परम पुरुष का सन्दर्शन

परम पुरुष का सन्दर्शन

स नो बन्धुर्जनिता, स विधाता, धामानि वेद भुवनानि विश्वा ।

यत्र देवा अमृतमानशानास, तृतीये धामन्नध्यैरयन्त ।

         १) परम पुरुष निर्गुण, निराकार है; पर साधक योगी उसे अनन्त गुणों की खान समझकर उसकी गुण-गरिमा से निरन्तर प्रेरणा लेना चाहते हैं। मनुष्य और मनुष्य में जितने सम्बन्ध हो सकते हैं उनकी इति भी परम पुरुष में होती है। श्रद्धा और आदर से परम पुरुष के साथ अनेक प्रिय और आत्मीय सम्बन्धों की कल्पना करता हुआ साधक सोचता रहता है कि वह परमेश्वर हमारा बन्धु है हमको प्रात्मीयता के सूत्र में बांधने वाला हैहमारा जनक भी वही है उसी की प्रेरणा से यह सृष्टि गई है। वह इसको जन्म देकर इसका पोषण भी करता है । सृष्टि का धारक होने के कारण ही उसे विधाता कहा जाता है । वह. सृष्टि का नियामक है। वह सर्वज्ञ भी है । वह सब तेजोमय लोकों का जानकार है। सब भुवनों-तीन भुवनों का ज्ञान उसे होता है। उससे कुछ भी छिपा हुआ नहीं है।

        २) पिण्ड और ब्रह्माण्ड में हमारे पूर्वजों ने तीन, पांच या सात दिव्य लोकों की कल्पना की है पिण्ड में स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर की स्थिति वैसी ही है जैसे ब्रह्माण्ड में पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्य लोक की स्थिति है। इनसे ऊपर तुरीय स्थान प्रात्मा का है। ब्रह्माण्ड में धु लोक में स्थित सूर्य से ऊपर परम पद की कल्पना की जाती है । तुरीय लोक की सत्ता का आभास तृतीय धाम में ही हो सकता है इसलिए यहाँ परम बन्धु और जनक परमात्मा से उस तृतीय धाम की अोर प्रेरणा देने के लिए प्रार्थना की गई है ।

         ३) परमधाम की एक विशेषता का यहां उल्लेख किया गया है। वह यह कि उसमें देवगण अमृत का सेवन किया करते हैं। हमारा शरीर दिव्य और अदिव्य तत्त्वों के सम्मिलित सहयोग से चल रहा है। जब हम स्थूल शरीर से सम्बद्ध अदिव्य अर्थात् भौतिक पदार्थों से जुड़े रहते हैं तब हम मरणधर्मा होते हैं; किन्तु जब हम इस शरीर में व्याप्त दिव्य तत्त्वों से सम्बन्ध जोड़ लेते हैं तो हमारा जीवन भी जन्म-मरण के चक्कर से ऊपर उठ जाता है । अमर जीवन की खोज का यही मार्ग है। इस दिशा में बढ़ने के लिए साधना करनेवाले योगी देवताओं की तरह अमृत का सेवन करके अमर हो जाते है। इसके लिए प्रेरणा अपनी दिव्य शक्तियों के माध्यम से वही परम पुरुष देता हैं।

बन्धु, जनक वह और विधाता

 सब भुवनों का रखता ज्ञान ।

उसी लोक को ओर प्रेरते

(जहाँ) करते देव अमृत का पान ।

आश्रम धर्म

आश्रम धर्म

         यह मनुष्य के सम्पूर्ण सफल जीवन की शतवर्षीय योजना हैकिस प्रकार एक मनुष्य, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम की परिपालना द्वारा अपने निजी जीवन को सब प्रकार से समुन्नत बनाता हुआ अपने परिवार, समाज-राष्ट्र और प्राणि-मात्र की हित साधना करता हुआ अन्ततः इसी कर्त्तव्य (धर्म) सम्पादन द्वारा प्रियतम प्रभु की शान्तिदायिनी गोद को पा सकता है- यह इस योजना का लक्ष्य है।

आश्रम धर्म

आश्रम धर्म

         यह मनुष्य के सम्पूर्ण सफल जीवन की शतवर्षीय योजना हैकिस प्रकार एक मनुष्य, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम की परिपालना द्वारा अपने निजी जीवन को सब प्रकार से समुन्नत बनाता हुआ अपने परिवार, समाज-राष्ट्र और प्राणि-मात्र की हित साधना करता हुआ अन्ततः इसी कर्त्तव्य (धर्म) सम्पादन द्वारा प्रियतम प्रभु की शान्तिदायिनी गोद को पा सकता है- यह इस योजना का लक्ष्य है।

प्रजातंत्र ही क्यों

प्रजातंत्र ही क्यों

महामात्य चाणक्य ने सुशासन के लिए दण्ड को सर्वोपरि साधन माना है । एक समय सारे देश में यह माग्यता प्रचलित रही है कि राज्य में जब दण्ड खड़ा रहता है तब धर्म, नीति, सदाचार, आदि सबकी सुस्थिति होती है । ऐसी स्थिति में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि प्रजातंत्र में दण्ड का क्या स्थान होना चाहिए ? महाभारत में कहा गया है कि पहले न राज्य था, न दण्ड देने वाला राजा; प्रजा स्वेच्छा से अपने अपने धर्म का पालन करती हुई परस्पर शासन कर लिया करती थी। यह आदिम प्रजातन्त्र की पद्धति थी। प्रजातांत्रिक व्यवस्था के विषय में जब जब भी चिन्तन किया जायगा तब-तब प्रादिम प्रजातंत्र की यह व्यवस्था हमारे लिए प्रेरक सिद्ध होगी।

दण्ड क्यों दिया जाता है ? राजा तो उसको दण्ड दिया करता था जो उसकी इच्छा के अनुरूप कार्य नहीं करता था। लोगों को प्रातंकित करने के लिए भी दण्ड दिया जाता था। प्रजातंत्र में ऐसी व्यवस्था नहीं चल सकती। यहाँ तो सामूहिक इच्छा के विपरीत आचरण करने वाले को ही दण्ड दिया जा सकता है सामूहिक इच्छा सदाचार के विरुद्ध हो तो उसको एक अकेला प्रादमी भी चुनौती दे सकता है। उसे कालकोठरी में डाल दिया जाय तो भी वह अनौचित्य के प्रति विद्रोह कर सकता है। यों कहा जा सकता है कि प्रजातंत्र में समूह की शक्ति को नियन्त्रित करने के लिए समझदार व्यक्ति सदैव समूह के अनुचित निर्णयों को चुनौती देते हैं। इसलिए यह उक्ति प्रसिद्ध हो गई है कि प्रजातंत्र में ईमानदार और स्पष्ट वक्ता अधिकतर जेल में ही अपना जीवन बिताते हैं । फिर भी लोगों को राजा के निरंकुश शासन की अपेक्षा प्रजातंत्र ही प्रिय लगता हैइसका एक कारण यह है कि प्रजातंत्र में भिन्न-भिन्न रुचियों वाले लोग निर्णय लेते हैं इसलिए अनुचित दण्ड से बचने की संभावना अधिक होती हैं। दूसरा पक्ष यह भी है कि इसी संभावना के कारण प्रजातत्र में अपराधों की संख्या बढ़ने लगती है।

वस्तुत: प्रजातंत्र ऐसी आदर्श व्यवस्था है जिसमें अपराध पनपने की संभावना ही नहीं होती । कैकेयी के भ्राता अश्वपति ने अपनी प्रजातांत्रिक व्यवस्था की विशेषता उद्घोषित करते हुए कहा था कि उनके राज्य में न चोर है, न झूठ बोलने वाला; कोई स्वैर नहीं हैं तब स्वैरिणी कहाँ से होगी। इस तरह की घोषणा वही कर सकता है जो स्वयं सदाचारी हो । नेता सदाचारी न हों तो नागरिक सदाचारी हो ही नहीं सकते हमारे पड़ोसी राष्ट्रों में प्रजातत्र नेताओं के अनाचार के कारण नष्ट हुअा है। हमारे देश में सब नेता तो सदाचारी नहीं है; पर कुछ अवश्य ही अपने चरित्र को पवित्र रखना चाहते हैं । देश उन्हीं के बल पर चल रहा है। प्रजातंत्र में दण्ड का लक्ष्य यही हो सकता है कि सदाचारी और व्यवस्थाप्रिय लोगों को उसका संरक्षण मिले । वह कठोर तो हो; पर उसका उपयोग कम से कम करना पड़े।

-पंचोली

प्रजातंत्र ही क्यों

प्रजातंत्र ही क्यों

महामात्य चाणक्य ने सुशासन के लिए दण्ड को सर्वोपरि साधन माना है । एक समय सारे देश में यह माग्यता प्रचलित रही है कि राज्य में जब दण्ड खड़ा रहता है तब धर्म, नीति, सदाचार, आदि सबकी सुस्थिति होती है । ऐसी स्थिति में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि प्रजातंत्र में दण्ड का क्या स्थान होना चाहिए ? महाभारत में कहा गया है कि पहले न राज्य था, न दण्ड देने वाला राजा; प्रजा स्वेच्छा से अपने अपने धर्म का पालन करती हुई परस्पर शासन कर लिया करती थी। यह आदिम प्रजातन्त्र की पद्धति थी। प्रजातांत्रिक व्यवस्था के विषय में जब जब भी चिन्तन किया जायगा तब-तब प्रादिम प्रजातंत्र की यह व्यवस्था हमारे लिए प्रेरक सिद्ध होगी।

दण्ड क्यों दिया जाता है ? राजा तो उसको दण्ड दिया करता था जो उसकी इच्छा के अनुरूप कार्य नहीं करता था। लोगों को प्रातंकित करने के लिए भी दण्ड दिया जाता था। प्रजातंत्र में ऐसी व्यवस्था नहीं चल सकती। यहाँ तो सामूहिक इच्छा के विपरीत आचरण करने वाले को ही दण्ड दिया जा सकता है सामूहिक इच्छा सदाचार के विरुद्ध हो तो उसको एक अकेला प्रादमी भी चुनौती दे सकता है। उसे कालकोठरी में डाल दिया जाय तो भी वह अनौचित्य के प्रति विद्रोह कर सकता है। यों कहा जा सकता है कि प्रजातंत्र में समूह की शक्ति को नियन्त्रित करने के लिए समझदार व्यक्ति सदैव समूह के अनुचित निर्णयों को चुनौती देते हैं। इसलिए यह उक्ति प्रसिद्ध हो गई है कि प्रजातंत्र में ईमानदार और स्पष्ट वक्ता अधिकतर जेल में ही अपना जीवन बिताते हैं । फिर भी लोगों को राजा के निरंकुश शासन की अपेक्षा प्रजातंत्र ही प्रिय लगता हैइसका एक कारण यह है कि प्रजातंत्र में भिन्न-भिन्न रुचियों वाले लोग निर्णय लेते हैं इसलिए अनुचित दण्ड से बचने की संभावना अधिक होती हैं। दूसरा पक्ष यह भी है कि इसी संभावना के कारण प्रजातत्र में अपराधों की संख्या बढ़ने लगती है।

वस्तुत: प्रजातंत्र ऐसी आदर्श व्यवस्था है जिसमें अपराध पनपने की संभावना ही नहीं होती । कैकेयी के भ्राता अश्वपति ने अपनी प्रजातांत्रिक व्यवस्था की विशेषता उद्घोषित करते हुए कहा था कि उनके राज्य में न चोर है, न झूठ बोलने वाला; कोई स्वैर नहीं हैं तब स्वैरिणी कहाँ से होगी। इस तरह की घोषणा वही कर सकता है जो स्वयं सदाचारी हो । नेता सदाचारी न हों तो नागरिक सदाचारी हो ही नहीं सकते हमारे पड़ोसी राष्ट्रों में प्रजातत्र नेताओं के अनाचार के कारण नष्ट हुअा है। हमारे देश में सब नेता तो सदाचारी नहीं है; पर कुछ अवश्य ही अपने चरित्र को पवित्र रखना चाहते हैं । देश उन्हीं के बल पर चल रहा है। प्रजातंत्र में दण्ड का लक्ष्य यही हो सकता है कि सदाचारी और व्यवस्थाप्रिय लोगों को उसका संरक्षण मिले । वह कठोर तो हो; पर उसका उपयोग कम से कम करना पड़े।

-पंचोली

एक स्पष्ट सी बात

बात है क्रान्तिकारियों की, हिंसा में विश्वास करनेवाली टोली की। भगतसिंह की, बटुकेश्वर दत्त की, अशफ़ा- कुल्ला, रामप्रसाद बिस्मिल की, चन्द्रशेखर ‘प्राज़ाद’ की और उनकी टोली की। उस टोली के सदस्य अपने लक्ष्य की प्राप्ति और अपने मार्ग की बाधाओं को नष्ट करने के लिए जिस व्यवस्था, अनुशासन और प्रतिज्ञा से प्राबद्ध होते थे उसमें ‘प्राण जाइ पर बचन न जाई’ का रूप मूर्त रहता था। प्राणपण से भारत की स्वतन्त्रता के लिए परितः निबद्ध आस्थावाले, विश्वतः परखे हुए और खरे व्यक्तित्व-वाले जन ही उस टोली के सदस्य हो सकते थे।

कभी समय था जब आर्यसमाज के सदस्य भी ऐसे ही सरल, स्पष्ट, और खरे जन होते थे। तभी सम्पूर्ण मही पर आर्यसमाज का आन्दोलन सफल जन-पान्दोलन बना जिसकी छिटकी हुई चिंगारियां आज भी यत्र तत्र विकीर्ण हैं । पर आज आर्यसमाज में सदस्यों की संख्या सोद्देश्य और जीवन-निष्ठ व्यक्तित्व में नहीं रह गई है। अब सदस्यों की भर्ती, आर्य-सदस्यों की छाँट और संख्या उन सदस्यों में से की जाती है जिनकी कथनी और करनी में कहीं भी कोई मेल नहीं है । और, यही हाल है तथा- कथित सनातन-धर्मी संस्थाओं और धर्मावलम्बियों का। राजनीतिक पार्टियों का हाल तो और भी बदतर है। निष्ठा के अभाव में सदस्यता निरर्थक हो गई है। देश की स्वतन्त्रता (सामाजिक, आर्थिक और अात्मिक) को सुरक्षित रखने के लिए देश में कर्तव्यनिष्ठ और वास्तविक नेतृत्व की अब महती आवश्यकता हैअच्छा नेतत्व भी तब उपजेगा जब हमारा समाज समष्टि रूप से उन्नत, जागरूक होगाऐसे समाज में जहां जात- पति के मनमाने और मगढन्त बन्धन हैं, जहां छूत और अछतों का झगड़ा है, जहां शिक्षा अक्षरज्ञान-मात्र है, जहां पढ़े-लिखे समझे जानेवाले लोग विदेशी प्राचार और व्यवहार के भक्त हैं एवं अपढ़ तथा तथाकथित शिक्षित भी मूर्ख, गवार, अज्ञानी पुरोहितों, पुजारियों और मुल्लानों के अधीन हैं वहां किसी महान् नेतृत्व का उत्पन्न होना और उभरना कैसे सम्भव होगा ? जहां नेतृत्व स्वयं धूर्त, ठग, स्वार्थी और दुराचारी हो वहां देशोद्धार, समाजोद्धार और आत्मिक उद्धार कैसे सम्भव होगा!

चोरबाजारी, कालाबाजारी, रिश्वत, बेईमानी से धन, कीर्ति और कमाई का सम्पादन करनेवाले व्यापारी, वकील, डॉक्टर, और भ्रष्ट नौकरशाही के मात्र डिग्रीया सर्टीफ़िकेट-धारी, ये भर गए हैं सभी धर्मों, सम्प्रदायों और राजनीतिक टोलियों में । बस, यही कारण है कि भारतमही में दुःख, द्वन्द्व, क्लेश, और मन, वचन, कर्म की भ्रष्टता दिन दूनी, रात चौगुनी बढ़ती जारही है और महाप्रलय को बुलावा देरही है। चारों ओर अनाचार और चीत्कार भर गया है। न कोई सुनता है, और सुनकर भी, सुनाकर भी कुछ होता नहीं है।

वेद-शिक्षक और वेद की शिक्षाए भी अाज धरी रह जानी हैं। कौन अपनाएगा या अपनारहा है वेद को और वेद की शिक्षानों को जिनका प्र+चार, प्र+सार काम्य है ‘वेद-सविता’ के मोती से शब्दों में । काश, वेद-संस्थान के सदस्य (संस्थान-परिवार) ‘वेद-सविता’ के अ+क्षरों और शब्दों में आस्थावान् बनें और नवनिर्माण करें समाज का ! आइए, संख्या को छोड़, गुण-ग्राहकता की परिवृद्धि की ओर ध्यान दीजिए और बूद बूद से जीवनसागर का निर्माण कीजिए। तब कोई वास्तविक नेतृत्व पैदा होगा जो वास्तविक क्रान्ति संजो सकेगा; भ्रष्टता, संकोच, अशालीनता, अनुशासन-भ्रष्टता और अभद्रता को अपदस्थ कर उसके स्थान पर विनय, शील, सौम्यता, ‘भद्रता, आर्यता और चरित्र को स्थापित करेगा ।

जब कथनी और करनी का अन्तर समाप्त हो जाएगा तब भ्रष्टता, भय और भ्रम की हिंसा से जो अहिंसा (सत्य, न्याय) उभरेगी वह अपनी परिभाषा करेगी. ‘हिंसा से विरति ही अहिंसा है’ जो व्यक्तिगत, सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन का प्राण है, क्रान्ति का सोपान है।

गुरुदेव को नमन

य मे छिद्रं चक्षुषों, हृदयस्य, मनसो वातितृष्णं, बृहस्पतिर् मे तद् दधातु ।

शं नो भवतु भुवनस्य यस् पतिः ।

बहस्पति परमात्मा का नाम है । वेद के विद्वान् आचार्य को भी बृहस्पति कहा जा सकता हैहमारे जीवन की वटियाँ गुरुदेव ही दूर करते हैं । राम को विश्वामित्र ने, पाण्डवों को द्रोणाचार्य ने, शिवाजी को. समर्थ राम- दास ने और ऋषि दयानन्द को स्वामी विरजानन्द ने योग्य बनाया। अनादि काल से हमारे देश में गुरु-शिष्य की पवित्र परंपरा चली आती है।

प्रत्येक प्रात्मा मानव देह में श्राकर सुख, शान्ति, आनन्द चाहता है। किंतु ये मिलते उसी को हैं जिन पर उस भवनपति की कृपा हो गई हो और बृहस्पति गुरु की शरण में जा पड़ा हो जब तक जीवन में दोषों, विकारों के छिद्र हैं तब तक सुख, शान्ति, आनन्द मिलना असंभव है।

ईश्वर ने इस सृष्टि को अति सुन्दर बनाया है जब भी हम सौन्दर्य को देखकर हमारे मन अथ वा शरीर किसी भी इन्द्रिय में विकार आता है तो हमारे जीवन में छिद्र या दोष या जाता है। किसी के प्रति हमारे मन में द्वेष उत्पन्न होता है तो समझो हमारा मन कट गया है, उसमें तरेड़ आ गई है, छिद्र हो गया है किसी के प्रति हमारे मन में दुर्भावना पाती है तो, जानो हमारे मन में छिद्र हो गया है । यही सब कुवास- नायों की तरे. व छिद्र जीवन को अशान्त व वेहाल कर देते हैं। उस व्याकुलता के समय ईशकृपा और वहस्पति गुरु के सहारे ही मानव मुक्ति प्राप्त करता है। मेरे जीवन की त्रुटियों को गुरु दूर करे ताकि एक एक व्यक्ति के पवित्र होने से सर्वत्र सुख हो-परिवार, समाज, राष्ट्र एवं विश्व में सुख शान्ति हो ।

छिद्र का होना अत्यन्त हानिकारक हैशरीर के एक अंग में फोड़ा निकला तो सारा शरीर दु:खी होगा। परिवार का एक सदस्य बिगड़ा तो सारा परिवार उसका फल भोगेगाराष्ट्र का एक हिस्सा विद्रोह करेगा तो सारा राष्ट्र कमजोर होगा। मैं मेरी त्रुटियां दूर करू तो मेरा परिवार, समाज और राष्ट्र सभी सुख-शान्ति का अनुभव करेंगे।

यदि शीतल जल के कलश में छिद्र हो जाय तो सारा कलश खाली हो जायेगा। यात्रियों से भरी नाव में छिद्र हो जाय तो नाव डूबने से सभी मरेंगे । पैर की एड़ी में तरेड़ पड़ जाती है तो शरीर कितना कष्ट पाता है। बांध में तरेड़ पड़ने पर कई गांवों के डूबने का ख़तरा उपस्थित हो जाता है। किसी के प्रति मन में तरेड़ पा जाय तो परिवारों से सूख-शान्ति विदा हो जाती है। पूज्य स्वामी दयानन्द के मिशन के सच्चे मिशनरी गुरुदेव स्वामी विद्यानंद जी ‘विदेह’ ने त जाने कितने लोगों और परिवारों के दोषों को दर करके समाज और जाति का कल्याण किया है। ‘विदेह’ जी के ‘वेदालोक’ में इस और ऐसे अनेक मंत्रों की सन्दर व्याख्या को श्रद्धापूर्वक पढ़। वेदमाता जीवन के सब छिद्रों को पूरेगीं । असीम सख की वष्टि होगी और जीवन सार्थक होगा।

          पूज्य गुरुदेव ‘विदेह’ को सश्रद्ध नमन !

गुरुदेव को नमन

य मे छिद्रं चक्षुषों, हृदयस्य, मनसो वातितृष्णं, बृहस्पतिर् मे तद् दधातु ।

शं नो भवतु भुवनस्य यस् पतिः ।

बहस्पति परमात्मा का नाम है । वेद के विद्वान् आचार्य को भी बृहस्पति कहा जा सकता हैहमारे जीवन की वटियाँ गुरुदेव ही दूर करते हैं । राम को विश्वामित्र ने, पाण्डवों को द्रोणाचार्य ने, शिवाजी को. समर्थ राम- दास ने और ऋषि दयानन्द को स्वामी विरजानन्द ने योग्य बनाया। अनादि काल से हमारे देश में गुरु-शिष्य की पवित्र परंपरा चली आती है।

प्रत्येक प्रात्मा मानव देह में श्राकर सुख, शान्ति, आनन्द चाहता है। किंतु ये मिलते उसी को हैं जिन पर उस भवनपति की कृपा हो गई हो और बृहस्पति गुरु की शरण में जा पड़ा हो जब तक जीवन में दोषों, विकारों के छिद्र हैं तब तक सुख, शान्ति, आनन्द मिलना असंभव है।

ईश्वर ने इस सृष्टि को अति सुन्दर बनाया है जब भी हम सौन्दर्य को देखकर हमारे मन अथ वा शरीर किसी भी इन्द्रिय में विकार आता है तो हमारे जीवन में छिद्र या दोष या जाता है। किसी के प्रति हमारे मन में द्वेष उत्पन्न होता है तो समझो हमारा मन कट गया है, उसमें तरेड़ आ गई है, छिद्र हो गया है किसी के प्रति हमारे मन में दुर्भावना पाती है तो, जानो हमारे मन में छिद्र हो गया है । यही सब कुवास- नायों की तरे. व छिद्र जीवन को अशान्त व वेहाल कर देते हैं। उस व्याकुलता के समय ईशकृपा और वहस्पति गुरु के सहारे ही मानव मुक्ति प्राप्त करता है। मेरे जीवन की त्रुटियों को गुरु दूर करे ताकि एक एक व्यक्ति के पवित्र होने से सर्वत्र सुख हो-परिवार, समाज, राष्ट्र एवं विश्व में सुख शान्ति हो ।

छिद्र का होना अत्यन्त हानिकारक हैशरीर के एक अंग में फोड़ा निकला तो सारा शरीर दु:खी होगा। परिवार का एक सदस्य बिगड़ा तो सारा परिवार उसका फल भोगेगाराष्ट्र का एक हिस्सा विद्रोह करेगा तो सारा राष्ट्र कमजोर होगा। मैं मेरी त्रुटियां दूर करू तो मेरा परिवार, समाज और राष्ट्र सभी सुख-शान्ति का अनुभव करेंगे।

यदि शीतल जल के कलश में छिद्र हो जाय तो सारा कलश खाली हो जायेगा। यात्रियों से भरी नाव में छिद्र हो जाय तो नाव डूबने से सभी मरेंगे । पैर की एड़ी में तरेड़ पड़ जाती है तो शरीर कितना कष्ट पाता है। बांध में तरेड़ पड़ने पर कई गांवों के डूबने का ख़तरा उपस्थित हो जाता है। किसी के प्रति मन में तरेड़ पा जाय तो परिवारों से सूख-शान्ति विदा हो जाती है। पूज्य स्वामी दयानन्द के मिशन के सच्चे मिशनरी गुरुदेव स्वामी विद्यानंद जी ‘विदेह’ ने त जाने कितने लोगों और परिवारों के दोषों को दर करके समाज और जाति का कल्याण किया है। ‘विदेह’ जी के ‘वेदालोक’ में इस और ऐसे अनेक मंत्रों की सन्दर व्याख्या को श्रद्धापूर्वक पढ़। वेदमाता जीवन के सब छिद्रों को पूरेगीं । असीम सख की वष्टि होगी और जीवन सार्थक होगा।

          पूज्य गुरुदेव ‘विदेह’ को सश्रद्ध नमन !

इच्छा करना ही पर्याप्त नहीं है

अधिकतर लोग अपने घर में चुपचाप पड़े रहते हैं। दुनियां में क्या होरहा है, इसकी उनको कोई परवाह नहीं होती। उनसे कोई पूछे कि ख़ामोश क्यों बैठे हो तो वे जवाब देंगे-अकेले हम क्या कर सकते हैं ? ‘

अकेला भी नगण्य तो नहीं होतारेत का कण कितना छोटा होता है; पर वही अन्य कणों के साथ मिल कर समुद्र का किनारा बनाता है। पानी की बूद छोटी होती है; पर समुद्र उसी से बनता है ।

सन्त भी आदमी ही होता है साढ़े तीन हाथ का। प्राणिमात्र से प्रेम का व्यवहार करके वह मानव से महा- मानव बन जाता है। आप सुख, शान्ति और आनन्द तो चाहते हैं, यश भी चाहते हैं; पर इसके लिए कर क्या रहे हैं ? जो आप चाहते हो उसके लिए आप कुछ कीजिए भी। केवल इच्छा करना पर्याप्त नहीं है । वैठे रहने से काम नहीं चलेगासफलता की चोटी पर पहुँचने वाले हर व्यक्ति ने बिलकुल नीचे से उठना प्रारम्भ किया था ।

एक जलती हुई बत्ती कई वत्तियों के जलने के लिए सहारा बनती हैअपनी बत्ती जलायो दूसरों को भी बत्ती जलाने में मदद करो। तब अंधकार भागेगाअंधकार को कोसने के बदले एक बत्ती जलाना बेहतर है।

इसलिए अपनी और दूसरों की भलाई के लिए, लक्ष्य को पाने के लिए केवल इच्छा ही मत रखिए । उठिए, आगे बढ़िये, काम कीजिए, धीरज धरिये और सफलता पाईये ।

अमर बलिदानी खुदीराम बोस

3 दिसंबर जन्म-दिवस पर प्रकाशित

भारतीय स्वतन्त्रता के इतिहास में अनेक कम आयु के वीरों ने भी अपने प्राणों की आहुति दी है। उनमें खुदीराम बोस का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जाता है। उन दिनों अनेक अंग्रेज अधिकारी भारतीयों से बहुत दुर्व्यवहार करते थे। ऐसा ही एक मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड उन दिनों मुज्जफरपुर, बिहार में तैनात था। वह छोटी-छोटी बात पर भारतीयों को कड़ी सजा देता था। अतः क्रान्तिकारियों ने उससे बदला लेने का निश्चय किया।

कोलकाता में प्रमुख क्रान्तिकारियों की एक बैठक में किंग्सफोर्ड को यमलोक पहुँचाने की योजना पर गहन विचार हुआ। उस बैठक में खुदीराम बोस भी उपस्थित थे। यद्यपि उनकी अवस्था बहुत कम थी; फिर भी उन्होंने स्वयं को इस खतरनाक कार्य के लिए प्रस्तुत किया। उनके साथ प्रफुल्ल कुमार चाकी को भी इस अभियान को पूरा करने का दायित्व दिया गया।

योजना का निश्चय हो जाने के बाद दोनों युवकों को एक बम, तीन पिस्तौल तथा 40 कारतूस दे दिये गये। दोनों ने मुज्जफरपुर पहुँचकर एक धर्मशाला में डेरा जमा लिया। कुछ दिन तक दोनों ने किंग्सफोर्ड की गतिविधियों का अध्ययन किया। इससे उन्हें पता लग गया कि वह किस समय न्यायालय आता-जाता है; पर उस समय उसके साथ बड़ी संख्या में पुलिस बल रहता था। अतः उस समय उसे मारना कठिन था।

अब उन्होंने उसकी शेष दिनचर्या पर ध्यान दिया। किंग्सफोर्ड प्रतिदिन शाम को लाल रंग की बग्घी में क्लब जाता था। दोनों ने इस समय ही उसके वध का निश्चय किया। 30 अपै्रल, 1908 को दोनों क्लब के पास की झाड़ियों में छिप गये। शराब और नाच-गान समाप्त कर लोग वापस जाने लगे। अचानक एक लाल बग्घी क्लब से निकली। खुदीराम और प्रफुल्ल की आँखें चमक उठीं। वे पीछे से बग्घी पर चढ़ गये और परदा हटाकर बम दाग दिया। इसके बाद दोनों फरार हो गये।

परन्तु दुर्भाग्य की बात कि किंग्सफोर्ड उस दिन क्लब आया ही नहीं था। उसके जैसी ही लाल बग्घी में दो अंग्रेज महिलाएँ वापस घर जा रही थीं। क्रान्तिकारियों के हमले से वे ही यमलोक पहुँच गयीं। पुलिस ने चारों ओर जाल बिछा दिया। बग्घी के चालक ने दो युवकों की बात पुलिस को बतायी। खुदीराम और प्रफुल्ल चाकी सारी रात भागते रहे। भूख-प्यास के मारे दोनों का बुरा हाल था। वे किसी भी तरह सुरक्षित कोलकाता पहुँचना चाहते थे।

प्रफुल्ल लगातार 24 घण्टे भागकर समस्तीपुर पहुँचे और कोलकाता की रेल में बैठ गये। उस डिब्बे में एक पुलिस अधिकारी भी था। प्रफुल्ल की अस्त व्यस्त स्थिति देखकर उसे संदेह हो गया। मोकामा पुलिस स्टेशन पर उसने प्रफुल्ल को पकड़ना चाहा; पर उसके हाथ आने से पहले ही प्रफुल्ल ने पिस्तौल से स्वयं पर ही गोली चला दी और बलिपथ पर बढ़ गये।

इधर खुदीराम थक कर एक दुकान पर कुछ खाने के लिए बैठ गये। वहाँ लोग रात वाली घटना की चर्चा कर रहे थे कि वहाँ दो महिलाएँ मारी गयीं। यह सुनकर खुदीराम के मुँह से निकला – तो क्या किंग्सफोर्ड बच गया ? यह सुनकर लोगों को सन्देह हो गया और उन्होंने उसे पकड़कर पुलिस को सौंप दिया। मुकदमे में खुदीराम को फाँसी की सजा घोषित की गयी। 11 अगस्त, 1908 को हाथ में गीता लेकर खुदीराम हँसते-हँसते फाँसी पर झूल गये। तब उनकी आयु 18 साल 8 महीने और 8 दिन थी। जहां वे पकड़े गये, उस पूसा रोड स्टेशन का नाम अब खुदीराम के नाम पर रखा गया है।

#KhudiramBose
#खुदीराम_बोस