आदर्श शासक महाराजा रणजीत सिंह (13 नवम्बर 1780 )

  • आदर्श शासक महाराजा रणजीत सिंह (13 नवम्बर 1780 )

(आज 13 नवम्बर उनके जन्म दिवस पर विशेष)

वे साँवले रंग का नाटे कद के मनुष्य थे। उनकी एक आँख शीतला के प्रकोप से चली गई थी। परंतु यह होते हुए भी वह तेजस्वी थे। आत्मबल का उदाहरण देखना हो तो महाराजा रणजीत सिंह मे देखना चाहिए महाराजा रणजीत सिंह जी जीतने बड़े योद्धा था उतने ही बड़े उदार महामानव थे।

महाराज रणजीत सिंह जी और उनकी धर्मपरायणता

महाराजा रंजीत सिंह जी को सिख संगत सिख बताती हैं। सत्य यह है कि महाराजा रंजीत सिंह जी केवल सिखों के नहीं अपितु समस्त हिन्दू समाज के रक्षक थे। महाराजा रंजीत सिंह जी के झंडे में शूरता की प्रतीक चंडी देवी, बल और ब्रह्मचर्य के प्रतीक वीर हनुमान बजरंग बली और शत्रुओं को रुलाने वाले काल भैरव का चित्र अंकिता था। अफगानिस्तान के शासक शाहशुजा ने महाराजा रंजीत सिंह के समक्ष अपने राज्याधिकार को वापिस दिलाने की जब अपील की थी तब महाराजा रंजीत सिंह जी ने दो शर्तें उनके समक्ष रखी थी। पहली की वे अपने राज्य में गौहत्या पर प्रतिबन्ध लगाए। दूसरी की सोमनाथ मंदिर से लूटे गए विशालकाय कवाड़ वापिस किये जाये। रणजीत सिंह जी ने जहां अमृतसर के स्वर्ण मंदिर को स्वर्ण से मंडित किया था वहीं पूरी के जगन्नाथ मंदिर और बनारस के विश्वनाथ मंदिर को दान देकर अपने कर्त्तव्य का निर्वाहन भी किया था।

27 जून को उनकी पूण्यतिथि पर पाकिस्तान में लाहौर में महाराजा रणजीत सिंह की मूर्ति लगाने का मौलवियों ने बहुत अधिक विरोध किया।मौलवियों ने कहा कि हम महमूद गजनवी की विरासत मानते हैं रणजीत सिंह की नहीं।

आज के अलगाववादी सिखों को उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए।

उनके जीवन के 3 अलभ्य प्रकरण

1- एक बार एक कवि उनके दरबार मे कविता सुनाना चाहता था।

द्वारपाल ने अंदर जाने देने के लिए शर्त रखी कि तुम्हारी कविता मे राजा की एक आँख का जिक्र जरूर हो। (उनकी एक आँख शीतला के प्रकोप से चली गई थी)

अंदर जाकर कवि ने कविता सुनाई –

ओरों की दो दो भली ते केहि के काज
तेरी एक ही आँख मे कोटि आँख की लाज

महाराजा रणजीत सिंह जी ने उसे बहुत पुरस्कार दिया।

2- एक बार उन्होने सेना के साथ जंगल मे पड़ाव डाला भोजन पकाते समय पता चला कि नमक लाना भूल गए। तब किसी ने कहा कि निकट के गाँव मे से जाकर नमक ले आए। जब सैनिक नमक लेकर आए तो महाराजा रणजीत सिंह जी ने पूछा

क्या नमक का मूल्य दे आए ?

सैनिको ने कहा – नमक का भी क्या मूल्य देना।

तभी महाराजा ने कहा तत्काल नमक का मूल्य दे कर आओ। यदि राजा मुफ्त मे नमक लेगा तो उसके सिपाही तो पूरा गाँव ही लूट लेंगे।

3- एक बार महाराजा कहीं जा रहे थे। तभी उनके माथे पर पत्थर आकार लगा। उनके माथे पर से खून बहने लगा। तभी सैनिक एक बुढ़िया को पकड़ लाए जिसने पत्थर फेंका था। बुढ़िया ने हाथ जो कर कहा कि वह अपने पोते के लिए फल तोड़ने के लिए पत्थर फेंका था जो गलती से उनके माथे पर लग गया।
महाराजा ने उस बुढ़िया को तत्काल कुछ धन दिया। सैनिको को बहुत आश्चर्य हुआ। तभी महाराजा ने कहा कि एक पेड़ पत्थर मारने पर फल देता है तो मैं क्या पेड़ से भी गया गुजारा हूँ?

महाराजा रणजीत सिंह को कोई औपचारिक शिक्षा नहीं मिली थी, वह अनपढ़ थे। अपने पराक्रम से विरोधियों को धूल चटा देने वाले रणजीत सिंह पर 13 साल की कोमल आयु में प्राण घातक हमला हुआ था। हमला करने वाले हशमत खां को किशोर रणजीत सिंह ने खुद ही मौत की नींद सुला दिया।

बाल्यकाल में चेचक रोग की पीड़ा, एक आँख गवाना, कम उम्र में पिता की मृत्यु का दुख, अचानक आया कार्यभार का बोझ, खुद पर हत्या का प्रयास इन सब कठिन प्रसंगों नें रणजीत सिंह को किसी मज़बूत फौलाद में तबदील कर दिया। उनके राज में कभी किसी अपराधी को मृत्यु दंड नहीं दिया गया था। रणजीत सिंह बड़े ही उदारवादी राजा थे, किसी राज्य को जीत कर भी वह अपने शत्रु को बदले में कुछ ना कुछ जागीर दे दिया करते थे ताकि वह अपना जीवन निर्वाह कर सके। वो महाराजा रणजीत सिंह ही थे जिन्होंने हरमंदिर साहिब यानि गोल्डन टेम्पल का जीर्णोधार करवाया था।

महाराजा रणजीत सिंह न गौ मांस खाते थे ना ही अपने दरबारियों को इसकी आज्ञा देते थे। सन 1805 में महाराजा ने भेष बदलकर लार्ड लेक शिविर में जाकर अंग्रेजी सेना की कवायद, गणवेश और सैन्य पद्दति को देखा और अपनी सेना को उसी पद्दति से संगठित करने का निश्चय किया. प्रारम्भ में स्वतन्त्र ढंग से लड़ने वाले सिख सैनिको को कवायद आदि का ढंग बड़ा हास्यापद लगा और उन्होंने उसका विरोध किया पर महाराजा रणजीत सिंह अपने निर्णय पर दृढ रहे।

महान इतिहासकार जे. डी कनिंघम ने कहा था-

” निःसंदेह रणजीत सिंह की उपलब्धियाँ महान थी। उसने पंजाब को एक आपसी लड़ने वाले संघ के रूप में प्राप्त किया तथा एक शक्तिशाली राज्य के रूप में परिवर्तित किया

डॉ विवेक आर्य

(सलंग्न चित्र- महाराजा रंजीत सिंह जी का राजध्वज

पुंसवन संस्कार

 पुंसवन संस्कार

 डा. अशोक आर्य

       मानव विकास के स्तम्भ स्वरूप जो सोलह संस्कार करने का आदेश महर्षि दयानन्द सरस्वती ने दिया है, उन्हीं की दूसरी कडी का नाम पुंसवन संस्कार है। यह संस्कार भी बालक के जन्म से पूर्व किया जाता है। पोषण को ही पुंसवन कहते हैं। अतः जब यह निश्चय हो जाता है कि गर्भ ठहरगया है तो उसके पोषण की आवश्यकता होती है। गर्भ स्थ शिशु के पोषण का प्रमुख आधारमा जिसके गर्भ में शिशु पल रहा है, ही होती हैअतः इस समय सभी प्रकार की जिम्मेवारियां मां की ही होती हैं । इस समय मां जैसा चाहे उसे ढाल सकती है जन्म के पस्चात् बालक को बिगाडने वाली माताओं को पता होना चाहिये कि यह उनकी भूलों का ही परिणाम है। जो समय उन्हें बालक के निर्माण का मिला था , उस का सदुपयोग उन्होंने नहीं किया । जो ढल गया , तो फिर उसे नया रूप कैसे दें?

      मां के गर्भ में शिशु का शारीरिक व मानसिक दो रूपों में विकास होता है। इन दोनों प्रकार के विकास के लिए दो संस्कारों का विधान किया गया है। जिन्हें पुंसवन व सीमन्तोनयन संस्कार के नाम से जानते हैं। यहां हम पुंसवन संस्कार के विषय में बताने का प्रयास कर रहे हैं :

      जब यह निश्चय हो जाता है कि गर्भ स्थिर हो गया है तो उसकी व उसे गिरने से बचाने के लिए यह संस्कार दूसरे अथवा तीसरे ने किया जाता है। जब स्त्री को ऋतुनाव आना बन्द हो जावे , उसे वमन आने लगे, स्तन व पेट बढने लगे, यह सब गर्भस्थ अवस्था लक्षण हैं। इस अवस्था में उसे कई सावधानियां करनी होती हैं ताकि गर्भपात भी न हो तथा सन्तान पुष्ट भी हो । गर्भस्त महिला को ऊंचे नीचे स्थान पर चलने, कठोर परिश्रम, गैस व भूखे रहने से गर्भ मखता है। ऊचे स्थानों पर चलने से ,गर्भ दबाव, डरावने शब्द व सपने से या सीधे पडे रहने से गर्भस्थ बालक मर सकता हैगर्भवती केकई प्रकार के कई गलत आचरण होने वाली सन्तान के पागल पन व कई प्रकार के अन्य रोगों का कारण होते हैं |

      अतः गर्भ धारण से लेकर प्रसव पर्यन्त गर्भवती सदा प्रसन्न रहे, आभूषण व अच्छे वस्त्र पहने,सभी प्रकार के धर्म कर्म करते हुए वैसा ही व्यवहार करे जैसा वह सन्तान को बनाना चाहती है। ऐसी कोई भी चेष्टा न करे जिससे गर्भ को हानि हो । अपने खाने में भी पौष्टिक तत्वों का प्रयोग करे। कठोर व वातकारी पदार्थों का सेवन न करे।

      इस संस्कार का उद्देश्य गर्भस्थ संतान की रक्षा होने के कारण ही महर्षि ने लिखा है कि गर्भ के दूसरे व तीसरे महीने वट वृक्ष (बरगद) की जटा व पत्ते गर्भिणी स्त्री के दाएं नासा पुट में सुंघाने उपयोगी हैंइन दिनों ब्रह्मी या गिलोय का खाना भी लाभकारी हैइसी प्रकार अन्य ढंग से भी उसके शरीर को बनाए रखने के लिए उपाय करने चाहिये ।योग्य चिकित्सकों का परामर्श व मार्गदर्शन सदा प्राप्त करते रहें । इन दिनों गर्भवती की पुष्टि का ध्यान र आवश्यक होता हैप्रत्येक माह गर्भवती की अवस्था बदलती एक उस के अनुसार ही उसके खानपान व सावधानिायों में भी पशि आता रहता है। अतः योग्य चिकित्सक व किसी वयोवृद्ध से निर परामर्श करते रहना चहिये तथा समय समय पर यथावश्यक खान पान में परिवर्तन करते रहना चाहिये कैल्शियम की मात्रा बढाएं व कब्ज किसी भी अवस्था में नहीं होने दें।

      पति अपनी पत्नि का सार्वजनिक रूप से हृदय स्पर्श करे। यह न केवल प्रेम का प्रतीक ही है अपितु यह घोषणा भी करता है कि वह आने वाली बडी जिम्मेवारी को खुशी से पूरा करने के लिए तैयार हैसभी चाहते हैं कि उनकी सन्तान पुरुषत्व से युक्त हो अर्थात् हृष्ट पुष्ट व पौरुष से भरपूर हो । सन्तान में यह गुण स्थापित करना ही पुंसवन संस्कार का मुख्य कार्य है। जहां तक सन्तान के पुत्र या पुत्री का होना है , यह गर्भ निश्चित होने के पश्चात् किसी भी प्रकार बदला नहीं जा सकता, ऐसा शास्त्रों का मानना है |

      इस संस्कार का एक अन्य उद्देश्य यह भी है कि गर्भ जिन कारणों से गिरने व नष्ट होने की सम्भावना होती है, सावधानी पूवर्क उनसे बचाते हुए प्रस्वावस्था तक उसे पूर्ण स्वस्थ रखा जा सके । एतदर्थ कुछ औषध भी बताई जाती हैं तथा सावधानियां भी , जिनका प्रयोग करते हुए परिपुष्ट सन्तान को जन्म दिया जा सकता है।

नामकरण सस्कार

नामकरण सस्कार

डा. अशोक आर्य

       मानव अनेक इच्छाओं व आकांक्षाओं से बालक की अभिलाशा  करता है। उसी आकांक्षा से गर्भाधान संस्कार होता है। गर्भ स्थापित होने के पश्चात् वह पुंसवन संस्कार करता है ताकि गर्भस्थ शिशु का शरीर पृष्ट हो सके। फिरसीमनतोन्नयन संस्कार के माध्यम से गर्भ स्थ शिशु में मनन शक्ति का वेग लाने का प्रयास करता है। जन्म होने के पश्चात् जातकर्म के माध्यम से भी उस बालक में वेदानुसार आध्यात्मिक विचार बनाने के लिए तथा सुगन्धित व्यंजन ग्रहण करने की प्रेरणा से उसकी जिह्रा पर मधु व घी के मिश्रण के साथ सोने की सलाई से ओ३म् लिखकर उसके कान में वेदो ऽ सीति कहा जाता है ताकि वह बालक जैसा हम बनाना चाहते हैं, वैसा व्यवहार करे किन्तु यह सब करने पर भी अभी बालक को कोई संज्ञात्मक नाम नहीं दिया गया होता, जिस से न केवल उसकी अपनी कोई पहचान बन सके तथा उसे बार बार याद आए कि उस ने न केवल माता पिता कि सभी इच्छाए। आकांक्षाएं पूर्ण करनी हैं। अपितु उसके व्यक्तित्व में भी निखार आने की सम्भावना बने। जिस नान को पुकारने पर उसे बार बार याद आ कि माता पिता ने किस इच्छा से उसे इस संसार के दर्शन करवाए किस भावना से उसका इतना सुन्दर नाम रखा है। उसनसम्बोधन से ही उसे अपने कर्तव्यों व इद्देश्य की याद आती रहे।

      आज लोग महर्षि के बताए मानव के नवनिर्माण के सूत्र सोलह संस्कारों से दूर होते चले जा रहे हैं। किन्तु नामकरण संस्कार को किसी न किसी रूप में आज का मानव आज भी कर रहा है क्यों कि नाम के बिना किसी बच्चे का व्यक्तित्व किसी अन्य से अलग नहीं हो सकताइसके बिना किसे सम्बोधन किया जा रहा है, इसका ज्ञान कैसे होगा? यही कारण है कि चाहे सभी संस्कार समाप्त हो जावें किन्तु नामकरण संस्कार फिर भी होता ही रहेगा। 

      नाम का बच्चे पर विशेष प्रभाव होता है ,क्योंकि हम जैसा सोचते हैं, वैसा ही हम करते भी हैं । अतः यह मन व कर्म के मध्य में स्थित शब्द है जो दोनों को प्रभावित करता है। अतः विचार व कर्म दोनों एक दूसरे से कभी अलग नहीं होते । शब्द का महत्व पढने से कहीं अधिक होता हैयही कारण है कि जो हम पुस्तकों में पढते हैं, उसे इतनी शीघ्रता से याद नहीं कर सकते जितनी शीघ्रता से गुरु मुख से सुनकर याद रखते हैं । यह शब्द ही नाम का रूप हैं । यही शब्द है जिसे हम एक बालक के नाम स्वरूप चुनते हैं, जिसका जीवन पर्यन्त इस बालक के लिए प्रयोग होना है। अतः यह शब्द इतना सार्थक व व्यवहारिक हो कि जब भी इस शब्द से उसे बुलाया जावे तो उसे शब्द की भावना भी याद आ जावे। 

      बालक का नाम निर्धारित करते समय ऐसा अर्थ पूर्ण रखा जावे कि जिसके सम्बोधन मात्र से ही बालक ही नहीं ,उसे सुनने वाले प्रत्येक व्यक्ति को पता चले कि उसके माता पिता उससे क्या इच्छाएं रखते हैं। महाष ने इसीलिए लिखा है कि नाम रखते समय यह ध्यान रहे कि यह नाम जड पदार्थो या पशु पक्षियों के निरर्थक नाम जैसा न हो। नाम सदा ऐसा रखा जावे, जो ऊंची भावना को जागृत करे। इसी नाम के बालक को सम्बोधन तो करना ही होता है साथ ही उस के पीछे छिपी ऊंची भावना का भी पता चले । नाम से ही बालक को पता चले कि उसने जीवन में क्या करना है ? बुरे ऐतिहासिक सम्बन्ध से जुडे नाम रखने से भी बचना चाहिये । नाम सदा ऊंची भावनाओं से युक्त ही होने चाहिये। केवल वैदिक संस्कति ही ऐसी प्रेरणा देती है। अन्य संस्कृतियों में तो निरर्थक नाम रखने की आम परम्परा है। वास्तव में नाम से जीवन को एक लक्ष्य मिलता है, एक दिशा मिलती है। इसीलिए कहा गया है कि नाम न केवल नई दिशा देने वाला ही हो अपितु उच्चारण में सुगम भी हो। संयुक्ताक्षरों वाले नाम को तोडकर व कठिन नाम को लोग बिगाड कर बोलने लगते हैं । अतः ध्यान रहे कि नाम ऐसा हो जिसे न तो तोडा जा सके और न ही बिगडने वाला नाम हो।

      एक संस्कार विधि स्पर्श, अन्तःस्थ , स्वर वाले नाम उच्चारण में सरल नामों को उपयुक्त बताती है। अतः नाम ऐसा हो कि जिसमें क ख च छ ट ठ त थ प फ का प्रयोग कम हो क्यों कि इनके उच्चारण के समय शरीर को अधिक चेष्टा करनी होती है। यदि नाम में ग घ ज झ ड ढ द ध न ब भ म य र ल व ह के अक्षरों का प्रयोग होता है तो लघु प्रयत्न से मधुर शब्द निकलता है। इसलिए नाम चयन कर्ता को ऐसे अक्षरों को नाम में रखने पर ध्यान देना चहिये । तद्धितान्त अर्थात् माता पिता सूचक नाम रखना भी अच्छा नहीं हैऐसे नाम शक्ति लगा कर बोले जाते हैं, जो उत्तम नहीं है। यह व्यवहारिक भी नहीं है। अतः नाम सरल,व सुगम के साथ ही सार्थक व सप्रयोजन होने चाहिये।

      यह भी ध्यान रखे कि बालक का नाम यग्म व कन्या का नामा अयुग्म अक्षरों से होना ही उत्तम है । युग्म का अर्थ है दो या चार अक्षरों का नाम तथा अयुग्म का अर्थ तीन अक्षरों के नाम से होता है। वास्तव में यह पारिवारिक परिचय की भावना से ही है। इसी से बच्चे की पारिवारिक पहचान बनती है। यह भी है कि बालक के नाम दो प्रकार से रखे जावें, एक सार्थक नाम , जो संस्कार विधि से रखे जावे दूसरे पारिवारिक नाम, जिन का प्रयोग माता, पिता व गुरूजन करें। सार्थक नाम से बालक के जीवन के लक्ष्य का पता चलता है। दूसरा नाम नामकरण के बिना ही प्रेम के नाम के रूप में जाना जाता है। ऐसा नाम केवल उपनयन संस्कार अर्थात् स्कूल प्रवेश से पूर्व तक ही प्रयोग में लाना चाहिये । अर्थात् नामकरण वाला नाम तो आजीवन चले किन्तु प्यार का नाम छोटी आयु में ही छोड दिया जावे। यह भी कहा जाता है कि जन्म की तिथि व नक्षत्र के आधार पर एक नाम रखा जावे तथा दूसरा नाम जो जीवन भर चले, वह ऐसा रखा जावे , जैसा हम बालक को संस्कारित कर बनाना चाहते हैं। नामकरण संस्कार साधारणतया जन्म के ११वें अथवा १०१ वें दिन करना चाहियेयह जन्म के दूसरे वर्ष करने की भी स्वीकृति दी गई है | 

      वैदिक संस्कृति सूंघने तथा स्पर्श पर बल देती है। अतः बच्चे को गोद में लेकर इसके नासिका छिद्र के पास ऊंगली का स्पर्श किया जाता है। इससे बच्चे का ध्यान स्वयं ही उसकी नासिका की वायु को स्पर्श करने वाले की और आकर्षित होता है। इससे माता पिता के अन्तःकरण की भावना उस बच्चे तक पहुंचती है। अतः जब पिता नासिका के समीप वायु स्पर्श करता है तो बच्चे को अनुभव होता है कि उस का प्रिय व्यक्ति उसे गोद में लेकर उसे प्रेम से सहला रहा है। 

सीमन्तोन्नयन संस्कार

सीमन्तोन्नयन संस्कार

डा. अशोक आर्य 

      मानव जीवन में संस्कारों का अति महत्व होने के कारण ही संस्कारी संतान में सब की अभिरुचि होती है। मानव में जन्म से पूर्व ही संस्कार डालने की प्राचीन परम्परा को अनवरत बनाए रखने के लिए महर्षि दयानन्द सरस्वती ने मनुष्य को बार बारसंस्कारित करने के लिए अपने अमर ग्रन्थ संस्कार विधि में सोलह संस्कारों की जो व्यवस्था की है तथा उपदेश किया है कि गर्भावस्था से मृत्यु पर्यन्त कम से कम सोलह बार तो इसे स्मरण दिलाना ही चाहिये कि हे मनुष्य ! तूं ने अच्छा बनना है। इतना ही नहीं पूरे संसार को भी अच्छा बनाने का कर्तव्य समाज ने उसी के कन्धों पर ही डाला हैअतः उत्तम संस्कारों को ग्रहण करते हुए वह संसार के अन्य लोगों को भी सुपथ पर लाने के लिए कार्य करे, यह भी सुसंस्कारी होने का एक भाग है |

       महर्षि दयानन्द सरस्वती ने जिन सोलह संस्कारों का विधान मानव जीवन में किया है , उनमें से तीन संस्कार जन्म से पूर्व गर्भा वस्था में होते हैं तथा शेष तेरह संस्कार जन्म के पश्चात् होते हैं । जो तीन संस्कार मानव के जन्म से पूर्व गर्भावस्था में होते हैं ,उनमें सीमन्तोन्नयन संस्कार तृतीय व गर्भावस्था में अन्तिम संस्कार हैइस संस्कारको सीमन्तोन्नयन संस्कार इस लिए कहते हैं क्योंकि यह ना है अर्थात् यह या में शिशु की अन्तिम सीमा का सरकार होता है विस्था की सीमा तथा जन्म की सीमा के मध्य का संस्कार होता है | 

      इससे पूर्व पुंसवन संस्कार में शारीरिक वृद्धि के अनुरूपः आगरकी कामना करते हुए गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य को पुष्टि देने की कामना व प्रयास किया गया है। यह पुष्टि तभी ही किसी उपयोग की होती है जब इस को दिशा देने वाला मरित ष्क भी सबल हो। सीमन्तोन्नयन संस्कार का उद्देश्य मनोवेगों को शक्ति प्रदान करना है। यह मानसिक विकास की कामना के लिए किया जाता है। अतः शारीरिक पुष्टि के पश्चात् गर्भस्थ शिशु की मानसिक पुष्टि ही इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है| 

      सुश्रुत के अनुसार मानव का शिर पांच संधियों का केन्द्र स्थान है। यदि थोडी सी असावधानी हो जावे तथा किसी कारण गर्भस्थ शिशु पर चोट लगने से , पागलपन, डर या भय होने से अथवा चेष्टा विहीन होने से उस का स्वास्थ्य सही नहीं रहता तथा इस अवस्था में मृत्यु भी हो जाती है। सिर में जो पांच संधियां होती हैं, उनका केन्द्र स्थान होने से , उनका सीमा स्थान होने से उसे “ सीमन्त भी कहते हैं। क्यापि इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य गर्भस्थ शिशु की मनन प्रक्रिया बढाना होती है इसका मानसिक विकास करना होता है । सीमन्त मस्ति ष्क को ऊपर उठाना होता है। इसलिए इस नामकरण भी “सीमन्तोन्नयन” नाम से किया गया है। अतः उपयुवा व्याख्या के सन्दर्भ में सीमन्तोन्नयन सरकार से अभिप्रायः संस्कार,जिससे माता का ध्यान अपनी गर्भस्थ संतान के मानसिक के विकास में लगे। 

      महर्षि दयानन्द सरस्वती ने संस्कार विधि में पारिवारिक प्रेम का प्रदर्शन करने की विधि दी है। महर्षि का मानना है कि यदि परिवार में पति व पत्नि प्रेम पूर्वक व प्रसन्न रहेंगे तो , उनकी भावी सन्तान भी सब को प्रेम बांटने वाली तथा सदा प्रसन्नचित्त रहने वाली होगी। अतः इस अवसरपर परिवार के मुखिया पति व पत्नि सदा प्रेम बांटते हए सदा प्रसन्न मुद्रा में रहते हुए अपनी गर्भस्थ सन्तान के मानसिकविकास पर अपना ध्यान केन्द्रित किये रहें क्योंकि मानसिक विकास ही सभी उन्नतियों का आधार है। माता पिता अपनी सन्तान को जैसा बनाना चाहते हैं, ठीक वैसा व्यवहार उन्हें एक दूसरे से करना चाहिये तथा ठीक वैसा वातावरण अपने चारों और बनाना होगा । वैसी कथाएं सुनाना तथा वैसे चित्र अपने कमरे में लगाना भी इस कार्य के लिए सहयोगी होगा ! यही वह अवसर है जिसे कभी खोने नहीं देना चाहिये । यदि यह अवसरहाथ से निकल गया तो जन्म लेने के पश्चात् उसके पिछले संस्कारों को बदलना सम्भव न होगासभी अच्छे या बुरे वातावरण का प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर पडना अवश्यम्भावी है। अतः अपने आप को साफ सुधरेवातावरण में , साधु संगति में तथा वीरोचित्त कथाओं के श्रवण व दर्शन में लगाना ही उचित है। नारी की इस अवस्था को दोहद कहा जाता है क्यों कि गर्भवती का एक हृदय तो अपना होता है तथा दूसरा गर्भस्थ शिशु का , जिसके संचालन व निर्माण का कार्य भी उसे ही करना होता है। अतः वह इस समय दो हृदयों वाली होती हैइस अवसर पर बालक के हृदय के धडकन की आवाज भी सुनाई देने लगती है। इस समय माता से सन्तान जूडी होती है। अतः क रक्त से ही उसका पोषण हो रहा होता है। इस समय माता में आ का जागृति होती है। यह इच्छाएंसन्तान से ही सम्बन्धित अनक इच्छाओं की जागृति होती है| यह इच्छाए संतान से ही सम्बंधित होती हैं। इस अवस्था में ही नहीं, जब शिशजन आदि खाने की रहती है। हो रही है, जिसे पूरा या में ही नहीं , जब शिशु जन्म ले लेता है तथा मांकन पपीता है तब भी मां की अभिला षा चाक आदि खानेकी इसका कारण है कि उसमें कैल्श्यिम की कमी हो रही है करने के लिए वह ऐसी वस्तुएखाने लगती है। इस अव बच्चे दोनों को ही कैल्शियम की दवा देनी चाहिये।

      चतर्थ माह में माता को अपनी गर्भस्थ सन्तान को अपने संस्कार देते हुए उसे पूर्व जन्म के संस्कारों से विमुख करना होता है। सन्तान के पूर्व जन्म के धुंधले संस्कार न केवल बालक को ही बल्कि उसकी गर्भवती माता को भी प्रभावित करने लगते हैं। यही वह अवसर होता है कि माता इस पर अपनी छाप अंकित करे। यदि इस समय माता अपने प्रबल संस्कार उस पर डालेगी तो इसके विगत संस्कारों की प्रबलता मन्द हो जावेगीअतः इस अवसर पर माता को चेष्टा पूर्वक वह सभी कथाएंसुननी चाहिये व वह सब दृश्य देखने चाहिये, जैसा वह अपनी भावी सन्तान को बनाना चाहती है। यह वही अवसर है जब वीर अभिमन्यु के समान गर्भ में शिक्षा प्राप्त की जा सकती है। यह अवसर ऐसा है, जिसका सदुपयोग माता अपनी सन्तान के निर्माण के लिए कर सकती है। यही वह अवसर है जिसमें नव मानव का कार्य किया जा सकता हैधर्म परायण व देशभक्त , मातृ पितृ भक्त सन्तान बनाने का यह ही अवसर है। इसे खोना अपने आपको विपत्तियों में डालने के समान हैयह वैदिक संस्कृति ही है, जिसमें गर्भ से पूर्व ही संस्कारों से मानव के नव निर्माण की योजना बनाई गई है। विश्व की अन्य किसी भी संस्कृति में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है |  

      मानव निमोण का ही एक अन्य पक्ष भी इस सरकार इस संस्कार के अन्तिम चरण में किया जाता है। जब संस्कार विधि मे दर्शाई विधि के अनुसार संस्कार सम्पन्न हो जाता है तो अन्त में कुछ घी आदि बच जाते हैं। इन पदार्थों में गर्भवती महिला अपना प्रतिबिम्ब देखती है तथा इस अवसर पर पति पत्नी का एक वार्तालाप होता है। यह वार्तालाप ही गर्भस्थ सन्तान के भवि ष्य निर्माण का मुख्य साधन बनता है। महर्षि ने संस्कार विधि में इस अवसर पर पति के मुख से कहलवाया है कि हे सौभाव्ये ! तुम इसमें क्या देख रही हो। देखें इस अवसर पर महर्षि ने गर्भवती महिला के मुख से कितने सुन्दर शब्द निकलवाए हैं। यह शब्द ही गर्भस्थ शिशु के भावी जीवन का निर्माण करने वाले है। 

      पति के प्रश्न को सुनकर पत्नी उत्तर देती है कि इसमें मैं अपनी सन्तान को देख रही हूं, जो ऐसे ही पौष्टिकता प्राप्त कर रही है। मैं अपने घर में दुधारू पशुओं को देख रही हूँ, जिन के दूध के उपभोग स ‘मेरी सन्तान का शारीरिक व मानसिक विकास होता हुआ मुझे स्पष्ट दिखाई दे रहा है। इसके साथ ही साथ मैं इसमें अपने घर में उमड रहे सौभाग्य को देख रही हूं,जिस में धनैश्वर्ष की व र्षा हो रही है। इस के कारण सर्वत्र सुख ही सुख दिखाई दे रहा है। इतना ही नहीं इस घी खिचडी आदि में मैं अपने पति की लम्बी आय के भी दर्शन कर रही हूँमेरी सुसस्कारी सन्तान जब गौ आदि पशुओं के दूध व घी से तृप्त होगी व सब और सौभाग्य ही सौभाग्य होगा तो इसकी प्रसन्नता से हामारे परिजनों की लम्बी आयु निश्चित रूप से होगी , यह सब वह गर्भवती महिला इस समय देख रही है | 

      यह वह अवसर है कि माता की प्रत्येक गतिविधि का केन्द्र उसके गर्भ में पल रही सन्तान है। जब उसका रंग प्रति क्षण इसी प्रकार रंगा होगा तो निश्चित ही सीमन्तोन्नयन संस्कार का उद्देश्य पूर्ण हो रहा होगा । इस संस्कार का उद्देश्य माता के मन व मस्ति ष्क को इन विचारों से भर देना है कि जिससे उसे प्रति क्षण अपनी प्रत्येक गतिविधि में अपनी सन्तान का सुख दिखाई दे ,प्रत्येक क्षण दुधारू पशुओं के दर्शन हों ताकि उसके दूध आदि से परिवार व गर्भस्थ सन्तान को पुष्टि मिलती रहे । सर्वत्र उसे सौभाग्य दिखाई दे । धन ऐश्वर्ष दिखाई दे। इसके उपभोग से भावी सन्तान व परिवार की समृद्धि की वृद्धि हो सके तथा पति व परिजनों की दीर्घायु की प्रतिक्षण इच्छा हो तो निश्चित ही उसके गर्भ में पल रही सन्तान शिव संकल्प वाली होगी | हृष्ट पुष्ट होगी , मननशील व दृढ संकल्प होगी। जब सन्तान ऐसी आज्ञाकारी व सुखकारी होगी तो पूरा परिवार सुखी होगा। उसका नाम दूर दूर तक पहँच जावेगा । इस प्रसिद्धि के कारण परिवार के सदस्यों की प्रसन्नता ही उनकी लम्बी आयु का कारण बनेगी तथा सीमन्तोन्नयन संस्कार के करने का उद्देश्य सफल होगा।

जातकर्म संस्कार

जातकर्म संस्कार

डा. अशोक आर्य 

       यह संस्कार मानव जीवन का जन्मोत्तर संस्कार है। शिशु के जन्म के पश्चात् किया जाने वाला प्रथम संस्कार होने के कारण यह जातकर्म संस्कार है। इस संस्कार में शिशु की जाति का निर्धारण नहीं होता क्योंकि जाति का निर्धारण तो जन्म के साथ ही मनुष्य जाति के रूप में हो गया है। जातकर्म तो कुछ क्रियाओं का नाम है। यह क्रियाएं दो प्रकार की होती हैं। प्रथम वह जिन का शरीर व इन्द्रियों की सफाई से सम्बन्ध होता है। इन्हें कर्म कह सकते हैं तथा दूसरी वह जिन से शिशु को संस्कार देने होते हैं।

    १.जन्म लेने पर किये जाने वाले कर्म ” सफाई “ “

      जन्म से पूर्व गर्भावस्था में बच्चे के रहने का वातावरण जन्म के पश्चात् के वातावरण से पूर्णतया भिन्न होता है । जन्म पूर्व उस की सारी क्रियाएँ माता के माध्यम से होती हैं। इस समय वह पानी से भरी एक थैली में रहता है। बच्चे के नाक, कान , मुंह, आंख आदि श्लेष्मा से बन्द किये रहते हैं ताकि उसके इन अंगों में पानी न चला जाए। जन्म लेते ही जो प्रथम कर्म किया जाता है, वह है इन अंगों की सफाई जब तक इन अंगों की सफाई न की जाए ,तब तक यह अंग क्रियाशील गहा होते अतः इनकी सफाई करके इन्हें खोला जाता है तथा कान में श्रवण शक्ति आरम्भ हो ,इसलिए कान के पास पत्थरों को टकरा करी आवाज की जाती है। इस समय बच्चे को कय “उल्टी” करवा कर उस नाक व फेफडे भी साफ किये जाते हैं। इस हेतु सैंधव नमक घी में मिलाकर दिया जाता है। बच्चे के शरीर पर से थैली के दूषित पानी के लेवा का प्रभाव समाप्त करने के लिए साबुन के साथ उसे गुनगुने पानी से नहलाया जाता है। अब कान के पास पत्थर से आवाज करके कानों को सुनने की क्षमता दी जाती है। इस प्रकार शिशु की इन्द्रियों को सजग करना या इन्हें प्रयोग के लायक बनाना ही जातकर्म है |

      हावा यह सब क्रियाएं करने के पश्चात् सिरपर घी से स्निग्ध कियाकपडा या रूई रखी जाती है। यह इस लिए कि यहां सिर की तीन अस्थियों के सन्धि स्थान पर तालु होता है। यही वह स्थान है जहां से बच्चे के स्वस्थ होने का पता चलता है। इसे दृढ करने के लिए ही यहल घी युक्त रूई रखी जाती है। यह इसकी रक्षा भी करता है तथा इसेजना पोषण भी देता है। इससे सर्दी आदि से भी रक्षा होती है। इसी प्रकार घी व मधु ( विषम भाग ) को सोने की श्लाका से जिह्वा पर “ओ३म् लिखने का आदेश दिया है। मधु व घी तो उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करता हैतथा भोजन की प्रेरणा देता है। जबकि ओ३म् प्रभु के स्मरण व आशीर्व द स्वरूप लिखा जाता है। जो उसे अध्यात्म के मार्ग पर चलने का द्योतक है |

    २. जन्म के समय के संस्कार

        ऊपर हमने बताया है कि जन्म लेते ही उसकी पांचों इन्द्रियों को साफ करके इन्हें ठीक से कार्य करने के योग्य बनाया जाता है तथा उर भोजन करना चाहिये ताकि स्वस्थ रह राके, इसका परिचय भी उसे दिया जाता है। अब इसे ऐरो संस्कार देने हैं कि वह जीवन पर्यन्त उन्हीं को सम्मुख रख अपने जीवन को एक निश्चित दिशा में चला सके। माता पिता व सन्तान , यह दोनों पक्ष आपसी व्यवहार से सरकार की किया करते हैं। माता पिता बालक की जिहा पर ओम लिख कर यह जिम्मेवारी लेते हैं कि वह अपनी सन्तान को ईश्वरीय “आध्यात्मिक मार्ग पर चलाएगा । बच्चा भी कुछ बड़ा होकर अपने माता पिता की आकांक्षाओं को पूर्ण करने का प्रयास करेगा। यह सरकार उसे ऊंचे से ऊंचा उठाने के लिए है।

      बालक का अध्यात्म की तरफ झुकाव तभी होगा जब उसमें एगे विचार भी होंगे। इसलिए बालक केकान में पिता कहता है “वेदोऽसीति” अर्थात् हे बालक ! तू ज्ञान वाला प्राणी है। जो बात कान में कही जाती है उसका महत्त्व अधिक होता है। अतः बालक जीवन पर्यन्त इस बात को स्मरण रखता है कि उसे ज्ञानी बनने का उपदेश पिता ने दिया है कि में मेहनत कर के पिता की आकांक्षाओं पर खरा उतरूंगा। इस से मौज मस्ती के साथ ही साथ आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करते हुए यथार्थ में विचरण करने की प्रेरणा दी गई है |

      इस प्रकार न केवल जन्म से पूर्व अपितु जन्म लेने के पश्चात् भी आजीवन उसे स्मरण दिलाया जाता है विभिन्न संस्कारों के माध्यम से कि उसने ऊंचे वैदिक आदर्शों को प्राप्त करने के लिए, दूसरों की सहायता व मार्ग दर्शन देने के लिए उच्च वैदिक ज्ञान को प्राप्त करना इससे इसका अपना कल्याण तो होगा ही, अन्य भी इससे लाभान्वित हाग।

उपनयन संस्कार

उपनयन संस्कार

डा. अशोक आर्य 

       इस संस्कार को वेदारम्भ संस्कार भी कहते हैं। यद्यपि वेदार संस्कार गुरुकुल में किया जाता है किन्तु गुरुकुल जाने से पूर्व पित निवास पर वेदारम्भ हेतु ही उपनयन किया जाता है। इस कारण ही इसे वेदारम्भ संस्कार भी कह देते हैं । बालक को शिक्षा प्राप्ती हेत विद्यालय में भेजने से पूर्व जो संस्कार किया जाता है , उसे उपनयन संस्कार कहते हैं। परमपिता परमात्मा ने बालक को जन्म से ही आंख तथा इससे देखने की शक्ति दी है। ताकि वह सांगारिक सुख प्राप्त कर सके। मनुष्य को प्रभु ने मस्ति ष्क भी दिया है। जिससे वह ज्ञान अर्जन कर सके। इसी ज्ञान की प्राप्ति के लिए जब बाल अवस्था में उसे गुरुकुल में प्रवेश दिलाया जाता था तो पहले उसका उपनयन संस्कार किया जाता था। यह ही शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार का प्रमाण पत्र होता था। ऐसे बालक को द्विज के नाम से पुकारा जाता था। इस द्विज शब्द का अर्थ है दूसरा जन्म । माता पिता के माध्यम से बालक का जन्म, प्रथम जन्म माना जाता है किन्तु जब इस संस्कारकेमाध्यम से बालक ब्रह्मचर्य के तप में तपते हुए उच्च से उच्च शिक्षा प्राप्ति के लिए निकलता है तो इसे दूसरा जन्म कहते हैं। मनु महाराज तो मानते हैं कि जन्म से सभी शुद्र होते हैं। यह तो संस्कार ही हैं जो उसे अज्ञानता से निकाल कर उन्नति केमार्ग पर ले जा कर द्विज बना कर वेदाध्ययन अधि – कारी बनाते हैंअतः अब तकजो जिम्मेवारी मानव केनवनिर्मा ण की माता पिता अपने कन्धों पर उठाए हुए थे, उसे आचार्य के हाथों सौंपने का नाम ही उपनयन संरकार है |

      इस सरकार के अवसर पर बालक को तीन रात्रों वाला धागा पहनाया जाता है , जिसे यज्ञोपवीत या जनेऊ कहते हैं । इस सूत्र को महर्षि के मतानुसार लिखा है कि जिन बच्चों को शीघ्र शिक्षा देनी हो तथा बच्चे में भी एतदर्थ सामर्थ्य हो, ऐसे ब्राह्मण पुत्र को जन्म अथवा गर्भ से पांचवें वर्ष , क्षत्रिय की सन्तान को छठे वर्ष तथा वैश्य सन्तान को आठवें वर्ष यज्ञोपवीत संस्कार कर विद्या प्राप्ति का अधिकार दे देना चाहिये । आज इस संस्कारों की परम्परा कम होते हुए भी, जिन का यह संस्कार नहीं हुआ होता ,विवाह पूर्व एक परम्परा स्वरूप यह संस्कार किया जाता है।

      जीवन के आरम्भिक व षों में शिशु को घर पर रखते हुए माता पिता के लिए जो सम्भव था, वह बालक को सिखाया, अब वह इस बालक को किसी विषय के विशेषज्ञ को सौंप रहे हैं, इसी समर्पण का नाम ही उपनयन संस्कार है। यदि किसी बालक का प्राचीन युग में इस निश्चित समय सीमा में यह संस्कार नहीं होता था तो लोग पूछते थे कि इस बालक का उपनयन संस्कार क्यों नहीं किया जा रहा ? क्या वह मुर्ख तो नहीं ? आदि । यहां यह भी उल्लेखनीय है कि प्राचीन काल में यज्ञोपवीत के सूत्र कपडों के ऊपर पहनने की पारम्परा थी। पारसी व रोमन तो आज भी इसे कपडों के ऊपर ही पहनते हैं। पारसियों का कुस्ती तथा रोमन पादरियों का कोट पर बंधा पटा इसी का ही एक रूप है।

      यज्ञोपवीत धारी को बडी प्रतिष्ठा की दृष्टि से देखा जाता इसी प्रतिष्ठा की प्राप्ति के लिए सभी माता पिता अपने बच्चों का संस्कार अवश्य ही करवाते थे। यही संस्कार पारसियों में गया तो कहा गया कि जो कुस्ती को धारण नहीं करता , उसे मृत्यु दण्ड कि जावे। दोनों समुदायों में इस अवसर पर जो मन्त्र बोला जाता है. दोही का अर्थ भी एक जैसा ही हैवैदिक संस्कृति के इस उपनयन संस्कार का प्रभाव जहां पारसियों व रोमन लोगों में दिखाई देता है. वही मुसलमानों ने भी इसे कुछ रूप में आज भी अपना रखा है। हमारे गायत्री मन्त्र की ही भाँति बालक को मुसलमान बिस्मिल्ला पढने के लिए कहते हैं । इसी प्रकार ईसाई भी बप्तिस्मा अर्थात् पुनरुत्पत्ति का सन्देश देते हैं। यह भी तो उपनयन संस्कार ही है |

      हमारे आचार्यों ने उप का अर्थ समीप तथा नयन का अर्थ ले जाना किया है। जब माता पिता अपने बालक को गुरु के समीप ले जा कर उसे शिक्षा देने की याचना करते हैं तो उस उपनयन कहा जाता है। इस अवसर पर गुरु बालक के चित्त व हृदय अर्थात् इन दोनों निधियों को ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित करने का कर्तव्य अपने ऊपर लेता है। ऐसे शिष्य को अन्तेवासी कहा गया है। इस से भाव है कि जो गुरु के अन्दर बसा हुआ हो। यह सामिप्य ही इसे उत्तम शिक्षा प्राप्ति का साधन देता है। अब गुरु बालक की ठीक उसी प्रकार देखभाल करता है, जिस प्रकार गर्भ काल में माता करती है। इससे उत्तम कोई अन्य उद्धरण नहीं हो सकता |

       काम हम जो यज्ञोपवीत के तीन सूत्र पहनते हैं, यह हमें हमार कर्तव्यों या तीन ऋणों के सूचक हैं। यह हैं ऋषिऋण , पित गर्षण , पितऋण तथा ; बार यह ही ब्रह्मचये, गृहस्थ व वानप्रस्थ ,तीनों आश्रमों का बोध है। जब हम इन तीनों क्रणों से उक्रण हो जाते हैं तो यज्ञोपवीत वारयज्ञाग्नि में डालकर संन्यास ले कर जनकल्याण में जुट जाते दस प्रकार यज्ञोपवीत के माध्यम से हम प्रथम तार का यह भाव पारण करते हैं कि हमारे पूर्वजों ने जिस प्रकार ज्ञान का भण्डार एकत्र कर हमें दिया है, वह क्रण स्वरूप हमारे पास है। हम भी इसी प्रकार ज्ञान का संकलन कर इसे आगे बांटेंगे। यही ब्रह्मचर्य आश्रम है , यही ऋषि ऋण उतारने की विधि है। इसका दूसरा तार हमें माता पिता के कण को उतारने की प्रेरणा दे रहा है। भाव यह है कि जिस प्रकार माता पिता ने गृहस्थ करके सन्तानोन्पत्ति से संसार को आगे बढाया है, उसी प्रकार शिक्षा प्राप्त कर हम भी गृहस्थ के माध्यम से समाज का उपकार करते हुए संसार को आगे बढाने का प्रयास करेंगे। इस का तीसरा तार हमें देव क्रण से भी मुक्त होने के लिए प्रयास करने की प्रेरणा दे रहा है। जिस प्रकार हमारे माता पिता ने ग्रहस्थ केपश्चात् वाणप्रस्थ ग्रहण कर समाज के उपकार व सेवा की प्रतिज्ञा ली , वैसे ही हम निश्चित समय आने पर ग्रहस्थ त्याग वानप्रस्थ लेकर तीसरे क्रण को भी उतारेंगे।

      का यहां यह बात भी वर्णनीय है कि वैदिक समाज व्यवस्था में पुरुष व स्त्री को सभी कर्तव्य समान रूप से करने का आदेश दिया गया हैइसलिए कन्याओं को भी पुरुषों के ही समान यज्ञोपवीत पहनने का अधिकार है। प्राचीन काल में कन्याएं भी इसे धारण कर गुरुकुलों में शिक्षा पाने जाती थीं। गार्गी, मैत्रेयी जैसी विदुषियां इसी का ही सुन्दर उदाहरण हैं। इसी प्रकार प्राचीन काल में पुरुषों के ही समान कन्याओ का भी वेद पढने का समान अवसर प्राप्त था । २५ [ समान अवसर प्राप्त था। इस विषय में महर्षि दयानन्द सरस्वती ने अथर्ववेद के उदाहरण देते हुए लिखा है भाव है कि कन्या ब्रह्मचारी रहकर युवा पति को प्राप्त होती हैउपनयन संस्कार से ही सम्भव है। अनेक स्थानों पर कई मन के पढने के आदेश हैं । वह इन्हें कैसे पढेगी ? तभी जब डलर वेदाध्ययन किया होगा । कई वेदमन्त्रों की स्त्री ऋषिकाएं भी हुई सरमा,अपाला जैसी अनेक महिलाओं ने वेद के गूढ रहस्यों को खोल हैआज तो हम देख रहे हैं कि शिक्षा के क्षेत्र में स्त्री पुरूषों से भी आगे निकल रही हैं। अतः एतदर्थ अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं रह जाती।

      इस अवसर पर उपनयन के इच्छुक बालक कई विधियां करते हैं , जिन को उपमा स्वरूप व प्रतिज्ञा स्वरूप किया जाता है । पितृ उपदेश भी इसी समय लिया जाता है। वदारम्भ हेतु उपनयन के अवसर पर गुरुकुल भेजते समय पिता अपने बालक को बाइस प्रकार के उपदेश व आदेश देता है। इनमें वह कहता है कि हे पुत्र ! अब तूने ब्रह्म विचरण करना है। इस समय जल का खूब प्रयोग करना तथा सदा शीतल रहना । सदा विद्याभ्यास में लगे रहना, इस हेतू दिन में कभी मत सोना,दिन में काम में व्यस्त रहना , अपने आचार्य की आज्ञा में अपने आप को रखना , वेदों का नियम पूर्वक अध्ययन करना ,यह भी ध्यान रहे कि आचार्य यदि कोई गल्त आज्ञा दे तो उसका पालन कभी मत करना , हां ! कभी क्रोध न करना व झूठ, गन्दे व कुटिल व्यवहार सदा बचकर रहना ,मैथुन से बचते हुए भूमि शयन करना। बजाने व सौन्दर्य प्रसाधनों का कभी प्रयोग मत करना , प्रातःक नित्यकर्म से निवृत होना , अपनी सजावट के लिए उस्तरे आदि का प्रयोग न करना , मांस , मदिरा व सूखे अन्न का सेवन का सेवन न करना तपस्या में व्यवधान न आने देते हुए बैल, घोडे, ऊंट आदि तथा तमान युग में गाडी, बस आदि सवारी का प्रयोग न करना, गुरुकुल समार्जन काल में गांव में निवास न करना तथा कभी जुता व छाता का योग न करना , अकारण उपस्थेन्द्रिय को मत छना , उर्ध्वरेता बनना, शारीर की शोभा को बढाने वाले पदार्थों के प्रयोग से वर्जित करते हुए कहा है कि तैलादि से शरीर को मत चुपडना ,खाद के लिए मिर्च, मसाले आदि मत खाना.आहार विहार की नियमितता का ध्यान रखते हए वेदाध्ययन करना, सभ्यता सीखते हुए, कम बोलते हुए सुशील बनने का प्रयास करना तथा दण्ड व मेखला धारण किये रखना, भिक्षा चर्या करना, संध्या व यज्ञादि में प्रमाद मत करना, स्नान. आचार्य के प्रति सम्मान, विद्या का संग्रह, जितेन्द्रिय व्रत में रहते हुए सभी प्रकार से धर्म का पालन करना । ऐसा सुन्दर पित आदेश वैदिक संस्कृति के अतिरिक्त कहां मिलेगा।

      इस अवसर पर प्रायः बालक इस प्रकार प्रतिज्ञा करता है कि यह जो उापनयन संस्कार के माध्यम से में ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रवेश कर रहा हूं. उसके अनुरूप गुरु के प्रत्येक उत्तम आदेश को शिरोधार्य करते हुए उच्च से उच्च शिक्षा प्राप्त कर ग्रहस्थ में जा कर समाज की प्रगति करते हुए वानप्रस्थ को ग्रहण करूंगा तथा इस अवसर पर समाज को दिशा दूंगा । इस ढंग से मेरे ऊपर जो तीन प्रकार के क्रण हैं,उन्हें मैं अपनी मेहनत से दूर करने का प्रयास आजीवन करता रहूंगा तथा इन से उक्रण हो कर ही रहूंगा | 

      इस से स्पष्ट होता है कि मानव जीवन के जिन सोलह संस्कारों के प्रथम नौ सस्कारों के पश्चात् बालक इस अवस्था में आ गया है कि वह ससारका उपकार करने के लिए अपन हीक्षा लेनी होगी। पूर्ण ब्रह्म में रनकलिए अपने आप को तैयार कर सका तयारा शिक्षा प्राप्ति से ही सम्भव हैशिक्षा प्राप्ति की प्र परम्परा है कि इस हेत उपनयन की दीक्षा लेनी होगी पूर्ण ना आचरण करते हुए इस का व्रत लेना होगायज्ञोपवीत के तीन तारा सन्देश के अनुसार उत्तम शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात् गृहस्थ म प्रवेश कर संसार से अज्ञान . अन्याय व अभाव को दूर करने का खूब परिश्रम करना होगा तथा इस के पूर्ण होने पर सभी सुख सुविधाओं को त्याग कर फिर से शरीर में ब्रह्मचारी का सा तेज पैदा क्रने के लिए वाणप्रस्थ आश्रम में जाकर पुनः शरीर को तपा कर परोपकार के लिए तैयार करना होगा। यही उपनयन का भाव है, यही उपनयन का सन्देश है तथा यही उपनयन का कर्तव्य है।

समावर्तन संस्कार

समावर्तन संस्कार

डा. अशोक आर्य 

       महर्षि दयानन्द जी ने जिन सोलह संस्कार करने का उपदेश अपने अमर ग्रन्थ संस्कार विधि में दिया है, उनमें से गयारह संस्कार एक के बाद एक करते हुए केवल आठ वर्ष की आयु में ही सम्पन्न हो जाते हैंमानव इस आठ वर्षीय आयु तक ही नवीन संस्कार तेजी से ग्रहण करने की शक्ति रखता है, इस कारण एक के बाद एक आठ वर्ष की आयु तक निरन्तर संस्कारी वातावरण में ही रहता है तथा मात्र आठ वर्ष में गयारह संस्कार पूर्ण हो जाते हैं । वेदारम्भ संस्कार के पश्चात् एक लम्बा विराम दिया जाता है ताकि वह अब वैचारिक संस्कारों के स्थान पर शैक्षिक विचार प्राप्त करने के लिए तपस्वी का जीवन व्यतीत करे। शिक्षा प्राप्ति के लिए उसे लम्बा समय लगाना होता हैमहर्षि ने इसे कम से कम चोदह वर्ष लिखा है। अतः वेदारम्भ संस्कार के पश्चात् जो आगामी संस्कार आता है वह कम से कम चौदह वर्ष के पश्चात् आता है। यदि कोई इससे आगे भी शिक्षा चाहे तो छतीस वर्ष व इससे आगे भी शिक्षा प्राप्त करना चाहे तो इसके लिए अडतीस वर्ष की आयु इस संस्कार के लिए लिखी है ,किन्तु सामान्यतया यह संस्कार बाइस वर्ष की आयु में ही होता है। जिस प्रकार उपनयन व वेदारम्भ संस्कार एक दूसरे के पूरक हैं, उसी प्रकार समावर्तन संस्कार तथा विवाह संस्कार भी एक दूसरे के पूरक हैं|

      जिस प्रकार गुरुकुल भेजने से पूर्व उपनयन संस्कार के अवसर पर पिता अपनी सन्तान को कठोर जीवन यापन करते हुए, गुरू आझ में विद्यार्जन के लिए लम्बा उपदेश देता है। इसी प्रकार शिक्षा पूर्ण का अपने पितृ गृह में लौटने वाले बालक को , जिसने जाकर गृहस्थ क जीवन व्यतीत करना होता है, आचार्य एक दीक्षान्त उपदेश देता है। इस उपदेश में जीवन की आगामी योजना बताई जाती है। इसे ही समाव न संस्कार के रूप में जाना जाता है |

      ___प्रथम उपदेश होता है कि भावी जीवन में कई प्रकारकी कठिनाइ व लोभ दिये जायेंगे किन्तु तूं ने कभी भी सत्य का पल्ला नहीं छोडन अन्त में सत्य ही विजयी होता है। सदा धर्म पर आचरण करना । ध पर आचरण करने वाला सभी संकटों को बडी सरलता से पारक लेता है। स्वाध्याय में कभी प्रमाद मत करना । स्वाध्याय से तेरी विछ की धाक जमी रहेगी तथा अपने किये कार्यों का अध्ययन करने से अप कमियों को दूर करने में सहायता मिलेगीतूं जिस प्रकार आचार्य व में आया था तथा शिक्षा प्राप्त कर जा रहा है , उसी प्रकार जाव सन्तान तैयार कर उसे भी शिक्षार्थ आचार्य कुल में भेज कर डास । की वृद्धि करना । यही ही आचार्य को दिया जाने वाला प्रिय धन है। व धर्म पर स्थित रहते हुए इसे बढाने में कभी प्रमाद मत करना – स्वाध्याय करते रहना तथा इसे प्रवचन द्वारा दूसरों में बांटते ही प्राप्त करना । अपने से ज्ञान में बडों ( देवों), अपने से आय में पितर), उनके अनुभव तुम्हारे से अधिक होने के कारण, उनके चलना. उनका आदर करना। अपने माता का आदर करना गुरु जनों का आदर करना तथा जो अतिथि घर में ना. जो माननीय हों या सर्वहित के हो । बुरे आदेशों को मत मानना यहां तक कि मेरी कही कोई बात अनुचित हो तो उसे भी मत माननासदा श्रेष्ठ लोगों के पास बैठना व उनका अनुगमन करना । तू अपने धन को श्रद्धा पूर्वक दान दे। यदि किसी को उत्तम नहीं मानता तो उसे बिना श्रद्धा के भी देकल को कोई चोर तेरे संचित धन को चोरी न कर ले , इस भय से भी दान कर। अतः अपने संचित धन का कुछ भाग अवश्य दान कर। जब किसी कर्म में सन्देह हो तथा उसके धर्माचरण होने का निर्णय न हो रहा हो तो आत्मा की आवाज से इसका निर्णय करना । यही मेरा उपदेश है। यही मेरा सन्देश है तथा यही वेदों व उपनिषद् आदि का सार है। इसे सदा अपने जीवन में धारण करना।

        इतना सुन्दर विदाई सन्देश केवल वैदिक संस्कृति में ही सम्भव है। अन्यत्र नहीं इस प्रकार का उपदेश देने के पश्चात् गुरू ने जो वेदारम्भ के समय कटि में बांधने को मेखला दी थी , जो आत्म रक्षार्थ दण्ड दिया था , उसकी भी अब आवश्यकता भावी जीवन में नहीं होती , इस कारण वह भी इस समय आचार्य उससे वापिस लौटा लेते हैं तथा कहते हैं कि अब ब्रह्मचर्य को भी अपनी इच्छानुसार छोड क्र गृहस्थार्थ विवाह कर सकते हो | 

वेदारम्भ संस्कार

वेदारम्भ संस्कार

डा. अशोक आर्य 

       मानव जीवन के सोलह संस्कारों में से गयारहवां तथा बारहवां, सानो संस्कार ही एक ही उद्देश्य से किये जाने के कारण दोनों का भाव समान ही है । बस अन्तर इतना है कि जब माता पिता एक निश्चित आय पर पहुंचने के कारण बालक को शिक्षार्जन के योग्य समझते हैं तो अपने ही निवास पर उपनयन संस्कार करके उसे गुरुकूल भेज देते तथा गुरू भी बालक को अपने गुरुकुल में स्थान देते हुए उसे अपने कु ल का भाग बनाने के लिए एक संस्कार करता है , जिसे वेदारम्भ संस्कारकहते हैं। दोनों संस्कारों का सम्बन्ध शिक्षा प्राप्त करना आरम्भ करने से हैइसी कारण इन दोनों संस्कारों को एक दूसरे का पूरक माना जाता है |

      प्राचीन गुरुकुलों में न तो आज सरीखे भवनों को ही केन्द्र मानकर महत्त्व दिया जाता था और न ही अन्य साज सज्जा की सामग्री को , क्योंकि इस का सम्बन्ध बालक की शिक्षा से होता था। अतः इनके केन्द्र या आधार बालक ही होते थे। इसी भावना को आज के शिक्षाविद् पुनः समझने लगे हैं। अतः आज पूनः यह स्वर मुखरित होने लगे हैं कि स्कूलों में बालकों महत्त्व को समझना चाहिये तथा इन्हें ही केन्द्र मानकर शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिये ।ऐसी व्यवस्था में गुरु बालक के विगत जन्म के संस्कारों का उसके व्यवहार से अध्ययन क्दरता है, माता पिता के संस्कारों का भी अध्ययन करता है तथा वर्तमान वातावरण ,जिसे पर्यावरण कहते हैं,का भी अध्ययन दर तदनुसार बालक की अभिरुचि के अनुसार इसे शिक्षा देता है |

      जहां तक संस्कारों का प्रश्न है, पहले भी बताया जा चुका है कि मानव जीवन के संस्कारों को दो भागों में बांटा गया है। प्रथम भाग में प्रसव पूर्व के तीन संस्कार रखे गए हैं तथा दूसरे भाग में जन्म के पश्चात् के शेष तेरह सरकार सम्मिलित हैं। इन संस्कारों से तो बालक को आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती ही है, उसके भावी जीवन के निर्माण के लिए पर्यावरण, शिष्य व ब्रह्मचारी, गुरुया आचार्य पढने के विषय चयन, पढने व पढाने की विधि व जीवन का लक्ष्य कैसे प्राप्त हो आदि पर शिक्षा प्रारम्भ करने से पूर्व वैदिक आचार्य विचार करते हैं। 

     वातावरण का बाल शिक्षा पर खूब प्रभाव होता है किन्तु इससे बालक को बचाया जा सकता है। गन्दे वातावरण के बच्चों में अच्छे संस्कारों की बहुलता उसे इससे बचा कर प्रगति पथ पर ला सकती हैयही कारण है कि गन्दे पर्यावर्णीय बालक अच्छे भी देखे गए हैं जबकि अच्छे पर्यावरणं में पले बच्चे भी देखभाल के अभाव में गन्दे हो सकतेहै। यह विगत जन्म के संस्कारों के बलवान् होने का परिवार सकता है । पारिवारिक पयोवरण का भी इस पर प्रभाव को परिवार में लडाई, कलह आदि प्रमादि व्यवहार होता बुराई की और जाना स्वाभाविक है। इसी कारण वैदिक पमादि व्यवहार होता है तो बालक का भीपरिवार में प्रतिदिन संध्या, यज्ञादि करते हुए उसके पर्यात रखा जावे। इसी प्रकार जिस समाज में बालक कार करते हुए उसके पर्यावरण को स्वच्छ में बालक का निवास है, उसका भी अच्छा होना उसके भी उसे अपने पर शिक्षणालयों को सके भावी जीवन की उत्तमता का आधार है। शाला में अपने परिवार का सा वातावरण मिले, इसीलिए वैदिक लियों को कुल कहा गया है। ताकि बालक इसे अपने परिवार आत्मसात् कर गुरु को पिता व सहपाठियों के साथ भाईयों का यवहार करते व प्रेम से रहते हुए शिक्षा प्राप्त करे। यही कारण है न आधुनिक स्कूल भी अपने आप को गुरुकुल कहलवाने में गौरव साव्यव त करने लगे है। अनुभव करने लगे हैं |

      शिक्षा प्राप्ति आरम्भ करते ही बालक को जो प्रक्रियाएं करनी होती थीं, उनमें सर्व प्रथम था आश्रम में निवास करना आश्रम एक कठिन तपस्या का नाम है । इस प्रकार इस में निवास करने के लिए से संकट पूर्ण अवस्था में साधना करते हुए भी हंसते रहने का निर्णय लेना होता था। उसे गुरु के पास जा कर एक बार पुनः ऐसी अवस्था में जाना होता था जैसे जन्म से पूर्व मां के गर्भ में था । अर्थात् अब गुरु आदेश ही उसका सब कुछ है तथा उसी के पालन में ही उसका कल्याण व भावी जीवन का उत्थान है। इस समय वह शिष्य तो है किन्तु क्योंकि गुरु ने उसे अपने में समा लिया है, अपने कुल का भाग बना लिया है, अतः अब गुरुचरणों में बैठ कर उसे ब्रह्म में विचरण करना है। गुरु उपदेश के अनुसार शिक्षा प्राप्त क्रना है गुरू आचार व्यवहार भी सिखाता है, इसलिए उसे आचार्य भी कहते हैं। इस समय शि ष्य समिधा समान है। जैसे समिधा आग के साथ से प्रदीप्त होती है। इसी प्रकार शिष्य भी गुरु से उपदेश पाकर स्वयं को आलौकित करता हैअतः शुरू का पूर्ण विद्वान् होना भी आवश्यक है |

      जहां तक पढाने के विषयों का प्रश्न है, वेदादि शास्त्र तो पढाए भी करे कि बार बालक को करे। जबकि इन दृष्टाः की निगमन पई शिक्षा देते सभः ही जावेंइसके अतिरिक्त गुरु इस बात की जांच की की चि किस विषय में है, उसकी विशेष शिक्षा बालक दृष्टांत देकर पढाना आगमन पद्धति की शिक्षा है जी को जीवन में उतार कर दिखाया जावे तो इसे शिक्षा की कहते हैं। गुरु को चाहिये कि दोनों विधियों को ही शिक्षा प्रयोग करे। इस के अतिरिक्त कई प्रकार की कौशल युक्त शिव देनी चाहियें। इसमें गौ पालन कृषि आदि को रखा जा सकता है |

      वैदिक शिक्षा जीवन को एक निश्चित दिशा देती हैजीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए बालक को समर्थ बनाया जाता । अतः शिक्षा समाप्ति पर आचार्य दीक्षान्त उपदेश देते हुए कहता है। आज से तुम्हारे से यह आशा की जाती है कि तुम सत्य का आचर करोगे, धार्मिक जीवन व्यतीत करते हुए माता पिता की सेवा व बड़ों सम्मान करोगे। यह केवल विदाई के समय ही गुरू नहीं कहता अपि कुल में प्रवेश के समय ही उसने बालक के समक्ष एक निश्चित योजः रखी थी। कुल आवास में रहते हुए उसी योजना से ही शिक्षा दी तथा यहां से पूनः लौटाकर कार्यक्षेत्र में भेजते समय गुरु चेताव स्वरूप पुनः यही उपदेश ही दोहराता है कि जो तुझे समझाया गया है उसका प्रतिक्षण पालन करना । यही जीवन की सफलता का मापदण् होगा।

      वेदारम्भ संस्कार में दण्ड धारण करना, भिक्षा कर भोजः लाना, मेखला धारण करना तथा कौपीन में रहना, यह कुछ आवश्यक विधियां हैं। ब्रह्मचारी के लिए उस युग में दण्ड धारण करना आवश्यक था, क्योंकि जंगली आवास के समय अपनी रक्षार्थ व दूसरों की रक्षा यह सहायक होता था। फिर यह क होता था । नदी नाले पार करते समय भी काम में आता कर यह तो कहा ही गया है कि महान् बनने के लिए पहाडों से न व नदी के तटीय स्थान उत्तम होते हैं । ऐसे ही स्थान में संलग्न व नदी के गरुकुल स्थित होते थे। 

      गरुकला में भिक्षा वृत्ति एक आवश्यक अंग थी। इससे गुरुकुल खर्च का बोझ तो कम होता ही था , बालक में निराभिमानता भी आती थी, झुकने के संस्कार भी मिलते थे। अहंकार का भी नाश होता या। इसमें सभी बालक समान रूप से भिक्षाटन करते थेकहीं कोई भेदभाव नहीं होता था । भिक्षा से प्राप्त सब सामग्री लाकर बालक गुरु चरणों के अर्पण कर देता था। इसी को ही सभी मिलजुल कर ग्रहण करते थे। यह समरसता लाने का एक सुन्दर मार्ग था । अतः वैदिक विधि विधान बालपन से ही उसे समानता का सन्देश देता था । यह उपदेश व्यवहारिक रूप से इसके मस्ति ष्क में डाल दिया जाता थाइसी कारण सभी बालक अपने समय का सदुपयोग करते हुए खूब मेहनत करते हुए शिक्षा प्राप्त करते थे। इस भिक्षा वृत्ति से सरकार या गुरुकुल संचालक पर अर्थका अधिक बोझ नहीं पडता था । आवश्यकताएं सीमित होने से , इसी से ही सब कार्य सिद्ध हो जाते थे। दयानन्द मठ दीनानगर में आज भी दोपहर का भोजन भिक्षा से लाने की प्रथा निर्बाध रूप से चल रही है। लंगोट व मेखला भी इस आश्रम के मुख्य बिन्दु हैं। यह बालक को सदाचारी रखते हुए वीर्यवान् बनाते हैंइससे चुस्ती भी आती है।

      इस विवरण से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि उपनयन संस्कार के साथ ही साथ वेदारम्भ संस्कार भी बालक को गुणवान् व विद्वान् बनाने की दिशा में बढ़ाया गया एक कदम है। इस समय बालक मातृव पितृ गोदी से निकल कर गरु की गोढी में चला जाता है । जहा गुरु बालक को विद्वान् बनने की प्रतिज्ञा लेते हए बालक के लिए कुछ नियम निर्धारित करता है । वहीं बालक भी इस कुल मे अप है। वहीं बालक भी इस कल में अपने निवास केक्षणों में पर्णतया सच्चरित रहते हए पर्ण तन्मयता से एकाग्रचित्हा , पद्य उपदेश के अनुसार अपनी दिनचर्या रखते हुए, सभी सुखा स दूर रहते हुए, तपश्चर्या का जीवन व्यतीत करते हुए, भिक्षाटन से भाजन लाकर सब के साथ समान रूप से उसका उपभोग कर बडे प्रेम पूर्वक मेहनत से सब प्रकार की विद्याओं को प्राप्त करता है।

विवाह संस्कार

विवाह संस्कार

डा. अशोक आर्य 

         वैदिक संस्कृति विश्व की महानतम संस्कृति का गौरव प्राप्त कर रही है। इस के समतुल्य कोई अन्य संस्कृति नहीं हैक्षेत्र में वसू ब्रह्मचारी निम्नतम माना गया है। इसे भी का बाइस वर्ष की आयु तक शिक्षार्थ गुरुकुल मे रहना आवश्यक था। ली पश्चात् वह गुरुकुल से वापिस आ करचोबीस वर्ष की आय पर्णा के पश्चात् ही उसका विवाह होता था अतः हमारी संस्कृति में अथवा किशोर विवाह का तो प्रश्न ही नहीं था । जो रुद्र शिक्षा पाने का अभिल षी होता था, वह ३६ वर्ष के बाद तथा इससे भी आगे पढने वाला आदित्य कहलाता था । ऐसा व्यक्ति ४८ वर्ष की आयु में विवाह करता था। इस सब से स्पष्ट पता चलता है कि बाल, किशोर विवाह जैसे विवाह तो उस युग में सोचे भी नहीं जा सकते थे।

      _. आज भारत में आठ प्रकार के विवाह हो रहे हैं यथा बाल विवाह अर्थात् अल्पायु में किया गया विवाह,देव विवाह विशाल यज्ञों के अवसर पर होने वाले विवाह इस श्रेणी में आते हैं । इस में बाहय दिखावा अधिक होता था। आर्ष विवाह में कन्या का पिता एक गाय आदि लेकर कन्या दान करता था, प्राजापात्य विवाह में कोई दिखावा न करते हुए केवल प्रजाति वृद्धि के लिए ही विवाह होता था।, आसुर विवाह में कन्या के पिता को धन देकर विवाह किया जाता है। गन्धर्व विवाह में बिना विवाह परस्पर इच्छा पूर्वक संयोग ही इस श्रेणी में आता है। , राक्षस विवाह किसी से जबरदस्ती कर उठा लाना तथा अपने घर में रख लेना इस प्रकार का विवाह है और पैशाच विवाह में सोती या नशे में धुत हो किसी कन्या को कलंकित करना ही पैशाचता है।

      वैदिक संस्कृति की श्रेष्ठता इसी बात में है कि विवाह एक धार्मिक संस्कार मानती है, जो जीवन में एक ही बार होता हैएक बार हो गया तो आजीवन रहेगा, कभी टूटेगा नहीं। इसका मुख्य उद्देश्य पितृ ऋण के भार से मुक्त होना है। माता पिता ने हमें जन्म दे कर व हमारा पालन कर एक प्रकार से हमें उधार के नीचे दबा दिया । इसे हम आगे सन्तान बढाकर ही चुका सकते हैं, जिसके लिए विवाह आवश्यक है। वैदिक विवाह एक धार्मिक विधि होने के कारण इस में किए जाने वाली विधियों से हमारी धार्मिक नीवं दृढ से भी दृढतर होती चली जाती हैजो भी आगन्तुक हमारे घर आवे, उसका यथोचित सत्कार हो, इस परम्परानुसार घर आए वर का स्वागत स्नानादि करवा आसन देकर, पैर धोकर, हाथ मुंह धुला कर, आचमन व मधुपर्क देकर किया जाता है। इस अवसर पर वर को गोदान दिया जाता है ताकि भावी सन्तान पुष्ट हो । इसके पश्चात् वर के दाएं हाथ में कन्या के माता पिता कन्या का दायां हाथ रखते हुए कन्या दान करते हैं |

      Sihl अब वर भी वधु का सत्कार करते हुए उसे वस्त्राभूषण आदि देता है। भाव यह है कि जिस प्रकार की वस्तुएं कन्या को उपहार में दी गई हैं, वह भी ससुराल में जाकर ऐसी वस्तुएं तैयार करे। इतना होने पर यज्ञ किया जाता है। इसी यज्ञ के समक्ष ही शेष क्रियाएं की जाती है। वसर पर की जाने वाली प्रथम विधि पाणि ग्रहण है। वर बैठी हाथ अपने हाथ में लेता हैहुई वधु के सामने खडा हो झुककर उसका हाथ तथा कहता है कि तेरे सौभाग्य के लिए तेरा हाथ लेता हू, यह मैं नहीं मानो संसार का उत्पादन करने वाली सविता ने तेरा हाथ पकडा है त मेरी धर्म की पत्नी है, मै तेरा पति हूं। तेरा पोषण करना मेरा धर्म है। हमारे साथ सन्तान की उत्पति करते हुए सौ वर्ष तक जीवन व्यतीत कर । पुनः वधू का हाथ पकड क्र अग्नि की प्रदक्षिणा करते हुए सौ वर्ष का का मनस्वी जीवन बिताने वाली हृष्ट पुष्ट सन्तान पैदा करने का संकल्प लेते हैं व पत्थर समान मजबूत रहने की प्रेरणा दी जाती है।

      लाजा होम जिसे फेरेभी कहते हैं, विवाह संस्कारकी एक महत्वपूर्ण किया हैलाजाहोम करते हुए वधु परमात्मा से प्रार्थना करती है कि प्रभु उसे पति कुल से कभी अलग न करे , पति की लम्बी आयु व समृद्ध परिवार की कामना करती है। परस्पर अनुराग व प्रभु के सहायी होने की कामना करती है। इन्हीं भावनाओं के साथ चार फेरे लेते हैंकेवल चोथे फेरे में वधु आगे होती है, शेष तीनो में वर। यह सब समाज के सम्मुख आने के लिए होता है। एक प्रकार की समाज के सामने गवाही होती है। यही रीत्यानुरूप विवाह की स्वीकृति मानी जाती है।

      विवाह संकार में सप्तपदी का भी फेरों के समान ही महत्व हैइसमें पति पत्नी विविध प्रतिज्ञाएं करते हैं यह प्रतिज्ञाएं सखी पारिवारिक जीवन के लिए होती हैं । तदन्तर जीवन पर्यन्त सूर्य से अपनी देखरेख की प्रार्थना की जाती है तथा यह भी प्रार्थना की जाती हैकि हमें सौ वर्षीय आयु प्राप्त हो तथा जीवन पर्यन्त सभी इन्द्रियां ठीक से काम करती रहें। हृदय स्पर्श से भी दोनों एक दूसरे पर आश्रित होते हए एक दूसरे के समीप आते हैं तथा जन समुदाय को भी वधू के दर्शन कराए जाते हैं । ध्रुव व अरुन्धती दर्शन से भी पारिवारिक जीवन मखमय व स्थिर बनाने का निर्णय लिया जाता है

      कहा वादेक विवाह में वास्तव में प्राचीन परम्परा स्वयंवर की रही है। इसका सबसे पुष्ट कारण यह रहा होगा कि इस के होने से आज के प्रेम विवाह की अवस्था से बचा जा सकता है। हमारे आचार्यों ने तो हा है कि विवाह से पूर्व स्त्री पुरुष एक दूसरे को देखे भी नहीं। इसका MAविशेष प्रयोजन यही रहा होगा कि विवाह तक पवित्रता बनी रहेदिक संस्कृति विवाह को एक आवश्यक धार्मिक कर्तव्य मानती है। आज कपेम विवाह में भावना की प्रधानता रहती है। वैदिक संस्कृति कहती है के विवाह के पश्चात् ही प्रेम का आरम्भ होता है, जो जीवन भर चलता । पश्चिम संस्कृति इससे उलट करते हुए पहले प्रेम तथा फिर विवाह मकरने के कारण , उनमें विवाह के पश्चात् साधारणतया कलह का जन्म होता है जो तलाक के रूप में अन्त को प्राप्त होता है। अतः वैदिक केव विवाह ही जीवन का सुखमय बनाने की सीढी है । इस का आदर्श जब्रह्मचर्य से जीवन को तपा कर तथा उच्च शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् वाही विवाह की स्वीकृति होती थी। जब इस प्रकार सुशिक्षित होने पर स्वयंवर से विवाह किया जाता था तो जीवन पर्यन्त न केवल पति पत्नी मैत्री भाव से रहते हुए सुखी होते थे अपितु अपने परिजनों व समाज में भी सुख बांटते रहते थे। उत्तम सन्तान की उत्पत्ति इसी सखा भाव का ही परिणाम होता था। वैदिक संस्कृति में संतति सुधार के जो उपाय दिये ए हैं, वह भी अपने आप में कीर्ति स्थापित करते हैं, उनका अवलम्बन ही तो सन्तान को ऊपर उठाने वाला होता है |

      वैदिक गृहस्थ में स्त्री की स्थिति सदा ही विशेष आदर वाली रही ।इसे घरकी सम्राज्ञी अथवा रानी कहा गया है। वह घर की समाज्ञा कारण सभी प्रकारकी देख रेख व क्रिया व्यवहार उसी के ही कन्धे पर आता है। वह अपनी चतुराई व योग्यता से परिवार को सुखी व खर्गिक बनाती है। वैदिक विवाह वास्तव में अमृत प्राप्त करने के समान हैपति के साथ ब्रह्म का निवास होता है। यह उसके प्रयत्नों का ही परिणाम होता है। इस प्रकार पति पत्नी बडप्पन को प्राप्त करते हैं। अब परार्थ ही उनका मुख्य कर्तव्य बन जाता है। तब ही तो कहा गया है। कि यह तो गृहस्थ ही है जिस पर मानव जीवन के सभी आश्रम टिके हुए हैं तभी तो वह गृहस्थ की आयु पूरी कर वन निवास करते थे | 

      5 वैदिक संस्कृति में सफल गृहरथी उसी को माना गया है जो एक निश्चित आयु के पश्चात् इसे त्याग कर जन कल्याण की भावना को सम्मुख रखते हुए अपने परिवार की सभी व्यवस्था अपने बच्चों कन्धों पर डाल कर अपने शरीर को पुनः तपा कर समाज सेवा के लिए तैयार करने के लिए एक बार फिर जंगलों में आवास कर तथा धर्म ग्रन्थों यथा वेद ,उपनि पदों आदि का पुनः अध्ययन करते हुए अपने आपको संन्यास के लिए तैयार करे। ताकि वह स्थान स्थान पर धूमते हुए जन कल्याण करते हुए खय भी ब्रह्म में विचरण करे। संसार में जहां एकता जीवन है तो भिन्नता या अनेकता मृत्यु का मार्ग है। वैदिक संरकति गृहरथ के माध्यम से अनेकता को समाप्त कर स्थापित करने की प्रेरणा देती हैयह हमें एकता की और ले जीवन के उच्च आदर्शों को प्राप्त कराने का मार्ग खोलती है। ताकी और ले जाते हुएमार्गखोलती है। समरस्ता की और जाने के रास्ते बताती है। इसी का नाम की का नाम वैदिक नाम वैदिक संकृति संकृति ने विवाह का आदर्श कहा हैयदि इसे पाने का प्रयास किया जावेगा तो वैदिक विवाह का आदर्श पाने में निश्चित ही सफलता मिलेगी।