पुंसवन संस्कार

 पुंसवन संस्कार

 डा. अशोक आर्य

       मानव विकास के स्तम्भ स्वरूप जो सोलह संस्कार करने का आदेश महर्षि दयानन्द सरस्वती ने दिया है, उन्हीं की दूसरी कडी का नाम पुंसवन संस्कार है। यह संस्कार भी बालक के जन्म से पूर्व किया जाता है। पोषण को ही पुंसवन कहते हैं। अतः जब यह निश्चय हो जाता है कि गर्भ ठहरगया है तो उसके पोषण की आवश्यकता होती है। गर्भ स्थ शिशु के पोषण का प्रमुख आधारमा जिसके गर्भ में शिशु पल रहा है, ही होती हैअतः इस समय सभी प्रकार की जिम्मेवारियां मां की ही होती हैं । इस समय मां जैसा चाहे उसे ढाल सकती है जन्म के पस्चात् बालक को बिगाडने वाली माताओं को पता होना चाहिये कि यह उनकी भूलों का ही परिणाम है। जो समय उन्हें बालक के निर्माण का मिला था , उस का सदुपयोग उन्होंने नहीं किया । जो ढल गया , तो फिर उसे नया रूप कैसे दें?

      मां के गर्भ में शिशु का शारीरिक व मानसिक दो रूपों में विकास होता है। इन दोनों प्रकार के विकास के लिए दो संस्कारों का विधान किया गया है। जिन्हें पुंसवन व सीमन्तोनयन संस्कार के नाम से जानते हैं। यहां हम पुंसवन संस्कार के विषय में बताने का प्रयास कर रहे हैं :

      जब यह निश्चय हो जाता है कि गर्भ स्थिर हो गया है तो उसकी व उसे गिरने से बचाने के लिए यह संस्कार दूसरे अथवा तीसरे ने किया जाता है। जब स्त्री को ऋतुनाव आना बन्द हो जावे , उसे वमन आने लगे, स्तन व पेट बढने लगे, यह सब गर्भस्थ अवस्था लक्षण हैं। इस अवस्था में उसे कई सावधानियां करनी होती हैं ताकि गर्भपात भी न हो तथा सन्तान पुष्ट भी हो । गर्भस्त महिला को ऊंचे नीचे स्थान पर चलने, कठोर परिश्रम, गैस व भूखे रहने से गर्भ मखता है। ऊचे स्थानों पर चलने से ,गर्भ दबाव, डरावने शब्द व सपने से या सीधे पडे रहने से गर्भस्थ बालक मर सकता हैगर्भवती केकई प्रकार के कई गलत आचरण होने वाली सन्तान के पागल पन व कई प्रकार के अन्य रोगों का कारण होते हैं |

      अतः गर्भ धारण से लेकर प्रसव पर्यन्त गर्भवती सदा प्रसन्न रहे, आभूषण व अच्छे वस्त्र पहने,सभी प्रकार के धर्म कर्म करते हुए वैसा ही व्यवहार करे जैसा वह सन्तान को बनाना चाहती है। ऐसी कोई भी चेष्टा न करे जिससे गर्भ को हानि हो । अपने खाने में भी पौष्टिक तत्वों का प्रयोग करे। कठोर व वातकारी पदार्थों का सेवन न करे।

      इस संस्कार का उद्देश्य गर्भस्थ संतान की रक्षा होने के कारण ही महर्षि ने लिखा है कि गर्भ के दूसरे व तीसरे महीने वट वृक्ष (बरगद) की जटा व पत्ते गर्भिणी स्त्री के दाएं नासा पुट में सुंघाने उपयोगी हैंइन दिनों ब्रह्मी या गिलोय का खाना भी लाभकारी हैइसी प्रकार अन्य ढंग से भी उसके शरीर को बनाए रखने के लिए उपाय करने चाहिये ।योग्य चिकित्सकों का परामर्श व मार्गदर्शन सदा प्राप्त करते रहें । इन दिनों गर्भवती की पुष्टि का ध्यान र आवश्यक होता हैप्रत्येक माह गर्भवती की अवस्था बदलती एक उस के अनुसार ही उसके खानपान व सावधानिायों में भी पशि आता रहता है। अतः योग्य चिकित्सक व किसी वयोवृद्ध से निर परामर्श करते रहना चहिये तथा समय समय पर यथावश्यक खान पान में परिवर्तन करते रहना चाहिये कैल्शियम की मात्रा बढाएं व कब्ज किसी भी अवस्था में नहीं होने दें।

      पति अपनी पत्नि का सार्वजनिक रूप से हृदय स्पर्श करे। यह न केवल प्रेम का प्रतीक ही है अपितु यह घोषणा भी करता है कि वह आने वाली बडी जिम्मेवारी को खुशी से पूरा करने के लिए तैयार हैसभी चाहते हैं कि उनकी सन्तान पुरुषत्व से युक्त हो अर्थात् हृष्ट पुष्ट व पौरुष से भरपूर हो । सन्तान में यह गुण स्थापित करना ही पुंसवन संस्कार का मुख्य कार्य है। जहां तक सन्तान के पुत्र या पुत्री का होना है , यह गर्भ निश्चित होने के पश्चात् किसी भी प्रकार बदला नहीं जा सकता, ऐसा शास्त्रों का मानना है |

      इस संस्कार का एक अन्य उद्देश्य यह भी है कि गर्भ जिन कारणों से गिरने व नष्ट होने की सम्भावना होती है, सावधानी पूवर्क उनसे बचाते हुए प्रस्वावस्था तक उसे पूर्ण स्वस्थ रखा जा सके । एतदर्थ कुछ औषध भी बताई जाती हैं तथा सावधानियां भी , जिनका प्रयोग करते हुए परिपुष्ट सन्तान को जन्म दिया जा सकता है।

नामकरण सस्कार

नामकरण सस्कार

डा. अशोक आर्य

       मानव अनेक इच्छाओं व आकांक्षाओं से बालक की अभिलाशा  करता है। उसी आकांक्षा से गर्भाधान संस्कार होता है। गर्भ स्थापित होने के पश्चात् वह पुंसवन संस्कार करता है ताकि गर्भस्थ शिशु का शरीर पृष्ट हो सके। फिरसीमनतोन्नयन संस्कार के माध्यम से गर्भ स्थ शिशु में मनन शक्ति का वेग लाने का प्रयास करता है। जन्म होने के पश्चात् जातकर्म के माध्यम से भी उस बालक में वेदानुसार आध्यात्मिक विचार बनाने के लिए तथा सुगन्धित व्यंजन ग्रहण करने की प्रेरणा से उसकी जिह्रा पर मधु व घी के मिश्रण के साथ सोने की सलाई से ओ३म् लिखकर उसके कान में वेदो ऽ सीति कहा जाता है ताकि वह बालक जैसा हम बनाना चाहते हैं, वैसा व्यवहार करे किन्तु यह सब करने पर भी अभी बालक को कोई संज्ञात्मक नाम नहीं दिया गया होता, जिस से न केवल उसकी अपनी कोई पहचान बन सके तथा उसे बार बार याद आए कि उस ने न केवल माता पिता कि सभी इच्छाए। आकांक्षाएं पूर्ण करनी हैं। अपितु उसके व्यक्तित्व में भी निखार आने की सम्भावना बने। जिस नान को पुकारने पर उसे बार बार याद आ कि माता पिता ने किस इच्छा से उसे इस संसार के दर्शन करवाए किस भावना से उसका इतना सुन्दर नाम रखा है। उसनसम्बोधन से ही उसे अपने कर्तव्यों व इद्देश्य की याद आती रहे।

      आज लोग महर्षि के बताए मानव के नवनिर्माण के सूत्र सोलह संस्कारों से दूर होते चले जा रहे हैं। किन्तु नामकरण संस्कार को किसी न किसी रूप में आज का मानव आज भी कर रहा है क्यों कि नाम के बिना किसी बच्चे का व्यक्तित्व किसी अन्य से अलग नहीं हो सकताइसके बिना किसे सम्बोधन किया जा रहा है, इसका ज्ञान कैसे होगा? यही कारण है कि चाहे सभी संस्कार समाप्त हो जावें किन्तु नामकरण संस्कार फिर भी होता ही रहेगा। 

      नाम का बच्चे पर विशेष प्रभाव होता है ,क्योंकि हम जैसा सोचते हैं, वैसा ही हम करते भी हैं । अतः यह मन व कर्म के मध्य में स्थित शब्द है जो दोनों को प्रभावित करता है। अतः विचार व कर्म दोनों एक दूसरे से कभी अलग नहीं होते । शब्द का महत्व पढने से कहीं अधिक होता हैयही कारण है कि जो हम पुस्तकों में पढते हैं, उसे इतनी शीघ्रता से याद नहीं कर सकते जितनी शीघ्रता से गुरु मुख से सुनकर याद रखते हैं । यह शब्द ही नाम का रूप हैं । यही शब्द है जिसे हम एक बालक के नाम स्वरूप चुनते हैं, जिसका जीवन पर्यन्त इस बालक के लिए प्रयोग होना है। अतः यह शब्द इतना सार्थक व व्यवहारिक हो कि जब भी इस शब्द से उसे बुलाया जावे तो उसे शब्द की भावना भी याद आ जावे। 

      बालक का नाम निर्धारित करते समय ऐसा अर्थ पूर्ण रखा जावे कि जिसके सम्बोधन मात्र से ही बालक ही नहीं ,उसे सुनने वाले प्रत्येक व्यक्ति को पता चले कि उसके माता पिता उससे क्या इच्छाएं रखते हैं। महाष ने इसीलिए लिखा है कि नाम रखते समय यह ध्यान रहे कि यह नाम जड पदार्थो या पशु पक्षियों के निरर्थक नाम जैसा न हो। नाम सदा ऐसा रखा जावे, जो ऊंची भावना को जागृत करे। इसी नाम के बालक को सम्बोधन तो करना ही होता है साथ ही उस के पीछे छिपी ऊंची भावना का भी पता चले । नाम से ही बालक को पता चले कि उसने जीवन में क्या करना है ? बुरे ऐतिहासिक सम्बन्ध से जुडे नाम रखने से भी बचना चाहिये । नाम सदा ऊंची भावनाओं से युक्त ही होने चाहिये। केवल वैदिक संस्कति ही ऐसी प्रेरणा देती है। अन्य संस्कृतियों में तो निरर्थक नाम रखने की आम परम्परा है। वास्तव में नाम से जीवन को एक लक्ष्य मिलता है, एक दिशा मिलती है। इसीलिए कहा गया है कि नाम न केवल नई दिशा देने वाला ही हो अपितु उच्चारण में सुगम भी हो। संयुक्ताक्षरों वाले नाम को तोडकर व कठिन नाम को लोग बिगाड कर बोलने लगते हैं । अतः ध्यान रहे कि नाम ऐसा हो जिसे न तो तोडा जा सके और न ही बिगडने वाला नाम हो।

      एक संस्कार विधि स्पर्श, अन्तःस्थ , स्वर वाले नाम उच्चारण में सरल नामों को उपयुक्त बताती है। अतः नाम ऐसा हो कि जिसमें क ख च छ ट ठ त थ प फ का प्रयोग कम हो क्यों कि इनके उच्चारण के समय शरीर को अधिक चेष्टा करनी होती है। यदि नाम में ग घ ज झ ड ढ द ध न ब भ म य र ल व ह के अक्षरों का प्रयोग होता है तो लघु प्रयत्न से मधुर शब्द निकलता है। इसलिए नाम चयन कर्ता को ऐसे अक्षरों को नाम में रखने पर ध्यान देना चहिये । तद्धितान्त अर्थात् माता पिता सूचक नाम रखना भी अच्छा नहीं हैऐसे नाम शक्ति लगा कर बोले जाते हैं, जो उत्तम नहीं है। यह व्यवहारिक भी नहीं है। अतः नाम सरल,व सुगम के साथ ही सार्थक व सप्रयोजन होने चाहिये।

      यह भी ध्यान रखे कि बालक का नाम यग्म व कन्या का नामा अयुग्म अक्षरों से होना ही उत्तम है । युग्म का अर्थ है दो या चार अक्षरों का नाम तथा अयुग्म का अर्थ तीन अक्षरों के नाम से होता है। वास्तव में यह पारिवारिक परिचय की भावना से ही है। इसी से बच्चे की पारिवारिक पहचान बनती है। यह भी है कि बालक के नाम दो प्रकार से रखे जावें, एक सार्थक नाम , जो संस्कार विधि से रखे जावे दूसरे पारिवारिक नाम, जिन का प्रयोग माता, पिता व गुरूजन करें। सार्थक नाम से बालक के जीवन के लक्ष्य का पता चलता है। दूसरा नाम नामकरण के बिना ही प्रेम के नाम के रूप में जाना जाता है। ऐसा नाम केवल उपनयन संस्कार अर्थात् स्कूल प्रवेश से पूर्व तक ही प्रयोग में लाना चाहिये । अर्थात् नामकरण वाला नाम तो आजीवन चले किन्तु प्यार का नाम छोटी आयु में ही छोड दिया जावे। यह भी कहा जाता है कि जन्म की तिथि व नक्षत्र के आधार पर एक नाम रखा जावे तथा दूसरा नाम जो जीवन भर चले, वह ऐसा रखा जावे , जैसा हम बालक को संस्कारित कर बनाना चाहते हैं। नामकरण संस्कार साधारणतया जन्म के ११वें अथवा १०१ वें दिन करना चाहियेयह जन्म के दूसरे वर्ष करने की भी स्वीकृति दी गई है | 

      वैदिक संस्कृति सूंघने तथा स्पर्श पर बल देती है। अतः बच्चे को गोद में लेकर इसके नासिका छिद्र के पास ऊंगली का स्पर्श किया जाता है। इससे बच्चे का ध्यान स्वयं ही उसकी नासिका की वायु को स्पर्श करने वाले की और आकर्षित होता है। इससे माता पिता के अन्तःकरण की भावना उस बच्चे तक पहुंचती है। अतः जब पिता नासिका के समीप वायु स्पर्श करता है तो बच्चे को अनुभव होता है कि उस का प्रिय व्यक्ति उसे गोद में लेकर उसे प्रेम से सहला रहा है।