वेदारम्भ संस्कार

डा. अशोक आर्य 

       मानव जीवन के सोलह संस्कारों में से गयारहवां तथा बारहवां, सानो संस्कार ही एक ही उद्देश्य से किये जाने के कारण दोनों का भाव समान ही है । बस अन्तर इतना है कि जब माता पिता एक निश्चित आय पर पहुंचने के कारण बालक को शिक्षार्जन के योग्य समझते हैं तो अपने ही निवास पर उपनयन संस्कार करके उसे गुरुकूल भेज देते तथा गुरू भी बालक को अपने गुरुकुल में स्थान देते हुए उसे अपने कु ल का भाग बनाने के लिए एक संस्कार करता है , जिसे वेदारम्भ संस्कारकहते हैं। दोनों संस्कारों का सम्बन्ध शिक्षा प्राप्त करना आरम्भ करने से हैइसी कारण इन दोनों संस्कारों को एक दूसरे का पूरक माना जाता है |

      प्राचीन गुरुकुलों में न तो आज सरीखे भवनों को ही केन्द्र मानकर महत्त्व दिया जाता था और न ही अन्य साज सज्जा की सामग्री को , क्योंकि इस का सम्बन्ध बालक की शिक्षा से होता था। अतः इनके केन्द्र या आधार बालक ही होते थे। इसी भावना को आज के शिक्षाविद् पुनः समझने लगे हैं। अतः आज पूनः यह स्वर मुखरित होने लगे हैं कि स्कूलों में बालकों महत्त्व को समझना चाहिये तथा इन्हें ही केन्द्र मानकर शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिये ।ऐसी व्यवस्था में गुरु बालक के विगत जन्म के संस्कारों का उसके व्यवहार से अध्ययन क्दरता है, माता पिता के संस्कारों का भी अध्ययन करता है तथा वर्तमान वातावरण ,जिसे पर्यावरण कहते हैं,का भी अध्ययन दर तदनुसार बालक की अभिरुचि के अनुसार इसे शिक्षा देता है |

      जहां तक संस्कारों का प्रश्न है, पहले भी बताया जा चुका है कि मानव जीवन के संस्कारों को दो भागों में बांटा गया है। प्रथम भाग में प्रसव पूर्व के तीन संस्कार रखे गए हैं तथा दूसरे भाग में जन्म के पश्चात् के शेष तेरह सरकार सम्मिलित हैं। इन संस्कारों से तो बालक को आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती ही है, उसके भावी जीवन के निर्माण के लिए पर्यावरण, शिष्य व ब्रह्मचारी, गुरुया आचार्य पढने के विषय चयन, पढने व पढाने की विधि व जीवन का लक्ष्य कैसे प्राप्त हो आदि पर शिक्षा प्रारम्भ करने से पूर्व वैदिक आचार्य विचार करते हैं। 

     वातावरण का बाल शिक्षा पर खूब प्रभाव होता है किन्तु इससे बालक को बचाया जा सकता है। गन्दे वातावरण के बच्चों में अच्छे संस्कारों की बहुलता उसे इससे बचा कर प्रगति पथ पर ला सकती हैयही कारण है कि गन्दे पर्यावर्णीय बालक अच्छे भी देखे गए हैं जबकि अच्छे पर्यावरणं में पले बच्चे भी देखभाल के अभाव में गन्दे हो सकतेहै। यह विगत जन्म के संस्कारों के बलवान् होने का परिवार सकता है । पारिवारिक पयोवरण का भी इस पर प्रभाव को परिवार में लडाई, कलह आदि प्रमादि व्यवहार होता बुराई की और जाना स्वाभाविक है। इसी कारण वैदिक पमादि व्यवहार होता है तो बालक का भीपरिवार में प्रतिदिन संध्या, यज्ञादि करते हुए उसके पर्यात रखा जावे। इसी प्रकार जिस समाज में बालक कार करते हुए उसके पर्यावरण को स्वच्छ में बालक का निवास है, उसका भी अच्छा होना उसके भी उसे अपने पर शिक्षणालयों को सके भावी जीवन की उत्तमता का आधार है। शाला में अपने परिवार का सा वातावरण मिले, इसीलिए वैदिक लियों को कुल कहा गया है। ताकि बालक इसे अपने परिवार आत्मसात् कर गुरु को पिता व सहपाठियों के साथ भाईयों का यवहार करते व प्रेम से रहते हुए शिक्षा प्राप्त करे। यही कारण है न आधुनिक स्कूल भी अपने आप को गुरुकुल कहलवाने में गौरव साव्यव त करने लगे है। अनुभव करने लगे हैं |

      शिक्षा प्राप्ति आरम्भ करते ही बालक को जो प्रक्रियाएं करनी होती थीं, उनमें सर्व प्रथम था आश्रम में निवास करना आश्रम एक कठिन तपस्या का नाम है । इस प्रकार इस में निवास करने के लिए से संकट पूर्ण अवस्था में साधना करते हुए भी हंसते रहने का निर्णय लेना होता था। उसे गुरु के पास जा कर एक बार पुनः ऐसी अवस्था में जाना होता था जैसे जन्म से पूर्व मां के गर्भ में था । अर्थात् अब गुरु आदेश ही उसका सब कुछ है तथा उसी के पालन में ही उसका कल्याण व भावी जीवन का उत्थान है। इस समय वह शिष्य तो है किन्तु क्योंकि गुरु ने उसे अपने में समा लिया है, अपने कुल का भाग बना लिया है, अतः अब गुरुचरणों में बैठ कर उसे ब्रह्म में विचरण करना है। गुरु उपदेश के अनुसार शिक्षा प्राप्त क्रना है गुरू आचार व्यवहार भी सिखाता है, इसलिए उसे आचार्य भी कहते हैं। इस समय शि ष्य समिधा समान है। जैसे समिधा आग के साथ से प्रदीप्त होती है। इसी प्रकार शिष्य भी गुरु से उपदेश पाकर स्वयं को आलौकित करता हैअतः शुरू का पूर्ण विद्वान् होना भी आवश्यक है |

      जहां तक पढाने के विषयों का प्रश्न है, वेदादि शास्त्र तो पढाए भी करे कि बार बालक को करे। जबकि इन दृष्टाः की निगमन पई शिक्षा देते सभः ही जावेंइसके अतिरिक्त गुरु इस बात की जांच की की चि किस विषय में है, उसकी विशेष शिक्षा बालक दृष्टांत देकर पढाना आगमन पद्धति की शिक्षा है जी को जीवन में उतार कर दिखाया जावे तो इसे शिक्षा की कहते हैं। गुरु को चाहिये कि दोनों विधियों को ही शिक्षा प्रयोग करे। इस के अतिरिक्त कई प्रकार की कौशल युक्त शिव देनी चाहियें। इसमें गौ पालन कृषि आदि को रखा जा सकता है |

      वैदिक शिक्षा जीवन को एक निश्चित दिशा देती हैजीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए बालक को समर्थ बनाया जाता । अतः शिक्षा समाप्ति पर आचार्य दीक्षान्त उपदेश देते हुए कहता है। आज से तुम्हारे से यह आशा की जाती है कि तुम सत्य का आचर करोगे, धार्मिक जीवन व्यतीत करते हुए माता पिता की सेवा व बड़ों सम्मान करोगे। यह केवल विदाई के समय ही गुरू नहीं कहता अपि कुल में प्रवेश के समय ही उसने बालक के समक्ष एक निश्चित योजः रखी थी। कुल आवास में रहते हुए उसी योजना से ही शिक्षा दी तथा यहां से पूनः लौटाकर कार्यक्षेत्र में भेजते समय गुरु चेताव स्वरूप पुनः यही उपदेश ही दोहराता है कि जो तुझे समझाया गया है उसका प्रतिक्षण पालन करना । यही जीवन की सफलता का मापदण् होगा।

      वेदारम्भ संस्कार में दण्ड धारण करना, भिक्षा कर भोजः लाना, मेखला धारण करना तथा कौपीन में रहना, यह कुछ आवश्यक विधियां हैं। ब्रह्मचारी के लिए उस युग में दण्ड धारण करना आवश्यक था, क्योंकि जंगली आवास के समय अपनी रक्षार्थ व दूसरों की रक्षा यह सहायक होता था। फिर यह क होता था । नदी नाले पार करते समय भी काम में आता कर यह तो कहा ही गया है कि महान् बनने के लिए पहाडों से न व नदी के तटीय स्थान उत्तम होते हैं । ऐसे ही स्थान में संलग्न व नदी के गरुकुल स्थित होते थे। 

      गरुकला में भिक्षा वृत्ति एक आवश्यक अंग थी। इससे गुरुकुल खर्च का बोझ तो कम होता ही था , बालक में निराभिमानता भी आती थी, झुकने के संस्कार भी मिलते थे। अहंकार का भी नाश होता या। इसमें सभी बालक समान रूप से भिक्षाटन करते थेकहीं कोई भेदभाव नहीं होता था । भिक्षा से प्राप्त सब सामग्री लाकर बालक गुरु चरणों के अर्पण कर देता था। इसी को ही सभी मिलजुल कर ग्रहण करते थे। यह समरसता लाने का एक सुन्दर मार्ग था । अतः वैदिक विधि विधान बालपन से ही उसे समानता का सन्देश देता था । यह उपदेश व्यवहारिक रूप से इसके मस्ति ष्क में डाल दिया जाता थाइसी कारण सभी बालक अपने समय का सदुपयोग करते हुए खूब मेहनत करते हुए शिक्षा प्राप्त करते थे। इस भिक्षा वृत्ति से सरकार या गुरुकुल संचालक पर अर्थका अधिक बोझ नहीं पडता था । आवश्यकताएं सीमित होने से , इसी से ही सब कार्य सिद्ध हो जाते थे। दयानन्द मठ दीनानगर में आज भी दोपहर का भोजन भिक्षा से लाने की प्रथा निर्बाध रूप से चल रही है। लंगोट व मेखला भी इस आश्रम के मुख्य बिन्दु हैं। यह बालक को सदाचारी रखते हुए वीर्यवान् बनाते हैंइससे चुस्ती भी आती है।

      इस विवरण से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि उपनयन संस्कार के साथ ही साथ वेदारम्भ संस्कार भी बालक को गुणवान् व विद्वान् बनाने की दिशा में बढ़ाया गया एक कदम है। इस समय बालक मातृव पितृ गोदी से निकल कर गरु की गोढी में चला जाता है । जहा गुरु बालक को विद्वान् बनने की प्रतिज्ञा लेते हए बालक के लिए कुछ नियम निर्धारित करता है । वहीं बालक भी इस कुल मे अप है। वहीं बालक भी इस कल में अपने निवास केक्षणों में पर्णतया सच्चरित रहते हए पर्ण तन्मयता से एकाग्रचित्हा , पद्य उपदेश के अनुसार अपनी दिनचर्या रखते हुए, सभी सुखा स दूर रहते हुए, तपश्चर्या का जीवन व्यतीत करते हुए, भिक्षाटन से भाजन लाकर सब के साथ समान रूप से उसका उपभोग कर बडे प्रेम पूर्वक मेहनत से सब प्रकार की विद्याओं को प्राप्त करता है।

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