मनुस्मृति और नारी जाति

मनुस्मृति और नारी जाति

डॉ विवेक आर्य

भारतीय समाज में एक नया प्रचलन देखने को मिल रहा है। इस प्रचलन को बढ़ावा देने वाले सोशल मीडिया में अपने आपको बहुत बड़े बुद्धिजीवी के रूप में दर्शाते है। सत्य यह है कि वे होते है कॉपी पेस्टिया शूरवीर। अब एक ऐसी ही शूरवीर ने कल लिख दिया मनु ने नारी जाति का अपमान किया है। मनुस्मृति में नारी के विषय में बहुत सारी अनर्गल बातें लिखी है। मैंने पूछा आपने कभी मनुस्मृति पुस्तक रूप में देखी है। वह इस प्रश्न का उत्तर देने के स्थान पर एक नया कॉपी पेस्ट उठा लाया। उसने लिखा-

“ढोल, गंवार , शूद्र ,पशु ,नारी सकल ताड़ना के अधिकारी।”

मेरी जोर के हंसी निकल गई। मुझे मालूम था कॉपी पेस्टिया शूरवीर ने कभी मनुस्मृति को देखा तक नहीं है। मैंने उससे पूछा अच्छा यह बताओ। मनुस्मृति कौनसी भाषा में है? वह बोला ब्राह्मणों की मृत भाषा संस्कृत। मैंने पूछा अच्छा अब यह बताओ कि यह जो आपने लिखा यह किस भाषा में है। वह फिर चुप हो गया। फिर मैंने लिखा यह तुलसीदास की चौपाई है। जो संस्कृत भाषा में नहीं अपितु अवधी भाषा में है। इसका मनुस्मृति से कोई सम्बन्ध नहीं है। मगर कॉपी पेस्टिया शूरवीर मानने को तैयार नहीं था। फिर मैंने मनुस्मृति में नारी जाति के सम्बन्ध में जो प्रमाण दिए गए है, उन्हें लिखा। पाठकों के लिए वही प्रमाण लिख रहा हूँ। आपको भी कोई कॉपी पेस्टिया शूरवीर मिले तो उसका आप ज्ञान वर्धन अवश्य करना।

मनुस्मृति में नारी जाति

यत्र नार्य्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्रऽफलाः क्रियाः। मनुस्मृति 3/56

अर्थात जिस समाज या परिवार में स्त्रियों का सम्मान होता है, वहां देवता अर्थात् दिव्यगुण और सुख़- समृद्धि निवास करते हैं और जहां इनका सम्मान नहीं होता, वहां अनादर करने वालों के सभी काम निष्फल हो जाते हैं।

पिता, भाई, पति या देवर को अपनी कन्या, बहन, स्त्री या भाभी को हमेशा यथायोग्य मधुर-भाषण, भोजन, वस्त्र, आभूषण आदि से प्रसन्न रखना चाहिए और उन्हें किसी भी प्रकार का क्लेश नहीं पहुंचने देना चाहिए। -मनुस्मृति 3/55

जिस कुल में स्त्रियां अपने पति के गलत आचरण, अत्याचार या व्यभिचार आदि दोषों से पीड़ित रहती हैं। वह कुल शीघ्र नाश को प्राप्त हो जाता है और जिस कुल में स्त्री-जन पुरुषों के उत्तम आचरणों से प्रसन्न रहती हैं, वह कुल सर्वदा बढ़ता रहता है। -मनुस्मृति 3/57

जो पुरुष, अपनी पत्नी को प्रसन्न नहीं रखता, उसका पूरा परिवार ही अप्रसन्न और शोकग्रस्त रहता है और यदि पत्नी प्रसन्न है तो सारा परिवार प्रसन्न रहता है। – मनुस्मृति 3/62

पुरुष और स्त्री एक-दूसरे के बिना अपूर्ण हैं, अत: साधारण से साधारण धर्मकार्य का अनुष्ठान भी पति-पत्नी दोनों को मिलकर करना चाहिए।-मनुस्मृति 9/96

ऐश्वर्य की कामना करने हारे मनुष्यों को योग्य है कि सत्कार और उत्सव के समयों में भूषण वस्त्र और भोजनादि से स्त्रियों का नित्यप्रति सत्कार करें। मनुस्मृति

पुत्र-पुत्री एक समान। आजकल यह तथ्य हमें बहुत सुनने को मिलता है। मनु सबसे पहले वह संविधान निर्माता है जिन्होंने जिन्होंने पुत्र-पुत्री की समानता को घोषित करके उसे वैधानिक रुप दिया है- ‘‘पुत्रेण दुहिता समा’’ (मनुस्मृति 9/130) अर्थात्-पुत्री पुत्र के समान होती है।

पुत्र-पुत्री को पैतृक सम्पत्ति में समान अधिकार मनु ने माना है। मनु के अनुसार पुत्री भी पुत्र के समान पैतृक संपत्ति में भागी है। यह प्रकरण मनुस्मृति के 9/130 9/192 में वर्णित है।

आज समाज में बलात्कार, छेड़खानी आदि घटनाएं बहुत बढ़ गई है। मनु नारियों के प्रति किये अपराधों जैसे हत्या, अपहरण , बलात्कार आदि के लिए कठोर दंड, मृत्युदंड एवं देश निकाला आदि का प्रावधान करते है। सन्दर्भ मनुस्मृति 8/323,9/232,8/342

नारियों के जीवन में आनेवाली प्रत्येक छोटी-बडी कठिनाई का ध्यान रखते हुए मनु ने उनके निराकरण हेतु स्पष्ट निर्देश दिये है।

पुरुषों को निर्देश है कि वे माता, पत्नी और पुत्री के साथ झगडा न करें। मनुस्मृति 4/180 इन पर मिथ्या दोषारोपण करनेवालों, इनको निर्दोष होते हुए त्यागनेवालों, पत्नी के प्रति वैवाहिक दायित्व न निभानेवालों के लिए दण्ड का विधान है। मनुस्मृति 8/274, 389,9/4

मनु की एक विशेषता और है, वह यह कि वे नारी की असुरक्षित तथा अमर्यादित स्वतन्त्रता के पक्षधर नहीं हैं और न उन बातों का समर्थन करते हैं जो परिणाम में अहितकर हैं। इसीलिए उन्होंने स्त्रियों को चेतावनी देते हुए सचेत किया है कि वे स्वयं को पिता, पति, पुत्र आदि की सुरक्षा से अलग न करें, क्योंकि एकाकी रहने से दो कुलों की निन्दा होने की आशंका रहती है। मनुस्मृति 5/149, 9/5- 6 इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि मनु स्त्रियों की स्वतन्त्रता के विरोधी है| इसका निहितार्थ यह है कि नारी की सर्वप्रथम सामाजिक आवश्यकता है -सुरक्षा की। वह सुरक्षा उसे, चाहे शासन-कानून प्रदान करे अथवा कोई पुरुष या स्वयं का सामर्थ्य।

उपर्युक्त विश्‍लेषण से हमें यह स्पष्ट होता है कि मनुस्मृति की व्यवस्थाएं स्त्री विरोधी नहीं हैं। वे न्यायपूर्ण और पक्षपातरहित हैं। मनु ने कुछ भी ऐसा नहीं कहा जो निन्दा अथवा आपत्ति के योग्य हो।

मनुस्मृति और नारी जाति

मनुस्मृति और नारी जाति

डॉ विवेक आर्य

भारतीय समाज में एक नया प्रचलन देखने को मिल रहा है। इस प्रचलन को बढ़ावा देने वाले सोशल मीडिया में अपने आपको बहुत बड़े बुद्धिजीवी के रूप में दर्शाते है। सत्य यह है कि वे होते है कॉपी पेस्टिया शूरवीर। अब एक ऐसी ही शूरवीर ने कल लिख दिया मनु ने नारी जाति का अपमान किया है। मनुस्मृति में नारी के विषय में बहुत सारी अनर्गल बातें लिखी है। मैंने पूछा आपने कभी मनुस्मृति पुस्तक रूप में देखी है। वह इस प्रश्न का उत्तर देने के स्थान पर एक नया कॉपी पेस्ट उठा लाया। उसने लिखा-

“ढोल, गंवार , शूद्र ,पशु ,नारी सकल ताड़ना के अधिकारी।”

मेरी जोर के हंसी निकल गई। मुझे मालूम था कॉपी पेस्टिया शूरवीर ने कभी मनुस्मृति को देखा तक नहीं है। मैंने उससे पूछा अच्छा यह बताओ। मनुस्मृति कौनसी भाषा में है? वह बोला ब्राह्मणों की मृत भाषा संस्कृत। मैंने पूछा अच्छा अब यह बताओ कि यह जो आपने लिखा यह किस भाषा में है। वह फिर चुप हो गया। फिर मैंने लिखा यह तुलसीदास की चौपाई है। जो संस्कृत भाषा में नहीं अपितु अवधी भाषा में है। इसका मनुस्मृति से कोई सम्बन्ध नहीं है। मगर कॉपी पेस्टिया शूरवीर मानने को तैयार नहीं था। फिर मैंने मनुस्मृति में नारी जाति के सम्बन्ध में जो प्रमाण दिए गए है, उन्हें लिखा। पाठकों के लिए वही प्रमाण लिख रहा हूँ। आपको भी कोई कॉपी पेस्टिया शूरवीर मिले तो उसका आप ज्ञान वर्धन अवश्य करना।

मनुस्मृति में नारी जाति

यत्र नार्य्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्रऽफलाः क्रियाः। मनुस्मृति 3/56

अर्थात जिस समाज या परिवार में स्त्रियों का सम्मान होता है, वहां देवता अर्थात् दिव्यगुण और सुख़- समृद्धि निवास करते हैं और जहां इनका सम्मान नहीं होता, वहां अनादर करने वालों के सभी काम निष्फल हो जाते हैं।

पिता, भाई, पति या देवर को अपनी कन्या, बहन, स्त्री या भाभी को हमेशा यथायोग्य मधुर-भाषण, भोजन, वस्त्र, आभूषण आदि से प्रसन्न रखना चाहिए और उन्हें किसी भी प्रकार का क्लेश नहीं पहुंचने देना चाहिए। -मनुस्मृति 3/55

जिस कुल में स्त्रियां अपने पति के गलत आचरण, अत्याचार या व्यभिचार आदि दोषों से पीड़ित रहती हैं। वह कुल शीघ्र नाश को प्राप्त हो जाता है और जिस कुल में स्त्री-जन पुरुषों के उत्तम आचरणों से प्रसन्न रहती हैं, वह कुल सर्वदा बढ़ता रहता है। -मनुस्मृति 3/57

जो पुरुष, अपनी पत्नी को प्रसन्न नहीं रखता, उसका पूरा परिवार ही अप्रसन्न और शोकग्रस्त रहता है और यदि पत्नी प्रसन्न है तो सारा परिवार प्रसन्न रहता है। – मनुस्मृति 3/62

पुरुष और स्त्री एक-दूसरे के बिना अपूर्ण हैं, अत: साधारण से साधारण धर्मकार्य का अनुष्ठान भी पति-पत्नी दोनों को मिलकर करना चाहिए।-मनुस्मृति 9/96

ऐश्वर्य की कामना करने हारे मनुष्यों को योग्य है कि सत्कार और उत्सव के समयों में भूषण वस्त्र और भोजनादि से स्त्रियों का नित्यप्रति सत्कार करें। मनुस्मृति

पुत्र-पुत्री एक समान। आजकल यह तथ्य हमें बहुत सुनने को मिलता है। मनु सबसे पहले वह संविधान निर्माता है जिन्होंने जिन्होंने पुत्र-पुत्री की समानता को घोषित करके उसे वैधानिक रुप दिया है- ‘‘पुत्रेण दुहिता समा’’ (मनुस्मृति 9/130) अर्थात्-पुत्री पुत्र के समान होती है।

पुत्र-पुत्री को पैतृक सम्पत्ति में समान अधिकार मनु ने माना है। मनु के अनुसार पुत्री भी पुत्र के समान पैतृक संपत्ति में भागी है। यह प्रकरण मनुस्मृति के 9/130 9/192 में वर्णित है।

आज समाज में बलात्कार, छेड़खानी आदि घटनाएं बहुत बढ़ गई है। मनु नारियों के प्रति किये अपराधों जैसे हत्या, अपहरण , बलात्कार आदि के लिए कठोर दंड, मृत्युदंड एवं देश निकाला आदि का प्रावधान करते है। सन्दर्भ मनुस्मृति 8/323,9/232,8/342

नारियों के जीवन में आनेवाली प्रत्येक छोटी-बडी कठिनाई का ध्यान रखते हुए मनु ने उनके निराकरण हेतु स्पष्ट निर्देश दिये है।

पुरुषों को निर्देश है कि वे माता, पत्नी और पुत्री के साथ झगडा न करें। मनुस्मृति 4/180 इन पर मिथ्या दोषारोपण करनेवालों, इनको निर्दोष होते हुए त्यागनेवालों, पत्नी के प्रति वैवाहिक दायित्व न निभानेवालों के लिए दण्ड का विधान है। मनुस्मृति 8/274, 389,9/4

मनु की एक विशेषता और है, वह यह कि वे नारी की असुरक्षित तथा अमर्यादित स्वतन्त्रता के पक्षधर नहीं हैं और न उन बातों का समर्थन करते हैं जो परिणाम में अहितकर हैं। इसीलिए उन्होंने स्त्रियों को चेतावनी देते हुए सचेत किया है कि वे स्वयं को पिता, पति, पुत्र आदि की सुरक्षा से अलग न करें, क्योंकि एकाकी रहने से दो कुलों की निन्दा होने की आशंका रहती है। मनुस्मृति 5/149, 9/5- 6 इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि मनु स्त्रियों की स्वतन्त्रता के विरोधी है| इसका निहितार्थ यह है कि नारी की सर्वप्रथम सामाजिक आवश्यकता है -सुरक्षा की। वह सुरक्षा उसे, चाहे शासन-कानून प्रदान करे अथवा कोई पुरुष या स्वयं का सामर्थ्य।

उपर्युक्त विश्‍लेषण से हमें यह स्पष्ट होता है कि मनुस्मृति की व्यवस्थाएं स्त्री विरोधी नहीं हैं। वे न्यायपूर्ण और पक्षपातरहित हैं। मनु ने कुछ भी ऐसा नहीं कहा जो निन्दा अथवा आपत्ति के योग्य हो।

वेद सन्देश जीवन के संदर्भ में

वेदा वदन्ति ।

सन्देश पीपल के पत्तों का

अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता । यजु-३५-४

अश्वत्थ ( पीपल के वृक्ष ) पर तुम्हारी बैठना है ,पत्ता तुम्हारा वसति:-वास है ।

You are sitting on अश्वत्थ tree and live on the leaves.

हम तनिक अपनी मानसिकता पर विचार करें । हम प्राय: असत्य को सत्य ,चंचल को स्थिर ,जड़ को चेतन ,अनित्य को नित्य ,अपयश को यश ,बुराईको अच्छाई समझते हैं । हम संसार में आकर समझते हैं कि हमें सदैव यहाँ रहना है और मौज मस्ती करनी है ।
महात्मा युधिष्ठिर से यक्ष ने पूछा – इस संसार में आश्चर्य क्या है ,उन्हों ने जो उत्तर दिया वह त्रिकाल सत्य है ,उन्हों ने कहा –
अहन्यहनि गच्छन्ति भूता इह यमालयम् ।
अन्ये स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमत: परम् ।।
प्रतिदिन अर्थियों पर प्राणी श्मशान की ओर जा रहे हैं ,लोग अपने बन्धु बान्धवों को अपने हाथों से चितायें बना बना कर जलारहे हैं । परन्तु उन्हें कभी यह विचार नहीं आता कि उनकी गति भी ऐसी हीहै ।दो पाटन के बीच में ख़ाली रहा न कोय ।इस संसार रूपी चक्की में सभी पिस रहे हैं ।यहाँ कोई भी स्थिर नहीं है ,यहाँ जैसे ही कोई उत्पत्ति होती है उसके साथ ही साथ विनाश भी प्रारम्भ हो जाता है ,संयोगाः विप्रयोगान्ता: , हमारा जन्मदिवस नहीं है परन्तु आयुन्यूनता सूचक दिवस है – हमारी इतनी आयु कम हो गई – यह बताता है ।तब भी अपनी शेष आयु के लिये सावधान नहीं होते , असाध्य को साध्य समझते हुये पूरी जीवन उसी में बिता देते हैं । ये इन्द्रियों के भोग ,विषय ,धन दौलत जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिये साधन हैं ,ये मानव ता के घातक नहीं साधक हैं ।
किसी भी पदार्थ में जब स्थिरता नहीं है तो फिरहम स्थिरता की कामना ही क्यों करते हैं ? उपरोक्त वेद की सूक्ति स्पष्ट ही हमारी अस्थिरता को बता रही है – वह कहती है अश्वत्थ पर तुम्हारी बैठक है ,अश्वत्थ पीपल का वृक्ष होता है ,यह संस्कृत शब्द बडा ही सार्थक है – य: श्वो न स्थास्यति स: – जो कल नहीं ठहरेगा । भोगापवर्गार्थं दृश्यम् – हम अपने नैतिक जीवन निर्माण के कार्यों को ,परमात्म प्राप्ति के उपायों को ,ज्ञानादि मोक्ष के साधनों को कल पर छोड़ते हुये चले जाते हैं अभी तो समय नहीं है कल कर लेंगे जब कि शुभस्य शीघ्रं होना चाहिये । कौन जानता है कि वह कल आयेगा भी या नहीं ,कल तक रह भी पायेंगे या नहीं । इसका क्या प्रमाण है । अश्वत्थ को चलदल भी कहते हैं ,जिसका अर्थ है चंचल पत्तों वाला । पीपल के पत्ते प्रायः हिलते रहते हैं मानों वे घोषणा कर रहे हैं – पर्णे वो वसतिश्कृता – पत्ते पर तुम्हारा वास है – पता नहीं कब वायु का झोंका आये और वह नीचे गिर जाये जो स्वयं क्षण भंगुर है उसका आश्रय लेने वाला भीनिश्चित ही क्षण भंगुर है ।

निस्सन्देह यह सब दृश्यमान जगत् अस्थायी है परन्तु इसमें एक अमर तत्त्व भी विद्यमान है जिसे हम संसार के द्वारा ,क्षण भंगुर शरीरके द्वाराही प्राप्तकर सकते हैं । इसी में हमारी कुशलताहै किइस अचेतन तत्त्व से चेतन तत्त्व को प्राप्त करें ,अनित्य सेनित्य चेतन को प्राप्तकरें ।

महर्षि याज्ञवल्क्य बृहदारण्यक उपनिषद में मैत्रेयी से कहते हैं-य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोन्तरो -जो परमेश्वर – आत्मा अर्थात् जीव में स्थित हो कर भी जीव से भिन्न है , जिसको मूढ़ जीवात्मा नहीं जानता है कि वह परमात्मा मेरे अन्दर व्यापक है ,यदि जानता होता तो वह कभी कुकर्म नहीं करता , मानव बनता। दानव नहीं ,सदाचारी बनता दुराचारी नहीं ,रक्षक बनता भक्षक नहीं ,परमात्मा की वेदोपदिश्ट आज्ञाओं का पालन करके मोक्षाधिकारी बनता ,जन्मजन्मान्तर तक भटकता नहीं ।इस लिये कहा जैसे शरीर में जीव रहता है वैसे ही जीव में परमेश्वर व्यापक है ,उसको तू जान । अन्यत्र कहा – आत्मा वा अरे श्रोतव्यो ,मन्तव्यो ,निदिध्यासितव्य इति एषोपनिषत् ,एषा वेदोपनिषत् ।

क्षण भंगुर शरीर में रहने वाले जीवों की यही सार्थकता है कि हम उस परमेश्वर को ज्ञान के द्वारा ,योगांगों के द्वारा जानने का प्रयास करें ,जिसके लिये हमारे जन्म जन्मांतर व्यतीत हो जाते हैं ।उसी परमेश्वर के लिये आता है –
नित्यो sनित्यानां ,चेतनश्चेतनानाम् ,
एको बहूनां यो विदधाति कामान् ।
तमात्मस्थं येsनुपश्यन्ति धीरा: ,
तमाहुरग्र्यं पुरुषं प्रमाणम् ।।

उतो तदद्य विद्याम यतस्तत् परिषिच्यते । वेद ।
हम सब का कर्तव्य है उस सत्ता को जानें जिससे सबको जीवन मिलता है ।