सीमन्तोन्नयन संस्कार

सीमन्तोन्नयन संस्कार

डा. अशोक आर्य 

      मानव जीवन में संस्कारों का अति महत्व होने के कारण ही संस्कारी संतान में सब की अभिरुचि होती है। मानव में जन्म से पूर्व ही संस्कार डालने की प्राचीन परम्परा को अनवरत बनाए रखने के लिए महर्षि दयानन्द सरस्वती ने मनुष्य को बार बारसंस्कारित करने के लिए अपने अमर ग्रन्थ संस्कार विधि में सोलह संस्कारों की जो व्यवस्था की है तथा उपदेश किया है कि गर्भावस्था से मृत्यु पर्यन्त कम से कम सोलह बार तो इसे स्मरण दिलाना ही चाहिये कि हे मनुष्य ! तूं ने अच्छा बनना है। इतना ही नहीं पूरे संसार को भी अच्छा बनाने का कर्तव्य समाज ने उसी के कन्धों पर ही डाला हैअतः उत्तम संस्कारों को ग्रहण करते हुए वह संसार के अन्य लोगों को भी सुपथ पर लाने के लिए कार्य करे, यह भी सुसंस्कारी होने का एक भाग है |

       महर्षि दयानन्द सरस्वती ने जिन सोलह संस्कारों का विधान मानव जीवन में किया है , उनमें से तीन संस्कार जन्म से पूर्व गर्भा वस्था में होते हैं तथा शेष तेरह संस्कार जन्म के पश्चात् होते हैं । जो तीन संस्कार मानव के जन्म से पूर्व गर्भावस्था में होते हैं ,उनमें सीमन्तोन्नयन संस्कार तृतीय व गर्भावस्था में अन्तिम संस्कार हैइस संस्कारको सीमन्तोन्नयन संस्कार इस लिए कहते हैं क्योंकि यह ना है अर्थात् यह या में शिशु की अन्तिम सीमा का सरकार होता है विस्था की सीमा तथा जन्म की सीमा के मध्य का संस्कार होता है | 

      इससे पूर्व पुंसवन संस्कार में शारीरिक वृद्धि के अनुरूपः आगरकी कामना करते हुए गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य को पुष्टि देने की कामना व प्रयास किया गया है। यह पुष्टि तभी ही किसी उपयोग की होती है जब इस को दिशा देने वाला मरित ष्क भी सबल हो। सीमन्तोन्नयन संस्कार का उद्देश्य मनोवेगों को शक्ति प्रदान करना है। यह मानसिक विकास की कामना के लिए किया जाता है। अतः शारीरिक पुष्टि के पश्चात् गर्भस्थ शिशु की मानसिक पुष्टि ही इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है| 

      सुश्रुत के अनुसार मानव का शिर पांच संधियों का केन्द्र स्थान है। यदि थोडी सी असावधानी हो जावे तथा किसी कारण गर्भस्थ शिशु पर चोट लगने से , पागलपन, डर या भय होने से अथवा चेष्टा विहीन होने से उस का स्वास्थ्य सही नहीं रहता तथा इस अवस्था में मृत्यु भी हो जाती है। सिर में जो पांच संधियां होती हैं, उनका केन्द्र स्थान होने से , उनका सीमा स्थान होने से उसे “ सीमन्त भी कहते हैं। क्यापि इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य गर्भस्थ शिशु की मनन प्रक्रिया बढाना होती है इसका मानसिक विकास करना होता है । सीमन्त मस्ति ष्क को ऊपर उठाना होता है। इसलिए इस नामकरण भी “सीमन्तोन्नयन” नाम से किया गया है। अतः उपयुवा व्याख्या के सन्दर्भ में सीमन्तोन्नयन सरकार से अभिप्रायः संस्कार,जिससे माता का ध्यान अपनी गर्भस्थ संतान के मानसिक के विकास में लगे। 

      महर्षि दयानन्द सरस्वती ने संस्कार विधि में पारिवारिक प्रेम का प्रदर्शन करने की विधि दी है। महर्षि का मानना है कि यदि परिवार में पति व पत्नि प्रेम पूर्वक व प्रसन्न रहेंगे तो , उनकी भावी सन्तान भी सब को प्रेम बांटने वाली तथा सदा प्रसन्नचित्त रहने वाली होगी। अतः इस अवसरपर परिवार के मुखिया पति व पत्नि सदा प्रेम बांटते हए सदा प्रसन्न मुद्रा में रहते हुए अपनी गर्भस्थ सन्तान के मानसिकविकास पर अपना ध्यान केन्द्रित किये रहें क्योंकि मानसिक विकास ही सभी उन्नतियों का आधार है। माता पिता अपनी सन्तान को जैसा बनाना चाहते हैं, ठीक वैसा व्यवहार उन्हें एक दूसरे से करना चाहिये तथा ठीक वैसा वातावरण अपने चारों और बनाना होगा । वैसी कथाएं सुनाना तथा वैसे चित्र अपने कमरे में लगाना भी इस कार्य के लिए सहयोगी होगा ! यही वह अवसर है जिसे कभी खोने नहीं देना चाहिये । यदि यह अवसरहाथ से निकल गया तो जन्म लेने के पश्चात् उसके पिछले संस्कारों को बदलना सम्भव न होगासभी अच्छे या बुरे वातावरण का प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर पडना अवश्यम्भावी है। अतः अपने आप को साफ सुधरेवातावरण में , साधु संगति में तथा वीरोचित्त कथाओं के श्रवण व दर्शन में लगाना ही उचित है। नारी की इस अवस्था को दोहद कहा जाता है क्यों कि गर्भवती का एक हृदय तो अपना होता है तथा दूसरा गर्भस्थ शिशु का , जिसके संचालन व निर्माण का कार्य भी उसे ही करना होता है। अतः वह इस समय दो हृदयों वाली होती हैइस अवसर पर बालक के हृदय के धडकन की आवाज भी सुनाई देने लगती है। इस समय माता से सन्तान जूडी होती है। अतः क रक्त से ही उसका पोषण हो रहा होता है। इस समय माता में आ का जागृति होती है। यह इच्छाएंसन्तान से ही सम्बन्धित अनक इच्छाओं की जागृति होती है| यह इच्छाए संतान से ही सम्बंधित होती हैं। इस अवस्था में ही नहीं, जब शिशजन आदि खाने की रहती है। हो रही है, जिसे पूरा या में ही नहीं , जब शिशु जन्म ले लेता है तथा मांकन पपीता है तब भी मां की अभिला षा चाक आदि खानेकी इसका कारण है कि उसमें कैल्श्यिम की कमी हो रही है करने के लिए वह ऐसी वस्तुएखाने लगती है। इस अव बच्चे दोनों को ही कैल्शियम की दवा देनी चाहिये।

      चतर्थ माह में माता को अपनी गर्भस्थ सन्तान को अपने संस्कार देते हुए उसे पूर्व जन्म के संस्कारों से विमुख करना होता है। सन्तान के पूर्व जन्म के धुंधले संस्कार न केवल बालक को ही बल्कि उसकी गर्भवती माता को भी प्रभावित करने लगते हैं। यही वह अवसर होता है कि माता इस पर अपनी छाप अंकित करे। यदि इस समय माता अपने प्रबल संस्कार उस पर डालेगी तो इसके विगत संस्कारों की प्रबलता मन्द हो जावेगीअतः इस अवसर पर माता को चेष्टा पूर्वक वह सभी कथाएंसुननी चाहिये व वह सब दृश्य देखने चाहिये, जैसा वह अपनी भावी सन्तान को बनाना चाहती है। यह वही अवसर है जब वीर अभिमन्यु के समान गर्भ में शिक्षा प्राप्त की जा सकती है। यह अवसर ऐसा है, जिसका सदुपयोग माता अपनी सन्तान के निर्माण के लिए कर सकती है। यही वह अवसर है जिसमें नव मानव का कार्य किया जा सकता हैधर्म परायण व देशभक्त , मातृ पितृ भक्त सन्तान बनाने का यह ही अवसर है। इसे खोना अपने आपको विपत्तियों में डालने के समान हैयह वैदिक संस्कृति ही है, जिसमें गर्भ से पूर्व ही संस्कारों से मानव के नव निर्माण की योजना बनाई गई है। विश्व की अन्य किसी भी संस्कृति में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है |  

      मानव निमोण का ही एक अन्य पक्ष भी इस सरकार इस संस्कार के अन्तिम चरण में किया जाता है। जब संस्कार विधि मे दर्शाई विधि के अनुसार संस्कार सम्पन्न हो जाता है तो अन्त में कुछ घी आदि बच जाते हैं। इन पदार्थों में गर्भवती महिला अपना प्रतिबिम्ब देखती है तथा इस अवसर पर पति पत्नी का एक वार्तालाप होता है। यह वार्तालाप ही गर्भस्थ सन्तान के भवि ष्य निर्माण का मुख्य साधन बनता है। महर्षि ने संस्कार विधि में इस अवसर पर पति के मुख से कहलवाया है कि हे सौभाव्ये ! तुम इसमें क्या देख रही हो। देखें इस अवसर पर महर्षि ने गर्भवती महिला के मुख से कितने सुन्दर शब्द निकलवाए हैं। यह शब्द ही गर्भस्थ शिशु के भावी जीवन का निर्माण करने वाले है। 

      पति के प्रश्न को सुनकर पत्नी उत्तर देती है कि इसमें मैं अपनी सन्तान को देख रही हूं, जो ऐसे ही पौष्टिकता प्राप्त कर रही है। मैं अपने घर में दुधारू पशुओं को देख रही हूँ, जिन के दूध के उपभोग स ‘मेरी सन्तान का शारीरिक व मानसिक विकास होता हुआ मुझे स्पष्ट दिखाई दे रहा है। इसके साथ ही साथ मैं इसमें अपने घर में उमड रहे सौभाग्य को देख रही हूं,जिस में धनैश्वर्ष की व र्षा हो रही है। इस के कारण सर्वत्र सुख ही सुख दिखाई दे रहा है। इतना ही नहीं इस घी खिचडी आदि में मैं अपने पति की लम्बी आय के भी दर्शन कर रही हूँमेरी सुसस्कारी सन्तान जब गौ आदि पशुओं के दूध व घी से तृप्त होगी व सब और सौभाग्य ही सौभाग्य होगा तो इसकी प्रसन्नता से हामारे परिजनों की लम्बी आयु निश्चित रूप से होगी , यह सब वह गर्भवती महिला इस समय देख रही है | 

      यह वह अवसर है कि माता की प्रत्येक गतिविधि का केन्द्र उसके गर्भ में पल रही सन्तान है। जब उसका रंग प्रति क्षण इसी प्रकार रंगा होगा तो निश्चित ही सीमन्तोन्नयन संस्कार का उद्देश्य पूर्ण हो रहा होगा । इस संस्कार का उद्देश्य माता के मन व मस्ति ष्क को इन विचारों से भर देना है कि जिससे उसे प्रति क्षण अपनी प्रत्येक गतिविधि में अपनी सन्तान का सुख दिखाई दे ,प्रत्येक क्षण दुधारू पशुओं के दर्शन हों ताकि उसके दूध आदि से परिवार व गर्भस्थ सन्तान को पुष्टि मिलती रहे । सर्वत्र उसे सौभाग्य दिखाई दे । धन ऐश्वर्ष दिखाई दे। इसके उपभोग से भावी सन्तान व परिवार की समृद्धि की वृद्धि हो सके तथा पति व परिजनों की दीर्घायु की प्रतिक्षण इच्छा हो तो निश्चित ही उसके गर्भ में पल रही सन्तान शिव संकल्प वाली होगी | हृष्ट पुष्ट होगी , मननशील व दृढ संकल्प होगी। जब सन्तान ऐसी आज्ञाकारी व सुखकारी होगी तो पूरा परिवार सुखी होगा। उसका नाम दूर दूर तक पहँच जावेगा । इस प्रसिद्धि के कारण परिवार के सदस्यों की प्रसन्नता ही उनकी लम्बी आयु का कारण बनेगी तथा सीमन्तोन्नयन संस्कार के करने का उद्देश्य सफल होगा।

जातकर्म संस्कार

जातकर्म संस्कार

डा. अशोक आर्य 

       यह संस्कार मानव जीवन का जन्मोत्तर संस्कार है। शिशु के जन्म के पश्चात् किया जाने वाला प्रथम संस्कार होने के कारण यह जातकर्म संस्कार है। इस संस्कार में शिशु की जाति का निर्धारण नहीं होता क्योंकि जाति का निर्धारण तो जन्म के साथ ही मनुष्य जाति के रूप में हो गया है। जातकर्म तो कुछ क्रियाओं का नाम है। यह क्रियाएं दो प्रकार की होती हैं। प्रथम वह जिन का शरीर व इन्द्रियों की सफाई से सम्बन्ध होता है। इन्हें कर्म कह सकते हैं तथा दूसरी वह जिन से शिशु को संस्कार देने होते हैं।

    १.जन्म लेने पर किये जाने वाले कर्म ” सफाई “ “

      जन्म से पूर्व गर्भावस्था में बच्चे के रहने का वातावरण जन्म के पश्चात् के वातावरण से पूर्णतया भिन्न होता है । जन्म पूर्व उस की सारी क्रियाएँ माता के माध्यम से होती हैं। इस समय वह पानी से भरी एक थैली में रहता है। बच्चे के नाक, कान , मुंह, आंख आदि श्लेष्मा से बन्द किये रहते हैं ताकि उसके इन अंगों में पानी न चला जाए। जन्म लेते ही जो प्रथम कर्म किया जाता है, वह है इन अंगों की सफाई जब तक इन अंगों की सफाई न की जाए ,तब तक यह अंग क्रियाशील गहा होते अतः इनकी सफाई करके इन्हें खोला जाता है तथा कान में श्रवण शक्ति आरम्भ हो ,इसलिए कान के पास पत्थरों को टकरा करी आवाज की जाती है। इस समय बच्चे को कय “उल्टी” करवा कर उस नाक व फेफडे भी साफ किये जाते हैं। इस हेतु सैंधव नमक घी में मिलाकर दिया जाता है। बच्चे के शरीर पर से थैली के दूषित पानी के लेवा का प्रभाव समाप्त करने के लिए साबुन के साथ उसे गुनगुने पानी से नहलाया जाता है। अब कान के पास पत्थर से आवाज करके कानों को सुनने की क्षमता दी जाती है। इस प्रकार शिशु की इन्द्रियों को सजग करना या इन्हें प्रयोग के लायक बनाना ही जातकर्म है |

      हावा यह सब क्रियाएं करने के पश्चात् सिरपर घी से स्निग्ध कियाकपडा या रूई रखी जाती है। यह इस लिए कि यहां सिर की तीन अस्थियों के सन्धि स्थान पर तालु होता है। यही वह स्थान है जहां से बच्चे के स्वस्थ होने का पता चलता है। इसे दृढ करने के लिए ही यहल घी युक्त रूई रखी जाती है। यह इसकी रक्षा भी करता है तथा इसेजना पोषण भी देता है। इससे सर्दी आदि से भी रक्षा होती है। इसी प्रकार घी व मधु ( विषम भाग ) को सोने की श्लाका से जिह्वा पर “ओ३म् लिखने का आदेश दिया है। मधु व घी तो उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करता हैतथा भोजन की प्रेरणा देता है। जबकि ओ३म् प्रभु के स्मरण व आशीर्व द स्वरूप लिखा जाता है। जो उसे अध्यात्म के मार्ग पर चलने का द्योतक है |

    २. जन्म के समय के संस्कार

        ऊपर हमने बताया है कि जन्म लेते ही उसकी पांचों इन्द्रियों को साफ करके इन्हें ठीक से कार्य करने के योग्य बनाया जाता है तथा उर भोजन करना चाहिये ताकि स्वस्थ रह राके, इसका परिचय भी उसे दिया जाता है। अब इसे ऐरो संस्कार देने हैं कि वह जीवन पर्यन्त उन्हीं को सम्मुख रख अपने जीवन को एक निश्चित दिशा में चला सके। माता पिता व सन्तान , यह दोनों पक्ष आपसी व्यवहार से सरकार की किया करते हैं। माता पिता बालक की जिहा पर ओम लिख कर यह जिम्मेवारी लेते हैं कि वह अपनी सन्तान को ईश्वरीय “आध्यात्मिक मार्ग पर चलाएगा । बच्चा भी कुछ बड़ा होकर अपने माता पिता की आकांक्षाओं को पूर्ण करने का प्रयास करेगा। यह सरकार उसे ऊंचे से ऊंचा उठाने के लिए है।

      बालक का अध्यात्म की तरफ झुकाव तभी होगा जब उसमें एगे विचार भी होंगे। इसलिए बालक केकान में पिता कहता है “वेदोऽसीति” अर्थात् हे बालक ! तू ज्ञान वाला प्राणी है। जो बात कान में कही जाती है उसका महत्त्व अधिक होता है। अतः बालक जीवन पर्यन्त इस बात को स्मरण रखता है कि उसे ज्ञानी बनने का उपदेश पिता ने दिया है कि में मेहनत कर के पिता की आकांक्षाओं पर खरा उतरूंगा। इस से मौज मस्ती के साथ ही साथ आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करते हुए यथार्थ में विचरण करने की प्रेरणा दी गई है |

      इस प्रकार न केवल जन्म से पूर्व अपितु जन्म लेने के पश्चात् भी आजीवन उसे स्मरण दिलाया जाता है विभिन्न संस्कारों के माध्यम से कि उसने ऊंचे वैदिक आदर्शों को प्राप्त करने के लिए, दूसरों की सहायता व मार्ग दर्शन देने के लिए उच्च वैदिक ज्ञान को प्राप्त करना इससे इसका अपना कल्याण तो होगा ही, अन्य भी इससे लाभान्वित हाग।

उपनयन संस्कार

उपनयन संस्कार

डा. अशोक आर्य 

       इस संस्कार को वेदारम्भ संस्कार भी कहते हैं। यद्यपि वेदार संस्कार गुरुकुल में किया जाता है किन्तु गुरुकुल जाने से पूर्व पित निवास पर वेदारम्भ हेतु ही उपनयन किया जाता है। इस कारण ही इसे वेदारम्भ संस्कार भी कह देते हैं । बालक को शिक्षा प्राप्ती हेत विद्यालय में भेजने से पूर्व जो संस्कार किया जाता है , उसे उपनयन संस्कार कहते हैं। परमपिता परमात्मा ने बालक को जन्म से ही आंख तथा इससे देखने की शक्ति दी है। ताकि वह सांगारिक सुख प्राप्त कर सके। मनुष्य को प्रभु ने मस्ति ष्क भी दिया है। जिससे वह ज्ञान अर्जन कर सके। इसी ज्ञान की प्राप्ति के लिए जब बाल अवस्था में उसे गुरुकुल में प्रवेश दिलाया जाता था तो पहले उसका उपनयन संस्कार किया जाता था। यह ही शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार का प्रमाण पत्र होता था। ऐसे बालक को द्विज के नाम से पुकारा जाता था। इस द्विज शब्द का अर्थ है दूसरा जन्म । माता पिता के माध्यम से बालक का जन्म, प्रथम जन्म माना जाता है किन्तु जब इस संस्कारकेमाध्यम से बालक ब्रह्मचर्य के तप में तपते हुए उच्च से उच्च शिक्षा प्राप्ति के लिए निकलता है तो इसे दूसरा जन्म कहते हैं। मनु महाराज तो मानते हैं कि जन्म से सभी शुद्र होते हैं। यह तो संस्कार ही हैं जो उसे अज्ञानता से निकाल कर उन्नति केमार्ग पर ले जा कर द्विज बना कर वेदाध्ययन अधि – कारी बनाते हैंअतः अब तकजो जिम्मेवारी मानव केनवनिर्मा ण की माता पिता अपने कन्धों पर उठाए हुए थे, उसे आचार्य के हाथों सौंपने का नाम ही उपनयन संरकार है |

      इस सरकार के अवसर पर बालक को तीन रात्रों वाला धागा पहनाया जाता है , जिसे यज्ञोपवीत या जनेऊ कहते हैं । इस सूत्र को महर्षि के मतानुसार लिखा है कि जिन बच्चों को शीघ्र शिक्षा देनी हो तथा बच्चे में भी एतदर्थ सामर्थ्य हो, ऐसे ब्राह्मण पुत्र को जन्म अथवा गर्भ से पांचवें वर्ष , क्षत्रिय की सन्तान को छठे वर्ष तथा वैश्य सन्तान को आठवें वर्ष यज्ञोपवीत संस्कार कर विद्या प्राप्ति का अधिकार दे देना चाहिये । आज इस संस्कारों की परम्परा कम होते हुए भी, जिन का यह संस्कार नहीं हुआ होता ,विवाह पूर्व एक परम्परा स्वरूप यह संस्कार किया जाता है।

      जीवन के आरम्भिक व षों में शिशु को घर पर रखते हुए माता पिता के लिए जो सम्भव था, वह बालक को सिखाया, अब वह इस बालक को किसी विषय के विशेषज्ञ को सौंप रहे हैं, इसी समर्पण का नाम ही उपनयन संस्कार है। यदि किसी बालक का प्राचीन युग में इस निश्चित समय सीमा में यह संस्कार नहीं होता था तो लोग पूछते थे कि इस बालक का उपनयन संस्कार क्यों नहीं किया जा रहा ? क्या वह मुर्ख तो नहीं ? आदि । यहां यह भी उल्लेखनीय है कि प्राचीन काल में यज्ञोपवीत के सूत्र कपडों के ऊपर पहनने की पारम्परा थी। पारसी व रोमन तो आज भी इसे कपडों के ऊपर ही पहनते हैं। पारसियों का कुस्ती तथा रोमन पादरियों का कोट पर बंधा पटा इसी का ही एक रूप है।

      यज्ञोपवीत धारी को बडी प्रतिष्ठा की दृष्टि से देखा जाता इसी प्रतिष्ठा की प्राप्ति के लिए सभी माता पिता अपने बच्चों का संस्कार अवश्य ही करवाते थे। यही संस्कार पारसियों में गया तो कहा गया कि जो कुस्ती को धारण नहीं करता , उसे मृत्यु दण्ड कि जावे। दोनों समुदायों में इस अवसर पर जो मन्त्र बोला जाता है. दोही का अर्थ भी एक जैसा ही हैवैदिक संस्कृति के इस उपनयन संस्कार का प्रभाव जहां पारसियों व रोमन लोगों में दिखाई देता है. वही मुसलमानों ने भी इसे कुछ रूप में आज भी अपना रखा है। हमारे गायत्री मन्त्र की ही भाँति बालक को मुसलमान बिस्मिल्ला पढने के लिए कहते हैं । इसी प्रकार ईसाई भी बप्तिस्मा अर्थात् पुनरुत्पत्ति का सन्देश देते हैं। यह भी तो उपनयन संस्कार ही है |

      हमारे आचार्यों ने उप का अर्थ समीप तथा नयन का अर्थ ले जाना किया है। जब माता पिता अपने बालक को गुरु के समीप ले जा कर उसे शिक्षा देने की याचना करते हैं तो उस उपनयन कहा जाता है। इस अवसर पर गुरु बालक के चित्त व हृदय अर्थात् इन दोनों निधियों को ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित करने का कर्तव्य अपने ऊपर लेता है। ऐसे शिष्य को अन्तेवासी कहा गया है। इस से भाव है कि जो गुरु के अन्दर बसा हुआ हो। यह सामिप्य ही इसे उत्तम शिक्षा प्राप्ति का साधन देता है। अब गुरु बालक की ठीक उसी प्रकार देखभाल करता है, जिस प्रकार गर्भ काल में माता करती है। इससे उत्तम कोई अन्य उद्धरण नहीं हो सकता |

       काम हम जो यज्ञोपवीत के तीन सूत्र पहनते हैं, यह हमें हमार कर्तव्यों या तीन ऋणों के सूचक हैं। यह हैं ऋषिऋण , पित गर्षण , पितऋण तथा ; बार यह ही ब्रह्मचये, गृहस्थ व वानप्रस्थ ,तीनों आश्रमों का बोध है। जब हम इन तीनों क्रणों से उक्रण हो जाते हैं तो यज्ञोपवीत वारयज्ञाग्नि में डालकर संन्यास ले कर जनकल्याण में जुट जाते दस प्रकार यज्ञोपवीत के माध्यम से हम प्रथम तार का यह भाव पारण करते हैं कि हमारे पूर्वजों ने जिस प्रकार ज्ञान का भण्डार एकत्र कर हमें दिया है, वह क्रण स्वरूप हमारे पास है। हम भी इसी प्रकार ज्ञान का संकलन कर इसे आगे बांटेंगे। यही ब्रह्मचर्य आश्रम है , यही ऋषि ऋण उतारने की विधि है। इसका दूसरा तार हमें माता पिता के कण को उतारने की प्रेरणा दे रहा है। भाव यह है कि जिस प्रकार माता पिता ने गृहस्थ करके सन्तानोन्पत्ति से संसार को आगे बढाया है, उसी प्रकार शिक्षा प्राप्त कर हम भी गृहस्थ के माध्यम से समाज का उपकार करते हुए संसार को आगे बढाने का प्रयास करेंगे। इस का तीसरा तार हमें देव क्रण से भी मुक्त होने के लिए प्रयास करने की प्रेरणा दे रहा है। जिस प्रकार हमारे माता पिता ने ग्रहस्थ केपश्चात् वाणप्रस्थ ग्रहण कर समाज के उपकार व सेवा की प्रतिज्ञा ली , वैसे ही हम निश्चित समय आने पर ग्रहस्थ त्याग वानप्रस्थ लेकर तीसरे क्रण को भी उतारेंगे।

      का यहां यह बात भी वर्णनीय है कि वैदिक समाज व्यवस्था में पुरुष व स्त्री को सभी कर्तव्य समान रूप से करने का आदेश दिया गया हैइसलिए कन्याओं को भी पुरुषों के ही समान यज्ञोपवीत पहनने का अधिकार है। प्राचीन काल में कन्याएं भी इसे धारण कर गुरुकुलों में शिक्षा पाने जाती थीं। गार्गी, मैत्रेयी जैसी विदुषियां इसी का ही सुन्दर उदाहरण हैं। इसी प्रकार प्राचीन काल में पुरुषों के ही समान कन्याओ का भी वेद पढने का समान अवसर प्राप्त था । २५ [ समान अवसर प्राप्त था। इस विषय में महर्षि दयानन्द सरस्वती ने अथर्ववेद के उदाहरण देते हुए लिखा है भाव है कि कन्या ब्रह्मचारी रहकर युवा पति को प्राप्त होती हैउपनयन संस्कार से ही सम्भव है। अनेक स्थानों पर कई मन के पढने के आदेश हैं । वह इन्हें कैसे पढेगी ? तभी जब डलर वेदाध्ययन किया होगा । कई वेदमन्त्रों की स्त्री ऋषिकाएं भी हुई सरमा,अपाला जैसी अनेक महिलाओं ने वेद के गूढ रहस्यों को खोल हैआज तो हम देख रहे हैं कि शिक्षा के क्षेत्र में स्त्री पुरूषों से भी आगे निकल रही हैं। अतः एतदर्थ अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं रह जाती।

      इस अवसर पर उपनयन के इच्छुक बालक कई विधियां करते हैं , जिन को उपमा स्वरूप व प्रतिज्ञा स्वरूप किया जाता है । पितृ उपदेश भी इसी समय लिया जाता है। वदारम्भ हेतु उपनयन के अवसर पर गुरुकुल भेजते समय पिता अपने बालक को बाइस प्रकार के उपदेश व आदेश देता है। इनमें वह कहता है कि हे पुत्र ! अब तूने ब्रह्म विचरण करना है। इस समय जल का खूब प्रयोग करना तथा सदा शीतल रहना । सदा विद्याभ्यास में लगे रहना, इस हेतू दिन में कभी मत सोना,दिन में काम में व्यस्त रहना , अपने आचार्य की आज्ञा में अपने आप को रखना , वेदों का नियम पूर्वक अध्ययन करना ,यह भी ध्यान रहे कि आचार्य यदि कोई गल्त आज्ञा दे तो उसका पालन कभी मत करना , हां ! कभी क्रोध न करना व झूठ, गन्दे व कुटिल व्यवहार सदा बचकर रहना ,मैथुन से बचते हुए भूमि शयन करना। बजाने व सौन्दर्य प्रसाधनों का कभी प्रयोग मत करना , प्रातःक नित्यकर्म से निवृत होना , अपनी सजावट के लिए उस्तरे आदि का प्रयोग न करना , मांस , मदिरा व सूखे अन्न का सेवन का सेवन न करना तपस्या में व्यवधान न आने देते हुए बैल, घोडे, ऊंट आदि तथा तमान युग में गाडी, बस आदि सवारी का प्रयोग न करना, गुरुकुल समार्जन काल में गांव में निवास न करना तथा कभी जुता व छाता का योग न करना , अकारण उपस्थेन्द्रिय को मत छना , उर्ध्वरेता बनना, शारीर की शोभा को बढाने वाले पदार्थों के प्रयोग से वर्जित करते हुए कहा है कि तैलादि से शरीर को मत चुपडना ,खाद के लिए मिर्च, मसाले आदि मत खाना.आहार विहार की नियमितता का ध्यान रखते हए वेदाध्ययन करना, सभ्यता सीखते हुए, कम बोलते हुए सुशील बनने का प्रयास करना तथा दण्ड व मेखला धारण किये रखना, भिक्षा चर्या करना, संध्या व यज्ञादि में प्रमाद मत करना, स्नान. आचार्य के प्रति सम्मान, विद्या का संग्रह, जितेन्द्रिय व्रत में रहते हुए सभी प्रकार से धर्म का पालन करना । ऐसा सुन्दर पित आदेश वैदिक संस्कृति के अतिरिक्त कहां मिलेगा।

      इस अवसर पर प्रायः बालक इस प्रकार प्रतिज्ञा करता है कि यह जो उापनयन संस्कार के माध्यम से में ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रवेश कर रहा हूं. उसके अनुरूप गुरु के प्रत्येक उत्तम आदेश को शिरोधार्य करते हुए उच्च से उच्च शिक्षा प्राप्त कर ग्रहस्थ में जा कर समाज की प्रगति करते हुए वानप्रस्थ को ग्रहण करूंगा तथा इस अवसर पर समाज को दिशा दूंगा । इस ढंग से मेरे ऊपर जो तीन प्रकार के क्रण हैं,उन्हें मैं अपनी मेहनत से दूर करने का प्रयास आजीवन करता रहूंगा तथा इन से उक्रण हो कर ही रहूंगा | 

      इस से स्पष्ट होता है कि मानव जीवन के जिन सोलह संस्कारों के प्रथम नौ सस्कारों के पश्चात् बालक इस अवस्था में आ गया है कि वह ससारका उपकार करने के लिए अपन हीक्षा लेनी होगी। पूर्ण ब्रह्म में रनकलिए अपने आप को तैयार कर सका तयारा शिक्षा प्राप्ति से ही सम्भव हैशिक्षा प्राप्ति की प्र परम्परा है कि इस हेत उपनयन की दीक्षा लेनी होगी पूर्ण ना आचरण करते हुए इस का व्रत लेना होगायज्ञोपवीत के तीन तारा सन्देश के अनुसार उत्तम शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात् गृहस्थ म प्रवेश कर संसार से अज्ञान . अन्याय व अभाव को दूर करने का खूब परिश्रम करना होगा तथा इस के पूर्ण होने पर सभी सुख सुविधाओं को त्याग कर फिर से शरीर में ब्रह्मचारी का सा तेज पैदा क्रने के लिए वाणप्रस्थ आश्रम में जाकर पुनः शरीर को तपा कर परोपकार के लिए तैयार करना होगा। यही उपनयन का भाव है, यही उपनयन का सन्देश है तथा यही उपनयन का कर्तव्य है।

समावर्तन संस्कार

समावर्तन संस्कार

डा. अशोक आर्य 

       महर्षि दयानन्द जी ने जिन सोलह संस्कार करने का उपदेश अपने अमर ग्रन्थ संस्कार विधि में दिया है, उनमें से गयारह संस्कार एक के बाद एक करते हुए केवल आठ वर्ष की आयु में ही सम्पन्न हो जाते हैंमानव इस आठ वर्षीय आयु तक ही नवीन संस्कार तेजी से ग्रहण करने की शक्ति रखता है, इस कारण एक के बाद एक आठ वर्ष की आयु तक निरन्तर संस्कारी वातावरण में ही रहता है तथा मात्र आठ वर्ष में गयारह संस्कार पूर्ण हो जाते हैं । वेदारम्भ संस्कार के पश्चात् एक लम्बा विराम दिया जाता है ताकि वह अब वैचारिक संस्कारों के स्थान पर शैक्षिक विचार प्राप्त करने के लिए तपस्वी का जीवन व्यतीत करे। शिक्षा प्राप्ति के लिए उसे लम्बा समय लगाना होता हैमहर्षि ने इसे कम से कम चोदह वर्ष लिखा है। अतः वेदारम्भ संस्कार के पश्चात् जो आगामी संस्कार आता है वह कम से कम चौदह वर्ष के पश्चात् आता है। यदि कोई इससे आगे भी शिक्षा चाहे तो छतीस वर्ष व इससे आगे भी शिक्षा प्राप्त करना चाहे तो इसके लिए अडतीस वर्ष की आयु इस संस्कार के लिए लिखी है ,किन्तु सामान्यतया यह संस्कार बाइस वर्ष की आयु में ही होता है। जिस प्रकार उपनयन व वेदारम्भ संस्कार एक दूसरे के पूरक हैं, उसी प्रकार समावर्तन संस्कार तथा विवाह संस्कार भी एक दूसरे के पूरक हैं|

      जिस प्रकार गुरुकुल भेजने से पूर्व उपनयन संस्कार के अवसर पर पिता अपनी सन्तान को कठोर जीवन यापन करते हुए, गुरू आझ में विद्यार्जन के लिए लम्बा उपदेश देता है। इसी प्रकार शिक्षा पूर्ण का अपने पितृ गृह में लौटने वाले बालक को , जिसने जाकर गृहस्थ क जीवन व्यतीत करना होता है, आचार्य एक दीक्षान्त उपदेश देता है। इस उपदेश में जीवन की आगामी योजना बताई जाती है। इसे ही समाव न संस्कार के रूप में जाना जाता है |

      ___प्रथम उपदेश होता है कि भावी जीवन में कई प्रकारकी कठिनाइ व लोभ दिये जायेंगे किन्तु तूं ने कभी भी सत्य का पल्ला नहीं छोडन अन्त में सत्य ही विजयी होता है। सदा धर्म पर आचरण करना । ध पर आचरण करने वाला सभी संकटों को बडी सरलता से पारक लेता है। स्वाध्याय में कभी प्रमाद मत करना । स्वाध्याय से तेरी विछ की धाक जमी रहेगी तथा अपने किये कार्यों का अध्ययन करने से अप कमियों को दूर करने में सहायता मिलेगीतूं जिस प्रकार आचार्य व में आया था तथा शिक्षा प्राप्त कर जा रहा है , उसी प्रकार जाव सन्तान तैयार कर उसे भी शिक्षार्थ आचार्य कुल में भेज कर डास । की वृद्धि करना । यही ही आचार्य को दिया जाने वाला प्रिय धन है। व धर्म पर स्थित रहते हुए इसे बढाने में कभी प्रमाद मत करना – स्वाध्याय करते रहना तथा इसे प्रवचन द्वारा दूसरों में बांटते ही प्राप्त करना । अपने से ज्ञान में बडों ( देवों), अपने से आय में पितर), उनके अनुभव तुम्हारे से अधिक होने के कारण, उनके चलना. उनका आदर करना। अपने माता का आदर करना गुरु जनों का आदर करना तथा जो अतिथि घर में ना. जो माननीय हों या सर्वहित के हो । बुरे आदेशों को मत मानना यहां तक कि मेरी कही कोई बात अनुचित हो तो उसे भी मत माननासदा श्रेष्ठ लोगों के पास बैठना व उनका अनुगमन करना । तू अपने धन को श्रद्धा पूर्वक दान दे। यदि किसी को उत्तम नहीं मानता तो उसे बिना श्रद्धा के भी देकल को कोई चोर तेरे संचित धन को चोरी न कर ले , इस भय से भी दान कर। अतः अपने संचित धन का कुछ भाग अवश्य दान कर। जब किसी कर्म में सन्देह हो तथा उसके धर्माचरण होने का निर्णय न हो रहा हो तो आत्मा की आवाज से इसका निर्णय करना । यही मेरा उपदेश है। यही मेरा सन्देश है तथा यही वेदों व उपनिषद् आदि का सार है। इसे सदा अपने जीवन में धारण करना।

        इतना सुन्दर विदाई सन्देश केवल वैदिक संस्कृति में ही सम्भव है। अन्यत्र नहीं इस प्रकार का उपदेश देने के पश्चात् गुरू ने जो वेदारम्भ के समय कटि में बांधने को मेखला दी थी , जो आत्म रक्षार्थ दण्ड दिया था , उसकी भी अब आवश्यकता भावी जीवन में नहीं होती , इस कारण वह भी इस समय आचार्य उससे वापिस लौटा लेते हैं तथा कहते हैं कि अब ब्रह्मचर्य को भी अपनी इच्छानुसार छोड क्र गृहस्थार्थ विवाह कर सकते हो | 

वेदारम्भ संस्कार

वेदारम्भ संस्कार

डा. अशोक आर्य 

       मानव जीवन के सोलह संस्कारों में से गयारहवां तथा बारहवां, सानो संस्कार ही एक ही उद्देश्य से किये जाने के कारण दोनों का भाव समान ही है । बस अन्तर इतना है कि जब माता पिता एक निश्चित आय पर पहुंचने के कारण बालक को शिक्षार्जन के योग्य समझते हैं तो अपने ही निवास पर उपनयन संस्कार करके उसे गुरुकूल भेज देते तथा गुरू भी बालक को अपने गुरुकुल में स्थान देते हुए उसे अपने कु ल का भाग बनाने के लिए एक संस्कार करता है , जिसे वेदारम्भ संस्कारकहते हैं। दोनों संस्कारों का सम्बन्ध शिक्षा प्राप्त करना आरम्भ करने से हैइसी कारण इन दोनों संस्कारों को एक दूसरे का पूरक माना जाता है |

      प्राचीन गुरुकुलों में न तो आज सरीखे भवनों को ही केन्द्र मानकर महत्त्व दिया जाता था और न ही अन्य साज सज्जा की सामग्री को , क्योंकि इस का सम्बन्ध बालक की शिक्षा से होता था। अतः इनके केन्द्र या आधार बालक ही होते थे। इसी भावना को आज के शिक्षाविद् पुनः समझने लगे हैं। अतः आज पूनः यह स्वर मुखरित होने लगे हैं कि स्कूलों में बालकों महत्त्व को समझना चाहिये तथा इन्हें ही केन्द्र मानकर शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिये ।ऐसी व्यवस्था में गुरु बालक के विगत जन्म के संस्कारों का उसके व्यवहार से अध्ययन क्दरता है, माता पिता के संस्कारों का भी अध्ययन करता है तथा वर्तमान वातावरण ,जिसे पर्यावरण कहते हैं,का भी अध्ययन दर तदनुसार बालक की अभिरुचि के अनुसार इसे शिक्षा देता है |

      जहां तक संस्कारों का प्रश्न है, पहले भी बताया जा चुका है कि मानव जीवन के संस्कारों को दो भागों में बांटा गया है। प्रथम भाग में प्रसव पूर्व के तीन संस्कार रखे गए हैं तथा दूसरे भाग में जन्म के पश्चात् के शेष तेरह सरकार सम्मिलित हैं। इन संस्कारों से तो बालक को आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती ही है, उसके भावी जीवन के निर्माण के लिए पर्यावरण, शिष्य व ब्रह्मचारी, गुरुया आचार्य पढने के विषय चयन, पढने व पढाने की विधि व जीवन का लक्ष्य कैसे प्राप्त हो आदि पर शिक्षा प्रारम्भ करने से पूर्व वैदिक आचार्य विचार करते हैं। 

     वातावरण का बाल शिक्षा पर खूब प्रभाव होता है किन्तु इससे बालक को बचाया जा सकता है। गन्दे वातावरण के बच्चों में अच्छे संस्कारों की बहुलता उसे इससे बचा कर प्रगति पथ पर ला सकती हैयही कारण है कि गन्दे पर्यावर्णीय बालक अच्छे भी देखे गए हैं जबकि अच्छे पर्यावरणं में पले बच्चे भी देखभाल के अभाव में गन्दे हो सकतेहै। यह विगत जन्म के संस्कारों के बलवान् होने का परिवार सकता है । पारिवारिक पयोवरण का भी इस पर प्रभाव को परिवार में लडाई, कलह आदि प्रमादि व्यवहार होता बुराई की और जाना स्वाभाविक है। इसी कारण वैदिक पमादि व्यवहार होता है तो बालक का भीपरिवार में प्रतिदिन संध्या, यज्ञादि करते हुए उसके पर्यात रखा जावे। इसी प्रकार जिस समाज में बालक कार करते हुए उसके पर्यावरण को स्वच्छ में बालक का निवास है, उसका भी अच्छा होना उसके भी उसे अपने पर शिक्षणालयों को सके भावी जीवन की उत्तमता का आधार है। शाला में अपने परिवार का सा वातावरण मिले, इसीलिए वैदिक लियों को कुल कहा गया है। ताकि बालक इसे अपने परिवार आत्मसात् कर गुरु को पिता व सहपाठियों के साथ भाईयों का यवहार करते व प्रेम से रहते हुए शिक्षा प्राप्त करे। यही कारण है न आधुनिक स्कूल भी अपने आप को गुरुकुल कहलवाने में गौरव साव्यव त करने लगे है। अनुभव करने लगे हैं |

      शिक्षा प्राप्ति आरम्भ करते ही बालक को जो प्रक्रियाएं करनी होती थीं, उनमें सर्व प्रथम था आश्रम में निवास करना आश्रम एक कठिन तपस्या का नाम है । इस प्रकार इस में निवास करने के लिए से संकट पूर्ण अवस्था में साधना करते हुए भी हंसते रहने का निर्णय लेना होता था। उसे गुरु के पास जा कर एक बार पुनः ऐसी अवस्था में जाना होता था जैसे जन्म से पूर्व मां के गर्भ में था । अर्थात् अब गुरु आदेश ही उसका सब कुछ है तथा उसी के पालन में ही उसका कल्याण व भावी जीवन का उत्थान है। इस समय वह शिष्य तो है किन्तु क्योंकि गुरु ने उसे अपने में समा लिया है, अपने कुल का भाग बना लिया है, अतः अब गुरुचरणों में बैठ कर उसे ब्रह्म में विचरण करना है। गुरु उपदेश के अनुसार शिक्षा प्राप्त क्रना है गुरू आचार व्यवहार भी सिखाता है, इसलिए उसे आचार्य भी कहते हैं। इस समय शि ष्य समिधा समान है। जैसे समिधा आग के साथ से प्रदीप्त होती है। इसी प्रकार शिष्य भी गुरु से उपदेश पाकर स्वयं को आलौकित करता हैअतः शुरू का पूर्ण विद्वान् होना भी आवश्यक है |

      जहां तक पढाने के विषयों का प्रश्न है, वेदादि शास्त्र तो पढाए भी करे कि बार बालक को करे। जबकि इन दृष्टाः की निगमन पई शिक्षा देते सभः ही जावेंइसके अतिरिक्त गुरु इस बात की जांच की की चि किस विषय में है, उसकी विशेष शिक्षा बालक दृष्टांत देकर पढाना आगमन पद्धति की शिक्षा है जी को जीवन में उतार कर दिखाया जावे तो इसे शिक्षा की कहते हैं। गुरु को चाहिये कि दोनों विधियों को ही शिक्षा प्रयोग करे। इस के अतिरिक्त कई प्रकार की कौशल युक्त शिव देनी चाहियें। इसमें गौ पालन कृषि आदि को रखा जा सकता है |

      वैदिक शिक्षा जीवन को एक निश्चित दिशा देती हैजीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए बालक को समर्थ बनाया जाता । अतः शिक्षा समाप्ति पर आचार्य दीक्षान्त उपदेश देते हुए कहता है। आज से तुम्हारे से यह आशा की जाती है कि तुम सत्य का आचर करोगे, धार्मिक जीवन व्यतीत करते हुए माता पिता की सेवा व बड़ों सम्मान करोगे। यह केवल विदाई के समय ही गुरू नहीं कहता अपि कुल में प्रवेश के समय ही उसने बालक के समक्ष एक निश्चित योजः रखी थी। कुल आवास में रहते हुए उसी योजना से ही शिक्षा दी तथा यहां से पूनः लौटाकर कार्यक्षेत्र में भेजते समय गुरु चेताव स्वरूप पुनः यही उपदेश ही दोहराता है कि जो तुझे समझाया गया है उसका प्रतिक्षण पालन करना । यही जीवन की सफलता का मापदण् होगा।

      वेदारम्भ संस्कार में दण्ड धारण करना, भिक्षा कर भोजः लाना, मेखला धारण करना तथा कौपीन में रहना, यह कुछ आवश्यक विधियां हैं। ब्रह्मचारी के लिए उस युग में दण्ड धारण करना आवश्यक था, क्योंकि जंगली आवास के समय अपनी रक्षार्थ व दूसरों की रक्षा यह सहायक होता था। फिर यह क होता था । नदी नाले पार करते समय भी काम में आता कर यह तो कहा ही गया है कि महान् बनने के लिए पहाडों से न व नदी के तटीय स्थान उत्तम होते हैं । ऐसे ही स्थान में संलग्न व नदी के गरुकुल स्थित होते थे। 

      गरुकला में भिक्षा वृत्ति एक आवश्यक अंग थी। इससे गुरुकुल खर्च का बोझ तो कम होता ही था , बालक में निराभिमानता भी आती थी, झुकने के संस्कार भी मिलते थे। अहंकार का भी नाश होता या। इसमें सभी बालक समान रूप से भिक्षाटन करते थेकहीं कोई भेदभाव नहीं होता था । भिक्षा से प्राप्त सब सामग्री लाकर बालक गुरु चरणों के अर्पण कर देता था। इसी को ही सभी मिलजुल कर ग्रहण करते थे। यह समरसता लाने का एक सुन्दर मार्ग था । अतः वैदिक विधि विधान बालपन से ही उसे समानता का सन्देश देता था । यह उपदेश व्यवहारिक रूप से इसके मस्ति ष्क में डाल दिया जाता थाइसी कारण सभी बालक अपने समय का सदुपयोग करते हुए खूब मेहनत करते हुए शिक्षा प्राप्त करते थे। इस भिक्षा वृत्ति से सरकार या गुरुकुल संचालक पर अर्थका अधिक बोझ नहीं पडता था । आवश्यकताएं सीमित होने से , इसी से ही सब कार्य सिद्ध हो जाते थे। दयानन्द मठ दीनानगर में आज भी दोपहर का भोजन भिक्षा से लाने की प्रथा निर्बाध रूप से चल रही है। लंगोट व मेखला भी इस आश्रम के मुख्य बिन्दु हैं। यह बालक को सदाचारी रखते हुए वीर्यवान् बनाते हैंइससे चुस्ती भी आती है।

      इस विवरण से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि उपनयन संस्कार के साथ ही साथ वेदारम्भ संस्कार भी बालक को गुणवान् व विद्वान् बनाने की दिशा में बढ़ाया गया एक कदम है। इस समय बालक मातृव पितृ गोदी से निकल कर गरु की गोढी में चला जाता है । जहा गुरु बालक को विद्वान् बनने की प्रतिज्ञा लेते हए बालक के लिए कुछ नियम निर्धारित करता है । वहीं बालक भी इस कुल मे अप है। वहीं बालक भी इस कल में अपने निवास केक्षणों में पर्णतया सच्चरित रहते हए पर्ण तन्मयता से एकाग्रचित्हा , पद्य उपदेश के अनुसार अपनी दिनचर्या रखते हुए, सभी सुखा स दूर रहते हुए, तपश्चर्या का जीवन व्यतीत करते हुए, भिक्षाटन से भाजन लाकर सब के साथ समान रूप से उसका उपभोग कर बडे प्रेम पूर्वक मेहनत से सब प्रकार की विद्याओं को प्राप्त करता है।

विवाह संस्कार

विवाह संस्कार

डा. अशोक आर्य 

         वैदिक संस्कृति विश्व की महानतम संस्कृति का गौरव प्राप्त कर रही है। इस के समतुल्य कोई अन्य संस्कृति नहीं हैक्षेत्र में वसू ब्रह्मचारी निम्नतम माना गया है। इसे भी का बाइस वर्ष की आयु तक शिक्षार्थ गुरुकुल मे रहना आवश्यक था। ली पश्चात् वह गुरुकुल से वापिस आ करचोबीस वर्ष की आय पर्णा के पश्चात् ही उसका विवाह होता था अतः हमारी संस्कृति में अथवा किशोर विवाह का तो प्रश्न ही नहीं था । जो रुद्र शिक्षा पाने का अभिल षी होता था, वह ३६ वर्ष के बाद तथा इससे भी आगे पढने वाला आदित्य कहलाता था । ऐसा व्यक्ति ४८ वर्ष की आयु में विवाह करता था। इस सब से स्पष्ट पता चलता है कि बाल, किशोर विवाह जैसे विवाह तो उस युग में सोचे भी नहीं जा सकते थे।

      _. आज भारत में आठ प्रकार के विवाह हो रहे हैं यथा बाल विवाह अर्थात् अल्पायु में किया गया विवाह,देव विवाह विशाल यज्ञों के अवसर पर होने वाले विवाह इस श्रेणी में आते हैं । इस में बाहय दिखावा अधिक होता था। आर्ष विवाह में कन्या का पिता एक गाय आदि लेकर कन्या दान करता था, प्राजापात्य विवाह में कोई दिखावा न करते हुए केवल प्रजाति वृद्धि के लिए ही विवाह होता था।, आसुर विवाह में कन्या के पिता को धन देकर विवाह किया जाता है। गन्धर्व विवाह में बिना विवाह परस्पर इच्छा पूर्वक संयोग ही इस श्रेणी में आता है। , राक्षस विवाह किसी से जबरदस्ती कर उठा लाना तथा अपने घर में रख लेना इस प्रकार का विवाह है और पैशाच विवाह में सोती या नशे में धुत हो किसी कन्या को कलंकित करना ही पैशाचता है।

      वैदिक संस्कृति की श्रेष्ठता इसी बात में है कि विवाह एक धार्मिक संस्कार मानती है, जो जीवन में एक ही बार होता हैएक बार हो गया तो आजीवन रहेगा, कभी टूटेगा नहीं। इसका मुख्य उद्देश्य पितृ ऋण के भार से मुक्त होना है। माता पिता ने हमें जन्म दे कर व हमारा पालन कर एक प्रकार से हमें उधार के नीचे दबा दिया । इसे हम आगे सन्तान बढाकर ही चुका सकते हैं, जिसके लिए विवाह आवश्यक है। वैदिक विवाह एक धार्मिक विधि होने के कारण इस में किए जाने वाली विधियों से हमारी धार्मिक नीवं दृढ से भी दृढतर होती चली जाती हैजो भी आगन्तुक हमारे घर आवे, उसका यथोचित सत्कार हो, इस परम्परानुसार घर आए वर का स्वागत स्नानादि करवा आसन देकर, पैर धोकर, हाथ मुंह धुला कर, आचमन व मधुपर्क देकर किया जाता है। इस अवसर पर वर को गोदान दिया जाता है ताकि भावी सन्तान पुष्ट हो । इसके पश्चात् वर के दाएं हाथ में कन्या के माता पिता कन्या का दायां हाथ रखते हुए कन्या दान करते हैं |

      Sihl अब वर भी वधु का सत्कार करते हुए उसे वस्त्राभूषण आदि देता है। भाव यह है कि जिस प्रकार की वस्तुएं कन्या को उपहार में दी गई हैं, वह भी ससुराल में जाकर ऐसी वस्तुएं तैयार करे। इतना होने पर यज्ञ किया जाता है। इसी यज्ञ के समक्ष ही शेष क्रियाएं की जाती है। वसर पर की जाने वाली प्रथम विधि पाणि ग्रहण है। वर बैठी हाथ अपने हाथ में लेता हैहुई वधु के सामने खडा हो झुककर उसका हाथ तथा कहता है कि तेरे सौभाग्य के लिए तेरा हाथ लेता हू, यह मैं नहीं मानो संसार का उत्पादन करने वाली सविता ने तेरा हाथ पकडा है त मेरी धर्म की पत्नी है, मै तेरा पति हूं। तेरा पोषण करना मेरा धर्म है। हमारे साथ सन्तान की उत्पति करते हुए सौ वर्ष तक जीवन व्यतीत कर । पुनः वधू का हाथ पकड क्र अग्नि की प्रदक्षिणा करते हुए सौ वर्ष का का मनस्वी जीवन बिताने वाली हृष्ट पुष्ट सन्तान पैदा करने का संकल्प लेते हैं व पत्थर समान मजबूत रहने की प्रेरणा दी जाती है।

      लाजा होम जिसे फेरेभी कहते हैं, विवाह संस्कारकी एक महत्वपूर्ण किया हैलाजाहोम करते हुए वधु परमात्मा से प्रार्थना करती है कि प्रभु उसे पति कुल से कभी अलग न करे , पति की लम्बी आयु व समृद्ध परिवार की कामना करती है। परस्पर अनुराग व प्रभु के सहायी होने की कामना करती है। इन्हीं भावनाओं के साथ चार फेरे लेते हैंकेवल चोथे फेरे में वधु आगे होती है, शेष तीनो में वर। यह सब समाज के सम्मुख आने के लिए होता है। एक प्रकार की समाज के सामने गवाही होती है। यही रीत्यानुरूप विवाह की स्वीकृति मानी जाती है।

      विवाह संकार में सप्तपदी का भी फेरों के समान ही महत्व हैइसमें पति पत्नी विविध प्रतिज्ञाएं करते हैं यह प्रतिज्ञाएं सखी पारिवारिक जीवन के लिए होती हैं । तदन्तर जीवन पर्यन्त सूर्य से अपनी देखरेख की प्रार्थना की जाती है तथा यह भी प्रार्थना की जाती हैकि हमें सौ वर्षीय आयु प्राप्त हो तथा जीवन पर्यन्त सभी इन्द्रियां ठीक से काम करती रहें। हृदय स्पर्श से भी दोनों एक दूसरे पर आश्रित होते हए एक दूसरे के समीप आते हैं तथा जन समुदाय को भी वधू के दर्शन कराए जाते हैं । ध्रुव व अरुन्धती दर्शन से भी पारिवारिक जीवन मखमय व स्थिर बनाने का निर्णय लिया जाता है

      कहा वादेक विवाह में वास्तव में प्राचीन परम्परा स्वयंवर की रही है। इसका सबसे पुष्ट कारण यह रहा होगा कि इस के होने से आज के प्रेम विवाह की अवस्था से बचा जा सकता है। हमारे आचार्यों ने तो हा है कि विवाह से पूर्व स्त्री पुरुष एक दूसरे को देखे भी नहीं। इसका MAविशेष प्रयोजन यही रहा होगा कि विवाह तक पवित्रता बनी रहेदिक संस्कृति विवाह को एक आवश्यक धार्मिक कर्तव्य मानती है। आज कपेम विवाह में भावना की प्रधानता रहती है। वैदिक संस्कृति कहती है के विवाह के पश्चात् ही प्रेम का आरम्भ होता है, जो जीवन भर चलता । पश्चिम संस्कृति इससे उलट करते हुए पहले प्रेम तथा फिर विवाह मकरने के कारण , उनमें विवाह के पश्चात् साधारणतया कलह का जन्म होता है जो तलाक के रूप में अन्त को प्राप्त होता है। अतः वैदिक केव विवाह ही जीवन का सुखमय बनाने की सीढी है । इस का आदर्श जब्रह्मचर्य से जीवन को तपा कर तथा उच्च शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् वाही विवाह की स्वीकृति होती थी। जब इस प्रकार सुशिक्षित होने पर स्वयंवर से विवाह किया जाता था तो जीवन पर्यन्त न केवल पति पत्नी मैत्री भाव से रहते हुए सुखी होते थे अपितु अपने परिजनों व समाज में भी सुख बांटते रहते थे। उत्तम सन्तान की उत्पत्ति इसी सखा भाव का ही परिणाम होता था। वैदिक संस्कृति में संतति सुधार के जो उपाय दिये ए हैं, वह भी अपने आप में कीर्ति स्थापित करते हैं, उनका अवलम्बन ही तो सन्तान को ऊपर उठाने वाला होता है |

      वैदिक गृहस्थ में स्त्री की स्थिति सदा ही विशेष आदर वाली रही ।इसे घरकी सम्राज्ञी अथवा रानी कहा गया है। वह घर की समाज्ञा कारण सभी प्रकारकी देख रेख व क्रिया व्यवहार उसी के ही कन्धे पर आता है। वह अपनी चतुराई व योग्यता से परिवार को सुखी व खर्गिक बनाती है। वैदिक विवाह वास्तव में अमृत प्राप्त करने के समान हैपति के साथ ब्रह्म का निवास होता है। यह उसके प्रयत्नों का ही परिणाम होता है। इस प्रकार पति पत्नी बडप्पन को प्राप्त करते हैं। अब परार्थ ही उनका मुख्य कर्तव्य बन जाता है। तब ही तो कहा गया है। कि यह तो गृहस्थ ही है जिस पर मानव जीवन के सभी आश्रम टिके हुए हैं तभी तो वह गृहस्थ की आयु पूरी कर वन निवास करते थे | 

      5 वैदिक संस्कृति में सफल गृहरथी उसी को माना गया है जो एक निश्चित आयु के पश्चात् इसे त्याग कर जन कल्याण की भावना को सम्मुख रखते हुए अपने परिवार की सभी व्यवस्था अपने बच्चों कन्धों पर डाल कर अपने शरीर को पुनः तपा कर समाज सेवा के लिए तैयार करने के लिए एक बार फिर जंगलों में आवास कर तथा धर्म ग्रन्थों यथा वेद ,उपनि पदों आदि का पुनः अध्ययन करते हुए अपने आपको संन्यास के लिए तैयार करे। ताकि वह स्थान स्थान पर धूमते हुए जन कल्याण करते हुए खय भी ब्रह्म में विचरण करे। संसार में जहां एकता जीवन है तो भिन्नता या अनेकता मृत्यु का मार्ग है। वैदिक संरकति गृहरथ के माध्यम से अनेकता को समाप्त कर स्थापित करने की प्रेरणा देती हैयह हमें एकता की और ले जीवन के उच्च आदर्शों को प्राप्त कराने का मार्ग खोलती है। ताकी और ले जाते हुएमार्गखोलती है। समरस्ता की और जाने के रास्ते बताती है। इसी का नाम की का नाम वैदिक नाम वैदिक संकृति संकृति ने विवाह का आदर्श कहा हैयदि इसे पाने का प्रयास किया जावेगा तो वैदिक विवाह का आदर्श पाने में निश्चित ही सफलता मिलेगी।

वानप्रस्थ संस्कार

वानप्रस्थ संस्कार

डा. अशोक आर्य 

        मानव जीवन भोग और वासना का मिला जुला स्वरूप हैइशोपनिषद् के प्रथम मन्त्र “ईशावास्यं इदं सर्वं…” ने भी इसी और इंगित करते हुए कहा है कि परम पिता परमात्मा ने इस संसार में बहुत कुछ भोग के लिए बनाया हैहे मानव ! तूं इन पर आसक्ति मत कर। इसे त्याग पूर्वक भोग । यह तेरा नहीं है यह सब परमपिता परमात्मा का है। जितना भोग , उतना ही विश्व का कल्याण भी कर। इसी उद्देश्य को सामने रखते हुए ही गृहस्थ के पश्चात् ऋषियों ने वानप्रस्थाश्रम की व्यवस्था की हैगृहस्थ में जो कुछ भोग किया, वासनाएं कीं , उससे शरीर में शिथिलता आ गई। अब यह शरीर इतना बलहीन हो गया है कि जो कुछ ब्रह्मचर्य में अर्जित किया था, वह सब कुछ खो चुका है। अब शक्ति का कोष रिक्त है। इसलिए, इस खजाने को पुनः भरने की आवश्यकता है। यदि खाली खजाने को भरने का प्रयास न किया गया तो शेष जीवन का निर्वाह कैसे हो सकेगा ? अतः गृहस्थ से शक्ति का जो खजाना समाप्त हो चुका है,उसे पुनः अर्जित करने के प्रयास का नाम ही वानप्रस्थ है।

      वानप्रस्थाश्रम माया मोह को त्यागने का अवसर चुके शरीरको पुनः तपा करकुन्दन बनाने का अवसर है, यह अपने आप को पुनः समाज की सेवा के लिए तैयार करने का अवसर आश्रम का अभिप्राय हमारे एक निश्चित उद्देश्य,पडाव अथवा जीवन यात्रा के एक पडाव के रूप में लिया जा सकता हैहम जीवन में एक पडाव पार कर दूसरेव फिर तीसरे पडाव में डेरा डालते हुए निरन्तर आगे बढते चले जाते हैं,किन्तु आज मोह माया के बन्धन जटिल हो गए हैं। इसी कारण हम गृहस्थ रूपी पडाव को छोड़ने को तैयार ही नहीं हो रहे। विश्व की किसी भी धर्मशाला या होटल में दो चार दिन से अधिक रुकने की आज्ञा नहीं है तो फिर गृहस्थ रुपी सराय को एक दिन तो छोडना ही होगा यदि हम इसे हंसते हुए छोड कर वानप्रस्थ हो जावें तो उत्तम है, अन्यथा प्रभु स्वयं हमें धकेल कर यहां से निकाल देगा। यदि हम मान सम्मान से चल दें तो अच्छा अन्यथा आज हो क्या रहा है । घरों में बडे बूढों का अपमान हो रहा है। माता पिता दुःखी कहते हैं हमें उचित सम्मान नहीं मिल रहा सरकार इसी कारण वृद्धाश्रम बना रही है। यहां भी उन्हें आराम नहीं है। हमारे पूर्वजों ने इसी झमेले से बचने के लिए वानप्रस्थाश्रम की व्यवस्था की थी। हो थान पर इसे त्यागने की प्रवृति को पुनः लाना होगा। यदि केराजनेता भी समझें तो एक निश्चित आयु के मोट करदेश के युवको को यह राष्ट्रीय सम्पत्ति मी खींच तान न आने पावेगी, जो वर्ष इसी व्यवस्था को आज के राजनेता भी समोर पश्चात् राज सुख को छोड कर देश के या सौप देवे तो राज सत्ता में ऐसी खींच तान २००७ में हुए राष्ट्रपति के चुनाव में आई है। हम ऐ ही क्यो दे कि हमारी सन्तान हमे घसीट करन .. सब सम्बन्धों को तोड कर संसार से सम्बन्धी आई है। हम ऐसी अवस्था आने कर बाहर फेंके । यह आश्रम अजोडता है। इतने विशाल की तो कहते हैं कि यह मेरा संसारको हमारा परिवार बना देता है। तभी तो नहीं। यही हमारे इस आश्रम का लक्ष्य है |

      पाचीन काल में तो पचास साठ वर्ष की आयु में कोई भी अपने ही में नहीं रहता था इस आयु के होते ही, अपने सभी अधिकार अपनी सुयोग्य सन्तान को सौपकर परिवार का त्याग कर जंगलों में जाकर तप से अपने को तपा कर पुनः कुन्दन बना कर संन्यास आश्रम की तैयारी करता था ताकि उस के संकटों का बखूबी सामना कर सके। अब वहां भोग छोड कर त्याग को अपनाता था ताकि दूसरों को भी निवृति मार्ग का सफलता पूर्वक उपदेश दे सकें |

      हमारे देश की इसी प्राचीन प्रणाली का ही परिणाम था कि यहां उच्चतम शिक्षा भी निशुल्क दी जाती थी। सभी उच्च शिक्षित होते थे तथा इस का ही परिणाम था कि भारत को विश्वगुरु माना जाने लगा था । विश्व के सभी देशों के लोग यहां शिक्षा पाने आते थे। हम विश्व भर में आध्यात्मिकता ही नहीं प्रत्येक क्षेत्र में अग्रणी थेप्राचीन काल से ही गृहस्थ सभी आश्रमों का पालक रहा है। सभी आश्रमों का भरण पोषण गृहस्थ ही करते थे। अन्य किसी भी आश्रम में किसी को भी कोई व्यवसाय करने का अधिकार नहीं थागृहस्थ पलकें बिछाए अतिथि की प्रतिक्षा किया करते थे। अतिथि सत्कार उनका परम धर्म था। वानप्रस्थ लेने के पश्चात् जब तपस्वी का जीवन व्यतीत किया जाता था तो यह गृहस्थी ही थे जो उनके जीवन यापन की प्रसन्नता से व्यवस्था करते थे । यदि ऐसा न होता तो कोई वानप्रस्थ में क्योंकरजाता। वानप्रस्थाश्रम में न जाने से सारा बोझ व्यवसायों व सरकारपरपडता तथा किसी भी नए व्यक्ति को कोई भी व्यवसाय करने का अवसर ही न मिलता | पुराना व्यक्तिस्थान छोडे तो ही नया व्यक्ति उसके व्यवसाय को सम्भाल सके (संसार में अभाव का कारण आज इसी आश्रम व्यवस्था टूटना ही तो है) जीवन में यथेष्ट कमाने के पश्चात् ही वानप्रस्थान मिलता था । अब तो वह अपने जीवन के अनुभव बाटकर संसार कल्याण करता था तथा संसार उसके भरण पोषण की व्यवस्था था। इस से ही उसे आत्म तत्त्व मिलता था। 

      इस आश्रम में आने से जहां भोगवाद की समाप्ति के साथ ही साथ नए लोगों को व्यवसाय मिलने से बेकारी दूर होती थी, वहां जो क छ उन्होंने जीवन में सीखा होता था, उसे अब संसार के नवयुवकों में बांटने का काम करने लगते थे। आज की रिटायारमैंट इस का ही एक रूप कुछ सीमा तक कहा जा सकता है। इस आश्रम में आने पर जंगल वाशी होते हुए तप पूर्वक अपने शरीर में शक्ति संचय करते थे। इनके आश्रम गुरुकुल का रूप ले लेते थे। योग्य शिष्य आकर यहां से शिक्षा पाते थे। जिन के बच्चे यहां शिक्षा पाते थे, वह तो यहां सहायता करते ही थे, जिस से जीवन की अनेक आवश्यकताओं को पूरा किया जाता था किन्तु भोजन की आवश्यकता भिक्षा से ही पूरी की जाती थी। इससे नम्रता की शिक्षा भी मिलती थी । इन स्थानों पर सब को बिना किसी भेदभाव के समान रूप से शिक्षा दी जाती थी , सभी को आश्रम का कार्य भी समान रूप से ही करना होता था तथा सभी को समान रूप से ही भिक्षा के लिए जाना होता थायहां कोई बडे छोटे, ऊंच नीच व राजा रंक का भेदभाव नहीं था । किसी से कोई शुल्क आदि नहीं लिया जाता था। यही कारण था कि उस युग में राजा की और से शिक्षा पर कुछ भी व्यय करने की आवश्यकता नहीं थी तथा समाज के सभी लोग समान रूप से शिक्षा प्राप्त करते थे तथा कोई भी अशिक्षित न था। अत: इय परम्परा को आज पुनः लाने की महती आवश्यक्ता है।

अन्त्येष्टी संस्कार 

अन्त्येष्टी संस्कार 

डा. अशोक आर्य

      भारत में प्राचीन काल से ही अन्त्येष्टी क्रिया को एक रूप में किया जाता है, जिसकी एक निश्चित विधि भी की संसार में अन्तिम संस्कार की प्रायः चार विधियां प्रचलित लोग मृतक शरीर को भूमि में गाडते हैं , कुछ इसे नदी में हैं, कुछ इसे खुली हवा में रख देते हैं ताकि पक्षी अथवा जीवन खा कर अपनी क्षुधा की तृप्ति कर लेवें तथा कुछ ऐसे भी समह १ जो मृतक शरीर को जला कर राख में बदल देते हैं। इन चारों विपिन पर विचार करने पर जो विधि उत्तम दिखाई देती है, वह है जला वाली विधि । हमारे ऋषियों ने जो कुछ भी किया अथवा जो कुछ भी करने का आदेश दिया, वह सदैव विज्ञान सम्मत होता था। वैदिक,भारतीय पद्धति में मृतक शरीर को जलाने के आदेश दिये, इसके पीछे भी विज्ञान ही काम करता है। आओ हम इस पर कुछ विचार करें :-

 जल में बहाना :-

       संसार की कुछ जातियां मृतक शरीर को पानी में बहाने की परम्परा को अपनाए हुए हैं। उनका कहना है कि इससे जलीय जीव अपने उदर की पूर्ति कर पावेंगे। जब हम इस पर विचार करते हैंइसके कई दोष हमें दिखाई देते हैं । यथा इससे पानी दूषित हो जावेगा। इसे जल के जीवों के खाने पर बहुत से टुकडे पानी में मिल जाने से यदि मृतक शरीर किसी भयंकर व्याधि से पीडित था तो वह व्याधि भी इस पानी का प्रयोग करने वाले तक पहुंच जावेगी। शरीरको खाने के पश्चात् जो हड्डियों पर कुछ मांस के टुकडे रह जावें गे तो वह भी व्याधि फैलाने का कारण बने गे। इस कारण अन्तिम संस्कार की यह क्रिया उत्तम नहीं है। 

 वायु में रखना :-

        जो लोग पक्षियों के भोजन के लिए मृतक के शरीर को वायु में रख देते हैं, उनमें भी वही दोष होता है। व्याधि फैलती है, सडांद आती है तथा मांस युक्त हड्डियां इधर उधर फैल जाती हैं | 

भूमि में गाडना :-

       भूमि में गडे शरीर को भी पशु जमीन से निकाल लेते हैं तथा मृतक शरीर को बैंचते हुए उस के शरीर के टुकड़े इधर उधर बिखेरते रहते हैं। इस प्रकार उापर्युक्त हानियां तो होती ही हैंइन के अतिरिक्त एक अन्य भयंकर हानि मृतक को गाडने की यह है कि प्रथम तो गाडने से भूमि नष्ट होती है। जहां शरीरको गाडा गया है, वहां की भूमि का कोई अन्य प्रयोग नहीं रह जाता, जिससे भूमि की कमी आ जाती है। दूसरे कुछ गन्दी प्रकार के कलुषित लोग गाडे गए शरीर को निकाल कर उसके साथ कुचेष्टाएं करते भी देखे गए हैं,जो अत्यन्त घृणित कार्य है। 

      अतः मृतक शरीर को गाडना न केवल व्याधि का कारण है पतु नैतिकता के पतन व भूमि के नाश का भी कारण भी है। 

 मम्मियों में सस्रक्षित रखना :-

        मिश्र आदि में मृतक शरीर की मम्मी बना क्छ सुरक्षित रखने की परम्परा रही है। इसके साथ बहुत सा सामान भी रखा जाता था, जिसे चुराने के लिए लुटेरे लोग कबरों तथा मम्मियों को तोडते भी देखे गए हैं। उनका मानना रहा है कि मृतक का सम्बन्ध इस संसार से समाप्त नहीं होता । इस कारण उस का शरीर सुरक्षित रखा जाना चाहिये। इन्हें पिरामिडों में औषधियों के साथ रखा जाता था। इनकी पत्नियां , नौकर चाकर व आवश्यक सामान भी साथ में दफना दिया जाता था। यह सब भी बेकार ही है | 

      मृतक दाह : भारतीय वैदिक परम्परा मृतक शरीर का दाह संस्कार करना या जलाना ही विश्व में मृतक का सर्वोत्तम संस्कार हैइससे न तो जल दूषित होता है, न वायु तथा न ही भूमि ही दूषित होती है। मात्र छ : फुट के स्थान पर चाहे सारे संसार का दाह संस्कार कर दो। इस से नैतिकता का पतन भी नहीं होता। मृतक के शरीर में यदि कोई रोग रहा होगा तो वह भी जल जावेगा तथा वायु मण्डल साफ हो जावेगा। 

        विश्व में अन्तिम संस्करका यह वैदिक विधान ही सर्वोत्तम है । जिन पंचतत्त्वों से शरीर का निर्माण हुआ है , मृत्यु के पश्चात् उन्हीं पंचतत्त्वों में मानव विलीन हो जाता है। आज विश्व के अनेक देशों ने विधि से इस परम्परा का अनुकरण करने का प्रयास किया है। यरोप व अमरीका में इस हेतू विधि भी बने। रोम के आधिपत्य काल में वहां मदों को जलाया जाता था। उन्हीं को देख कर वहां विचार उठा । यह परम्परा उन्हें ग्रीस से मि परम्परा उन्हें ग्रीस से मिली थी, जो भारत से सावित रहा था। ईसाईयत के प्रचारने मृतक शरीर को जलाने पर लगाई। अब तो चीन जैसे देश भी हाह विधि अपना रहे हैं । शव से प्रभावित होकर इंग्लैंड में शवदाह सोसायटी बनी। गर थाम्परान डरा हेत एक पुस्तक भी लिखी। तात्कालीन इंग्लैंड के विचारकों ने पर थाम्पसनके विचारों को समर्थन किया। यहा १३ जनवरी १८७८ किमेशन सोसायटी आफ इंग्लैंड की स्थापना हुई। इस संस्था के प्रयास से १८७८ के लगभग सरे नामक स्थान पर प्रथम शव दाह ग्रह स्थापित किया गया। १८८३ में वहां इसे वैधानिक स्वीकृति मिली१९०२ में वहां एतदर्थ विधेयक भी पास किया गया। आज वहां दो सौ से भी अधिक मृतक दाह गृह हैं। इसी प्रकार कन्टेनेवियन देशों ,न्यूजीलैण्ड ,आस्ट्रेलिया में भी ऐसे विधि बने । अमेरिका में भी १८७६ से शव दाह आरम्भ हुआ। यहां भी आज तीन सौ से अधिक शव दाह केन्द्र हैं। इतना ही नहीं यूरोप व अमेरिका के प्रायः सभी देशों में शवदाह संस्थाएं बन गई हैं। इन्हों ने अन्तर्राष्ट्रीय शवदाह संगठन भी बना लिया। जिस का लंदन मुख्यालय बना। इनकी शवदाह को प्रोत्साहन देने के लिए त्रैवार्षिक कान्फेंस भी होती है। इससे स्पष्ट है कि विश्व में भारतीय वैदिक शव दाह प्रथा को अपनाने की होड़ सी लग गई है। यही इसकी श्रेष्ठता का परिचायक है। इसका मुख्य कारण तो भूमि की बचत है ही। साथ ही अन्य भी कुछ कारण इस प्रकार हैं:

      मृतक के रोगों से वाय मण्डल दूषित नहीं होता, निकट से निकलने वाले जल में भी दोष नहीं आता , अब शरीरको पशु उखाड नहा पाते। इससे रोगाणु फैलने का भय समाप्त हो जाता है । कफन स बचा जा सकता है तथा अनाचारकी घटनाएं नहीं हो सकती।, मात्रा में भूमि की बचत होती है, जिसे विकास के अन्य कार्यों में उपयोग में लाया जा सकता है। इससे कब्र पूजा खयमेव ही समाप्त हो जाती है। इस से कमाई खाने वाले अब समाज के उत्थान में लगेंगेअनेक पाखण्डों की समाप्ति होती है। इन कबरों तक आने जाने वार चढावा चढाने से होने वाले व्यय की बचत होती है, जिससे विकास अन्य विकास कार्यों के लिए संसाधन सभव हो पाते हैं । हमारे यहां ही नहीं विश्व में अरबों रुपए के व्यय से सहस्रों मकबरे बने हैं। यदि मुर्दा जलाने की प्रथा को अपनाया जावे तो इन मकबरों पर होने वाले व्ययार को बचाकर इसे राष्ट्रोत्थान के कार्यों पर व्यय किया जा सकेगा। अनेक लोग तो कबरों से मुर्दे निकाल कर उनसे कुकर्म करते हैं तथा अनेकालोग इन कबरों के एकान्त में इन पर बैठ कर जुआ खेलने व शराबपीने जैसे भद्दे काम भी करते हैं। ऐसे लोगों से भी कुछ तो छुटकारा पाया ही जा सकेगा। 

      अतः मानवीय स्वास्थ्य की रक्षा के साथ ही साथ भूमि की कमी को दूर करने व विपुल धन सम्पत्ति को मुर्दे को मात्र जलाने से ही बचाया जा सकता है। संस्कृत में तो मृत्यु के लिए कहा भी गया है कि पञ्चतत्व में विलीन हो गया। इस का भाव है कि यह शरीर पृथ्वी , वायु, जल, अग्नि तथा आकाश के मेल से बना है। मृत्यु के पश्चात् इसे जितनी शीघ्रता से इन्हीं पांचों तत्वों के रूप में बदला जा सके उतना ही अच्छा है। इसे शीघ्र ही इन पांच तत्वों में बदलने का साधन अग्नि में जलाना ही है। अन्य कोई साधन नहीं है। इसी साधन से ही यह कार्य शीघ्र हो पाता है। इस लिए हमारे ऋषियों ने दाह कर्म को ही इस हेतु सर्वोत्तम कर्म स्वीकार किया है। अथर्ववेद के अध्याय १८, सूक्त २ मन्त्र ३८ में भी इसी बात के ही स्पष्ट निर्देश दिये गए हैं। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने तो इस की विधि भी निर्धारित की है तथा लिखा हैसम्पन्न मृतक व्यक्ति बाह संस्कार में किया वसके। आज की महंगाई तक व्यक्ति के भार के बराबर घी व सामग्री का प्रयोग कार में किया जावे ताकि वायु मण्डल पूरी तरह से शुद्ध हो की महंगाई को देखते हुए इतना तो सम्भव नहीं हो पा रहा यथाशक्ति जितना अधिक से अधिक घी सामग्री, केसर कपूर का प्रयोग सम्भव हो सके किया जावे ताकि वायु मण्डल रोग मुक्त तथा मृतक व्यक्ति के रोगाणुओं का किसी अन्य पर प्रभाव न हो सके ।

      वैदिक भारतीय संस्कृति कितनी महान् है, जिसने मरने पर भी सम्पूर्ण विश्व के भले की कामना करते हुए इस के पार्थिव शरीर को दबाने, जल में फेंकने या खुले में रखने के स्थान पर दाह कर्म की पद्धति रचकर सर्व संसार के सुख की कामना ही की है। हमारे ऋषि जानते थे कि जल में मृतक को डालने से, कबर में दफनाने से तथा वायु मण्डल में मुर्दे को खुला रखने से न केवल उसके रोगाणु फैल कर विनाश का कारण बनते हैं, लोगों को बुरे कार्य करने को प्रेरित करते , भूमि की कमी का कारण बनते हैं, अपितु मृतक को शीघ्र पंच तत्त्व में विलीन होने में भी बाधक होते हैं। इसीलिए उन्हों ने इन सब से दाह संस्कार को ही उत्तम माना । यह उनकी महान् विजय ही है जो आज विश्व के बडे बडे देश भी न केवल सामाजिक व्यवहार से अपितु विधि से भी इसे स्वीकार करने लगे हैं | 

संन्यास संस्कार

डा. अशोक आर्य 

       हमारे प्राचीन ऋषियों ने मानव को बार बार यह स्मरण दिलाने के लिए कि हे मानव ! तूं ने अपने जीवन को अच्छा बनाना है, परोपकारी बनाना है, दूसरों की सेवा करनी है,माता पिता व गुरूजनों का आदर करना है ,धर्म व जाति का रक्षक बनना है , जहां सोलह सरंकारों का व्यवधान रचा, वहीं चार आश्रमों की भी व्यवस्था की । ताकि सभी लोग समान रूप से समाज की रचना प्रक्रिया में अपनी सहभागिता दर्शा सकें। जहां तक संन्यास का प्रश्न है, यह जहां सोलह संस्कारों का एक महत्त्व पूर्ण अंग है वहीं चार आश्रमों में भी विशेष कामाचा रूप से शोभायमान है |

      सोलह संस्कारों में जन्म के पश्चात् होने वाले सरकारों में बारहवां संस्कार तथा कुल सोलह संस्कारों में पन्द्रहवां संस्कार ही सिंन्यास संस्कार है। जहा तक आश्रम व्यवस्था का प्रश्न है, इसमें भी चार संस्कार सम्मिलित किए गए हैं , जो पहले से ही सोलह कारों का अंग हैंयथा ब्रह्मचर्य संस्कारों में गयारहवां संस्कारहै तो श्रम व्यवस्था में प्रथम आश्रम है। गृहस्थ संस्कारों में तेरहवां संस्कार है तो हमारी आश्रम व्यवस्था इसे दूसरे स्थान पर रखती हैवानप्रस्थ हमारी संस्कार व्यवस्था में चोदहवां संस्कार है तो आश्रम व्यवस्था में तीसरा । इसी प्रकार संन्यास सस्कार प्रणाली का पन्न संस्कार है तो हमारी आश्रम व्यवस्था इसे अन्तिम व चोथा आप स्वीकार करती है। वास्तव में मानव जीवन को हमारी महान् वैदिक संस्कृति १०० वर्ष का मानती है तथा कहती है कि यदि हम खली जलवा ग्रहण करते हुए एक निश्चित व्यवस्था में जीवन यापन करें तो हमारी आयु निश्चित रूप से कम से कम एक सौ वर्ष की होगी। इसी आधार पर इसके चार पडाव, ठहराव या रथल बनाए गए हैं , जिन्हें चार आश्रमों का नाम दिया गया तथा प्रत्येक आश्रम में ठहरने की अवधि पच्चीस वर्ष निश्चित की गई। यही चार पडाव ही चार आश्रम हैं, जा कि संस्कारों में भी अपना स्थान बनाए हुए हैं।

      आश्रमों में केवल गृहस्थ को छोडकर शेष तीनों आश्रमों का सम्बन्ध जंगलों , पहाडों व नदियों की खुली वायु में विचरण करने व प्रकृति की गोद में रहकरशीतल व स्वास्थ्य प्रद शुद्ध जलवायु का सेवन करना होता था । जबकि गृहस्थ लोग नगरों में रहते थे। इस प्रकार शतव र्षीय जीवन का तीन चौथाई अर्थात् जीवन के पिचहत्तर वर्ष जंगलों की खली वायु में विचरण करना होता था। यही ही हमारे उत्तम स्वास्थ्य का कारण था |

      गहस्थ जीवन में आई दुर्बलताओं को दूर करने व परोपकाएकी भावनानुसार निशुल्क अपने अनुभवों को बांटने के लिए की व्यवस्था थी। पच्चीस वर्ष तक इस आश्रम में रहते परी प्रकार से बलिष्ठ होकर तप जाता था, किसी की असर करने का उस पर कुछ भी प्रभाव नहीं होता था, तब वह नभवों को बांटने के लिए वानप्रस्थाश्रम इस आश्रम में रहते हुए जब मनुष्य होता था, तब वह संन्यास ले लेता था तथा जीवित अवस्था में था। यह आश्रम व्यवस्था का अन्तिम आश्रम था तथा जीवित अवस्था में होने वाले संस्कारों में अन्तिम संस्कार थाइसके पश्चात् केवल अन्तिम संस्कार अर्थात मृतक संस्कारही शेष रह जाता था |

      आज संन्यास का अभिप्राय ठगी या बेकारों के समूह के अर्थों में लिया जाता है किन्तु हमारे ऋषियों ने इस आश्रम को अति महत्व पूर्ण माना हैइस आश्रम में आने वाले व्यक्ति सभी सम्बन्धों से , सीमाओं से, वैभव से ऊपर उठ जाते हैं। अब सारा संसार ही उसका निवास स्थान होता है। देशीय सीमाएं उसके लिए कुछ भी अर्थ नहीं रखती थीं। सारे संसार के लोग उसका परिवार होता है,व्यक्तिगत परिवार भी सांसारिक लोगों की ही भाँति होता है। संसार के सभी लोग ही उसके सम्बन्धी होते हैं । वह जहां चाहे चला जाता है, जहां चाहे रुक जाता है। किसी को नहीं पता होता कि अमुक व्यक्ति आज कहां है तथा किसे क्या उपदेश दे रहा है । इस प्रकार केवल संसार का उपकार करना ही उसका एकमात्र ध्येय होता है। इसी ध्येय की पूर्ति के लिए वह एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमता रहता हैकिसी भी एक स्थान पर वह अधिक समय तक नहीं रुकता । स्वयं को इस समय अग्नि के तपाता है तथा इसलिए ही काषाय वस्त्र धारण करता है। अपने पवचनों का प्रसाद वह सवेत्र बाटते हुए कुछ मिला ता खाया नहीं तो यं दीपमते हुए कब व कहा उसकी मृत्यु हो जाती है ,उसका अन्तिम कौन करता है। इसका उसके निजी परिजनों को भी पता नहीं पाता । विश्व में कहीं भी ऐसा संस्कार वैदिक संस्कृति के अतिरिक्त ही नहीं मिलेगा । यही ही हमारी संस्कृति व इस संस्कार की महानता व श्रेष्ठता हैप्रभु संस्कारों का युग पुनः लौटावे तो संसार पुनः समागे पर चले |

वेदारम्भ संस्कार

डा. अशोक आर्य 

       मानव जीवन के सोलह संस्कारों में से गयारहवां तथा बारहवां, सानो संस्कार ही एक ही उद्देश्य से किये जाने के कारण दोनों का भाव समान ही है । बस अन्तर इतना है कि जब माता पिता एक निश्चित आय पर पहुंचने के कारण बालक को शिक्षार्जन के योग्य समझते हैं तो अपने ही निवास पर उपनयन संस्कार करके उसे गुरुकूल भेज देते तथा गुरू भी बालक को अपने गुरुकुल में स्थान देते हुए उसे अपने कु ल का भाग बनाने के लिए एक संस्कार करता है , जिसे वेदारम्भ संस्कारकहते हैं। दोनों संस्कारों का सम्बन्ध शिक्षा प्राप्त करना आरम्भ करने से हैइसी कारण इन दोनों संस्कारों को एक दूसरे का पूरक माना जाता है |

      प्राचीन गुरुकुलों में न तो आज सरीखे भवनों को ही केन्द्र मानकर महत्त्व दिया जाता था और न ही अन्य साज सज्जा की सामग्री को , क्योंकि इस का सम्बन्ध बालक की शिक्षा से होता था। अतः इनके केन्द्र या आधार बालक ही होते थे। इसी भावना को आज के शिक्षाविद् पुनः समझने लगे हैं। अतः आज पूनः यह स्वर मुखरित होने लगे हैं कि स्कूलों में बालकों महत्त्व को समझना चाहिये तथा इन्हें ही केन्द्र मानकर शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिये ।ऐसी व्यवस्था में गुरु बालक के विगत जन्म के संस्कारों का उसके व्यवहार से अध्ययन क्दरता है, माता पिता के संस्कारों का भी अध्ययन करता है तथा वर्तमान वातावरण ,जिसे पर्यावरण कहते हैं,का भी अध्ययन दर तदनुसार बालक की अभिरुचि के अनुसार इसे शिक्षा देता है |

      जहां तक संस्कारों का प्रश्न है, पहले भी बताया जा चुका है कि मानव जीवन के संस्कारों को दो भागों में बांटा गया है। प्रथम भाग में प्रसव पूर्व के तीन संस्कार रखे गए हैं तथा दूसरे भाग में जन्म के पश्चात् के शेष तेरह सरकार सम्मिलित हैं। इन संस्कारों से तो बालक को आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती ही है, उसके भावी जीवन के निर्माण के लिए पर्यावरण, शिष्य व ब्रह्मचारी, गुरुया आचार्य पढने के विषय चयन, पढने व पढाने की विधि व जीवन का लक्ष्य कैसे प्राप्त हो आदि पर शिक्षा प्रारम्भ करने से पूर्व वैदिक आचार्य विचार करते हैं। 

     वातावरण का बाल शिक्षा पर खूब प्रभाव होता है किन्तु इससे बालक को बचाया जा सकता है। गन्दे वातावरण के बच्चों में अच्छे संस्कारों की बहुलता उसे इससे बचा कर प्रगति पथ पर ला सकती हैयही कारण है कि गन्दे पर्यावर्णीय बालक अच्छे भी देखे गए हैं जबकि अच्छे पर्यावरणं में पले बच्चे भी देखभाल के अभाव में गन्दे हो सकतेहै। यह विगत जन्म के संस्कारों के बलवान् होने का परिवार सकता है । पारिवारिक पयोवरण का भी इस पर प्रभाव को परिवार में लडाई, कलह आदि प्रमादि व्यवहार होता बुराई की और जाना स्वाभाविक है। इसी कारण वैदिक पमादि व्यवहार होता है तो बालक का भीपरिवार में प्रतिदिन संध्या, यज्ञादि करते हुए उसके पर्यात रखा जावे। इसी प्रकार जिस समाज में बालक कार करते हुए उसके पर्यावरण को स्वच्छ में बालक का निवास है, उसका भी अच्छा होना उसके भी उसे अपने पर शिक्षणालयों को सके भावी जीवन की उत्तमता का आधार है। शाला में अपने परिवार का सा वातावरण मिले, इसीलिए वैदिक लियों को कुल कहा गया है। ताकि बालक इसे अपने परिवार आत्मसात् कर गुरु को पिता व सहपाठियों के साथ भाईयों का यवहार करते व प्रेम से रहते हुए शिक्षा प्राप्त करे। यही कारण है न आधुनिक स्कूल भी अपने आप को गुरुकुल कहलवाने में गौरव साव्यव त करने लगे है। अनुभव करने लगे हैं |

      शिक्षा प्राप्ति आरम्भ करते ही बालक को जो प्रक्रियाएं करनी होती थीं, उनमें सर्व प्रथम था आश्रम में निवास करना आश्रम एक कठिन तपस्या का नाम है । इस प्रकार इस में निवास करने के लिए से संकट पूर्ण अवस्था में साधना करते हुए भी हंसते रहने का निर्णय लेना होता था। उसे गुरु के पास जा कर एक बार पुनः ऐसी अवस्था में जाना होता था जैसे जन्म से पूर्व मां के गर्भ में था । अर्थात् अब गुरु आदेश ही उसका सब कुछ है तथा उसी के पालन में ही उसका कल्याण व भावी जीवन का उत्थान है। इस समय वह शिष्य तो है किन्तु क्योंकि गुरु ने उसे अपने में समा लिया है, अपने कुल का भाग बना लिया है, अतः अब गुरुचरणों में बैठ कर उसे ब्रह्म में विचरण करना है। गुरु उपदेश के अनुसार शिक्षा प्राप्त क्रना है गुरू आचार व्यवहार भी सिखाता है, इसलिए उसे आचार्य भी कहते हैं। इस समय शि ष्य समिधा समान है। जैसे समिधा आग के साथ से प्रदीप्त होती है। इसी प्रकार शिष्य भी गुरु से उपदेश पाकर स्वयं को आलौकित करता हैअतः शुरू का पूर्ण विद्वान् होना भी आवश्यक है |

      जहां तक पढाने के विषयों का प्रश्न है, वेदादि शास्त्र तो पढाए भी करे कि बार बालक को करे। जबकि इन दृष्टाः की निगमन पई शिक्षा देते सभः ही जावेंइसके अतिरिक्त गुरु इस बात की जांच की की चि किस विषय में है, उसकी विशेष शिक्षा बालक दृष्टांत देकर पढाना आगमन पद्धति की शिक्षा है जी को जीवन में उतार कर दिखाया जावे तो इसे शिक्षा की कहते हैं। गुरु को चाहिये कि दोनों विधियों को ही शिक्षा प्रयोग करे। इस के अतिरिक्त कई प्रकार की कौशल युक्त शिव देनी चाहियें। इसमें गौ पालन कृषि आदि को रखा जा सकता है |

      वैदिक शिक्षा जीवन को एक निश्चित दिशा देती हैजीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए बालक को समर्थ बनाया जाता । अतः शिक्षा समाप्ति पर आचार्य दीक्षान्त उपदेश देते हुए कहता है। आज से तुम्हारे से यह आशा की जाती है कि तुम सत्य का आचर करोगे, धार्मिक जीवन व्यतीत करते हुए माता पिता की सेवा व बड़ों सम्मान करोगे। यह केवल विदाई के समय ही गुरू नहीं कहता अपि कुल में प्रवेश के समय ही उसने बालक के समक्ष एक निश्चित योजः रखी थी। कुल आवास में रहते हुए उसी योजना से ही शिक्षा दी तथा यहां से पूनः लौटाकर कार्यक्षेत्र में भेजते समय गुरु चेताव स्वरूप पुनः यही उपदेश ही दोहराता है कि जो तुझे समझाया गया है उसका प्रतिक्षण पालन करना । यही जीवन की सफलता का मापदण् होगा।

      वेदारम्भ संस्कार में दण्ड धारण करना, भिक्षा कर भोजः लाना, मेखला धारण करना तथा कौपीन में रहना, यह कुछ आवश्यक विधियां हैं। ब्रह्मचारी के लिए उस युग में दण्ड धारण करना आवश्यक था, क्योंकि जंगली आवास के समय अपनी रक्षार्थ व दूसरों की रक्षा यह सहायक होता था। फिर यह क होता था । नदी नाले पार करते समय भी काम में आता कर यह तो कहा ही गया है कि महान् बनने के लिए पहाडों से न व नदी के तटीय स्थान उत्तम होते हैं । ऐसे ही स्थान में संलग्न व नदी के गरुकुल स्थित होते थे। 

      गरुकला में भिक्षा वृत्ति एक आवश्यक अंग थी। इससे गुरुकुल खर्च का बोझ तो कम होता ही था , बालक में निराभिमानता भी आती थी, झुकने के संस्कार भी मिलते थे। अहंकार का भी नाश होता या। इसमें सभी बालक समान रूप से भिक्षाटन करते थेकहीं कोई भेदभाव नहीं होता था । भिक्षा से प्राप्त सब सामग्री लाकर बालक गुरु चरणों के अर्पण कर देता था। इसी को ही सभी मिलजुल कर ग्रहण करते थे। यह समरसता लाने का एक सुन्दर मार्ग था । अतः वैदिक विधि विधान बालपन से ही उसे समानता का सन्देश देता था । यह उपदेश व्यवहारिक रूप से इसके मस्ति ष्क में डाल दिया जाता थाइसी कारण सभी बालक अपने समय का सदुपयोग करते हुए खूब मेहनत करते हुए शिक्षा प्राप्त करते थे। इस भिक्षा वृत्ति से सरकार या गुरुकुल संचालक पर अर्थका अधिक बोझ नहीं पडता था । आवश्यकताएं सीमित होने से , इसी से ही सब कार्य सिद्ध हो जाते थे। दयानन्द मठ दीनानगर में आज भी दोपहर का भोजन भिक्षा से लाने की प्रथा निर्बाध रूप से चल रही है। लंगोट व मेखला भी इस आश्रम के मुख्य बिन्दु हैं। यह बालक को सदाचारी रखते हुए वीर्यवान् बनाते हैंइससे चुस्ती भी आती है।

      इस विवरण से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि उपनयन संस्कार के साथ ही साथ वेदारम्भ संस्कार भी बालक को गुणवान् व विद्वान् बनाने की दिशा में बढ़ाया गया एक कदम है। इस समय बालक मातृव पितृ गोदी से निकल कर गरु की गोढी में चला जाता है । जहा गुरु बालक को विद्वान् बनने की प्रतिज्ञा लेते हए बालक के लिए कुछ नियम निर्धारित करता है । वहीं बालक भी इस कुल मे अप है। वहीं बालक भी इस कल में अपने निवास केक्षणों में पर्णतया सच्चरित रहते हए पर्ण तन्मयता से एकाग्रचित्हा , पद्य उपदेश के अनुसार अपनी दिनचर्या रखते हुए, सभी सुखा स दूर रहते हुए, तपश्चर्या का जीवन व्यतीत करते हुए, भिक्षाटन से भाजन लाकर सब के साथ समान रूप से उसका उपभोग कर बडे प्रेम पूर्वक मेहनत से सब प्रकार की विद्याओं को प्राप्त करता है।