विवाह संस्कार

विवाह संस्कार

डा. अशोक आर्य 

         वैदिक संस्कृति विश्व की महानतम संस्कृति का गौरव प्राप्त कर रही है। इस के समतुल्य कोई अन्य संस्कृति नहीं हैक्षेत्र में वसू ब्रह्मचारी निम्नतम माना गया है। इसे भी का बाइस वर्ष की आयु तक शिक्षार्थ गुरुकुल मे रहना आवश्यक था। ली पश्चात् वह गुरुकुल से वापिस आ करचोबीस वर्ष की आय पर्णा के पश्चात् ही उसका विवाह होता था अतः हमारी संस्कृति में अथवा किशोर विवाह का तो प्रश्न ही नहीं था । जो रुद्र शिक्षा पाने का अभिल षी होता था, वह ३६ वर्ष के बाद तथा इससे भी आगे पढने वाला आदित्य कहलाता था । ऐसा व्यक्ति ४८ वर्ष की आयु में विवाह करता था। इस सब से स्पष्ट पता चलता है कि बाल, किशोर विवाह जैसे विवाह तो उस युग में सोचे भी नहीं जा सकते थे।

      _. आज भारत में आठ प्रकार के विवाह हो रहे हैं यथा बाल विवाह अर्थात् अल्पायु में किया गया विवाह,देव विवाह विशाल यज्ञों के अवसर पर होने वाले विवाह इस श्रेणी में आते हैं । इस में बाहय दिखावा अधिक होता था। आर्ष विवाह में कन्या का पिता एक गाय आदि लेकर कन्या दान करता था, प्राजापात्य विवाह में कोई दिखावा न करते हुए केवल प्रजाति वृद्धि के लिए ही विवाह होता था।, आसुर विवाह में कन्या के पिता को धन देकर विवाह किया जाता है। गन्धर्व विवाह में बिना विवाह परस्पर इच्छा पूर्वक संयोग ही इस श्रेणी में आता है। , राक्षस विवाह किसी से जबरदस्ती कर उठा लाना तथा अपने घर में रख लेना इस प्रकार का विवाह है और पैशाच विवाह में सोती या नशे में धुत हो किसी कन्या को कलंकित करना ही पैशाचता है।

      वैदिक संस्कृति की श्रेष्ठता इसी बात में है कि विवाह एक धार्मिक संस्कार मानती है, जो जीवन में एक ही बार होता हैएक बार हो गया तो आजीवन रहेगा, कभी टूटेगा नहीं। इसका मुख्य उद्देश्य पितृ ऋण के भार से मुक्त होना है। माता पिता ने हमें जन्म दे कर व हमारा पालन कर एक प्रकार से हमें उधार के नीचे दबा दिया । इसे हम आगे सन्तान बढाकर ही चुका सकते हैं, जिसके लिए विवाह आवश्यक है। वैदिक विवाह एक धार्मिक विधि होने के कारण इस में किए जाने वाली विधियों से हमारी धार्मिक नीवं दृढ से भी दृढतर होती चली जाती हैजो भी आगन्तुक हमारे घर आवे, उसका यथोचित सत्कार हो, इस परम्परानुसार घर आए वर का स्वागत स्नानादि करवा आसन देकर, पैर धोकर, हाथ मुंह धुला कर, आचमन व मधुपर्क देकर किया जाता है। इस अवसर पर वर को गोदान दिया जाता है ताकि भावी सन्तान पुष्ट हो । इसके पश्चात् वर के दाएं हाथ में कन्या के माता पिता कन्या का दायां हाथ रखते हुए कन्या दान करते हैं |

      Sihl अब वर भी वधु का सत्कार करते हुए उसे वस्त्राभूषण आदि देता है। भाव यह है कि जिस प्रकार की वस्तुएं कन्या को उपहार में दी गई हैं, वह भी ससुराल में जाकर ऐसी वस्तुएं तैयार करे। इतना होने पर यज्ञ किया जाता है। इसी यज्ञ के समक्ष ही शेष क्रियाएं की जाती है। वसर पर की जाने वाली प्रथम विधि पाणि ग्रहण है। वर बैठी हाथ अपने हाथ में लेता हैहुई वधु के सामने खडा हो झुककर उसका हाथ तथा कहता है कि तेरे सौभाग्य के लिए तेरा हाथ लेता हू, यह मैं नहीं मानो संसार का उत्पादन करने वाली सविता ने तेरा हाथ पकडा है त मेरी धर्म की पत्नी है, मै तेरा पति हूं। तेरा पोषण करना मेरा धर्म है। हमारे साथ सन्तान की उत्पति करते हुए सौ वर्ष तक जीवन व्यतीत कर । पुनः वधू का हाथ पकड क्र अग्नि की प्रदक्षिणा करते हुए सौ वर्ष का का मनस्वी जीवन बिताने वाली हृष्ट पुष्ट सन्तान पैदा करने का संकल्प लेते हैं व पत्थर समान मजबूत रहने की प्रेरणा दी जाती है।

      लाजा होम जिसे फेरेभी कहते हैं, विवाह संस्कारकी एक महत्वपूर्ण किया हैलाजाहोम करते हुए वधु परमात्मा से प्रार्थना करती है कि प्रभु उसे पति कुल से कभी अलग न करे , पति की लम्बी आयु व समृद्ध परिवार की कामना करती है। परस्पर अनुराग व प्रभु के सहायी होने की कामना करती है। इन्हीं भावनाओं के साथ चार फेरे लेते हैंकेवल चोथे फेरे में वधु आगे होती है, शेष तीनो में वर। यह सब समाज के सम्मुख आने के लिए होता है। एक प्रकार की समाज के सामने गवाही होती है। यही रीत्यानुरूप विवाह की स्वीकृति मानी जाती है।

      विवाह संकार में सप्तपदी का भी फेरों के समान ही महत्व हैइसमें पति पत्नी विविध प्रतिज्ञाएं करते हैं यह प्रतिज्ञाएं सखी पारिवारिक जीवन के लिए होती हैं । तदन्तर जीवन पर्यन्त सूर्य से अपनी देखरेख की प्रार्थना की जाती है तथा यह भी प्रार्थना की जाती हैकि हमें सौ वर्षीय आयु प्राप्त हो तथा जीवन पर्यन्त सभी इन्द्रियां ठीक से काम करती रहें। हृदय स्पर्श से भी दोनों एक दूसरे पर आश्रित होते हए एक दूसरे के समीप आते हैं तथा जन समुदाय को भी वधू के दर्शन कराए जाते हैं । ध्रुव व अरुन्धती दर्शन से भी पारिवारिक जीवन मखमय व स्थिर बनाने का निर्णय लिया जाता है

      कहा वादेक विवाह में वास्तव में प्राचीन परम्परा स्वयंवर की रही है। इसका सबसे पुष्ट कारण यह रहा होगा कि इस के होने से आज के प्रेम विवाह की अवस्था से बचा जा सकता है। हमारे आचार्यों ने तो हा है कि विवाह से पूर्व स्त्री पुरुष एक दूसरे को देखे भी नहीं। इसका MAविशेष प्रयोजन यही रहा होगा कि विवाह तक पवित्रता बनी रहेदिक संस्कृति विवाह को एक आवश्यक धार्मिक कर्तव्य मानती है। आज कपेम विवाह में भावना की प्रधानता रहती है। वैदिक संस्कृति कहती है के विवाह के पश्चात् ही प्रेम का आरम्भ होता है, जो जीवन भर चलता । पश्चिम संस्कृति इससे उलट करते हुए पहले प्रेम तथा फिर विवाह मकरने के कारण , उनमें विवाह के पश्चात् साधारणतया कलह का जन्म होता है जो तलाक के रूप में अन्त को प्राप्त होता है। अतः वैदिक केव विवाह ही जीवन का सुखमय बनाने की सीढी है । इस का आदर्श जब्रह्मचर्य से जीवन को तपा कर तथा उच्च शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् वाही विवाह की स्वीकृति होती थी। जब इस प्रकार सुशिक्षित होने पर स्वयंवर से विवाह किया जाता था तो जीवन पर्यन्त न केवल पति पत्नी मैत्री भाव से रहते हुए सुखी होते थे अपितु अपने परिजनों व समाज में भी सुख बांटते रहते थे। उत्तम सन्तान की उत्पत्ति इसी सखा भाव का ही परिणाम होता था। वैदिक संस्कृति में संतति सुधार के जो उपाय दिये ए हैं, वह भी अपने आप में कीर्ति स्थापित करते हैं, उनका अवलम्बन ही तो सन्तान को ऊपर उठाने वाला होता है |

      वैदिक गृहस्थ में स्त्री की स्थिति सदा ही विशेष आदर वाली रही ।इसे घरकी सम्राज्ञी अथवा रानी कहा गया है। वह घर की समाज्ञा कारण सभी प्रकारकी देख रेख व क्रिया व्यवहार उसी के ही कन्धे पर आता है। वह अपनी चतुराई व योग्यता से परिवार को सुखी व खर्गिक बनाती है। वैदिक विवाह वास्तव में अमृत प्राप्त करने के समान हैपति के साथ ब्रह्म का निवास होता है। यह उसके प्रयत्नों का ही परिणाम होता है। इस प्रकार पति पत्नी बडप्पन को प्राप्त करते हैं। अब परार्थ ही उनका मुख्य कर्तव्य बन जाता है। तब ही तो कहा गया है। कि यह तो गृहस्थ ही है जिस पर मानव जीवन के सभी आश्रम टिके हुए हैं तभी तो वह गृहस्थ की आयु पूरी कर वन निवास करते थे | 

      5 वैदिक संस्कृति में सफल गृहरथी उसी को माना गया है जो एक निश्चित आयु के पश्चात् इसे त्याग कर जन कल्याण की भावना को सम्मुख रखते हुए अपने परिवार की सभी व्यवस्था अपने बच्चों कन्धों पर डाल कर अपने शरीर को पुनः तपा कर समाज सेवा के लिए तैयार करने के लिए एक बार फिर जंगलों में आवास कर तथा धर्म ग्रन्थों यथा वेद ,उपनि पदों आदि का पुनः अध्ययन करते हुए अपने आपको संन्यास के लिए तैयार करे। ताकि वह स्थान स्थान पर धूमते हुए जन कल्याण करते हुए खय भी ब्रह्म में विचरण करे। संसार में जहां एकता जीवन है तो भिन्नता या अनेकता मृत्यु का मार्ग है। वैदिक संरकति गृहरथ के माध्यम से अनेकता को समाप्त कर स्थापित करने की प्रेरणा देती हैयह हमें एकता की और ले जीवन के उच्च आदर्शों को प्राप्त कराने का मार्ग खोलती है। ताकी और ले जाते हुएमार्गखोलती है। समरस्ता की और जाने के रास्ते बताती है। इसी का नाम की का नाम वैदिक नाम वैदिक संकृति संकृति ने विवाह का आदर्श कहा हैयदि इसे पाने का प्रयास किया जावेगा तो वैदिक विवाह का आदर्श पाने में निश्चित ही सफलता मिलेगी।

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