आविष्कार 

आविष्कार 

         गणित संख्याओं का विज्ञान है जानते हो, संख्या का अर्थ क्या होता है ? ‘संख्या’ का अर्थ होता है पूर्ण ज्ञान, निश्चयात्मक ज्ञान, पूरी जानकारी। गणित में जानकारी तो निश्चयात्मक होती है; पर निश्चय तक पहुंचने के लिए कल्पना का सहारा भी लेना पड़ता है। गणित के सवाल हल करते समय कभी तुमने भी इस तरह की कल्पना की होगी- ‘माना कि….’ । ऐसी कल्पना हम किसी के भी बारे में कर सकते हैं। आयो ! आज ऐसा ही एक सवाल करें।

           माना कि तुम दुनिया के पहले आदमी  हो और सोते से जागने पर पूरब की दिशा में उषा के सौंदर्य को देख रहे हो। अंधेरे के बाद उषा का लाल लाल प्रकाश बहुत आनंद दे रहा है न ! मालूम पड़ रहा होगा जैसे सारा सुख तुम्हारे ऊपर उंडेला जा रहा हो । सूरज की पहली किरण भी देखी होगीजैसे वही है हाथ, जो तुम पर सुख और आनन्द की वर्षा कर रहा है। हाथ अकेला है । वर्षा करनेवाला दिखाई नहीं देता। उषा भी अकेली, और यह हाथ भी अकेला, और तुम ? तुम भी अकेले । क्या लगता है यह सब तुम्हें ? अनुभव होता होगा, ‘मैं हूँ और यह उषा है, और यह हाथ है, सुख और आनंद बरसाने वाला’। कल्पना अच्छी लग रही है न ? मन में इच्छा जाग रही होगी कि उसको देखें जो सुख बरसाता है, जो आनंद बरसाता है, जो प्रकाश बरसाता है और अंधकार का नाश करता है । जानना चाहते होंगे कि कौन है वह ? कैसा होगा वह ? कितना बड़ा होगा वह ? कितने रूप वाला होगा वह ? हाँ, यह तो मन में निश्चित रूप से होगा कि वह रात के अंधेरे की तरह नहीं हो सकता; उससे भिन्न होगा; प्रकाश का केंद्र होगा। वह केवल मेरे लिए होगा, किसी और के लिए नहीं होगा। मैं सिर्फ उसके लिए होऊंगा, किसी और के लिए नहीं।

          मान रहे हो न तुम, कि तुम सबसे पहले आदमी हो और सबसे पहली उषा को देख रहे हो. सबसे पहली किरण को देख रहे हो ? लो, तैयार हो जाओ, वह आ रहा है जिसकी सबसे पहली किरण, पहला हाथ देख रहे थे। वह सुख का दाता, प्रकाश का दाता, आनन्द का दाता । कौन है वह ? वह गोले का ऊपरी हिस्सा दिखा । वह ऊंचा होता जा रहा है । आधा गोला हो गया। अब पूरा हो रहा है । तपे हुए सोने का गोला । सुनहरा प्रकाश का गोला। सूख और आनंद और प्रकाश क्या इसी में भरे हुए थे ? हां, इसी में । क्या यह किसी की गेंद है या गुब्बारा है जिसमें सुख भरा हुआ है ? अगर ऐसा होता तो यह फूटता, तब.सुख बिखेरता। यह तो सुख का पुज है, प्रकाश का पूज है। पता नहीं चलता कि इसने कौन से हाथ से सुख बरसाया था ? न जाने कितने हाथ हैं इसके ? कहां छिपे थे ये सब ? क्या रात के अंधेरे में ? अंधेरे में तो नहीं छिप सकते। अंधेरा इसको रहता है वहां अंधेरा नहीं रह सकता। यह आज पहली बार ही थोड़े आया है। रोज़ाना आता होगा, रोज़ाना आता रहेगा। कैसे सोचा यह तुमने ? तुम तो पहले आदमी हो न ? निश्चय ही तुम्हारा मन कहता होगा कि यह इतना सुख एक दिन में नहीं बटोरा जा सकता; इसे बार बार बरसना चाहिए । और, इसके साथ ही, मन यह भी कहता होगा कि ‘हाँ, यह रोजाना बरसेगा क्यों कि इस सुख बरसाने वाले के अनेक हाथ हैं। कभी इससे बरसाएगा, कभी उससे बरसाएगा; पर बरसाएगा रोज़ । नियम से आकर बरसाएगा। यह मेरा मित्र है । बड़ा प्यारा मित्र, परम मित्र । ऐसा न होता तो मेरे लिए इतना सब कुछ क्यों लाता ।

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