वानप्रस्थ संस्कार

वानप्रस्थ संस्कार

डा. अशोक आर्य 

        मानव जीवन भोग और वासना का मिला जुला स्वरूप हैइशोपनिषद् के प्रथम मन्त्र “ईशावास्यं इदं सर्वं…” ने भी इसी और इंगित करते हुए कहा है कि परम पिता परमात्मा ने इस संसार में बहुत कुछ भोग के लिए बनाया हैहे मानव ! तूं इन पर आसक्ति मत कर। इसे त्याग पूर्वक भोग । यह तेरा नहीं है यह सब परमपिता परमात्मा का है। जितना भोग , उतना ही विश्व का कल्याण भी कर। इसी उद्देश्य को सामने रखते हुए ही गृहस्थ के पश्चात् ऋषियों ने वानप्रस्थाश्रम की व्यवस्था की हैगृहस्थ में जो कुछ भोग किया, वासनाएं कीं , उससे शरीर में शिथिलता आ गई। अब यह शरीर इतना बलहीन हो गया है कि जो कुछ ब्रह्मचर्य में अर्जित किया था, वह सब कुछ खो चुका है। अब शक्ति का कोष रिक्त है। इसलिए, इस खजाने को पुनः भरने की आवश्यकता है। यदि खाली खजाने को भरने का प्रयास न किया गया तो शेष जीवन का निर्वाह कैसे हो सकेगा ? अतः गृहस्थ से शक्ति का जो खजाना समाप्त हो चुका है,उसे पुनः अर्जित करने के प्रयास का नाम ही वानप्रस्थ है।

      वानप्रस्थाश्रम माया मोह को त्यागने का अवसर चुके शरीरको पुनः तपा करकुन्दन बनाने का अवसर है, यह अपने आप को पुनः समाज की सेवा के लिए तैयार करने का अवसर आश्रम का अभिप्राय हमारे एक निश्चित उद्देश्य,पडाव अथवा जीवन यात्रा के एक पडाव के रूप में लिया जा सकता हैहम जीवन में एक पडाव पार कर दूसरेव फिर तीसरे पडाव में डेरा डालते हुए निरन्तर आगे बढते चले जाते हैं,किन्तु आज मोह माया के बन्धन जटिल हो गए हैं। इसी कारण हम गृहस्थ रूपी पडाव को छोड़ने को तैयार ही नहीं हो रहे। विश्व की किसी भी धर्मशाला या होटल में दो चार दिन से अधिक रुकने की आज्ञा नहीं है तो फिर गृहस्थ रुपी सराय को एक दिन तो छोडना ही होगा यदि हम इसे हंसते हुए छोड कर वानप्रस्थ हो जावें तो उत्तम है, अन्यथा प्रभु स्वयं हमें धकेल कर यहां से निकाल देगा। यदि हम मान सम्मान से चल दें तो अच्छा अन्यथा आज हो क्या रहा है । घरों में बडे बूढों का अपमान हो रहा है। माता पिता दुःखी कहते हैं हमें उचित सम्मान नहीं मिल रहा सरकार इसी कारण वृद्धाश्रम बना रही है। यहां भी उन्हें आराम नहीं है। हमारे पूर्वजों ने इसी झमेले से बचने के लिए वानप्रस्थाश्रम की व्यवस्था की थी। हो थान पर इसे त्यागने की प्रवृति को पुनः लाना होगा। यदि केराजनेता भी समझें तो एक निश्चित आयु के मोट करदेश के युवको को यह राष्ट्रीय सम्पत्ति मी खींच तान न आने पावेगी, जो वर्ष इसी व्यवस्था को आज के राजनेता भी समोर पश्चात् राज सुख को छोड कर देश के या सौप देवे तो राज सत्ता में ऐसी खींच तान २००७ में हुए राष्ट्रपति के चुनाव में आई है। हम ऐ ही क्यो दे कि हमारी सन्तान हमे घसीट करन .. सब सम्बन्धों को तोड कर संसार से सम्बन्धी आई है। हम ऐसी अवस्था आने कर बाहर फेंके । यह आश्रम अजोडता है। इतने विशाल की तो कहते हैं कि यह मेरा संसारको हमारा परिवार बना देता है। तभी तो नहीं। यही हमारे इस आश्रम का लक्ष्य है |

      पाचीन काल में तो पचास साठ वर्ष की आयु में कोई भी अपने ही में नहीं रहता था इस आयु के होते ही, अपने सभी अधिकार अपनी सुयोग्य सन्तान को सौपकर परिवार का त्याग कर जंगलों में जाकर तप से अपने को तपा कर पुनः कुन्दन बना कर संन्यास आश्रम की तैयारी करता था ताकि उस के संकटों का बखूबी सामना कर सके। अब वहां भोग छोड कर त्याग को अपनाता था ताकि दूसरों को भी निवृति मार्ग का सफलता पूर्वक उपदेश दे सकें |

      हमारे देश की इसी प्राचीन प्रणाली का ही परिणाम था कि यहां उच्चतम शिक्षा भी निशुल्क दी जाती थी। सभी उच्च शिक्षित होते थे तथा इस का ही परिणाम था कि भारत को विश्वगुरु माना जाने लगा था । विश्व के सभी देशों के लोग यहां शिक्षा पाने आते थे। हम विश्व भर में आध्यात्मिकता ही नहीं प्रत्येक क्षेत्र में अग्रणी थेप्राचीन काल से ही गृहस्थ सभी आश्रमों का पालक रहा है। सभी आश्रमों का भरण पोषण गृहस्थ ही करते थे। अन्य किसी भी आश्रम में किसी को भी कोई व्यवसाय करने का अधिकार नहीं थागृहस्थ पलकें बिछाए अतिथि की प्रतिक्षा किया करते थे। अतिथि सत्कार उनका परम धर्म था। वानप्रस्थ लेने के पश्चात् जब तपस्वी का जीवन व्यतीत किया जाता था तो यह गृहस्थी ही थे जो उनके जीवन यापन की प्रसन्नता से व्यवस्था करते थे । यदि ऐसा न होता तो कोई वानप्रस्थ में क्योंकरजाता। वानप्रस्थाश्रम में न जाने से सारा बोझ व्यवसायों व सरकारपरपडता तथा किसी भी नए व्यक्ति को कोई भी व्यवसाय करने का अवसर ही न मिलता | पुराना व्यक्तिस्थान छोडे तो ही नया व्यक्ति उसके व्यवसाय को सम्भाल सके (संसार में अभाव का कारण आज इसी आश्रम व्यवस्था टूटना ही तो है) जीवन में यथेष्ट कमाने के पश्चात् ही वानप्रस्थान मिलता था । अब तो वह अपने जीवन के अनुभव बाटकर संसार कल्याण करता था तथा संसार उसके भरण पोषण की व्यवस्था था। इस से ही उसे आत्म तत्त्व मिलता था। 

      इस आश्रम में आने से जहां भोगवाद की समाप्ति के साथ ही साथ नए लोगों को व्यवसाय मिलने से बेकारी दूर होती थी, वहां जो क छ उन्होंने जीवन में सीखा होता था, उसे अब संसार के नवयुवकों में बांटने का काम करने लगते थे। आज की रिटायारमैंट इस का ही एक रूप कुछ सीमा तक कहा जा सकता है। इस आश्रम में आने पर जंगल वाशी होते हुए तप पूर्वक अपने शरीर में शक्ति संचय करते थे। इनके आश्रम गुरुकुल का रूप ले लेते थे। योग्य शिष्य आकर यहां से शिक्षा पाते थे। जिन के बच्चे यहां शिक्षा पाते थे, वह तो यहां सहायता करते ही थे, जिस से जीवन की अनेक आवश्यकताओं को पूरा किया जाता था किन्तु भोजन की आवश्यकता भिक्षा से ही पूरी की जाती थी। इससे नम्रता की शिक्षा भी मिलती थी । इन स्थानों पर सब को बिना किसी भेदभाव के समान रूप से शिक्षा दी जाती थी , सभी को आश्रम का कार्य भी समान रूप से ही करना होता था तथा सभी को समान रूप से ही भिक्षा के लिए जाना होता थायहां कोई बडे छोटे, ऊंच नीच व राजा रंक का भेदभाव नहीं था । किसी से कोई शुल्क आदि नहीं लिया जाता था। यही कारण था कि उस युग में राजा की और से शिक्षा पर कुछ भी व्यय करने की आवश्यकता नहीं थी तथा समाज के सभी लोग समान रूप से शिक्षा प्राप्त करते थे तथा कोई भी अशिक्षित न था। अत: इय परम्परा को आज पुनः लाने की महती आवश्यक्ता है।

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