आज का पंचांग

🕉🙏 नमस्ते जी 🙏🕉

🌹आपका दिन शुभ हो 🌹

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💥 20 जुलाई 2019 💥
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दिन —– शनिवार
तिथि — तृतीया
नक्षत्र —- शतभिषा
पक्ष —— कृष्ण
माह– — श्रावण
ऋतु ——– वर्षा
सूर्य दक्षिणायणे,उत्तर गोले
विक्रम सम्वत –2076
दयानंदाब्द — 195
शक सम्बत — 1941
कलयुगाब्द — 5121
मन्वतर —-वैवस्वत (सप्तम)
सृष्टि सम्वत–1960853120
#शुक्र अस्त पूर्व

🍎 पहला सुख निरोगी काया नीम की निंबोली गिरी 10 ग्राम और बड़ी हरड़ का बक्कल 20 ग्राम लेकर चूर्ण बना लें । 2 ग्राम से 5 ग्राम तक धारोष्ण गोदुग्ध में कुछ मिश्री या शक्कर डाल कर दो तीन बार दें, इससे बार-बार खूनी दस्त जाना और दर्द दूर होता है। यह दिव्य औषधि है

🌹आज का विचार
मर्यादाओं को तोड़ने से मानवता खतरे में पड़ जाती है!

👏एक निवेदन: बिना हेल्मेट के बाइक,बिना सीट-बेल्ट के कार मत चलाइए ! वर्षा ऋतु है एक दो वृक्ष अवश्य लगाइए!

🙏 आज का वैदिक भजन 🙏

कविता छोटी है,परंतु सारांश बड़ा है

वाह रे जिंदगी

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    * दौलत की भूख ऐसी लगी की कमाने निकल गए *
    * ओर जब दौलत मिली तो हाथ से रिश्ते निकल गए *
    * बच्चो के साथ रहने की फुरसत ना मिल सकी *
    * ओर जब फुरसत मिली तो बच्चे कमाने निकल गए *
    वाह रे जिंदगी
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    वाह रे जिंदगी
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    * जिंदगी की आधी उम्र तक पैसा कमाया*
    *पैसा कमाने में इस शरीर को खराब किया *
    * बाकी आधी उम्र उसी पैसे को *
    * शरीर ठीक करने में लगाया *
    * ओर अंत मे क्या हुआ *
    * ना शरीर बचा ना ही पैसा *
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    वाह रे जिंदगी
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    वाह रे जिंदगी
    “”””””””””””””””””‘””””
    * शमशान के बाहर लिखा था *
    * मंजिल तो तेरी ये ही थी *
    * बस जिंदगी बित गई आते आते *
    * क्या मिला तुझे इस दुनिया से *

    * अपनो ने ही जला दिया तुझे जाते जाते *
    वाह रे जिंदगी

    🙏 आज का वैदिक भजन 🙏
    श्वासों की माला से सिमरूँ मैं तेरा नाम
    बन जाऊँ बन्दा मैं तेरा हे कृपानिधान

    ऐसी कृपा करो प्रभु मेरे
    मिटे मन की तृष्णा और बन जायें तेरे
    सबसे हो प्रीति और बन जाये जीवन महान्
    श्वासों की माला से सिमरूँ मैं तेरा नाम

    प्रभु!मुझको पिला दो कोई अमृत का प्याला
    रँग दे इस दिल को हम, कर दो मतवाला
    मेरा है तन-मन सब कुछ तुझपे कुर्बान
    श्वासों की माला से सिमरूँ मैं तेरा नाम

    सदा पकड़ो मेरी बाहें
    कहीं भटक न जायें
    विषयों में फंस कर हम बहक न जायें
    जिस दिन तू निकले बिसर जाये मेरी जान
    श्वासों की माला से सिमरूँ मैं तेरा नाम
    स्वर :- पूज्य स्वामी रामदेव जी
    इस भजन की तुलना वेद मन्त्र से करें :-
    “सांसों की माला पे सिमरू मैं प्रभु का नाम”

    वायुमारोह धर्मणा (धर्मणा वायुम् आरोह) सामवेद 483
    कोई श्वास भक्तिरस से रिक्त न रहजाए।

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के अमूल्य उपदेश (भाग ३)

२१. जो दुष्ट कर्मचारी द्विज को श्रेष्ठ, कर्मकार शूद्र को नीच मानें तो इसके परे पक्षपात् अन्याय, अधर्म दूसरा अधिक क्या होगा।

२२. जो विद्यादि सद्गुणों में गुरुत्व नहीं है झूठमूठ कण्ठी, तिलक, वेद विरुद्ध मन्त्रोपदेश करने वाले हैं वे गुरु ही नहीं किन्तु गडरिये हैं। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ११)

२३. “जो धर्मयुक्त उत्तम काम करे, सदा परोपकार में प्रवृत्त हो, कोई दुर्गुण जिसमें न हो, विद्वान् सत्योपदेश से सब का उपकार करे, उसको साधु कहते हैं।” (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ११)

२४. जैसे गृहस्थ व्यवहार और स्वार्थ में परिश्रम करते हैं उनसे अधिक परिश्रम परोपकार करने में संन्यासी भी तत्पर रहें तभी सब आश्रम उन्नति पर रहें। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ११)

२५. संन्यासियों का मुख्य कर्म यही है कि सब गृहस्थादि आश्रमों को सब प्रकार के व्यवहारों का सत्य निश्चय करा अधर्म व्यवहारों से छुड़ा सब संशयों का छेदन कर सत्य धर्मयुक्त व्यवहारों में प्रवृत्त करें। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ५)

२६. उत्तम दाता उसको कहते हैं जो देश, काल को जान कर सत्य विद्या धर्म की उन्नति रूप परोपकारार्थ देवे। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ११)

२७. जिसके शरीर में सुरक्षित वीर्य रहता है तब उसको आरोग्य, बुद्धि, बल, पराक्रम बढ़ के बहुत सुख की प्राप्ति होती है। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास २)

२८. अनेक प्रकार के मद्य, गांजा, भांग, अफीम आदि- जो-जो बुद्धि का नाश करने वाले पदार्थ हैं उनका सेवन कभी न करें। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास १०)

२९. देखो जब आर्यों का राज्य था तब महोपकारक गाय आदि नहीं मारे जाते थे, तभी आर्यावर्त्त व अन्य भूगोल देशों में बड़े आनन्द में मनुष्यादि प्राणी वर्त्तते थे क्योंकि दूध, घी, बैल आदि पशुओं की बहुताई होने से अन्न रस पुष्कल होते थे। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास १०)

३०. इन पशुओं के मारने वालों को सब मनुष्यों की हत्या करने वाले जानियेगा। (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास १०)

उषा पृथ्वी के पूर्व के आधे भाग को अपनी लालिमा से भर देती है।

उषा पृथ्वी के पूर्व के आधे भाग को अपनी लालिमा से भर देती है। उषा की किरणें सूर्य का आगाज़ करती है, और दिन निकलने की घोषणा कर देती है। उसी प्रकार देवत्व के योद्धा मानवता के कल्याण करने के लिए अपने अस्त्र-शस्त्रों को चमकाते हैं। (सामवेद -१७५५)

प्रत्येक जीवात्मा सुख पाना चाहती है निरन्तर सुख की ओर दौड़ रही है परंतु मंजिल प्राप्त नहीं कर पा रही है।
भोग योनियाँ तो बन्धन में हैं
न तृतीये तथा उप्लब्धे: वेदांतदर्शन३-१-१८,
अर्थात उनके लिए तो वैसे ही सुविधा नहीं वे तो निम्न योनि के प्राणी हैं मगर जो मानवयोनि पितृयान को प्राप्त कर देवयान अर्थात मोक्ष मार्ग का सुख लेना चाहती है उनके लिए सुंदर अवसर है।
ऐसा नहीं है कि उन्हें ज्ञान नहीं, ज्ञान भी प्राप्त कर ज्ञानी हो जाती है परंतु फिर भी मंजिल नहीं मिल पाती,
क्योंकि एक भूल उससे हो
रही है जो कि रोड़ा है पद, पैसा, प्रतिष्ठा, पुत्र पति पत्नी-परिवार से मोह,
परमात्मा को यह सब चाहिए नहीं,
क्योंकि उसके पास जाने वाला भी उसके परिवार का सदस्य है और नहीं जाने वाला भी।
वह तो आपका निष्काम भाव से किया कर्म और अपने प्रति श्रद्धा भक्ति देखता है।
अतः भूल से बचें, मूल को पकड़ें, विकृति की आयी धूल छंटने पर पूर्ण प्रकाश पूर्ण सुख
-दर्शनाचार्या विमलेश बंसल आर्या

प्रतिभाद वा सर्वम्।।
-महर्षि पतंजलि कृत योगदर्शन विभूतिपाद सूत्र-३३,
शब्दार्थ
प्रातिभाद-प्रातिभ नामक ज्ञान से,
वा -अथवा,
सर्वम्- सब कुछ जान लेता है।
सूत्रार्थ
-अथवा प्रातिभ ज्ञान से अनेक पदार्थों का ज्ञान होता है।
इससे पूर्व सूत्र में मूर्धा के सात्विक प्रकाश में संयम के फल सिद्ध दर्शन को जानने का प्रयास किया।
प्रस्तुत सूत्र में प्रातिभ ज्ञान से अनेक पदार्थों के ज्ञान होने का कथन है।
महर्षि व्यास भाष्य करते हुए कहते हैं– प्रातिभ तारक नामक ज्ञान होता है। वह विवेकज ज्ञान का पूर्व रूप है वह प्रातिभ ज्ञान ऐसा ही होता है जैसे सूर्योदय के पूर्व प्रभा होती है उस प्रातिभ ज्ञान की उत्पत्ति के होने पर योगी उसके द्वारा सबको जानता है।
सर्वप्रथम इस प्रातिभ ज्ञान को ही समझने का प्रयास करते हैं।
यह ज्ञान स्वयं के अंदर से ही उत्तम संस्कारों के कारण पूर्व ही उत्पन्न होता है।
कहने का भाव यह है कि विवेकज ज्ञान से पहले का रूप ही प्रातिभ ज्ञान है।
वास्तव में जो पूर्व ही ज्ञानमय लालिमा रूप में भासे वही तो प्रातिभ है।
जैसे सूर्योदय से पूर्व की लालिमा दिखाई देती है। सूर्य उदय बाद में होता है ठीक उसी तरह विवेकज ज्ञान से पहले की ज्ञानमय लालिमा प्रातिभ नाम से जानी जाती है। यह ज्ञान किसी बाहर के निमित्त से उत्पन्न नहीं होता बल्कि पूर्व जन्म व इस जन्म दोनों के उत्तम संस्कार सुदृढ़ योगाभ्यास वेद आदि सत्य शास्त्रों के अध्ययन अध्यापन सत्संग आदि धर्म के आचरण से भीतर से ही पूर्व उत्पन्न होता है।
किसी किसी व्यक्ति में छोटी आयु में ही यह प्रातिभ ज्ञान देखा गया है ध्रुव, प्रह्लाद, मूलशंकर इत्यादि प्रतिभावान ज्ञानी बालक प्रातिभ ज्ञान के ऐतिहासिक प्रमाण हैं।
ऐसे ही बालक फिर विवेकी हो ईश्वर को प्राप्त भी कर गए।
क्योंकि अनेक पदार्थों के ज्ञान विज्ञान की परत प्रातिभ पर ही टिकी है।
जैसे पूत के पैर पालने में दिख जाते हैं वैसे ही विवेकी ज्ञान से पूर्व का ज्ञान जिसे महर्षि पतंजलि प्रातिभ कहते हैं। वह प्रतिभाशाली लोगों में पूर्व से ही भासता है। वही ज्ञान आगे बढ़कर स्वयं व ईश्वर का बोध करा देता है।
अतः जो योगाभ्यासी साधक योगाभ्यास में बचपन से ही कुशल हो निरन्तर साधनारत रहते हैं वह भी उनके प्रातिभ ज्ञान की ही वजह है।
वे ही आगे चलकर अनेक पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करते हुए सब कुछ अर्थात जिससे सब कुछ होता है उस ईश्वर को प्राप्त करने विवेकज ज्ञान तक कोई कसर नहीं छोड़ते।
वास्तव में ऐसे अमृतपुत्र ही ईश्वर के सच्चे अच्छे पुत्र हैं।
काव्यमय भाव🎤
प्रातिभ ही विवेकज आधार,
ज्यों सूर्योदय लालिमा पसार।
योगी भरे विविध विज्ञान,
सुसंस्कारवित् पूर्व निशान।।–दर्शनाचार्या विमलेश बंसल आर्या