महर्षि दयानंद सरस्वती

काशी शास्त्रार्थ पर स्वयं महर्षि दयानन्द जी की टिप्पणी

● अब तक कोई भी वेद में मूर्तिपूजा का प्रमाण प्रमाण नहीं निकाल सका
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– भावेश मेरजा

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने 4 अगस्त 1875 को पूना में अपने जीवन वृत्तान्त के विषय में एक भाषण किया था। अन्य स्थानों की भांति पूना में भी कुछ लोगों को ऐसा संशय होने लगा था कि यदि यह स्वामी जी ब्राह्मण होते तो मूर्तिपूजा जैसी परम्परागत आस्थाओं के विरुद्ध ऐसा अभियान नहीं चलाते। इसलिए उनको अपने पूर्वाश्रम आदि के सम्बन्ध में कुछ बताना चाहिए और जो उनको पहले से जानते पहचानते हैं ऐसे कुछ लोगों के पत्रादि मंगाकर उपस्थित करने चाहिए। ऐसे हालात में स्वामी जी ने अपने बारे में कुछ बताने का उचित समझा और एक भाषण स्व-जीवन के विषय में दिया। इस भाषण में उन्होंने जन्म से लेकर तत्कालीन अवस्था पर्यन्त अपने जीवन तथा कार्यों का दिग्दर्शन प्रस्तुत किया। अपने इस भाषण में उन्होंने काशी के पण्डितों से 16 नवम्बर 1869 को हुए उस शास्त्रार्थ का भी उल्लेख किया, जिसने स्वामी जी को एक क्रान्तिकारी धर्मसंशोधक के रूप में देश-विदेश में विख्यात कर दिया था। इस शास्त्रार्थ के बारे में उन्होंने बताया –

“…प्रयाग से मैं रामनगर को गया। वहाँ के राजा की इच्छानुसार काशी के पण्डितों से शास्त्रार्थ हुआ। इस शास्त्रार्थ में यह विषय प्रविष्ट था कि वेदों में मूर्तिपूजा है या नहीं। मैंने यह सिद्ध करके दिखा दिया कि ‘प्रतिमा’ शब्द तो वेदों में मिलता है, परन्तु उसके अर्थ तौल नाप आदि के हैं। वह शास्त्रार्थ अलग छपकर प्रकाशित हुआ है, जिसको सज्जन पुरुष अवलोकन करेंगे। ‘इतिहास’ शब्द से ब्राह्मण ग्रन्थ ही समझने चाहिए, इस पर भी शास्त्रार्थ हुआ था। गत वर्ष के भाद्रपद मास में मैं काशी में था। आज तक चार बार काशी में जा चुका हूँ। जब-जब काशी में जाता हूँ तब-तब विज्ञापन देता हूँ कि यदि किसी को वेद में मूर्तिपूजा का प्रमाण मिला हो तो मेरे पास लेकर आवें, परन्तु अब तक कोई भी प्रमाण नहीं निकाल सका।”

[स्रोत : उपदेश मंजरी अथवा पूना प्रवचन, अन्तिम 15वां प्रवचन, प्रस्तुति : भावेश मेरजा]
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