संन्यास संस्कार

डा. अशोक आर्य 

       हमारे प्राचीन ऋषियों ने मानव को बार बार यह स्मरण दिलाने के लिए कि हे मानव ! तूं ने अपने जीवन को अच्छा बनाना है, परोपकारी बनाना है, दूसरों की सेवा करनी है,माता पिता व गुरूजनों का आदर करना है ,धर्म व जाति का रक्षक बनना है , जहां सोलह सरंकारों का व्यवधान रचा, वहीं चार आश्रमों की भी व्यवस्था की । ताकि सभी लोग समान रूप से समाज की रचना प्रक्रिया में अपनी सहभागिता दर्शा सकें। जहां तक संन्यास का प्रश्न है, यह जहां सोलह संस्कारों का एक महत्त्व पूर्ण अंग है वहीं चार आश्रमों में भी विशेष कामाचा रूप से शोभायमान है |

      सोलह संस्कारों में जन्म के पश्चात् होने वाले सरकारों में बारहवां संस्कार तथा कुल सोलह संस्कारों में पन्द्रहवां संस्कार ही सिंन्यास संस्कार है। जहा तक आश्रम व्यवस्था का प्रश्न है, इसमें भी चार संस्कार सम्मिलित किए गए हैं , जो पहले से ही सोलह कारों का अंग हैंयथा ब्रह्मचर्य संस्कारों में गयारहवां संस्कारहै तो श्रम व्यवस्था में प्रथम आश्रम है। गृहस्थ संस्कारों में तेरहवां संस्कार है तो हमारी आश्रम व्यवस्था इसे दूसरे स्थान पर रखती हैवानप्रस्थ हमारी संस्कार व्यवस्था में चोदहवां संस्कार है तो आश्रम व्यवस्था में तीसरा । इसी प्रकार संन्यास सस्कार प्रणाली का पन्न संस्कार है तो हमारी आश्रम व्यवस्था इसे अन्तिम व चोथा आप स्वीकार करती है। वास्तव में मानव जीवन को हमारी महान् वैदिक संस्कृति १०० वर्ष का मानती है तथा कहती है कि यदि हम खली जलवा ग्रहण करते हुए एक निश्चित व्यवस्था में जीवन यापन करें तो हमारी आयु निश्चित रूप से कम से कम एक सौ वर्ष की होगी। इसी आधार पर इसके चार पडाव, ठहराव या रथल बनाए गए हैं , जिन्हें चार आश्रमों का नाम दिया गया तथा प्रत्येक आश्रम में ठहरने की अवधि पच्चीस वर्ष निश्चित की गई। यही चार पडाव ही चार आश्रम हैं, जा कि संस्कारों में भी अपना स्थान बनाए हुए हैं।

      आश्रमों में केवल गृहस्थ को छोडकर शेष तीनों आश्रमों का सम्बन्ध जंगलों , पहाडों व नदियों की खुली वायु में विचरण करने व प्रकृति की गोद में रहकरशीतल व स्वास्थ्य प्रद शुद्ध जलवायु का सेवन करना होता था । जबकि गृहस्थ लोग नगरों में रहते थे। इस प्रकार शतव र्षीय जीवन का तीन चौथाई अर्थात् जीवन के पिचहत्तर वर्ष जंगलों की खली वायु में विचरण करना होता था। यही ही हमारे उत्तम स्वास्थ्य का कारण था |

      गहस्थ जीवन में आई दुर्बलताओं को दूर करने व परोपकाएकी भावनानुसार निशुल्क अपने अनुभवों को बांटने के लिए की व्यवस्था थी। पच्चीस वर्ष तक इस आश्रम में रहते परी प्रकार से बलिष्ठ होकर तप जाता था, किसी की असर करने का उस पर कुछ भी प्रभाव नहीं होता था, तब वह नभवों को बांटने के लिए वानप्रस्थाश्रम इस आश्रम में रहते हुए जब मनुष्य होता था, तब वह संन्यास ले लेता था तथा जीवित अवस्था में था। यह आश्रम व्यवस्था का अन्तिम आश्रम था तथा जीवित अवस्था में होने वाले संस्कारों में अन्तिम संस्कार थाइसके पश्चात् केवल अन्तिम संस्कार अर्थात मृतक संस्कारही शेष रह जाता था |

      आज संन्यास का अभिप्राय ठगी या बेकारों के समूह के अर्थों में लिया जाता है किन्तु हमारे ऋषियों ने इस आश्रम को अति महत्व पूर्ण माना हैइस आश्रम में आने वाले व्यक्ति सभी सम्बन्धों से , सीमाओं से, वैभव से ऊपर उठ जाते हैं। अब सारा संसार ही उसका निवास स्थान होता है। देशीय सीमाएं उसके लिए कुछ भी अर्थ नहीं रखती थीं। सारे संसार के लोग उसका परिवार होता है,व्यक्तिगत परिवार भी सांसारिक लोगों की ही भाँति होता है। संसार के सभी लोग ही उसके सम्बन्धी होते हैं । वह जहां चाहे चला जाता है, जहां चाहे रुक जाता है। किसी को नहीं पता होता कि अमुक व्यक्ति आज कहां है तथा किसे क्या उपदेश दे रहा है । इस प्रकार केवल संसार का उपकार करना ही उसका एकमात्र ध्येय होता है। इसी ध्येय की पूर्ति के लिए वह एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमता रहता हैकिसी भी एक स्थान पर वह अधिक समय तक नहीं रुकता । स्वयं को इस समय अग्नि के तपाता है तथा इसलिए ही काषाय वस्त्र धारण करता है। अपने पवचनों का प्रसाद वह सवेत्र बाटते हुए कुछ मिला ता खाया नहीं तो यं दीपमते हुए कब व कहा उसकी मृत्यु हो जाती है ,उसका अन्तिम कौन करता है। इसका उसके निजी परिजनों को भी पता नहीं पाता । विश्व में कहीं भी ऐसा संस्कार वैदिक संस्कृति के अतिरिक्त ही नहीं मिलेगा । यही ही हमारी संस्कृति व इस संस्कार की महानता व श्रेष्ठता हैप्रभु संस्कारों का युग पुनः लौटावे तो संसार पुनः समागे पर चले |

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