उषा पृथ्वी के पूर्व के आधे भाग को अपनी लालिमा से भर देती है।

उषा पृथ्वी के पूर्व के आधे भाग को अपनी लालिमा से भर देती है। उषा की किरणें सूर्य का आगाज़ करती है, और दिन निकलने की घोषणा कर देती है। उसी प्रकार देवत्व के योद्धा मानवता के कल्याण करने के लिए अपने अस्त्र-शस्त्रों को चमकाते हैं। (सामवेद -१७५५)

प्रत्येक जीवात्मा सुख पाना चाहती है निरन्तर सुख की ओर दौड़ रही है परंतु मंजिल प्राप्त नहीं कर पा रही है।
भोग योनियाँ तो बन्धन में हैं
न तृतीये तथा उप्लब्धे: वेदांतदर्शन३-१-१८,
अर्थात उनके लिए तो वैसे ही सुविधा नहीं वे तो निम्न योनि के प्राणी हैं मगर जो मानवयोनि पितृयान को प्राप्त कर देवयान अर्थात मोक्ष मार्ग का सुख लेना चाहती है उनके लिए सुंदर अवसर है।
ऐसा नहीं है कि उन्हें ज्ञान नहीं, ज्ञान भी प्राप्त कर ज्ञानी हो जाती है परंतु फिर भी मंजिल नहीं मिल पाती,
क्योंकि एक भूल उससे हो
रही है जो कि रोड़ा है पद, पैसा, प्रतिष्ठा, पुत्र पति पत्नी-परिवार से मोह,
परमात्मा को यह सब चाहिए नहीं,
क्योंकि उसके पास जाने वाला भी उसके परिवार का सदस्य है और नहीं जाने वाला भी।
वह तो आपका निष्काम भाव से किया कर्म और अपने प्रति श्रद्धा भक्ति देखता है।
अतः भूल से बचें, मूल को पकड़ें, विकृति की आयी धूल छंटने पर पूर्ण प्रकाश पूर्ण सुख
-दर्शनाचार्या विमलेश बंसल आर्या

प्रतिभाद वा सर्वम्।।
-महर्षि पतंजलि कृत योगदर्शन विभूतिपाद सूत्र-३३,
शब्दार्थ
प्रातिभाद-प्रातिभ नामक ज्ञान से,
वा -अथवा,
सर्वम्- सब कुछ जान लेता है।
सूत्रार्थ
-अथवा प्रातिभ ज्ञान से अनेक पदार्थों का ज्ञान होता है।
इससे पूर्व सूत्र में मूर्धा के सात्विक प्रकाश में संयम के फल सिद्ध दर्शन को जानने का प्रयास किया।
प्रस्तुत सूत्र में प्रातिभ ज्ञान से अनेक पदार्थों के ज्ञान होने का कथन है।
महर्षि व्यास भाष्य करते हुए कहते हैं– प्रातिभ तारक नामक ज्ञान होता है। वह विवेकज ज्ञान का पूर्व रूप है वह प्रातिभ ज्ञान ऐसा ही होता है जैसे सूर्योदय के पूर्व प्रभा होती है उस प्रातिभ ज्ञान की उत्पत्ति के होने पर योगी उसके द्वारा सबको जानता है।
सर्वप्रथम इस प्रातिभ ज्ञान को ही समझने का प्रयास करते हैं।
यह ज्ञान स्वयं के अंदर से ही उत्तम संस्कारों के कारण पूर्व ही उत्पन्न होता है।
कहने का भाव यह है कि विवेकज ज्ञान से पहले का रूप ही प्रातिभ ज्ञान है।
वास्तव में जो पूर्व ही ज्ञानमय लालिमा रूप में भासे वही तो प्रातिभ है।
जैसे सूर्योदय से पूर्व की लालिमा दिखाई देती है। सूर्य उदय बाद में होता है ठीक उसी तरह विवेकज ज्ञान से पहले की ज्ञानमय लालिमा प्रातिभ नाम से जानी जाती है। यह ज्ञान किसी बाहर के निमित्त से उत्पन्न नहीं होता बल्कि पूर्व जन्म व इस जन्म दोनों के उत्तम संस्कार सुदृढ़ योगाभ्यास वेद आदि सत्य शास्त्रों के अध्ययन अध्यापन सत्संग आदि धर्म के आचरण से भीतर से ही पूर्व उत्पन्न होता है।
किसी किसी व्यक्ति में छोटी आयु में ही यह प्रातिभ ज्ञान देखा गया है ध्रुव, प्रह्लाद, मूलशंकर इत्यादि प्रतिभावान ज्ञानी बालक प्रातिभ ज्ञान के ऐतिहासिक प्रमाण हैं।
ऐसे ही बालक फिर विवेकी हो ईश्वर को प्राप्त भी कर गए।
क्योंकि अनेक पदार्थों के ज्ञान विज्ञान की परत प्रातिभ पर ही टिकी है।
जैसे पूत के पैर पालने में दिख जाते हैं वैसे ही विवेकी ज्ञान से पूर्व का ज्ञान जिसे महर्षि पतंजलि प्रातिभ कहते हैं। वह प्रतिभाशाली लोगों में पूर्व से ही भासता है। वही ज्ञान आगे बढ़कर स्वयं व ईश्वर का बोध करा देता है।
अतः जो योगाभ्यासी साधक योगाभ्यास में बचपन से ही कुशल हो निरन्तर साधनारत रहते हैं वह भी उनके प्रातिभ ज्ञान की ही वजह है।
वे ही आगे चलकर अनेक पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करते हुए सब कुछ अर्थात जिससे सब कुछ होता है उस ईश्वर को प्राप्त करने विवेकज ज्ञान तक कोई कसर नहीं छोड़ते।
वास्तव में ऐसे अमृतपुत्र ही ईश्वर के सच्चे अच्छे पुत्र हैं।
काव्यमय भाव🎤
प्रातिभ ही विवेकज आधार,
ज्यों सूर्योदय लालिमा पसार।
योगी भरे विविध विज्ञान,
सुसंस्कारवित् पूर्व निशान।।–दर्शनाचार्या विमलेश बंसल आर्या