ब्रह्म की आंधी

ब्रह्म की आंधी

यथा वातश् च्यावयति भूम्या रेणुमन्तरिक्षा चाभ्रम् ।

एवा मत सर्व दुर्भूतं ब्रह्मनुत्तमपायति ।

          जब मैं ईश्वरीय नियमों के अनुसार प्रकृति में घटित होने- वाले घटनाचक्र पर दृष्टिपात करता हूँ तब मेरा मानस किसी किसी घटनाचक्र से तरंगित हो उठता है। मैं सोचने लगता है कि यह घटना मेरे अन्दर भी क्यों नहीं घटित होतीआज मेरा ध्यान ‘वायु’ की ओर गया है। अभी प्रबल झंझावात आया था, सामने के मैदान की धूल को उड़ा ले गया और अब यह भू-प्रदेश नितान्त स्वच्छ हो गया है। इस वायु की एक और करामात देखो, अांधी के बाद वृष्टि होने लगी है। आकाश में जो मेघ- घटाएं छायी हुई थीं, उन्हें झकझोर कर वायु ने नीचे बरसा दिया है जिससे भूमि वर्षा से स्नात होकर और भी अधिक निखर उठी है।

         मैं चाहता हूँ कि मेरे अन्दर भी झंझावात उठे, ब्रह्म की अांधी पाये, ईश्वरीय भावों और वैदिक भावनाओं का सांय-सांय करता हुया अंधड़ उठे । मेरे हृत्पटल पर और मस्तिष्क-भूमि में जो दुर्भावों, पापों और वासनाओं की बहुत सी धूल एकत्र हो गई है उसे वह उड़ा ले जाये तथा मेरे अन्तःकरण और मस्तिष्क को निर्मल कर दे । जैसे कभी-कभी आकाश में जल-भरे बादल छाये रहने पर भी बरसते नहीं, वैसे ही मेरे प्रात्माकाश में भी सद्भावों और सद्गुणों के बादल छाए हुए हैं । पर बरस नहीं रहे। ब्रह्म-रूप पवन, ईश्वर और वेद का प्रबल प्रभंजन उन सद्भावों और सद् गणों को झकझोर कर मेरे हृदय और मस्तिष्क पर बरसा दे। दुर्भावों के उड़ चुकने से निर्मल हुया हृदय और मस्तिष्क उन सद्भावों और सद्गुणों को आत्मसात् कर लेने के लिए योग्य भूमि सिद्ध होगा

         प्रायो, साधना द्वारा हम अपने अन्दर ब्रह्म की आंधी  उठाए और समस्त ‘दुर्भूत’ को उस आंधी के झोंके से उड़ाकर मन और मस्तिष्क की भूमियों को पवित्र कर लेवें।

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