीनों के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और शवों को बोरियों में भरकर लाहौर से दूर सतलुज नदी के किनारे हुसैनीवाला (फिरोज़पुर) में लाकर मिट्टी का तेल डालकर जला दिया। उन्हें इस बात का भय था कि शव देखकर लोग आपे से बाहर न हो जाएँ। हुआ भी वही। दूसरे दिन जब लोगों को पता चला कि इन तीनों को फाँसी दे दी गई है तो भारत का कोई शहर, कोई क़स्बा नहीं बचा जहाँ जुलूस न निकले हों। आज़ादी के बाद हुसैनीवाला के उसी स्थान पर जहाँ भगतसिंह का दाह-संस्कार किया गया था, सरकार ने शहीद स्मारक बनवा दिया। वहाँ पर भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव की काँस्य प्रतिमाएँ तथा तीनों महावीरों की समाधि भी बनी है और उनकी वीरगाथाओं की याद दिलाती है।

        भगतसिंह को फांसी दे देने भर से भगतसिंह की आवाज बंद ना होकर और बुलंद हो गयी क्योंकि अब हर युवा के मन में भगतसिंह बनने की इच्छा पैदा हो गयी। कवि राजगोपाल सिंह के शब्दों में—–

उनका मकसद था 
आवाज को दबाना 
अग्नि को बुझाना 
सुगंध को कैद करना। 
तुम्हारा मकसद था 
आवाज को बुलंद करना 
अग्नि को हवा देना 
सुगंध को विस्तार देना।
वे कायर थे 
उन्होंने तुम्हें असमय मारा 
तुम्हारी राख को ठंडा होने से पहले ही 
प्रवाहित कर दिया जल में। 
जल ने 
अग्नि को और भड़का दिया 
तुम्हारी आवाज शंखनाद में तब्दील हो गयी 
कोटि कोटि जनता की प्राणवायु हो गए तुम।

        जेल के दिनों में उनके लिखे खतों व लेखों से उनके विचारों का अन्दाजा लगता है। उन्होंने भारतीय समाज में लिपि (पंजाबी की गुरुमुखी व शाहमुखी तथा हिन्दी और अरबी एवम् उर्दू के सन्दर्भ में विशेष रूप से), जाति और धर्म के कारण आयी दूरियों पर दुःख व्यक्त किया था। उन्होंने समाज के कमजोर वर्ग पर किसी भारतीय के प्रहार को भी उसी सख्ती से सोचा जितना कि किसी अंग्रेज के द्वारा किये गये अत्याचार को| भगत सिंह को हिन्दी, उर्दू, पंजाबी तथा अंग्रेजी के अलावा बांग्ला भी आती थी जो उन्होंने बटुकेश्वर दत्त से सीखी थी । उनका विश्वास था कि उनकी शहादत से भारतीय जनता और उद्विग्न हो जायेगी और ऐसा उनके जिन्दा रहने से शायद ही हो पाये । इसी कारण उन्होंने मौत की सजा सुनाने के बाद भी माफ़ीनामा लिखने से साफ मना कर दिया था।

       पं० राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ ने अपनी आत्मकथा में जो-जो दिशा-निर्देश दिये थे, भगत सिंह ने उनका अक्षरश: पालन किया। उन्होंने अंग्रेज सरकार को एक पत्र भी लिखा, जिसमें कहा गया था कि उन्हें अंग्रेज़ी सरकार के ख़िलाफ़ भारतीयों के युद्ध का प्रतीक एक युद्धबन्दी समझा जाये तथा फाँसी देने के बजाय गोली से उड़ा दिया जाये। फाँसी के पहले 3 मार्च को अपने भाई कुलतार को भेजे एक पत्र में भगत सिंह ने लिखा था –

उसे यह फ़िक्र है हरदम,
नया तर्जे-जफ़ा (अन्याय) क्या है?
हमें यह शौक देखें,
सितम की इंतहा क्या है?
दहर (दुनिया) से क्यों खफ़ा रहे,
चर्ख (आसमान) का क्यों गिला करें,
सारा जहाँ अदू (दुश्मन) सही,
आओ मुकाबला करें।
कोई दम का मेहमान हूँ,
ए-अहले-महफ़िल,
चरागे सहर हूँ,
बुझा चाहता हूँ।
मेरी हवाओं में रहेगी,
ख़यालों की बिजली,
यह मुश्त-ए-ख़ाक है फ़ानी,
रहे रहे न रहे।

         इन जोशीली पंक्तियों से उनके शौर्य का अनुमान लगाया जा सकता है। चन्द्रशेखर आजाद से पहली मुलाकात के समय जलती हुई मोमबती पर हाथ रखकर उन्होंने कसम खायी थी कि उनकी जिन्दगी देश पर ही कुर्बान होगी और उन्होंने अपनी वह कसम पूरी कर दिखायी।

         भगत सिंह और उनके मित्रों की शहादत को आज ह‍ी नही तत्‍कालीन मीडिया और युवाओं 
ने भी गांधीजी के अंग्रेज परस्‍ती गांधीवाद पर देशभक्तों का तमाचा बताया था। दक्षिण भारत में पेरियार ने उनके लेख मैं नास्तिक क्यों हूँ पर अपने साप्ताहिक पत्र कुडई आरसु में के 22-29 मार्च, 1931 के अंक में तमिल में संपादकीय लिखा । इसमें भगतसिंह की प्रशंसा की गई थी तथा उनकी शहादत को गांधीवाद के पर विजय के रूप में देखा गया था । तत्‍कालीन गांधीगीरी वाली मानसिकता आज के भारत सरकार में भी विद्यमान है, और आज भी कांग्रेस का हर संभव प्रयास यही रहता है कि नेहरु-गाँधी खानदान को छोड़कर देश किसी और हुतात्मा से परिचित न हो जाये। इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है कि आज़ादी के इतने वर्षों बाद हमें ये सुनने को मिलता है कि भगतसिंह सरकारी तौर पर शहीद की श्रेणी में नहीं हैं। इनता तो तय है कि अंग्रेजों द्वारा बनाई गई कांग्रेस और अंग्रेजों में कोई फर्क नही है। न वह सेनानियों का सम्‍मान करते थे और न ही काग्रेस|कितना कड़वा सच बयान किया है कवि ने इन पंक्तियों में—

भगतसिंह ! इस बार न लेना काया भारतवासी की,
देशभक्ति के लिए आज भी सज़ा मिलेगी फाँसी की !
यदि जनता की बात करोगे, तुम गद्दार कहाओगे–
बम्ब सम्ब की छोड़ो, भाषण दिया कि पकड़े जाओगे !
निकला है कानून नया, चुटकी बजते बँध जाओगे,
न्याय अदालत की मत पूछो, सीधे मुक्ति पाओगे,
काँग्रेस का हुक्म; ज़रूरत क्या वारंट तलाशी की !
मत समझो, पूजे जाओगे क्योंकि लड़े थे दुश्मन से,
रुत ऐसी है आँख लड़ी है अब दिल्ली की लंदन से,
कामनवैल्थ कुटुम्ब देश को खींच रहा है मंतर से–
प्रेम विभोर हुए नेतागण, नीरा बरसी अंबर से,
भोगी हुए वियोगी, दुनिया बदल गई बनवासी की !
गढ़वाली जिसने अँग्रेज़ी शासन से विद्रोह किया,
महाक्रान्ति के दूत जिन्होंने नहीं जान का मोह किया,
अब भी जेलों में सड़ते हैं, न्यू-माडल आज़ादी है,
बैठ गए हैं काले, पर गोरे ज़ुल्मों की गादी है,
वही रीति है, वही नीति है, गोरे सत्यानाशी की !
सत्य अहिंसा का शासन है, राम-राज्य फिर आया है,
भेड़-भेड़िए एक घाट हैं, सब ईश्वर की माया है !
दुश्मन ही जब अपना, टीपू जैसों का क्या करना है ?
शान्ति सुरक्षा की ख़ातिर हर हिम्मतवर से डरना है !
पहनेगी हथकड़ी भवानी रानी लक्ष्मी झाँसी की !

—-शैलेन्द्र

          लेकिन सुखद यह है कि देश की नयी पीढ़ी लगातार भगतसिंह से जुड़ रही है और इस बात को समझने लगी है कि किस तरह से उसे आज़ादी के महानायकों से दूर रखा गया और कुछ गिने चुने लोगों को ही आज़ादी की लड़ाई का नायक बना कर उसके सामने पेश किया गया। भगतसिंह तथा उनके साथियों को फांसी दिए जाने पर लाहौर के उर्दू दैनिक समाचारपत्र पयाम ने लिखा था —पूरा हिन्दुस्तान इन तीनों शहीदों को पूरे ब्रितानिया से ऊंचा समझता है । अगर हम हजारों-लाखों अंग्रेजों को मार भी गिराएं, तो भी हम पूरा बदला नहीं चुका सकते । यह बदला तभी पूरा होगा, अगर तुम हिन्दुस्तान को आजाद करा लो, तभी ब्रितानिया की शान मिट्टी में मिलेगी। ओ! भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव, अंग्रेज खुश हैं कि उन्होंने तुम्हारा खून कर दिया। लेकिन वो गलती पर हैं। उन्होंने तुम्हारा खून नहीं किया, उन्होंने अपने ही भविष्य में छुरा घोंपा है। तुम जिन्दा हो और हमेशा जिन्दा रहोगे। सच में भगतसिंह और अन्य हुतात्मा हमेशा जीवित रहेंगे, हमारे हृदयों में, हमारे विचारों में। कोटि कोटि नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि आज़ादी की लड़ाई के इस महानायक को।

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