दुर्गा-पूजा दुर्गा-अष्टमी |

दुर्गा-पूजा दुर्गा-अष्टमी

बंगाल से लेकर पूरे देश में इसका बड़ा महात्म्य है | बड़े-बड़े पण्डित आयेंगे, दुर्गा-पूजन से लेकर दुर्गा-हवन तक करेंगे | यजमान को प्रभावित करने के लिए उसके सामने बहुत सारे मन्त्र बोले जायेंगे | यजमान को यह लगना चाहिये कि दुर्गा-पूजा के अवसर पर दुर्गा से सम्बन्धित मन्त्र भी बोला गया इसलिए वेद-मन्त्र भी खोजना होगा ताकि वह प्रभावित हो (ब्राह्मणों का एक अकथित नियम सा बन गया है की यजमान को प्रकाशित न करो परन्तु प्रभावित कर दो और दक्षिणा लेकर चलते बनो, इसमें दोष यजमानों का भी है क्यों कि वे “आँख के अन्धे-गाँठ के पूरे” बने बैठे रहते हैं जिसका लाभ ब्राह्मण-वर्ग उठाता रहता है | यदि यजमान ने रुचिपूर्वक और ब्राह्मण ने ज्ञान-पूर्वक संस्कार करवाया होता तो आज की स्थिति कहीं अच्छी होती इसलिए दोष दोनों का है|)

अपने यजमान को प्रभावित करने के लिए ही ब्राह्मण प्रायः निम्न प्रयोग करते रहते हैं :-

१) यदि शनैश्चर (शनि-देवता) की पूजा करनी है तो “शन्नो देवीरभिष्टये” (यजुर्वेद 36/12) मन्त्र बोला जाता है | जिसका शनि के साथ निकट का नहीं तो दूर का भी सम्बन्ध नहीं है |

२) राहू की पूजा करने के लिए “कया नश्चित्रा” मन्त्र का पाठ करते हैं

३) बुध ग्रह पूजा के लिए “उद् बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि” (यजुर्वेद 15/54) बोला जाता है

इसी प्रकार से दुर्गा की पूजा करनी हो तो निम्न वेद-मन्त्र का पाठ करते हैं |

जा॒तवे॑दसे सुनवाम॒ सोम॑मरातीय॒तो नि द॑हाति॒ वेद॑: ।

स न॑: पर्ष॒दति॑ *दु॒र्गाणि॒* विश्वा॑ ना॒वेव॒ सिन्धुं॑ दुरि॒तात्य॒ग्निः ॥

ऋग्वेद 01/99/01

पाठक स्पष्ट देख पा रहे होंगे की इस मन्त्र में दुर्गा पद आया है (फिर चाहे वह दुर्गाणि ही क्यों न हो) | ब्राह्मण भी जब मन्त्र बोलते हैं तब दुर्गा(णि) आने पर जोर से बोलते हैं ताकि यजमान को पता चल जाये की दुर्गा का विशेष मन्त्र बोला गया |

यहाँ विचार करना है की दुर्गा देवी के साथ दुर्गाणि का सम्बन्ध कैसे है ?

मन्त्र में “दुर्गाणि” शब्द आया है, जिसका अर्थ (महर्षि दयानन्द जी को छोड़ भी दिया जाये तब भी) सायणाचार्य जी ने “विश्वा विश्वानि सर्वाणि दुर्गाणि दुर्गमनानि भोक्तुमावश्यकानि दुःखानि” किया है | दुःखों को तैरने (पार करने) के लिए प्रार्थना की गई है | दुर्गाणि का अर्थ दुर्गम स्थितियाँ है |

देखने वाली बात यह है कि :- महर्षि दयानन्द जी को न मानने वाले और सायणाचार्य जी को ही मानने वाले पण्डित/ब्राह्मण इस मन्त्र का दुर्गापूजा में किस प्रकार गलत तरीके से प्रयोग करते हैं, सायणाचार्य जी को भी मात कर दिया है और दुर्गा पूजा में इस मन्त्र को जोड़ा जाने लगा |

महर्षि दयानन्द जी ने अपने वेद-मन्त्र भाष्य में दु॒र्गाणि॒ पद का अर्थ किया है “दुःखेन गन्तुं योग्यानि स्थानानि” किया है | अब बतलाइये ! दुर्गा के लिए दु॒र्गाणि॒ पद वाला मन्त्र पढ़ना कितना उचित है | ऐसा ही अर्थ/भाष्य ऋग्वेद 07/60/12 में भी में किया है “दुःख से जाने योग्य कामों का” ।

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पाठक की स्वाभाविक इच्छा होगी की इस मन्त्र का विनियोग किसने कब कहाँ किया है ? तो एक पुस्तक है पूना से छपी है जिसका नाम है संस्काररत्नमाला जिसमें इसका प्रयोग “दुर्गाप्रीत्यर्थ बलिदाने विनियोग:” (पृष्ठ 118) अर्थात् दुर्गा की प्रीति के लिए बलिदान करते समय इस मन्त्र को बोलना चाहिये | आगे लिखा है “दुर्गावाहने विनियोग:” अर्थात् दुर्गा के वाहन में इस मन्त्र को बोलना चाहिए | जबकि दुर्गा का वेद मन्त्र में नाम तक नहीं है |

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विनियोग का अर्थ होता है वि(विशेषतया) + नि (निश्चय से) योग (लगाना) = अर्थात् किसी मन्त्र का किसी क्रिया में लगाना , Application of a mantra । यदि किसी मन्त्र का जो अर्थ है वह उस क्रिया के साथ ठीक बैठ जाता है तब वह विनियोग ठीक है । यदि कोई व्यक्ति “शन्नो देवी’ मन्त्र बोल कर व्यायाम करें तो यह विनियोग ठीक नहीं माना जायेगा परन्तु आचमन करे तो विनियोग उचित कहलायेगा । *यह विनियोग ऋषिकृत है या पुरुषकृत है, ईश्वरकृत या अपौरुषेय नहीं है ।*

इस के साथ यजमानों से निवेदन है की कृपया मेरी इस प्रस्तुति/पोस्ट को ब्राह्मणों के विरुद्ध न लें परन्तु अपने विरुद्ध लें और जागृत बनें, शब्द-अर्थ को जानें, *योग्य-विद्वान्-सात्त्विक-धार्मिक-परोपकारप्रिय-सत्योपदेष्टा ब्राह्मण से ही संस्कार करवायें और स्वयं भी सीखें | यज्ञ-संस्कार आदि सीखने के लिए आर्य समाज नियमित आयें |*

धन्यवाद

*सादर*

विदुषामनुचर

विश्वप्रिय वेदानुरागी

*(प्रस्तुत लेख का आधार पण्डित ब्रह्मदत्त जी जिज्ञासु के लेखों का संग्रह “जिज्ञासु रचना मञ्जरी” पृष्ठ 238-239 है | वेदमन्त्रों का विनियोग नामक लेख को पाठक विस्तार से पढ़ें |)*