मनुष्य का आहार क्या है

मनुष्य का आहार क्या है

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सत्त्व, रज और तम की साम्यावस्था का नाम प्रकृति है । भोजन की भी तीन श्रेणियां हैं । प्रत्येक व्यक्ति अपने रुचि वा प्रवृत्ति के अनुसार भोजन करता है । श्रीकृष्ण जी महाराज ने गीता में कहा है –

आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः

          सभी मनुष्य अपनी प्रवृत्ति के अनुसार तीन प्रकार के भोजन को प्रिय मानकर भक्षण करते हैं । अर्थात् सात्त्विक वृत्ति के लोग सात्त्विक भोजन को श्रेष्ठ समझते हैं । राजसिक वृत्ति वालों को रजोगुणी भोजन रुचिकर होता है । और तमोगुणी व्यक्ति तामस भोजन की ओर भागते हैं । किन्तु सर्वश्रेष्ठ भोजन सात्त्विक भोजन होता है ।

सात्त्विक भोजन

आयुः – सत्त्व – बलारोग्य – सुख – प्रीति – विवर्धनाः ।

रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥

         आयु, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले रसीले, चिकने स्थिर, देर तक ठीक रहने वाले एवं हृदय के लिये हितकारी – ऐसा भोजन सात्त्विक जनों को प्रिय होता है । अर्थात् जिस भोजन के सेवन से आयु, बल, वीर्य, आरोग्य आदि की वृद्धि हो, जो सरस, चिकना, घृतादि से युक्त, चिरस्थायी और हृदय के लिये बल शक्ति देने वाला है, वह भोजन सात्त्विक है ।

         सात्त्विक पदार्थ – गाय का दूध, घी, गेहूं, जौ, चावल, मूंग, मोठ, उत्तम फल, पत्तों के शाक, बथुवा आदि, काली तोरई, घीया (लौकी) आदि मधुर, शीतल, स्निग्ध सरस, शुद्ध पवित्र, शीघ्र पचने वाले तथा बल, ओज अवं कान्तिप्रद पदार्थ हैं वे सात्त्विक हैं । बुद्धिमान् व्यक्तियों का यही भोजन है ।

गोदुग्ध सर्वोत्तम भोजन है । वह बलदायक, आयुवर्द्धक, शीतल, कफ पित्त के विकारों को शान्त करता है । हृदय के लिये हितकारी है तथा रस और पाक में मधुर है । गोदुग्ध सात्त्विक भोजन के सभी गुणों से ओतप्रोत है ।

        प्राकृतिक आहार दूध ही है । मनुष्य-जन्म के समय भगवान् ने मनुष्य के लिये माता के स्तनों में दूध का सुप्रबन्ध किया है । मनुष्य के शरीर और मस्तिष्क का यथोचित पालन पोषण करने के लिये पोषक तत्त्व जिन्हें आज का डाक्टर विटेमिन्स (vitamins) नाम देता है, सबसे अधिक और सर्वोत्कृष्ट रूप में दूध में ही पाये जाते हैं जो शरीर के प्रत्येक भाग अर्थात् रक्त, मांस और हड्डी को पृथक्-पृथक् शक्ति पहुंचाते हैं । मस्तिष्क अर्थात् मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार इस अन्तःकरण चतुष्टय को शुद्ध करके गोदुग्ध सब प्रकार का बल प्रदान करता है । इसमें ऐतिहासिक प्रमाण है –

महात्मा बुद्ध तप करते-करते सर्वथा कृशकाय हो गये थे । वे चलने फिरने में भी सर्वथा असमर्थ हो गये थे । उस समय अपने वन के इष्ट देवता की पूजार्थ गोदुग्ध से बनी खीर लेकर एक वैश्य देवी सुजाता नाम की वहां पहुंची जहां वट-वृक्ष के नीचे महात्मा बुद्ध निराश अवस्था में (मरणासन्न) बैठे थे । उस देवी ने उन्हें ही अपना देवता समझा और उसी की पूजार्थ वह खीर उसके चरणों में श्रृद्धापूर्वक उपस्थित कर दी । महात्मा बुद्ध बहुत भूखे थे, उन्होंने उस खीर को खा लिया । उससे उन्हें ज्योति मिली, दिव्य प्रकाश मिला । जिस तत्त्व की वे खोज में थे, उसके दर्शन हुए । निराशा आशा में बदल गई । शरीर और अन्तःकरण में विशेष उत्साह, स्फूर्ति हुई । यह उनके परम पद अथवा महात्मा पद की प्राप्ति की कथा वा गौरव गाथा है । सभी बौद्ध इतिहासकार ऐसा मानते हैं कि सुजाता की खीर ने ही महात्मा बुद्ध को दिव्य दर्शन कराये । वह खीर उस देवी ने बड़ी श्रद्धा से बनाई थी । उनके घर पर एक हजार दुधारू गायें थीं । उन सबका दूध निकलवाकर वह १०० गायों को पिला देती थी और उन १०० गायों का दूध निकलवाकर १० गौवों को पिला देती थी और दस गौवों का दूध निकालकर १ गाय को पिला देती थी ।

इस गाय के दूध से खीर बनाकर वन के देवता की पूजार्थ ले जाती । उसका यह कार्यक्रम प्रतिदिन चलता था । इस प्रकार से श्रद्धापूर्वक बनायी हुई वह खीर महात्मा बुद्ध के अन्तःकरण में ज्ञान की ज्योति जगाने वाली बनी ।

         छान्दोग्य उपनिषद् में लिखा है –

आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः ।

स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः ॥

        आहार के शुद्ध होने पर अन्तःकरण मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार शुद्ध हो जाते हैं । अन्तःकरण की शुद्धि होने पर स्मरणशक्ति दृढ़ और स्थिर हो जाती है । स्मृति के दृढ़ होने से हृदय की सब गांठें खुल जाती हैं । अर्थात् जन्म-मरण के सब बन्धन ढीले हो जाते हैं । अविद्या, अन्धकार मिटकर मनुष्य दासता की सब श्रृंखलाओं से छुटकारा पाता है और परमपद मोक्ष की प्राप्ति का अधिकारी बनता है । निष्कर्ष यह निकला कि शुद्धाहार से मनुष्य के लोक और परलोक दोनों बनते हैं । योगिराज श्रीकृष्ण जी ने भी गीता में इसकी इस प्रकार पुष्टि की है –

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।

युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥६-१७॥

         यथायोग्य आहार-विहार करने वाले, यथोचित कर्म करनेवाले, उचित मात्रा में निद्रा (सोने और जागने) का यह योग दुःखनाशक होता है । शुद्ध आहार-विहार करने वाले मनुष्य के सब दुःख दूर हो जाते हैं ।

इसी के अनुसार महात्मा बुद्ध को सुजाता की खीर से ज्ञान का प्रकाश मिला । दूसरी ओर इससे सर्वथा विपरीत हुआ, अर्थात् महात्मा बुद्ध को उनके एक भक्त ने सूवर का मांस खिला दिया, यही उनकी मृत्यु का कारण बना । उनको भयंकर अतिसार (दस्त) हुये । कुशीनगर में उन्हें यह शरीर छोड़ना पड़ा । मांस तो रोगों का घर है और रोग मृत्यु के अनुचर सेवक हैं । अतः गोदुग्ध की बनी सुजाता की खीर सात्त्विक भोजन ने ज्ञान और जीवन दिया तथा तमोगुणी भोजन मांस ने महात्मा बुद्ध को रोगी बनाकर मृत्यु के विकराल गाल में धकेल दिया । इसीलिये प्राचीनकाल से ही गोदुग्ध को सर्वोत्तम और पूर्ण भोजन मानते आये हैं ।

         आयुर्वेद के ग्रन्थों में सात्त्विक आहार की बड़ी प्रशंसा की है –

आहारः प्रणितः सद्यो बलकृद् देहधारणः ।

स्मृत्यायुः-शक्ति वर्णौजः सत्त्वशोभाविवर्धनः ॥(भाव० ४-१)

         भोजन से तत्काल ही शरीर का पोषण और धारण होता है, बल्कि वृद्धि होती है तथा स्मरणशक्ति आयु, सामर्थ्य, शरीर का वर्ण, कान्ति, उत्साह, धैर्य और शोभा बढ़ती है । आहार ही हमारा जीवन है । किन्तु सात्त्विक सर्वश्रेष्ठ है । और सात्त्विक आहार में गोदुग्ध तथा गोघृत सर्वप्रधान और पूर्ण भोजन है ।

        धन्वन्तरीय निघन्टु में लिखा है –

पथ्यं रसायनं बल्यं हृद्यं मेध्यं गवां पयः ।

आयुष्यं पुंस्त्वकृद् वातरक्तविकारानुत् ॥१६४)

(सुवर्णादिः षष्ठो वर्यः)

          गोदुग्ध पथ्य सब रोगों तथा सब अवस्थाओं (बचपन, युवा तथा वृद्धावस्था) में सेवन करने योग्य रसायन, आयुवर्द्धक, बलकारक, हृदय के लिये हितकारी, मेधा बुद्धि को बनाने वाला, पुंस्त्वशक्ति अर्थात् वीर्यवर्द्धक, वात तथा रक्तपित्त के विकारों रोगों को दूर करनेवाला है । गोदुग्ध को सद्यः शुक्रकरं पयः तत्काल वीर्य बलवर्द्धक लिखा है । इस प्रकार आयुर्वेद के सभी ग्रन्थों में गोदुग्ध के गुणों का बखान किया है और इसकी महिमा के गुण गाये हैं । अतः इस सर्वश्रेष्ठ और पूर्णभोजन का सभी मनुष्यों को सेवन करना चाहिये । यह सर्वश्रेष्ठ सात्त्विक आहार है । जैसे अपनी जननी माता का दूध बालक एक से दो वा अधिक से अधिक तीन वर्ष तक पीता रहता है । माता के दुग्ध से उस समय बच्चा जितना बढ़ता और बलवान् बनता है उतना यदि वह अपनी आयु के शेष भाग में ४० वर्ष की सम्पूर्णता की अवस्था तक भी बढ़ता रहे तो न जाने कितना लम्बा और कितना शक्तिशाली बन जाये । माता का दूध छोड़ने के पश्चात् लोग गौ, भैंस, बकरी आदि पशुवों के दूध को पीते हैं । यदि केवल गोदुग्ध का ही सेवन करें तो सर्वतोमुखी उन्नति हो । बल, लम्बाई, आयु आदि सब बढ़ जावें । जैसे स्वीडन, डैनमार्क, हालैण्ड आदि देशों में गाय का दूध मक्खन पर्याप्त मात्रा में होता है । इसलिये स्वीडन में २०० वर्ष में ५ इंच कद बढ़ा है और भारतीयों के भोजन में पचास वर्ष से गोदुग्ध आदि की न्यूनता होती जा रही है, अतः इन तीस वर्षों में २ इंच कद घट गया । महाभारत के समय भारत देश के वासियों को इच्छानुसार गाय का घृत वा दुग्ध खाने को मिलता था । अतः ३०० और ४०० वर्ष की दीर्घ आयु तक लोग स्वस्थ रहते हुए सुख भोगते थे । महर्षि व्यास की आयु ३०० वर्ष से अधिक थी । भीष्म पितामह १७६ वर्ष की आयु में एक महान् बलवान् योद्धा थे । कौरव पक्ष के मुख्य सेनापति थे, अर्थात् सबसे बलवान् थे । महाभारत में चार पीढ़ियां युवा थी और युद्ध में भाग ले रही थी । जैसे शान्तनु महाराज के भ्राता बाह्लीक अर्थात् भीष्म के चचा युद्ध में लड़ रहे थे । उनका पुत्र सोमदत्त तथा सोमदत्त के पुत्र भूरिश्रवा और भूरिक्षवा – ये सब युद्ध में रत अपना युद्ध कौशल दिखा रहे थे । इस प्रकार चार पीढ़ियां युवा थीं । ६ फीट से कम लम्बाई किसी की नहीं थी । १०० वर्ष से पूर्व कोई नहीं मरता था । यह सब गोदुग्धादि सात्त्विक आहार का ही फल था । सत्यकाम जाबाल को ऋषियों की गायों की सेवा करते हुए तथा गोदुग्ध के सेवन से ही ब्रह्मज्ञान हुआ । गोदुग्ध की औषध मिश्रित खीर से ही महाराज दशरथ के चार पुत्ररत्न उत्पन्न हुए । इसीलिये गाय के दूध को अमृत कहा है । संसार में अमृत नाम की वस्तु कोई है तो वह गाय का घी-दूध ही है ।

          गाय के घी के विषय में राजनिघन्टु में इस प्रकार लिखा है –

गव्यं हव्यतमं घृतं बहुगुणं भोग्यं भवेद्‍भाग्यतः ॥२०४॥

         गौ का घी हव्यतम अर्थात् हवन करने के लिये सर्वश्रेष्ठ है और बहु-गुण युक्त है, यह बड़े सौभाग्यशाली मनुष्यों को ही खाने को मिलता है । यथार्थ में गोपालक ही शुद्ध गोघृत का सेवन कर सकते हैं । गाय के घी को अमृत के समान गुणकारी और रसायन माना है । सब घृतों में उत्तम है । सात्त्विक पदार्थों में सबसे अधिक गुणकारी है । इसी प्रकार गाय की दही, तक्र, छाछ आदि भी स्वास्थ्य रक्षा के लिये उत्तम हैं । दही, तक्र के सेवन से पाचनशक्ति यथोचित रूप में भोजन को पचाती है । इसके सेवन से पेट के सभी विकार दूर होकर उदर नीरोग हो जाता है । निघण्टुकार ने कितना सत्य लिखा है – न तक्रसेवी व्यथते कदाचित् – तक्र का सेवन करनेवाला कभी रोगी नहीं होता । गौ के घी, दूध, दही, तक्र – सभी अमृत तुल्य हैं । इसीलिये हमारे ऋषियों ने इसे माता कहा है । वेद भगवान् ने इस माता को आप्यायध्वमघ्न्या न मारने योग्य, पालन और उन्नत करने योग्य लिखा है अर्थात् गोमाता का वध वा हिंसा कभी नहीं करनी चाहिये क्योंकि यह सर्वश्रेष्ठ सात्त्विक भोजन के द्वारा संसार का पालन पोषण करती है । इसकी नाभि से अमृतस्य नाभिः अमृतरूपी दूध झरता है । यह सात्त्विक आहार का स्रोत है ।

राजसिक भोजन

कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।

आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥ (गीता १७।९॥

         कड़वे, खट्टे, नमकीन, अत्युष्ण, तीक्ष्ण, रूक्ष दाह, जलन उत्पन्न करने वाले नमक, मिर्च, मसाले, इमली, अचार आदि से युक्त चटपटे भोजन राजसिक हैं । इनके सेवन से मनुष्य की वृत्ति चंचल हो जाती है । नाना प्रकार के रोगों से ग्रस्त होकर व्यक्ति विविध दुःखों का उपभोग करता है और शोकसागर में डूब जाता है । अर्थात् अनेक प्रकार की आधि-व्याधियों से ग्रस्त होकर दुःख ही पाता है । इसलिये उन्नति चाहने वाले स्वास्थ्यप्रिय व्यक्ति इस रजोगुणी भोजन का सेवन नहीं करते । उपर्युक्त रजोगुणी पदार्थ अभक्ष्य नहीं, किन्तु हानिकारक हैं । किसी अच्छे वैद्य के परामर्श से औषधरूप में इनका सेवन हो सकता है । भोजनरूप में प्रतिदिन सेवन करने योग्य ये रजोगुणी पदार्थ नहीं होते ।

 तामसिक भोजन

यातयामं गतरसं पूतिपर्युषितं च यत् ।

उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥गीता १७।१०॥

          बहुत देर से बने हुए, नीरस, शुष्क, स्वादरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी, उच्छिष्ट (जूंठे) और बुद्धि को नष्ट करने करनेवाले भोजन तमोगुणप्रधान व्यक्ति को प्रिय होते हैं । जो अन्न गला सड़ा हुआ बहुत विलम्ब से पकाया हुआ, बासी, कृमि कीटों का खाया हुआ अथवा किसी का झूठा, अपवित्र किया हुआ, रसहीन तथा दुर्गन्धयुक्त माँस, मछली, अण्डे, प्याज, लहसुन, शलजम आदि तामसिक भोजन हैं । इनका सेवन नहीं करना चाहिये । ये अभक्ष्य मानकर सर्वथा त्याज्य हैं । जो इन तमोगुणी पदार्थों का सेवन करता है, वह अनेक प्रकार के रोगों में फंस जाता है । उसका स्वास्थ्य बिगड़ जाता है, आयु क्षीण हो जाती है, बुद्धि, मन तथा आत्मा इतने मलिन हो जाते हैं कि उनको अपने हिताहित और धर्माधर्म का भी ज्ञान और ध्यान नहीं रहता । अतःएव तमोगुणी व्यक्ति मलिन, आलसी, प्रमादी होकर पड़े रहते हैं । चोरी, व्यभिचार आदि अनाचारों का मूल ही तामसिक भोजन है (इन तमोगुणी भोजनों में भी मांस, अण्डा, मछली सबसे अधिक तमोगुणी है । वैसे तो सभी तमोगुणी भोजन हानिकारक होने से सर्वथा त्याज्य हैं किन्तु मांस, मछली आदि तो सर्वथा अभक्ष्य है । इनको खाना तो दूर, कभी भूल कर स्पर्श भी नहीं करना चाहिये ।)

संस्कृत में मांस का नाम आमिष है, जिसका अर्थ है – अमन्ति रोगिणो भवन्ति येन भक्षितेन तदामिषम् जिस पदार्थ के भक्षण से मनुष्य रोगी हो जाये, वह आमिष कहलाता है । आजकल सभी मानते हैं कि मांसाहारी लोगों को कैंसर, कोढ़, गर्मी के सभी रोग, दांतों का गिर जाना, मृगी, पागलपन, अन्धापन, बहरापन आदि भयंकर रोग लग जाते हैं । मांस मनुष्य को रोगी करने वाला अभक्ष्य पदार्थ है । मनुष्य को इनसे सदैव दूर रहना चाहिये । इस विचार के मानने वाले लोग योरुप में भी हुये हैं ।

अंग्रेजी भाषा के ख्यातिनाम साहित्यकार बर्नाड शॉ ने मांस खाना छोड़ दिया था । वे मांस के सहभोज में नहीं जाते थे । मांस भक्षण के पक्षपाती डाक्टरों ने उनसे कहा कि मांस नहीं खाओगे तो शीघ्र मर जावोगे । उन्होंने उत्तर दिया मुझे परीक्षण कर लेने दो, यदि मैं नहीं मरा तो तुम निरामिषभोजी बन जाओगे अर्थात् मांस खाना छोड़ दोगे । बर्नाड शॉ लगभग १०० वर्ष की आयु के होकर मरे और मरते समय तक स्वस्थ रहे । उन्होंने एक बार कहा था – “मेरी स्थिति बड़ी गम्भीर है, मुझसे कहा जाता है गोमांस खाओ, तुम जीवित रहोगे । मैंने अपने वसीयत (स्वीकार पत्र) लिख दी है कि मेरे मरने पर मेरी अर्थी के साथ विलाप करती हुई गाड़ियों की आवश्यकता नहीं । मेरे साथ बैल, भेड़ें, गायें, मुर्गे और मछलियां रहेंगी क्योंकि मैंने अपने साथी प्राणियों को खाने की अपेक्षा स्वयं का मरना अच्छा समझा है । हजरत नूह की किस्ती को छोड़कर यह दृश्य सबसे अधिक और महत्त्वपूर्ण होगा ।”

इसी प्रकार आर्य जगत् के प्रसिद्ध विद्वान् स्व० पं० गुरुदत्त एम. ए. विद्यार्थी एक बार रोगी हो गये थे । डाक्टरों ने परामर्श दिया कि गुरुदत्त जी मांस खा लें तो बच सकते हैं । पं० गुरुदत्त जी ने उत्तर दिया कि यदि मैं मांस खाने पर अमर हो जाऊं, पुनः मरना ही न पड़े तो विचार कर सकता हूँ । डाक्टर चुप हो गये ।

मानवीय भोजन तथा उसका परिचरण

मानवीय भोजन तथा उसका परिचरण

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       प्रस्तुत लेख का विषय है, मनुष्य का भोजन तथा उसका प्रकार। भोजन शद की सिद्धि केलिए पाणिनी ने एक धातु सूत्र लिखा है- ”भुज पालन अयवहारयो” इस धातु के दो अर्थ हैं- एक पालन करना, दूसरा भोजन करना। इसी धातु से अन्योन्य अनेक शद बनते हैं, जैसे-भोग, भोज्य, भोक्ता, भोक्तव्य आदि (भोग तथा भोक्ता का) भोज्य और भोक्ता का निकट (नित्य) सबन्ध है। प्राकृतिक जड़ पदार्थ परार्थ हैं, अर्थात् चेतन आत्मा के लिए है। आत्मा जब स्व कर्मानुसार मानव व अन्य प्राणी के शरीर में आता है तो कर्मफल के तद्रूप शरीर की रचना होती है। शरीर पंच भौतिक होने से तत् तत्त्व की आवश्यकता होती है। वह जरूरत भूख के रूप में अभिव्यक्त होती है। उसकी कमी व आवश्यकता की पूर्ति विभिन्न भक्ष्यों से की जाती है। यहीं से भोक्ता भूख तथा भोजन के इस त्रिक का सूत्रपात होता है। ये स्वखाद्यत्रिगुणात्मक होते हैं, क्योंकि जो गुण कारण में होता है, वह कार्य में भी देखा जाता है। ”कारणगुणपूर्वकः कार्य गुणोदृष्टः” (वै. अ. 2 आ. 1 सू. 24) अर्थात् ”जैसे कारण में गुण होते हैं वैसे ही कार्य में होते है”। इन सत्त्वादि के तीनों गुणों के पृथक-पृथक गुण-धर्म है। मूल प्रकृति के पंचभूत विकार हैं। इन्हीं से समग्र स्थूल शरीरों की रचना होती है।       ऊपर से लेकर शरीर तक का सबन्ध नितान्त रूप से कारण-कार्य के अनुरूप चलता रहता है। इसी प्रकार सभी प्राणियों के इन्हीं प्राकृतिक तत्त्वों से शरीरों का निर्माण होता है तथा स्व-स्व गुण-धर्म निमित्त शरीर में रहते हैं। सभी प्राणियों की नेक प्रकृति स्वभाव तथा जीने का कारण बड़ा विलक्षण प्रकार रहता है। अपनी-अपनी स्वाभाविक प्रकृति व शरीर आकृति के आधार पर उनका अपना-अपना भोजन भी निश्चित है। क्षुद्रजीव से लेकर विशालकाय पर्यन्त साी प्राणियों में एक निर्धारित जीवन-शैली है। इसमें तनिक भी विपर्यय नहीं होता है। भोजन भक्षी प्राणियों को स्थूल रूप से दोाागों में विभक्त कर सकते हैं- शाकाहारी और मांसाहारी। अब देखना यह कि मनुष्य कौन से आहार पर विश्वास रखता है? सभी प्राणी अपने-अपने भोजन पर पूर्ण विश्वस्त हैं। किन्तु मानव अपने भोजन पर अभी तक निर्णय नहीं कर पाया है कि मनुष्य का भोजन कौन-सा है? पशु-पक्षी, जन्तु, जानवर बुद्धिविहीन होने पर भी अपने खाद्य पर अटल है, किन्तु आश्चर्य है कि सभी प्राणियों में बुद्धिमान, मनुष्य अपने खाद्यों में चंचल व दुर्बल है। अतः कहा है  ”लोल्यं दुःखस्य कारणम्”- जीभ का लालच सभी दुःखों का कारण है। पर प्राणी के शरीर को विनष्ट करके अपने जीभ के स्वाद को पूरा करना कहाँ तक सही है? मांस भक्षण से मनुष्य का स्वभाव हिंसक व तामसिक हो जाता है। आयुर्वेद के चरकादि ग्रन्थों में जो मांस भक्षण का विधान किया है, वह किसी परिस्थिति विशेष के लिए हो सकता है अथवा किसी रोग विशेष के लिए हो सकता है। सर्व साधारण एवं निर्विकल्प नियम नहीं है। मांस के अन्य अनेकों विकल्प हैं, उसके स्थान पर अनेक वन्य औषधियों से रोग का निवारण किया जा सकता है। अतएव मांस मनुष्य का भोजन नहीं, क्योंकि यह मानवीय प्रकृति के सानुकूल नहीं है। सचमुच मनुष्य का भोजन तो फल, दूध, अन्नादि सर्वोत्तम पदार्थ हैं। फलाहार जो प्राकृतिक रूप से स्वयं वृक्ष पर परिपक्व होता है। जिसे किसी भी प्रकार के ”केमिकल” से नहीं पकाया हो, वहीं सर्वोत्तम है। दूसरा- उत्तम गवादि पशुओं का दूध, जो किसी भी मिलावट रहित होना चाहिये। तृतीय है- अन्नाहार, जो धरती के र्गा से उत्पन्न होकर सभी का पालन करता है। किन्तु अत्याधुनिक स्वादों से अनाज को पूर्ण दूषित करके खाना स्वास्थ्य के लिए हानिप्रद है। ध्यातव्य है कि आहार की शुद्धि होने पर ही सत्त्व बुद्धितत्त्व की शुद्धि होती है और सत्त्व शुद्ध होने पर ही निश्चल स्मृति होती है। हमारे शरीर में पंचकोष होते हैं। अन्न का सबन्ध शरीर के पाँच कोषों से है। इन पंच कोषों में सबसे पहला अन्नमय कोष है। अन्नमय कोष की शुद्धि होने पर अन्य कोषों की उत्तरोत्तर शुद्धि व परिमार्जन होता जाता है। यह सर्वविदित है कि रोगोत्पत्ति प्रायः अनियमित आहार-विहार के कारण होती है। स्वास्थ्य के मूल रूप उपस्तभ तीन हैं- आहार, निद्रा और ब्रह्मचर्य। ये आयु के प्रमुख बिन्दु हैं और परमाचरणीय हैं क्योंकि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति के लिए आरोग्य ही मूल साधन है, अतः देश, काल, अवस्था, गुण, परिपाक, हेतु, लक्षण, स्वभाव आदि का परिज्ञान करके ही सत्त्व, बल, आरोग्यदायक ओषध सम भोजन की योजना करें। ध्यान रहे कि भोजन अथवा भोज्य पदार्थ भोग न बन जाय, जिससे रोग के वशीभूत होकर दुःख भोगना पड़े, क्योंकि रोग सबसे भयंकर दुःख होता है। यहाँ वैदिक सूक्ति है- तेन त्यक्तेन भुंजीथाः। भोज्य  पदार्थों का भोग भी करना है, किन्तु त्यागपूर्वक करना है। ये सभी विधि विधान शरीर के परिपेक्ष में किये गये हैं। शरीरस्थ आत्मा के विषय में कोई विचार नहीं किया गया है, अतः समूचे क्रम में आत्मा ही सर्व उपादेय है। यह सब कुछ आत्मा के लिए है, शरीरेन्द्रियों के द्वारा भौतिक पदार्थों से जो सबन्ध होता है, वह अन्ततः आत्मा तक पहुँचाता है, क्योंकि आत्मा ही कर्त्ता और भोक्ता है। स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन रहता है और पवित्र मन से आत्मा की पवित्रता बढ़ती है, अतः आत्मिक सुख परमेश्वर की भक्ति अर्थात् यथोचित् ईश्वर की प्रार्थना करने से प्राप्त होती है। ईश्वर प्रदत्त पदार्थों के उपयोग करने से पहले उसका धन्यवाद करना एक परम कर्त्तव्य है। इसके बिना मनुष्य कृतघ्न एवं दण्डनीय है। परमेश्वर के धन्यवाद के रूप में एक वेद मन्त्र का पाठ किया जाता है-

3म् अन्नपतेऽन्नस्य नो देह्यनमीवस्य शुष्मिणः।

प्र प्र दातारं तारिषऽऊर्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे।।

       हे अन्न के स्वामी प्रभो! हमारे लिए बल, बुद्धि, तेज, ओज प्रदान करने वाले रोग रहित अन्न प्रदान करो, हे स्वामिन्! हमें आत्मिक शक्तिदायक अन्न दो, जिससे जीवन आरोग्यवान् होकर सुखपूर्वक जी सकें। इस वेद मन्त्र का उच्चारण भोजन से पूर्व करना चाहिये, क्योंकि यह ईश्वर की आज्ञा है। इससे भिन्न मन्त्रों का उच्चारण भोजन से पहले करना अप्रासंगिक है। जैसा मनुष्य समुदाय में एक प्रचलन है-

3म् सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु।

सह वीर्यं करवावहै।

तेजस्विनावधीतमस्तु माविद्विषावहै।।

-ब्रह्मानन्द वल्ली प्रथमोऽनुवाकः

        अर्थ- हे परमात्मन्! एक साथ ही हम दोनों की रक्षा करो। साथ-साथ ही हम दोनों की रक्षा करो। साथ ही बल को बढ़ावे तेजयुक्त प्रभावजनक हम दोनों का पढ़ना, स्वाध्याय, एक साथ ही हो। हम द्वेष न करें, कभी भी एक-दूसरे का अहित न सोचें।

        यहाँ विचारणीय यह कि इस औपनिषदिक मन्त्र का उच्चारण भोजन काल में किया जाता है, क्या यह उचित है? इसी मन्त्र की एक क्रिया पद पर विचार करने से अच्छी प्रकार समाधान हो जाता है। इस परिप्रेक्ष में पाणिनी मुनि का एक सूत्र है- ”भजोऽनवने” (पाणिनि अष्टाध्यायी तृतीय अ. सू. सं. 66) अर्थ- भुजधातोरनवनेऽर्थे वर्तमानादात्मने पदं भवति। भुनक्तु अर्थात् भुज धातु खाने के अर्थ में हो तो आत्मनेपद होती है। इस मन्त्र में जो क्रियापद है वह परस्मैपद है, अतः भुनक्तु का अर्थ होगा- रक्षा करना, न कि भोजन करना ”भुक्ते” का अर्थ भोजन करना होता है। वैदिक परपरा अनुगत भोजन से पूर्व उच्चारणीय मन्त्र तो (अन्नपते….) वही मन्त्र प्रासांगिक और सार्थक है। अन्य मन्त्र अथवा कोई श्लोक आदि कदापि संगत नहीं हो सकता। इसी प्रकार से कुछ लोग गीता के एक श्लोक का भी उच्चारण करते हैंः-

ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणाहुतम्।

ब्रह्मैवतेन गतव्यं ब्रह्म कर्म समाधिना।।

– गीता-4-24

         अर्थ- जिस यज्ञ में अर्पण अर्थात् स्त्रुवा आदि भी ब्रह्म है और हवन किये जाने योग्य द्रव्य भी ब्रह्म है तथा ब्रह्म रूप कर्त्ता के द्वारा ब्रह्म रूप अग्नि में आहुति देना रूप क्रिया भी ब्रह्म ही है। अतएव गीता के इस श्लोक को प्रसंग से रहित ही बोला जाता है। इस श्लोक में ऐसा कोई भी शद नहीं है, जो भोजन से सबन्धित किसी बात को प्रकट करता हो, परन्तु न जाने लोग इस श्लोक को भोजन से पूर्व क्यों उच्चारण करते हैं? सचमुच यह विचारणीय बिन्दु है। सभी सज्जन मनुष्यों का कर्त्तव्य है कि असत्य को छोड़कर सत्य का ग्रहण करें। यही धर्म तथा यही सत्कर्म है।

मानवीय भोजन तथा उसका परिचरण

मानवीय भोजन तथा उसका परिचरण

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       प्रस्तुत लेख का विषय है, मनुष्य का भोजन तथा उसका प्रकार। भोजन शद की सिद्धि केलिए पाणिनी ने एक धातु सूत्र लिखा है- ”भुज पालन अयवहारयो” इस धातु के दो अर्थ हैं- एक पालन करना, दूसरा भोजन करना। इसी धातु से अन्योन्य अनेक शद बनते हैं, जैसे-भोग, भोज्य, भोक्ता, भोक्तव्य आदि (भोग तथा भोक्ता का) भोज्य और भोक्ता का निकट (नित्य) सबन्ध है। प्राकृतिक जड़ पदार्थ परार्थ हैं, अर्थात् चेतन आत्मा के लिए है। आत्मा जब स्व कर्मानुसार मानव व अन्य प्राणी के शरीर में आता है तो कर्मफल के तद्रूप शरीर की रचना होती है। शरीर पंच भौतिक होने से तत् तत्त्व की आवश्यकता होती है। वह जरूरत भूख के रूप में अभिव्यक्त होती है। उसकी कमी व आवश्यकता की पूर्ति विभिन्न भक्ष्यों से की जाती है। यहीं से भोक्ता भूख तथा भोजन के इस त्रिक का सूत्रपात होता है। ये स्वखाद्यत्रिगुणात्मक होते हैं, क्योंकि जो गुण कारण में होता है, वह कार्य में भी देखा जाता है। ”कारणगुणपूर्वकः कार्य गुणोदृष्टः” (वै. अ. 2 आ. 1 सू. 24) अर्थात् ”जैसे कारण में गुण होते हैं वैसे ही कार्य में होते है”। इन सत्त्वादि के तीनों गुणों के पृथक-पृथक गुण-धर्म है। मूल प्रकृति के पंचभूत विकार हैं। इन्हीं से समग्र स्थूल शरीरों की रचना होती है।       ऊपर से लेकर शरीर तक का सबन्ध नितान्त रूप से कारण-कार्य के अनुरूप चलता रहता है। इसी प्रकार सभी प्राणियों के इन्हीं प्राकृतिक तत्त्वों से शरीरों का निर्माण होता है तथा स्व-स्व गुण-धर्म निमित्त शरीर में रहते हैं। सभी प्राणियों की नेक प्रकृति स्वभाव तथा जीने का कारण बड़ा विलक्षण प्रकार रहता है। अपनी-अपनी स्वाभाविक प्रकृति व शरीर आकृति के आधार पर उनका अपना-अपना भोजन भी निश्चित है। क्षुद्रजीव से लेकर विशालकाय पर्यन्त साी प्राणियों में एक निर्धारित जीवन-शैली है। इसमें तनिक भी विपर्यय नहीं होता है। भोजन भक्षी प्राणियों को स्थूल रूप से दोाागों में विभक्त कर सकते हैं- शाकाहारी और मांसाहारी। अब देखना यह कि मनुष्य कौन से आहार पर विश्वास रखता है? सभी प्राणी अपने-अपने भोजन पर पूर्ण विश्वस्त हैं। किन्तु मानव अपने भोजन पर अभी तक निर्णय नहीं कर पाया है कि मनुष्य का भोजन कौन-सा है? पशु-पक्षी, जन्तु, जानवर बुद्धिविहीन होने पर भी अपने खाद्य पर अटल है, किन्तु आश्चर्य है कि सभी प्राणियों में बुद्धिमान, मनुष्य अपने खाद्यों में चंचल व दुर्बल है। अतः कहा है  ”लोल्यं दुःखस्य कारणम्”- जीभ का लालच सभी दुःखों का कारण है। पर प्राणी के शरीर को विनष्ट करके अपने जीभ के स्वाद को पूरा करना कहाँ तक सही है? मांस भक्षण से मनुष्य का स्वभाव हिंसक व तामसिक हो जाता है। आयुर्वेद के चरकादि ग्रन्थों में जो मांस भक्षण का विधान किया है, वह किसी परिस्थिति विशेष के लिए हो सकता है अथवा किसी रोग विशेष के लिए हो सकता है। सर्व साधारण एवं निर्विकल्प नियम नहीं है। मांस के अन्य अनेकों विकल्प हैं, उसके स्थान पर अनेक वन्य औषधियों से रोग का निवारण किया जा सकता है। अतएव मांस मनुष्य का भोजन नहीं, क्योंकि यह मानवीय प्रकृति के सानुकूल नहीं है। सचमुच मनुष्य का भोजन तो फल, दूध, अन्नादि सर्वोत्तम पदार्थ हैं। फलाहार जो प्राकृतिक रूप से स्वयं वृक्ष पर परिपक्व होता है। जिसे किसी भी प्रकार के ”केमिकल” से नहीं पकाया हो, वहीं सर्वोत्तम है। दूसरा- उत्तम गवादि पशुओं का दूध, जो किसी भी मिलावट रहित होना चाहिये। तृतीय है- अन्नाहार, जो धरती के र्गा से उत्पन्न होकर सभी का पालन करता है। किन्तु अत्याधुनिक स्वादों से अनाज को पूर्ण दूषित करके खाना स्वास्थ्य के लिए हानिप्रद है। ध्यातव्य है कि आहार की शुद्धि होने पर ही सत्त्व बुद्धितत्त्व की शुद्धि होती है और सत्त्व शुद्ध होने पर ही निश्चल स्मृति होती है। हमारे शरीर में पंचकोष होते हैं। अन्न का सबन्ध शरीर के पाँच कोषों से है। इन पंच कोषों में सबसे पहला अन्नमय कोष है। अन्नमय कोष की शुद्धि होने पर अन्य कोषों की उत्तरोत्तर शुद्धि व परिमार्जन होता जाता है। यह सर्वविदित है कि रोगोत्पत्ति प्रायः अनियमित आहार-विहार के कारण होती है। स्वास्थ्य के मूल रूप उपस्तभ तीन हैं- आहार, निद्रा और ब्रह्मचर्य। ये आयु के प्रमुख बिन्दु हैं और परमाचरणीय हैं क्योंकि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति के लिए आरोग्य ही मूल साधन है, अतः देश, काल, अवस्था, गुण, परिपाक, हेतु, लक्षण, स्वभाव आदि का परिज्ञान करके ही सत्त्व, बल, आरोग्यदायक ओषध सम भोजन की योजना करें। ध्यान रहे कि भोजन अथवा भोज्य पदार्थ भोग न बन जाय, जिससे रोग के वशीभूत होकर दुःख भोगना पड़े, क्योंकि रोग सबसे भयंकर दुःख होता है। यहाँ वैदिक सूक्ति है- तेन त्यक्तेन भुंजीथाः। भोज्य  पदार्थों का भोग भी करना है, किन्तु त्यागपूर्वक करना है। ये सभी विधि विधान शरीर के परिपेक्ष में किये गये हैं। शरीरस्थ आत्मा के विषय में कोई विचार नहीं किया गया है, अतः समूचे क्रम में आत्मा ही सर्व उपादेय है। यह सब कुछ आत्मा के लिए है, शरीरेन्द्रियों के द्वारा भौतिक पदार्थों से जो सबन्ध होता है, वह अन्ततः आत्मा तक पहुँचाता है, क्योंकि आत्मा ही कर्त्ता और भोक्ता है। स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन रहता है और पवित्र मन से आत्मा की पवित्रता बढ़ती है, अतः आत्मिक सुख परमेश्वर की भक्ति अर्थात् यथोचित् ईश्वर की प्रार्थना करने से प्राप्त होती है। ईश्वर प्रदत्त पदार्थों के उपयोग करने से पहले उसका धन्यवाद करना एक परम कर्त्तव्य है। इसके बिना मनुष्य कृतघ्न एवं दण्डनीय है। परमेश्वर के धन्यवाद के रूप में एक वेद मन्त्र का पाठ किया जाता है-

3म् अन्नपतेऽन्नस्य नो देह्यनमीवस्य शुष्मिणः।

प्र प्र दातारं तारिषऽऊर्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे।।

       हे अन्न के स्वामी प्रभो! हमारे लिए बल, बुद्धि, तेज, ओज प्रदान करने वाले रोग रहित अन्न प्रदान करो, हे स्वामिन्! हमें आत्मिक शक्तिदायक अन्न दो, जिससे जीवन आरोग्यवान् होकर सुखपूर्वक जी सकें। इस वेद मन्त्र का उच्चारण भोजन से पूर्व करना चाहिये, क्योंकि यह ईश्वर की आज्ञा है। इससे भिन्न मन्त्रों का उच्चारण भोजन से पहले करना अप्रासंगिक है। जैसा मनुष्य समुदाय में एक प्रचलन है-

3म् सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु।

सह वीर्यं करवावहै।

तेजस्विनावधीतमस्तु माविद्विषावहै।।

-ब्रह्मानन्द वल्ली प्रथमोऽनुवाकः

        अर्थ- हे परमात्मन्! एक साथ ही हम दोनों की रक्षा करो। साथ-साथ ही हम दोनों की रक्षा करो। साथ ही बल को बढ़ावे तेजयुक्त प्रभावजनक हम दोनों का पढ़ना, स्वाध्याय, एक साथ ही हो। हम द्वेष न करें, कभी भी एक-दूसरे का अहित न सोचें।

        यहाँ विचारणीय यह कि इस औपनिषदिक मन्त्र का उच्चारण भोजन काल में किया जाता है, क्या यह उचित है? इसी मन्त्र की एक क्रिया पद पर विचार करने से अच्छी प्रकार समाधान हो जाता है। इस परिप्रेक्ष में पाणिनी मुनि का एक सूत्र है- ”भजोऽनवने” (पाणिनि अष्टाध्यायी तृतीय अ. सू. सं. 66) अर्थ- भुजधातोरनवनेऽर्थे वर्तमानादात्मने पदं भवति। भुनक्तु अर्थात् भुज धातु खाने के अर्थ में हो तो आत्मनेपद होती है। इस मन्त्र में जो क्रियापद है वह परस्मैपद है, अतः भुनक्तु का अर्थ होगा- रक्षा करना, न कि भोजन करना ”भुक्ते” का अर्थ भोजन करना होता है। वैदिक परपरा अनुगत भोजन से पूर्व उच्चारणीय मन्त्र तो (अन्नपते….) वही मन्त्र प्रासांगिक और सार्थक है। अन्य मन्त्र अथवा कोई श्लोक आदि कदापि संगत नहीं हो सकता। इसी प्रकार से कुछ लोग गीता के एक श्लोक का भी उच्चारण करते हैंः-

ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणाहुतम्।

ब्रह्मैवतेन गतव्यं ब्रह्म कर्म समाधिना।।

– गीता-4-24

         अर्थ- जिस यज्ञ में अर्पण अर्थात् स्त्रुवा आदि भी ब्रह्म है और हवन किये जाने योग्य द्रव्य भी ब्रह्म है तथा ब्रह्म रूप कर्त्ता के द्वारा ब्रह्म रूप अग्नि में आहुति देना रूप क्रिया भी ब्रह्म ही है। अतएव गीता के इस श्लोक को प्रसंग से रहित ही बोला जाता है। इस श्लोक में ऐसा कोई भी शद नहीं है, जो भोजन से सबन्धित किसी बात को प्रकट करता हो, परन्तु न जाने लोग इस श्लोक को भोजन से पूर्व क्यों उच्चारण करते हैं? सचमुच यह विचारणीय बिन्दु है। सभी सज्जन मनुष्यों का कर्त्तव्य है कि असत्य को छोड़कर सत्य का ग्रहण करें। यही धर्म तथा यही सत्कर्म है।

आशीर्वाद

भारतवर्ष में प्राय: माता-पिता, गुरुओं, अपने से बड़ों, विद्वानों आदि से आशीर्वाद लेने की प्रथा है। मनुष्य प्रकृति में भी यह भावना है। जिसे वह श्रद्धेय पूज्य मानता है, जिसे अपने से ज्यादा ज्ञानवान मानता है, धार्मिक जनता है, उसके मुख से अपने लिए, अपनी सन्तान के लिये, अपने परिवार के लिए, अपने सम्बन्धियों के लिए आशीर्वाद के वचन चाहता है। यदि किसी अवसर विशेष पर उन वृद्ध पुरुषों को भोजनादि खिलाया जाता है तो भी कुछ आशीर्वाद की आशा की जाती है।

 

प्राय: जब हम किसी वृद्ध की सेवा नि:स्वार्थ भाव से करते है तो वे हमें हमारे लिए जीवन में सुख-शान्ति, धन दौलत इत्यादि बातों की भावना का विचार करके हमें आशीर्वाद देते है।

 

वेद के एक मन्त्र में अभिवादन और आशीर्वाद के विषय में आता है-

 

अभिवादनशीलस्य  नित्यं वृद्धोपसेविनः।

चत्वारि तस्य वथ्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्।।

 

सामान्य रूप से जब कोई व्यक्ति अपने बड़ों को श्रद्धा और विनम्रता पूर्वक अभिवादन व सम्मान करता है, तथा अपने बुजुर्गो की सेवा करने वाला होता है। उनकी आयु ,विद्या, यश और बल, इन चारों में सदैव वृद्धि होती रहती हैं।

 

प्राचीन समय से ही परम्परा चली आ रही है कि जब भी हम किसी विद्वान, व्यक्ति या उम्र में बड़े व्यक्ति से मिलते हैं तो उनके पैर छूते हैं। इस परम्परा को मान-सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। और इसके फलस्वरूप वे विद्वान या अन्य व्यक्ति हमारी मंगल कामना और भावी जीवन के लिए आशीर्वाद देते है जो कि वास्तव में आगे चलकर हमारे जीवन में इसका प्रभाव पड़ता है। यदि हम अपने किसी छोटे को आशीर्वाद देते है तो वह आशीर्वाद नि:स्वार्थ भावना से हमें देना चाहिए। हमारा व्यवहार भी छल से रहित और प्यार भरा होना चाहिए।

 

उसी प्रकार से यदि हम परमपिता परमात्मा का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते है तो परमात्मा का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए हमें अपने जीवन में शुभकर्म करते हुए परमात्मा के आशीर्वाद रूपी कृपा का पात्र बनना होगा।

 

आत्मा ओर परमात्मा के विषय का एक प्रसंग  है कि एक बार आत्मा परमात्मा से कहती है –

 

आत्मा – परमपिता परमात्मा मैं आपके अमृतमयी आशीर्वाद को प्राप्त करना चाहती हूँ अर्थात् मैं मोक्ष प्राप्त करना चाहती हूँ।

 

परमात्मा – मेरे आशीर्वाद के लिये अर्थात् मोक्ष प्राप्ति के लिए तुझे (आत्मा)कुछ प्रयत्न करने होगें, एक शरीर रूपी चोला जो की मानव का होगा उसके अन्दर जाकर अपने जीवन के कार्यकाल में शुभ कर्म करने होगें। संसार के श्रेष्ठ कर्म करने होगें।

 

आत्मा – मैं तैयार हूँ परमपिता परमात्मा।

 

परन्तु यह आत्मा मानव के शरीर में आकर इस भौतिक संसार में रहते हुए अपने जीवन के कार्यकाल में शुभ कर्म करना भूल जाती है और संसार की इस चकाचौंध में रहकर इसी को जीवन समझ बैठती है और उस परमपिता परमात्मा के मोक्ष रूपी आशीर्वाद के लेने की पात्रता को भूल जाती है। इसी कारण परमपिता परमात्मा के आनन्द रूपी आशीर्वाद से वंचित रह जाती है और जन्म-मरण के चक्कर में फसी रह जाती है।

 

अगर हम किसी व्यक्ति से आशीर्वाद को चाहते है और फिर उस आशीर्वाद के फल को प्राप्त करना चाहते है तो उसके लिए हमें सबसे पहले सच्चे ह्रदय से उस आशीर्वाद के लिए उचित पात्र बनना होगा। तभी आशीर्वाद हमारे जीवन के लिए सार्थक होगा।  ओ३म् शान्ति

 

–विकास आर्य (वैदिक वाटिका से चुनें पुष्प)

योग ही रोग का नाशक है

योग का मुख्य उद्देश्य चित्त की एकाग्रता द्वारा आत्मिक मानसिक तथा बौधिक शक्तियों का विकास करना और आत्म साक्षात द्वारा परम आत्मा तक पहुंचाना है किंतु जो बुद्धि तथा आत्मा का निवास स्थान है जो परमात्मा का साक्षात मन्दिर है वह हमारा शरीर यदि बलवान और स्वस्थ नहीं है तो हम अपनी शक्तियों का विकास नहीं कर सकते हैं और ना ही अपने आत्मस्वरूप का साक्षात परम आत्मा परमेश्वर का दर्शन आर्यों की धर्म पुस्तक वेद में भक्त भगवान से प्रार्थना करते हैं।

 

“स्थिरैरंगैस्तुष्टुवांस:”

हे प्रभु हम सुधार तथा बलवान अंगों से तेरी स्तुति करने वाले हैं अध्यात्म विद्या की मुख्य पुस्तक उपनिषद भी बिना शारीरिक बल के आत्मदर्शन असंभव ही बताती है जैसा कि उपनिषदों में कहा है –

 

नायमात्मा बलहीनेनलभ्यः।

अर्थात् यह आत्मा बल हीना कमजोर मनुष्य को प्राप्त नहीं होता है अतः योग जहां आत्मिक मानसिक तथा भौतिक उन्नति का उपाय बताता है, वहां शारीरिक उन्नति का भी सर्वोत्तम तथा अचूक उपाय हमारे सामने रखता है।

 

स्वस्थ तथा बलवान शरीर ही सांसारिक सुख समृद्धि का मुख्य साधन है

मनुष्य-जीवन का उद्देश्य अपने को सुखमय तथा शक्ति संपन्न बनाना है इस उद्देश्य की पूर्ति भी तभी हो सकती है जबकि हमारे शरीर निरोग तथा सबल हो। इस शरीर की महत्ता का विद्वज्जनों ने इन शब्दों में गुणानुवाद गाया है।

 

आयतनं सर्वं विद्यानां मूलं धर्मार्थकाममोक्षाणाम्।

प्रेयः किमन्यत् शरीरमजरामरं विहायैकम्।।

अर्थात् जो शरीर सम्पूर्ण विद्याओं तथा शुभ गुणों का आधार है, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष -प्राप्ति का मूल कारण है, उस शरीर को मनुष्य तो सैदव अजर, अमर चाहता हैं

 

अर्थात् चिरायु अवस्था से अधिक प्रिय वस्तु संसार में मनुष्य के लिए और क्या होगी।

 

आज प्रभु की अमूल्य देन की दयनीय दशा को देख कर बहुत दुख होता है आज सभ्य संसार इस शरीर की अनेक प्रकार की आधि-व्याधियों से आक्रांत हो रहा है सम्भवत: कोई ऐसा सौभाग्यशाली पुरुष होगा कि जिसको किसी न किसी प्रकार की आधि तथा व्याधियों ने घेर रखा हो। जठराग्नि की कमजोरी (अपचन), बद्धकोष्ठता (कब्ज), का कबाब रक्त दोष सिर दर्द जुखाम स्वपनदोष प्रमेह में ही धातुक्षीणता आदि बीमारियां तो सर्वसाधारण बनती जा रही है आज सभ्य जगत का प्रतीक पुरुष उपयुक्त किसी न किसी व्याधि से अवश्य आक्रांत है यदि कोई सौभाग्यवश शारीरिक व्याधि से मुक्त है तो उसे मानसिक व्याधि ने सता रखा है। इसलिए आज हमारे शरीरों में तथा मनों में न बल है न उत्साह, न पावित्र्य है और न प्रसन्नता।

 

जीवन की छोटी से छोटी घटनाएं तथा परिस्थितियां भी हमारे निर्बल तथा निस्तेज शरीर तथा मन को विक्षुब्ध और अशान्त बना देती है। हमारे स्वभाव का आनंद को भी नष्ट कर हमें शोक सागर में डूबा देती है संसार का कोई ही शायद सौभाग्यशाली मनुष्य होगा कि जिसको किसी ने किसी शोक या चिंता ने सता रखा हो इन सब आदि व्याधियों का मुख्य कारण हमारी शारीरिक तथा मानसिक निर्मलता और अस्वस्थता ही है और उसमें भी विशेष कर शारीरिक निर्बलता जिस मनुष्य का शरीर स्वस्थ और बलवान नहीं वह कभी भी मानसिक चिंता हो तथा शारीरिक व्याधियों से मुक्त नहीं हो सकता है।

 

उसके पास सांसारिक सुख भोग की सब सामग्री होते हुए भी ना तो वह उसे स्वेच्छा पूर्वक भोग सकता है और ना ही उसके द्वारा सुख और शांति को प्राप्त कर सकता है उसे कोई न कोई मानसिक चिंता या शारीरिक बीमारी अवश्य घेरे रहती है कमजोर शरीर वाले के मन में न तो किसी भी कार्य को करने का उत्साह होता है और ना उमंग, उसका जीवन स्वभाविक शांति तथा आनंद से शून्य सदा नीरस शुष्क बना रहता है हमारे प्राचीन आचार्यों ने सुखी जीवन के जो  लक्षण बताएं हैं आज हम में से शायद ही कोई सौभाग्यशाली होगा जिसमें यह सारे के सारे लक्षण सर्वात्मना विद्यमान हो।

 

महर्षि चरक ग्रंथ में सुखी जीवन के लक्षण बताते हुए लिखते हैं

 

जिस मनुष्य को शारीरिक व मानसिक रोग नहीं सताते जो विशेषकर यौवनावस्था में सब प्रकार के शारीरिक व मानसिक विकारों से रहित है जिसका बल वीर्य यश पौरुष और पराक्रम उसकी सामर्थ्य तथा इच्छा के अनुरूप है जिसका शरीर नाना प्रकार की कला कौशल आदि विज्ञान को प्राप्त करने में समर्थ है जिसकी इन्द्रियां स्वस्थ बलवान और इंद्रियजन्य भोगो के भोगने में समर्थ है जिसके शरीर में किसी प्रकार की निर्बलता नहीं उसका जीवन ही वास्तव में सुखी जीवन है अतः जिसके शरीर में उपयुक्त नहीं है वह कभी सुखी जीवन नहीं कहला सकता ऐसे नीरस  उत्साहहीन जीवन से ना तो इहलोक सुधर सकता है और न ही परलोक अत: इस लोक और परलोक को शांति तथा सुखमय बनाने का यदि कोई मुख्य साधन है तो वह है शारीरिक आरोग्यता इसलिए शरीर शास्त्र के आचार्यों ने कहा है।

 

 

धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्।।

 

अर्थात् – धर्म अर्थ काम और मोक्ष जो कि मानव जीवन रूपी कल्पवृक्ष के चार मधुर फल है उनका यदि कोई श्रेष्ठता तथा मुख्य साधन है तो वह शारीरिक आरोग्यता ही है, क्योंकि यदि हमारा शरीर स्वस्थ और बलवान् है तो हम अपने पुरुषार्थ से धन भी कमा सकते हैं, उस धन द्वारा सांसारिक सुखों का उपयोग भी कर सकते हैं और परोपकार, देश, जाति तथा धर्म की सेवा तथा आत्म चिंतन और प्रभु-भक्ति आदि शुभ कार्य भी कर सकते हैं। इसलिए महापुरुषों ने कहा है-

 

“शरीरमाद्यं खलु धर्म-साधनम्”

अर्थात् – अपने जीवन को धार्मिक तथा सुखमय बनाने का सबसे प्रथम और मुख्य साधन स्वस्थ तथा बलवान शरीर ही है। इसलिए हमारे आचार्यों ने सभी स्वास्थ्य पर बहुत बल दिया है महर्षि चरक तो यहां तक लिखते हैं –

 

सर्वमन्यत् परित्यज्य शरीरमनुपालयेत्।

तदभावे हि भावानां सर्वाभावः शरीरिणाम्।।

अर्थात् – मनुष्य अन्य सब काम छोड़कर पहले अपने शरीर की ओर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि अन्य सब धन, संपत्ति आदि पदार्थों तथा सुख साधनों के होने पर भी शरीर स्वास्थ्य के बिना वह सब नहीं के समान है।

 

–विकास आर्य (वैदिक वाटिका से चुनें पुष्प)

महेन्द्र प्रताप सिंह

29 अप्रैल का दिन भारत के प्रखर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, पत्रकार, लेखक, क्रांतिकारी और समाज सुधारक राजा महेन्द्र प्रताप सिंह का निर्वाण दिवस है जो ‘आर्यन पेशवा’ के नाम से प्रसिद्ध थे। उनका जन्म मुरसान के नरेश बहादुर धनश्याम सिंह के घर 1 दिसंबर 1886 में हुआ था। राजा घनश्याम सिंह जी के तीन पुत्र थे, दत्तप्रसाद सिंह, बल्देव सिंह और खड़गसिंह, जिनमें सबसे बड़े दत्तप्रसाद सिंह राजा घनश्याम सिंह के उपरान्त मुरसान की गद्दी पर बैठे और बल्देव सिंह बल्देवगढ़ की जागीर के मालिक बन गए। खड़गसिंह जो सबसे छोटे थे वही हमारे चरित्र नायक राजा महेन्द्र प्रताप जी हैं जो हाथरस के नरेश राजा हरिनारायण द्वारा गोद लिये जाने के बाद खड़गसिंह से महेन्द्र प्रताप सिंह हो गए, मानो खड़ग उनके व्यक्तित्व में साकार प्रताप बनकर ही एकीभूत हो गई हो।

राजा साहब पहले कुछ दिन तक अलीगढ़ के गवर्नमेन्ट स्कूल में और फिर अलीगढ़ के एम.ए.ओ. कॉलेज में पढ़े जो बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के रूप में विकसित हुआ। राजा साहब को अलीगढ़ में सर सैयद अहमद ख़ाँ के आग्रह पर पढ़ने भेजा गया था, क्योंकि राजा साहब के पिताजी राजा घनश्याम सिंह की सैयद साहब से व्यक्तिगत मित्रता थी और इस संस्था की स्थापना के लिए राजा बहादुर ने यथेष्ट दान भी दिया था, जिससे एक पक्का कमरा बनवाया गया था, जिस पर आज भी राजा बहादुर घनश्याम सिंह का नाम लिखा हुआ है। इस कालेज में पढने का परिणाम यह हुआ कि राजा साहब का मुस्लिम वातावरण तथा मुसलमान लोगों से सहज ही परिचय हो गया जो बाद में जब राजा साहब देश को छोड़ कर विदेशों में स्वतंत्रता का अलख जगाने गये, तब मुसलमान बादशाहों से तथा मुस्लिम देशों की जनता से हार्दिक भाईचारा बनाने में बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ।

राजा साहब जब विद्यार्थी थे, उनमें जहाँ सब धर्मों के प्रति सहज अनुराग जगा वहाँ शिक्षा द्वारा जैसे-जैसे बुद्धि के कपाट खुले वैसे-वैसे ही अंग्रेज़ों की साम्राज्य लिप्सा के प्रति उनके मन में क्षोभ और विद्रोह भी भड़का। वृन्दावन के राज महल में प्रचलित ठाकुर दयाराम की वीरता के किस्से बड़े बूढ़ों और क्षोभ से भर जाता था और वह उनसे टक्कर लेने के मंसूबे बाँधा करते थे। जैसे-जैसे उनकी बुद्धि विकसित होती गई, वैसे अंग्रेज़ों के प्रति इनका विरोध भी मन ही मन तीव्र होता चला गया।

राजा साहब के विद्यार्थी जीवन में ही सन 1901 में जब वह केवल 14 वर्ष के थे, जींद नरेश महाराज रणवीरसिंह जी की छोटी बहिन बलवीर कौर से उनका विवाह हो गया और पिता हरिनारायण की मौत के बाद मात्र 20 वर्ष की आयु में हाथरस राज्य के राजा बने । उनके विचारों के कारण अंग्रेजों ने बेशक उन्हें राजा की उपाधि नहीं दी लेकिन जनता उन्हें राजा ही मानती थी। सरकारी कागजों में उन्हें कुंवर लिखा जाता और विदेशी राष्ट्र कुमार कहते थे। 1906 में अपने समधी जींद के महाराजा की इच्छा के विरुद्ध राजा महेन्द्र प्रताप ने कलकत्ता ने इन्डियन नेशनल काँग्रेस के अधिवेशन में भाग लिया और वहाँ से स्वदेशी के रंग में रंगकर लौटे।

1909 में वृन्दावन स्थित महाराज दयारा सिंह के महल में उन्होंने प्रेम महाविद्यालय की स्थापना की जो तकनीकी शिक्षा के लिए भारत में प्रथम केन्द्र था। इस महाविद्यालय की कीर्ति जल्द ही सम्पूर्ण देश में फैल गयी जिसके परिणामस्वरूप महामना मदन मोहन मालवीय का प्रेम इस विद्यालय से लम्बे समय तक रहा। महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू, लाला हंसराज, सुभाष चन्द्र बोस, सी.एफ. एण्डूज, रवीन्द्रनाथ टेगौर, सरोजनी नायडू सरीखे जाने-माने नाम प्रेम महाविद्यालय को देखने वृन्दावन आये और विद्यालय की हस्ताक्षर पंजिका में अपनी-अपनी प्रशंसात्मक टिप्पणियाँ दर्ज की। 14 अप्रैल 1915 को महात्मा गाँधी ने अपना पूरा दिन इस विद्यालय में बिताया। इस विद्यालय की लोकप्रियता के किस्सों की फहरिस्त लम्बी है और यह एक समय यह विद्यालय क्रांतिकारियों की शरणस्थली बन गया था।

वृन्दावन में ही एक विशाल फलवाले उद्यान को जो 80 एकड़ में था, 1911 में आर्य प्रतिनिधि सभा उत्तर प्रदेश को दान में दे दिया जिसमें आर्य समाज गुरुकुल है और राष्ट्रीय विश्वविद्यालय भी है। अपने शासन काल में राजा साहब ने शिक्षा संस्थाओं और ग़रीबों की ओर विशेष ध्यान दिया और उनके लिए राज साहब के द्वार सदा खुले रहते थे। अलीगढ़ के डी.ए.बी. कॉलेज और कायस्थ पाठशाला के लिए उन्होंने भूमि दान में दी थी और हिन्दू विश्वविद्यालय, काशी को भी भेंट दी थी, इसलिए वे विश्वविद्यालय के बोर्ड के सदस्य भी थे। बुलन्दशहर ज़िले में राजा साहब की काफ़ी बड़ी जमींदारी थी और वहाँ भी उन्होंने अनेक संस्थाओं को हृदय खोलकर दान दिए। राजा साहब ने मथुरा के ज़िलाधिकारी को उस सस्ते जमाने में दस हज़ार रुपये दान दिए थे कि इस रकम से बैंक खोलकर उससे उनके मथुरा ज़िले के प्रजाजन किसानों को सहायता दी जाये। इसी प्रकार आपने 25 हज़ार रुपया देकर मथुरा ज़िले के अपनी ज़मीदारी के गांवों में प्रारंभिक पाठशालाऐं भी खुलवाईं।

राजा साहब जाति के आधार पर छुआछूत के उस समय भी घोर विरोधी थे, जब महात्मा गांधी इस देश में लौटे भी न थे। गांधी जी के अछूतोद्धार आन्दोलन आरम्भ होने से बहुत पहले ही उन्होंने वृन्दावन जैसी पुराण पंथी वैष्णवी नगरी में रहकर भी इस अन्याय पूर्ण प्रथा के विरुद्ध हल्ला बोल दिया था। यह वह युग था, जब सनातनी लोग तथाकथित अछूतों की छाया से भी छू जाना पाप मानकर स्नान करते थे और उन्हें बहुत ही हेय और घृणा की दृष्टि से देखा जाता था। परन्तु राजा साहब ने सन 1911 में जब वे स्वास्थ्य लाभ के लिए अल्मोड़ा गये थे, एक टमटा के साथ भोजन कर लिया जो ऐसी जाति मानी जाती थी, जिसकी छूई हुई वस्तु अपवित्र मानकर फेंक दी जाती थी। ऐसे व्यक्ति के साथ राजा साहब भोजन करें, यह बात उनके किसी साथी को पसन्द न थी, जिस कारण चारों और काफ़ी कानाफूंसी हुई, परन्तु राजा साहब ने उस ओर कोई ध्यान नहीं दिया और हमेशा जाति के बधनों से स्वयं को ऊपर रखा।

देश को आज़ाद कराने की धुन मन में ठाने राजा साहब लाला हरदयाल और चम्पकरमण पिल्लई जैसे क्रान्तिधर्माओं से निरंतर संपर्क बनाये हुए थे और उनके द्वारा गुप्त रूप से भारत भेजे जाने वाले हथियारों को ना केवल क्रांतिकारियों तक पहुंचाते थे बल्कि उन्हें धन भी उपलब्ध कराते थे। इन गतिविधियों के चलते वो अंग्रेज जासूसों की नज़रों में चढ़ गए थे और यहाँ रहते हुए उनके लिए कोई बड़ा काम करना लगभग असंभव हो गया था। 1914 में प्रथम विश्व युद्ध की लपटों से यूरोप आक्रांत था, तब पुरुषोत्तम दास टंडन की सलाह पर विदेशों में जाकर देश की स्वाधीनता के प्रयासों को मजबूती देने और प्रथम विश्वयुद्ध से लाभ उठाकर भारत को आजादी दिलवाने के पक्के इरादे से वे 10 फरवरी 1915 को अपने साथ जितना संभव था उतनी संपत्ति लेकर मोहम्मद पीर के छद्म नाम से स्विट्जरलेंड होते हुए बर्लिन पहुंचे और जर्मनी के शासक कैसर से भेंट की जिसने आजादी की लड़ाई में हर संभव सहायता देने का वचन दिया। इस पर शासन ने उन्हें राजद्रोही घोषित कर उनकी सम्पत्ति जब्त कर ली।

बुडापोस्ट, बल्गारिया, टर्की होकर वहाँ से वह अफगानिस्तान में हैरत पहुँचे और अफगान बादशाह से मुलाकात की और वहीं से 1 दिसम्बर 1915 में काबुल से भारत के लिए अस्थाई सरकार की घोषणा की जिसके राष्ट्रपति स्वयं तथा प्रधानमंत्री मौलाना बरकतुल्ला खाँ बने। अफगानिस्तान ने अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया जिसमें सहायता के लिए वे रूस गये और लेनिन से मिले परंतु लेनिन ने कोई सहायता नहीं की। यहाँ पर इस बात को याद करना समीचीन होगा कि 1915 में राजा महेंद्र प्रताप ने जो बीज अफगानिस्तान में बोया था, उसे 28 वर्ष बाद 1943 में रासबिहारी बोस ने जापान में पूर्ण रूप से विकसित करके उनके अधूरे सपने को ना केवल पूरा कर दिया बल्कि पूर्ण स्वराज्य के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उसे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के हाथों सौंप दिया जिन्होंने 1915 में देखे गए स्वप्न को चरम परिणिति पर पहुँचाया। 1920 से 1946 तक राजा महेंद्र प्रताप विदेशों में भ्रमण करते रहे और विश्व मैत्री संघ की स्थापना की।

वे भारत की ही नहीं, तो विश्व के हर देश की स्वाधीनता के पक्षधर थे। 1925 में उन्होंने न्यूयार्क में नीग्रो लोगों की स्वतंत्रता के समर्थन में भाषण दिया। सितम्बर 1938 में उन्होंने एक सैनिक बोर्ड का गठन किया, जिसमें वे अध्यक्ष, रासबिहारी बोस उपाध्यक्ष तथा आनंद मोहन सहाय महामंत्री थे। द्वितीय विश्व युद्ध में उन्हें बंदी बना लिया गया; पर कुछ नेताओं के प्रयास से वे मुक्त करा लिये गये। 1946 में भारत वापस आने पर उनका भव्य स्वागत किया गया और सरदार पटेल की पुत्री मणिबेन उनके स्वागत के लिए स्वयं उपस्थित रहीं। इसके बाद वे देश में जहां भी गये, देशभक्त जनता ने उन्हें सिर आंखों पर बैठाया। स्वाधीनता के लिए मातृभूमि से 32 वर्ष दूर रहने तथा अपनी सारी सम्पत्ति होम कर देने वाले ऐसे त्यागी पुरुष के दर्शन करने लोग दूर-दूर से पैदल चलकर आते थे।

राजा महेन्द्र प्रताप पंचायती राज को ही वास्तविक स्वाधीनता मानते थे। वे आम आदमी के अधिकारों के समर्थक तथा नौकरशाही के अत्यधिक अधिकारों के विरोधी थे। उन्होंने 1957 से 1962 तक मथुरा लोकसभा क्षेत्र से निर्दलीय प्रतिनिधित्व किया। वे ‘भारतीय स्वाधीनता सेनानी संघ’ तथा ‘अखिल भारतीय जाट महासभा’ के भी अध्यक्ष रहे। 29 अप्रैल 1979 को उन्होंने इस दुनिया से विदा ने ली। दुर्भाग्य कि राजनैतिक कारणों से भारत सरकार ने उन्हें वह मान सम्मान नहीं दिया जो उन्हें मिलना चाहिये था, सिवाय इसके कि 15 अगस्त 1979 को उनकी स्मृति में एक डाक टिकट अवश्य जारी किया गया। उनके निर्वाण दिवस पर शत शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।

“वेदों के तमिल अनुवादक ऋषि भक्त श्री मनक्कल रामस्वामी जम्बुनाथन”

“वेदों के तमिल अनुवादक ऋषि भक्त श्री मनक्कल रामस्वामी जम्बुनाथन”
• मनमोहन कुमार आर्य • 

ऋषि दयानन्द वेदों के संस्कृत एवं हिन्दी भाषा के भाष्यकार हैं। उन्होंने ऋग्वेद आंशिक एवं यजुर्वेद का सम्पूर्ण भाष्य संस्कृत एवं हिन्दी भाषा में किया। उनका ग्रन्थ ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ स्वयं में वैदिक साहित्य की एक अनुपम कृति है। इस ग्रन्थ को पढ़कर ही वेदों के महत्व से परिचित हुआ जा सकता है। ऋषि दयानन्द के वेदभाष्य को समझने के लिये भूमिका ग्रन्थ का अध्ययन आवश्यक है। ऋषि दयानन्द की वेदभाष्य शैली भी अत्युत्तम है। वेदभाष्य में वह पहले मन्त्र के पाठो का पदच्छेद करते हैं। इसके बाद अन्वय देते हैं। अन्वय के बाद अन्वय के अनुसार संस्कृत भाषा में पदार्थ एवं उसके बाद हिन्दी भाषा में पदार्थ और अन्त में संस्कृत एवं हिन्दी में भावानुवाद देते हैं। ऋषि दयानन्द का वेदभाष्य उनसे पूर्व के उपलब्ध सभी वेदभाष्यों में सर्वोत्तम है। ऋषि दयानन्द के किये हुए अर्थ व्यवहारिक एवं पारमार्थिक हैं जिससे हमें अभ्युदय एवं निःश्रेयस की प्राप्ति में सहायता एवं मार्गदर्शन मिलता है। इसकी परीक्षा पाठक स्वयं पढ़कर, विचार कर व अन्य भाष्यों को देखकर कर सकते हैं।

आर्यसमाज में ऋषि दयानन्द जी के बाद अनेक वेदभाष्यकार हुए हैं जिन्होंने न केवल ऋषि दयानन्द जी के अवशिष्ट भाष्य के कार्य को पूरा करने का प्रयत्न किया अपितु उस भाग का भी भाष्य किया जिस पर ऋषि दयानन्द का भाष्य उपलब्ध है। हम जानते हैं कि देश में अधिकांश लोग हिन्दी बोलते, समझते व पढ़ते हैं। हमारे देश में अनेक क्षेत्रीय भाषायें हैं जहां आज भी हिन्दी पढ़ने की क्षमता लोगों में नहीं है। ऐसे लोगों को उनकी भाषा में ही वेदभाष्य सहित वैदिक साहित्य के ग्रन्थों को उपलब्ध कराना आर्यसमाज का कर्तव्य है। इसी की पूर्ति तमिल भाषा के विद्वान ऋषि भक्त श्री एम. आर. जन्बुनाथन जी ने की है। डॉ0 भवानीलाल भारतीय जी ने इनका अति संक्षिप्त परिचय अपनी पुस्तक ‘वेदो के वेद सेवक विद्वान’ में दिया है। हम वहीं से श्री जम्बुनाथन जी का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं।

तमिलभाषा में वैदिक साहित्य के प्रणेता एम.आर. जम्बुनाथन का जन्म 23 अगस्त सन् 1896 को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले के मनक्कल ग्राम में हुआ। इनका पूरा नाम मनक्कल रामस्वामी जम्बुनाथन था। तमिल, संस्कृत तथा अंग्रेजी में आपका उच्चस्तरीय अध्ययन हुआ। ऋषि दयानन्द की विचारधारा से परिचय प्राप्त कर आपने वैदिक धर्म को अंगीकार किया ओर अपनी मातृभाषा तमिल में वैदिक साहित्य का प्रणयन किया। 18 दिसंम्बर 1978 को आपका निधन हुआ। श्री जम्बुनाथन ने चारों वेदों का तमिल भाषा में अनुवाद किया है जिसका विवरण इस प्रकार है–ऋग्वेद (1978), यजुर्वेद-शुक्ल एवं कृष्ण (1938), सामवेद (1934), अथर्ववेद (1940), शतपथ ब्राह्मण की कथायें (1933), उपनिषद् कथाएं (1932), कठोपनिषद् (तमिल) 1932 में। तमिल जैसी प्राचीन तथा प्रांजल भाषा में वेदों का आपका किया अनुवाद एक महत्वपूर्ण कार्य है।

इण्टरनैट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार श्री एम.आर. जम्बुनाथन जी ने सत्यार्थप्रकाश के अनुवाद सहित स्वामी दयानन्द जी और स्वामी श्रद्धानन्द जी के जीवन एवं कार्यों पर भी ग्रन्थों की रचना की है। योग एवं योगासनों पर भी आपने अनेक पुस्तकें लिखी हैं। हम आशा करते हैं कि पाठकों के लिये यह संक्षिप्त परिचय किंचित लाभप्रद होगा। ईश्वर भक्त, ऋषि भक्त, आर्यसमाज के पोषक एवं वेद सेवक विद्वान श्री एम.आर. जम्बुनाथन जी को सादर नमन एवं श्रद्धांजलि। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

मांसाहारी लोगों द्वारा हानि

(दोहा)

जो गल काटै और का अपना रहै कटाय ।

साईं के दरबार में बदला कहीं न जाय ॥

मांसाहारी लोगों ने भारत में विघ्न मचा दिये ॥टेक॥

गोमाता सा दुखी ना कोई, घी और दूध कहां से होई ।

सारा कर्म बलबुद्धि खोई, दुर्बल निपट बना दिये ।

दुष्टाचारी लोगों ने ॥ मांसाहारी …..॥१॥

हय श्वानों का पालन करते, गोरक्षा में चित्त न धरते ।

हिंसा करत जरा नहीं डरते, गल पर छुरी चला दिये ।

आफत तारी लोगों ने ॥ मांसाहारी …..॥२॥

जिनसे है दुनियां का पालन, उन्हें मार क्या सुख हो लालन ।

फंस गई प्रजा विपत के जाल, उत्तम पशु खपा दिये ।

क्या मन धारी लोगों ने ॥ मांसाहारी …..॥३॥

मृगों की डार नजर न आवें, दरियावों में मीन न पावें ।

मोर कहां से कूक सुनावें, मार मार के ढा दिये ।

विपता डारी लोगों ने ॥ मांसाहारी …..॥४॥

कबूतरों के गोल रहे ना, तीतर करत किलोल रहे ना ।

शुक मैना बेमोल रहे ना, हरियल गर्द मिला दिये ।

पंडुकी मारी लोगों ने ॥ मांसाहारी …..॥५॥

अजा, भेड़, दुम्बे ना छोड़े, उनके हो गये जग में तोड़े ।

कहां से बनेंगे ऊनी जोड़े, महंगे मोल बिका दिये ।

कीनी ख्वारी लोगों ने ॥ मांसाहारी …..॥६॥

पाढ़े नील गाय हन डारे, ससे स्यार मुर्ग गोह विचारे ।

गरीब कच्छप नटों ने मारे,ऐसे त्रास दिखा दिये ।

दुःख दे भारी लोगों ने ॥ मांसाहारी …..॥७॥

जब जब सब जन्तु निबड़ जायेंगे, सोचो तो फिर ये क्या खायेंगे ।

कह घीसा सब सुख नसायेंगे, सो कारण मैं गा दिये ।

सुन लई सारी लोगों ने ॥ मांसाहारी …..॥८॥

इसी प्रकार चौधरी घीसाराम जी (मेरठ निवासी) का एक अन्य भजन भी मांस भक्षण निषेध पर है । वह इस प्रकार है –

(दोहा)

बकरी खात पात है, ताकी काढ़ी खाल ।

जिसे वाम मारग कहें, विषय पाप का भोग ॥

मांस मांस सब एक से, क्या बकरी क्या गाय ।

यह जग अन्धा हो रहा, जान बूझ कर खाय ॥

टेक – नर दोजख में जाते हैं, बेखता जीव को मार के ।

और के गले पर छुरी धरे हैं, नहीं संग दिल दया करे हैं ।

पापी कुष्ठी होय मरे हैं, दिल से रहम बिसार के ।

गल अपना कटवाते हैं ॥१॥

जो गल काट के बहिश्त में जाना, काट कुटुम्ब को भी पहुंचाना ।

और खुदा को दोष लगाना, उसका नाम पुकार के ॥

दुःख देख न घबराते हैं ॥२॥

घास खांय सो गल कटवावें, मांस खाय वो किस घर जायें ।

समझें ना बहुविध समझावें, खुश होते सिर तार के ।

करनी का फल पाते हैं ॥३॥

मांस मांस सब हैं इकसारी, क्या बकरी क्या गाय बिचारी ।

जान बूझ खाते नर नारी, रूप दुष्ट का धार के ॥४॥

बढ़ जाते हैं रोग बदन में, ना कुछ ताकत बढ़ती तन में ।

हे ईश्वर दे ज्ञान उरन में, बख्शें ज्ञान विचार के ।

जन घीसा यश गाते हैं ॥५॥

उर्दू कविता

       एक उर्दू के कवि ने अपने भावों को निम्न प्रकार से प्रकट करते हुये निर्दोष प्राणियों पर दया करने की याचना (अपील) ही है –

पशुओं की हड्डियों को अब ना तबर से तोड़ो ।

चिड़ियों को देख उड़ती, छर्रे न इन पे छोड़ो ॥

अजलूम जिसको देखो, उसकी मदद को दोड़ो ।

जख्मी के जख्म सी दो और टूटे उज्व जोड़ो ॥

बागों में बुलबुलों को फूलों को चूमने दो ।

चिड़ियों को आसमां में आजाद घूमने दो ॥

दुमही को यह दिया है इस होसिला प्रभु ने ।

जो रस्म अच्छी देखो, उसको लगो चलाने ।

लाखों ने मांस छोड़, सब्जी लगे हैं खाने ।

और प्रेम रस जल से हरजा लगे रचाने ॥

इन में भी जान समझ कर इन को जकात दे दो ।

यह काम धर्म का है, तुम इसमें साथ दे दो ॥

वेद में मांस भक्षण निषेध

वेद में मांस भक्षण निषेध

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        वैसे तो मानने को वेद, धम्मपद, तौरेत, जबूर, इञ्जील, बाईबल और कुरान सभी धार्मिक ग्रन्थ माने जाते हैं । किन्तु वेद को छोड़कर सब अन्य ग्रन्थ भिन्न-भिन्न मत और सम्प्रदायों के हैं । इन सम्प्रदायों के पुराने से पुराने ग्रन्थ महाभारत काल से पीछे के ही हैं । इन की आयु चार हजार वर्ष से अधिक किसी की भी नहीं है । यथार्थ में ये ग्रन्थ धार्मिक ग्रन्थ की कोटि में नहीं आते । इनको किसी सम्प्रदाय विशेष का ग्रन्थ कहा जा सकता है, फिर भी इनके इन सम्प्रदायों में से भी अधिकतर सम्प्रदायों के ग्रन्थों में मांस भक्षण का निषेध किया है । यथार्थ में सच्चे धर्म का आदि स्रोत वेद ही है । इसलिये मनु जी महाराज ने धर्मं जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः धर्म को जानना चाहें, उनके लिये परम श्रुति अर्थात् वेद ही है, यह माना है ।

जब जब परमात्मा सृष्टि की रचना करता है, तब तब अपने परम पवित्र ज्ञान को प्राणिमात्र के कल्याण के लिये प्रकाशित करता है । वेद के किन्हीं एक दो सिद्धान्तों को पकड़ कर चतुर लोग अपने ग्रन्थों की रचना करके नये नये सम्प्रदायों और मतों को खड़ा कर लेते हैं और उन्हीं को धर्म का नाम दे देते हैं । यथार्थ में धर्म अनेक नहीं होते, धर्म और सत्य एक ही होता है । जैसे दो और दो चार ही होते हैं, न्यून वा अधिक नहीं होते । इसलिये महर्षि दयानन्द ने वेद सब विद्याओं का पुस्तक हैवेद का पढ़ना पढ़ाना और सुनना सुनाना सब आर्यों (श्रेष्ठ पुरुषों) का परम धर्म है यह लिखकर इस सत्यता पर अपनी मोहर लगाई है ।

बाह्य अन्धकार को दूर करने के लिये परम दयालु प्रभु ने जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश दिया है इसी प्रकार मानव के आन्तरिक अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करने के लिये ज्ञानरूप वेदज्योति का प्रकाश किया है । इस बात को सभी एकमत होकर स्वीकार करते हैं कि वेद सब से प्राचीन है । यहां तक कि विदेशी विद्वानों के मतानुसार भी संसार के पुस्तकालय में सब से प्राचीन धार्मिक ग्रन्थ वेद ही माने जाते हैं । वहां लिखा है –

 

इममूर्णायुं वरुणस्य नाभिं त्वचं पशूनां द्विपदां चतुष्पदाम् ।

त्वष्टुं प्रजानां प्रथम जनित्रमग्ने मा हिंसीः परमे व्योमन् ॥

 (यजुर्वेद अ० १२, मन्त्र ४०)

इन ऊन रूपी बालों वाले भेड़, बकरी, ऊंट आदि चौपाये, पक्षी आदि दो पग वालों को मत मार ।

यदि नो गां हमि यद्यश्वं यदि पूरुषम् ।

तं त्वा सीसेन विध्यामो यथा नोऽसो अवीरहा ॥

(अथर्ववेद १।१६।)

         यदि हमारी गौ, घोड़े पुरुष का हनन करेगा तो तुझे शीशे की गोली से बेध देंगे, मार देंगे जिससे तू हननकर्त्ता न रहे । अर्थात् पशु, पक्षी आदि प्राणियों के वध करने वाले कसाई को वेद भगवान् गोली से मारने की आज्ञा देता है ।

वेदों में मांस खाने का निषेध इस रूप में किया है । मांस बिना पशुहिंसा के प्राप्त नहीं होता है । अश्व, गौ, अजा (बकरी), अवि (भेड़) आदि नाम लेकर पशुमात्र की हिंसा का निषेध किया है और द्विपद शब्द से पक्षियों के मारने का भी निषेध है ।

       पशुओं को पालने की आज्ञा सर्वत्र मिलती है –

यजमानस्य पशून् पाहि ।१॥१॥ (यजुर्वेद)

यजमान के पशुओं की रक्षा करो ।

       मनुस्मृति के प्रमाण पहले दे चुके हैं । मांस न खाने का फल सौ अश्वमेध यज्ञों के समान बताया है ।

वर्षे वर्षेऽश्वमेधेन यो यजेत शतं समाः ।

मांसानि च न खादेद्यस्तयोः पुण्यफलं समम् ॥मनु ५।५३॥

      जो सौ वर्ष पर्यन्त प्रतिवर्ष अश्वमेध यज्ञ करता है और जो जीवन भर मांस नहीं खाता है, दोनों को समान फल मिलता है ।

याज्ञवल्क्य स्मृति में लिखा है –

सर्वान् कामानवाप्नोति हयमेधफलं तथा ।

गृहेऽपि निवसन् विप्रो मुनिर्मांसविवर्जनात् ॥

(आचाराध्याय ७।१८०॥)

        विद्वान् विप्र सर्वकामनाओं तथा अश्वमेध यज्ञ के फल को प्राप्त होता है । ऐसा गृहस्थी जो मांस नहीं खाता, वह घर पर रहता हुआ भी मुनि कहलाता है ।

इस युग के विधाता महर्षि दयानन्द ने मांस भक्षण का सर्वथा निषेध किया है । वे सत्यार्थप्रकाश में लिखते हैं –

    १. : मद्य मांस आदि मादक द्रव्यों का पीना – ये स्त्री को दूषित करने वाले दुर्गुण हैं ।

    २. : मद्य मांसादि के सेवन से अलग रहें ।

    ३. : जो मादक और हिंसा कारक (मांस) द्रव्य को छोड़ के भोजन करने हारे हों, वे हविर्भुज (हवन यज्ञशेष खाने वाले) हैं ।

    ४. : जब मांस का निषेध है तो सर्वत्र ही निषेध है ।

    ५. : हां, मुसलमान, ईसाई आदि मद्य माँसाहारियों के हाथ के खाने में आर्यों को भी मद्य मांसादि खाना पीना अपराध पीछे लग पड़ता है ।

    ६. : इनके मद्य मांस आदि दोषों को छोड़ गुणों को ग्रहण करें ।

    ७. : हां, इतना अवश्य चाहिये कि मद्य मांस का ग्रहण कदापि भूल कर भी न करें ।

वेदादि शास्त्रों में मांस भक्षण और मद्य सेवन की आज्ञा कहीं नहीं, निषेध सर्वत्र है । जो मांस खाना कहीं टीकाओं में मिलता है, वह वाममार्गी टीकाकारों की लीला है, इसलिये उनको राक्षस कहना उचित है, परन्तु वेदों में मांस खाना नहीं लिखा ।

महाभारत में मांस भक्षण निषेध

सुरां मत्स्यान्मधु मांसमासवकृसरौदनम् ।

धूर्तैः प्रवर्तितं ह्येतन्नैतद् वेदेषु कल्पितम् ॥

(शान्तिपर्व २६५।९॥)

        सुरा, मछली, मद्य, मांस, आसव, कृसरा आदि खाना धूर्तों ने प्रचलित किया है, वेद में इन पदार्थों के खाने-पीने का विधान नहीं है ।

अहिंसा परमो धर्मः सर्वप्राणभृतां वरः । (आदिपर्व ११।१३)

किसी भी प्राणी को न मारना ही परमधर्म है ।

प्राणिनामवधस्तात सर्वज्यायान्मतो मम ।

अनृतं वा वदेद्वाचं न हिंस्यात्कथं च न ॥

(कर्णपर्व ६९।२३)

         मैं प्राणियों को न मारना ही सबसे उत्तम मानता हूँ । झूठ चाहे बोल दे, पर किसी की हिंसा न करे ।

यहाँ अहिंसा को सत्य से बढ़कर माना है । असत्य की अपेक्षा हिंसा से दूसरों को दुःख अधिक होता है क्योंकि सबको जीवन प्रिय है । इसीलिये यह महान् आश्चर्य है कि –

जीवितुं यः स्वयं चेच्छेत् कथं सोऽन्यं प्रघातयेत् ।

यद्यदात्मनि चेच्छेत् तत्परस्यापि चिन्तयेत् ॥

(शान्तिपर्व २५९।२२॥)

          जो स्वयं जीने की इच्छा करता है, वह दूसरों को कैसे मारता है । प्राणी जैसा अपने लिये चाहता है, वैसा दूसरों के लिये भी वह चाहे । कोई मनुष्य यह नहीं चाहता कि कोई हिंसक पशु वा मनुष्य मुझे, मेरे बालबच्चों, इष्टमित्रों वा सगे सम्बन्धियों को किसी प्रकार का कष्ट दे वा हानि पहुंचाये अथवा प्राण ले लेवे, वा इनका मांस खाये । एक कसाई जो प्रतिदिन सैंकड़ों वा सहस्रों प्राणियों के गले पर खञ्जर चलाता है, आप उसको एक बहुत छोटी और बारीक सी सूई चुभोयें तो वह इसे कभी भी सहन नहीं करेगा । फिर अन्य प्राणियों की गर्दन काटने का अधिकार उसे कहां से मिल गया ? प्राणियों का हिंसक कसाई महापापी होता है । महाभारत में कहा है –

घातकः खादको वापि तथा यश्चानुमन्यते ।

यावन्ति तस्य रोमाणि तावदु वर्षाणि मञ्जति ॥

(अनुशासनपर्व ६४।४॥)

          मारनेवाला, खानेवाला, सम्मति देनेवाला – ये सब उतने वर्ष दुःख में डूबे रहते हैं जितने कि मरने वाले पशु के रोम होते हैं । अर्थात् मांसाहारी घातकादि लोग बहुत जन्मों तक भयंकर दुःखों को भोगते रहते हैं । मनु महाराज के मतानुसार आठ कसाई इस महापातक के बदले दुःख भोगते हैं ।

हिंसा न करे

धर्मशीलो नरो विदानीहकोऽनहीकोऽपि वा ।

आत्मभूतः सदालोके चरेद् भूतान्यहिंसया ॥

(शान्तिपर्व २६५।८॥)

         धार्मिक स्वभाववाला पुरुष इस लोक को चाहता हो वा न चाहता हो, सबको समान समझ कर किसी की हिंसा न करता हुआ संसार यात्रा करे । किसी को सताये नहीं ।

मित्रस्य चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षामहे ।

        हम सब प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखें । इस वेदाज्ञानुसार सब प्राणियों को मित्रवत् समझकर सेवा करे, सुख देवे । इसी में जीवन की सफलता है । इसी से वह लोक और परलोक दोनों बनते हैं ।     

क्या भारत में गोहत्या कभी पुण्यदा थी यश आर्य

वैदिक साहित्य में ऐसे कई उदाहरण हैं जिनसे पता चलता है कि उस दौर में भी गोमांस का सेवन किया जाता था. जब यज्ञ होता था तब भी गोवंश की बली दी जाती थी.

      उत्तर: प्रमाण कहां  है ?

धर्मशास्त्रों में यह कोई बड़ा अपराध नहीं है इसलिए प्राचीनकाल में इसपर कभी प्रतिबंध नहीं लगाया गया.

उत्तर :ये  झूठ है।वेद में गो वध निषेध है ।
सारा विवाद 19वीं शताब्दी में शुरू हुआ जब आर्य समाज की स्थापना हुई और स्वामी दयानंद सरस्वती ने गोरक्षा के लिये अभियान चलाया. और इसके बाद ही ऐसा चिह्नित कर दिया गया कि जो ‘बीफ़’ बेचता और खाता है वो मुसलमान है. इसी के बाद साम्प्रदायिक तनाव भी होने शुरू हो गए. उससे पहले साम्प्रदायिक दंगे नहीं होते थे.

उत्तर: ऋषि द्यानंद ने कहां कहा है  कि गो  मांस भक्षक केवल मुसल्मान होता है , और   ईसाइ आदि  नहीं ? क्या  साम्प्रदायिक दंगे अंग्रेज़ सरकार आदि ने नहीं भडकाए ? बंगाल विभाजन क्यों हुआ ?

सारांश :  द्विजेंद्र नारायण झा  एक मांसाहारी  समाज का सदस्य है । उसका समाज तंत्र [शक्ति ] को मानता है । तंत्र अवैदिक मत है,मांसाहार करने देता है । वह स्वयम कार्ल मार्क्स का पुजारी है ।  यदि वह वेद मंत्र लिखता  तो मैं  खंडित करता ।  सारा लेख झा जी की कल्पना पर आधारित है । अत: लेख निराधार है । क्या यह व्यक्ति यह सिद्ध  कर सकता है, कि वेदिक संहिताओं में गोहत्या  करने पर अमुक पुण्य प्राप्त होगा ,  ऐसा लिखा है  ?  देखो वेद क्या कह्ता है :