एक स्पष्ट सी बात

बात है क्रान्तिकारियों की, हिंसा में विश्वास करनेवाली टोली की। भगतसिंह की, बटुकेश्वर दत्त की, अशफ़ा- कुल्ला, रामप्रसाद बिस्मिल की, चन्द्रशेखर ‘प्राज़ाद’ की और उनकी टोली की। उस टोली के सदस्य अपने लक्ष्य की प्राप्ति और अपने मार्ग की बाधाओं को नष्ट करने के लिए जिस व्यवस्था, अनुशासन और प्रतिज्ञा से प्राबद्ध होते थे उसमें ‘प्राण जाइ पर बचन न जाई’ का रूप मूर्त रहता था। प्राणपण से भारत की स्वतन्त्रता के लिए परितः निबद्ध आस्थावाले, विश्वतः परखे हुए और खरे व्यक्तित्व-वाले जन ही उस टोली के सदस्य हो सकते थे।

कभी समय था जब आर्यसमाज के सदस्य भी ऐसे ही सरल, स्पष्ट, और खरे जन होते थे। तभी सम्पूर्ण मही पर आर्यसमाज का आन्दोलन सफल जन-पान्दोलन बना जिसकी छिटकी हुई चिंगारियां आज भी यत्र तत्र विकीर्ण हैं । पर आज आर्यसमाज में सदस्यों की संख्या सोद्देश्य और जीवन-निष्ठ व्यक्तित्व में नहीं रह गई है। अब सदस्यों की भर्ती, आर्य-सदस्यों की छाँट और संख्या उन सदस्यों में से की जाती है जिनकी कथनी और करनी में कहीं भी कोई मेल नहीं है । और, यही हाल है तथा- कथित सनातन-धर्मी संस्थाओं और धर्मावलम्बियों का। राजनीतिक पार्टियों का हाल तो और भी बदतर है। निष्ठा के अभाव में सदस्यता निरर्थक हो गई है। देश की स्वतन्त्रता (सामाजिक, आर्थिक और अात्मिक) को सुरक्षित रखने के लिए देश में कर्तव्यनिष्ठ और वास्तविक नेतृत्व की अब महती आवश्यकता हैअच्छा नेतत्व भी तब उपजेगा जब हमारा समाज समष्टि रूप से उन्नत, जागरूक होगाऐसे समाज में जहां जात- पति के मनमाने और मगढन्त बन्धन हैं, जहां छूत और अछतों का झगड़ा है, जहां शिक्षा अक्षरज्ञान-मात्र है, जहां पढ़े-लिखे समझे जानेवाले लोग विदेशी प्राचार और व्यवहार के भक्त हैं एवं अपढ़ तथा तथाकथित शिक्षित भी मूर्ख, गवार, अज्ञानी पुरोहितों, पुजारियों और मुल्लानों के अधीन हैं वहां किसी महान् नेतृत्व का उत्पन्न होना और उभरना कैसे सम्भव होगा ? जहां नेतृत्व स्वयं धूर्त, ठग, स्वार्थी और दुराचारी हो वहां देशोद्धार, समाजोद्धार और आत्मिक उद्धार कैसे सम्भव होगा!

चोरबाजारी, कालाबाजारी, रिश्वत, बेईमानी से धन, कीर्ति और कमाई का सम्पादन करनेवाले व्यापारी, वकील, डॉक्टर, और भ्रष्ट नौकरशाही के मात्र डिग्रीया सर्टीफ़िकेट-धारी, ये भर गए हैं सभी धर्मों, सम्प्रदायों और राजनीतिक टोलियों में । बस, यही कारण है कि भारतमही में दुःख, द्वन्द्व, क्लेश, और मन, वचन, कर्म की भ्रष्टता दिन दूनी, रात चौगुनी बढ़ती जारही है और महाप्रलय को बुलावा देरही है। चारों ओर अनाचार और चीत्कार भर गया है। न कोई सुनता है, और सुनकर भी, सुनाकर भी कुछ होता नहीं है।

वेद-शिक्षक और वेद की शिक्षाए भी अाज धरी रह जानी हैं। कौन अपनाएगा या अपनारहा है वेद को और वेद की शिक्षानों को जिनका प्र+चार, प्र+सार काम्य है ‘वेद-सविता’ के मोती से शब्दों में । काश, वेद-संस्थान के सदस्य (संस्थान-परिवार) ‘वेद-सविता’ के अ+क्षरों और शब्दों में आस्थावान् बनें और नवनिर्माण करें समाज का ! आइए, संख्या को छोड़, गुण-ग्राहकता की परिवृद्धि की ओर ध्यान दीजिए और बूद बूद से जीवनसागर का निर्माण कीजिए। तब कोई वास्तविक नेतृत्व पैदा होगा जो वास्तविक क्रान्ति संजो सकेगा; भ्रष्टता, संकोच, अशालीनता, अनुशासन-भ्रष्टता और अभद्रता को अपदस्थ कर उसके स्थान पर विनय, शील, सौम्यता, ‘भद्रता, आर्यता और चरित्र को स्थापित करेगा ।

जब कथनी और करनी का अन्तर समाप्त हो जाएगा तब भ्रष्टता, भय और भ्रम की हिंसा से जो अहिंसा (सत्य, न्याय) उभरेगी वह अपनी परिभाषा करेगी. ‘हिंसा से विरति ही अहिंसा है’ जो व्यक्तिगत, सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन का प्राण है, क्रान्ति का सोपान है।

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