वेद मंत्र

यो३स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तस्य त्वं प्राणेना प्यायस्व ।
आ वयं प्यासिषीमहि गोभिरश्वैः प्रजया पशुभिर्गृहैर्धनेन ।।
―अथर्व० ७.८१.५
_हे परमात्मन्! जो हम से वैर-विरोध रखता है और जिससे हम शत्रुता रखते हैं तू उसे भी दीर्घायु प्रदान कर। वह भी फूले-फले और हम भी समृद्धिशाली बनें। हम सब गाय, बैल, घोड़ों, पुत्र, पौत्र, पशु और धन-धान्य से भरपूर हों। सबका कल्याण हो और हमारा भी कल्याण हो।

।।ओ३म्।। पूषन्नध्वनस्तिर व्यंहो विमुचो नपात् ।
सक्ष्वा देव प्र णस्पुरः ॥
(ऋग्वेद १/४२/१)

अर्थात- हे सबके पालन-पोषण करने वाले सूर्य और पृथिवी के समान सबके रक्षक तथा पोषक ! तू कठिन मार्गो से भी अच्छी प्रकार पार पहुचा दे । हे विविध पदार्थो और सुखों को प्रजा पर न्यौछावर करने वाले, मेघ के समान उदार पुरुषों को नष्ट न होने देने वाले राजन ! तू पाप और रोग पीड़ा से मुक्त कर । हे प्रकाशवन ! दानशील ! तू हमारे आगे मार्ग दर्शक के रूप में रह । अथवा मार्ग को पार कर और हे। प्रजा को न गिरने देने वाले ! तू पाप और दुःख से मुक्त कर ।

*🔥 ओ३म् 🔥*

मा न इन्द्राभ्याऽऽ३ दिशः सूरो अक्तुष्वा यमत।
त्वा युजा वनेम तत्।। सामवेद -१२८।।

हे ईश्वर, आप हमारे मित्र हैं। किसी भी दिशा से अंधकार में भी पाप या पापयुक्त व्यक्ति हमें कोई हानि ना पहुंचा पाएं। आप हमारे मित्र और पथ प्रदर्शक हैं। आप हमारी पापवृत्तियों और बाहरी पाप को नष्ट करने में हमारी सहायता करें।

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