Lakhnau Kavi sammelan


Sahitya Sangam Santhan ke Dwara Akhil Bhartiya Kavi Sammelan 20 August 2017 ko Aayojit hua

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भारत में ईस्वी संवत् का प्रचलन अंग्रेजी शासको ने 1752 में किया । 1752 से पहले ईस्वी सन् 25 मार्च से शुरू होता था किन्तु 18 वीं शताब्दी से इसकी शुरूआत एक जनवरी से होने लगी ।
जनवरी से जून रोमन के नामकरण रोमन जोनस,मार्स व मया इत्यादि के नाम पर हैं । जुलाई और अगस्त रोम के सम्राट जूलियस सीजर तथा उसके पौत्र आगस्टन के नाम पर तथा सितम्बर से दिसम्बर तक रोमन संवत् के मासो के आधार पर रखे गये हैं ।आखिर क्या आधार है इस काल गणना का ? यह तो ग्रहो और नक्षत्रो की स्थिति पर आधारित होनी चाहिए ।
स्वतंत्रता प्राप्ती के पश्चात नवम्बर 1952 में वैज्ञानिको और औद्योगिक परिषद के द्वारा पंचांग सुधार समिति की स्थापना की गयी ।समिति के 1955 में सौंपी अपनी रिपोर्ट में विक्रम संवत को भी स्वीकार करने की सिफारिश की । किन्तु, तत्कालिन प्रधानमंत्री पं. नेहरू के आग्रह पर ग्रेगेरियन केलेण्ड़र को ही राष्ट्रीय केलेण्ड़र के रूप में स्वीकार लिया गया।
ग्रेगेरियन केलेण्ड़र की काल गणना मात्र दो हजार वर्षो की अति अल्प समय को दर्शाती है ।जबकि यूनान की काल गणना 1582 वर्ष, रोम की 2757 वर्ष, यहूदी 5768, मिस्त्र की 28691, पारसी 198875 तथा चीन की 96002305 वर्ष पुरानी है ।
इन सबसे अलग यदि भारतीय काल गणना की बात करें तो हमारे ज्योतिष के अनुसार पृथ्वी की आयु एक अरब 97 करोड़ 39 लाख 49 हजार 110 वर्ष है । जिसके व्यापक प्रमाण हमारे पास उपलब्ध हैं । हमारे प्राचीन ग्रंथो में एक एक पल की गणना की गई है ।जिस प्रकार ईस्वी संवत् का सम्बन्ध ईसा से है उसी प्रकार हिजरी सम्वत् का सम्बन्ध मुस्लिम जगत और हजरत मोहम्मद से है ।
किन्तु विक्रम संवत् का सम्बन्ध किसी भी धर्म से न होकर सारे विश्व की प्रकृति, खगोल सिद्धांत व ब्रम्हाण्ड़ के ग्रहो व नक्षत्रो से है । इसलिए भारतीय काल गणना पंथ निरपेक्ष होने के साथ सृष्टि की रचना व राष्ट्र की गौरवशाली परम्पराओं को दर्शाती है ।
इतना ही नहीं, ब्रम्हाण्ड़ के सबसे पुरातन ग्रंथो वेदो में भी इसका वर्णन है ।नव संवत् यानि संवत्सरो का वर्णन यजूर्वेद के 27 वें व 30 वें अध्याय के मंत्र क्रमांक क्रमशः 45 व 15 में विस्तार से दिया गया
है । विश्व को सौर मण्ड़ल के ग्रहों व नक्षत्रो की चाल व निरन्तर बदलती उनकी स्थिति पर ही हमारे दिन, महीने, साल और उनके सूक्ष्मतम भाग पर आधारित है इसी वैज्ञानिक आधार के कारण ही पाश्यात्य देशो के अंधानुकरण के बावजूद, चाहे बच्चे के गर्भाधान की बात हो, जन्म की बात हो, नामकरण की बात हो, गृह प्रवेश या व्यापार प्रारंभ करने की बात हो हम एक कुशल पंड़ित के पास जाकर शुभ मुहूर्त पुछते हैं।और तो और, देश के बड़े से बड़े राजनेता भी सत्तासीन होने के लिए सबसे पहले एक अच्छे मुहूर्त का इंतज़ार करते हैं जो कि विशुद्ध रूप से विक्रमी संवत् के पंचाग पर आधारित होता है ।
भारतीय शास्त्ररीत्या कोई भी काम शुभ मुहूर्त में किया जाए तो उसकी सफलता में चार चाँद लग जाते हैं ।चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा वर्ष प्रतिपदा कहलाती है। इस दिन से ही नया वर्ष प्रारंभ होता है। ‘युग‘ और ‘आदि‘ शब्दों की संधि से बना है ‘युगादि‘ । आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में ‘उगादि‘ और महाराष्ट्र में यह पर्व ‘ग़ुड़ी पड़वा‘ के रूप में मनाया जाता है।
कहा जाता है कि इसी दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि का निर्माण किया था। इसमें मुख्यतया ब्रह्माजी और उनके द्वारा निर्मित सृष्टि के प्रमुख देवी-देवताओं, यक्ष-राक्षस, गंधवारें, ऋषि-मुनियों, नदियों, पर्वतों, पशु-पिक्षयों और कीट-पतंगों का ही नहीं, रोगों और उनके उपचारों तक का भी पूजन किया जाता है। इसी दिन से नया संवत्सर शुंरू होता है। अत इस तिथि को ‘नवसंवत्सर‘ भी कहते हैं।
शुक्ल प्रतिपदा का दिन चंद्रमा की कला का प्रथम दिवस माना जाता है। जीवन का मुख्य आधार वनस्पतियों को सोमरस चंद्रमा ही प्रदान करता है। इसे औषधियों और वनस्पतियों का राजा कहा गया है। इसीलिए इस दिन को वर्षारंभ माना जाता है। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में सारे घरों को आम के पेड़ की पत्तियों के बंदनवार से सजाया जाता है। सुखद जीवन की अभिलाषा के साथ-साथ यह बंदनवार समृद्धि, व अच्छी फसल के भी परिचायक हैं। ‘उगादि‘ के दिन ही पंचांग तैयार होता है। महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने इसी दिन से सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीना और वर्ष की गणना करते हुए ‘पंचांग ‘ की रचना की थी।चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को महाराष्ट्र में गुड़ीपड़वा कहा जाता है। वर्ष के साढ़े तीन मुहुर्तों में गुड़ीपड़वा की गिनती होती है। शालिवाहन शक का प्रारंभ इसी दिन से होता है। इस अवसर पर आंध्र प्रदेश में घरों में ‘पच्चड़ी/प्रसादम‘ के रूप में बांटा जाता है। कहा जाता है कि इसका निराहार सेवन करने से मानव निरोगी बना रहता है। चर्म रोग भी दूर होता है। इस पेय में मिली वस्तुएं स्वादिष्ट होने के साथ-साथ आरोग्यप्रद भी होती हैं। महाराष्ट्र में पूरन पोली या मीठी रोटी बनाई जाती है। इसमें—गुढ़, नमक, नीम के फूल, इमली और कच्चा आममिलाया जाता है। गुढ़ मिठास के लिए, नीम के फूल कड़वाहट मिटाने के लिए और इमली व आम जीवन के खट्टे-मीठे स्वाद चखने का प्रतीक के रूप में होते हैं। भारतीय परंपरा में घरों में इसी दिन से आम खाने की आम का रस बनाने की और आम के रस की मिठाई बनाने की शुरुआत होती है।
शालिवाहन नामक एक कुम्हार के लड़के ने मिट्टी के सैनिकों की सेना बनाई और उस पर पानी छिड़ककर उनमें प्राण फूँक दिए और इस सेना की मदद से शक्तिशाली शत्रुओं को पराजित किया। इस विजय के प्रतीक के रूप में शालिवाहन शक का प्रारंभ हुआ।
एक कथा यह भी है कि इसी दिन भगवान राम ने बाली के अत्याचारी शासन से दक्षिण की प्रजा को मुक्ति दिलाई थी । बाली के त्रास से मुक्त हुई प्रजा ने घर-घर में उत्सव मनाकर ध्वज (ग़ुड़ियां) फहराए थे। आज भी घर के आंगन में ग़ुड़ी खड़ी करने की प्रथा महाराष्ट्र में प्रचलित है। इसीलिए इस दिन को गुड़ीपडवा नाम दिया गया।
गुड़ी पड़वा के साथ ही नौ दिन की चैत्र की नवरात्रि शुरु हो जाती है। नौ दिन तक चलने वाली यह नवरात्रि दुर्गापूजा के साथ-साथ, रामनवमी को राम और सीता के विवाह के साथ सम्पन्न होती है।चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के प्रात: सूर्योदय की प्रथम रश्मि के दर्शन के साथ नववर्ष का आरंभ होता है।
“मधौ सितादेर्दिनमासवर्षयुगादिकानां युगपत्प्रवृत्ति:”
महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने प्रतिबादित किया है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से दिन-मास-वर्ष और युगादि का आरंभ हुआ है। युगों में प्रथम सतयुग का आरंभ भी इसी दिन से हुआ है। कल्पादि-सृष्ट्यादि-युगादि आरंभ को लेकर इस दिवस के साथ अति प्राचीनता जुड़ी हुई है। सृष्टि की रचना को लेकर इसी दिवस से गणना की गई है, लिखा है-
चैत्र-मासि जगद् ब्रह्मा ससर्ज प्रथमे%हनि ।
शुक्लपक्षे समग्रे तु तदा सूर्योदये सति ।।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि के सूर्योदय के समय से नवसंवत्सर का आरंभ होता है, यह अत्यंत पवित्र तिथि है। इसी दिवस से पितामह ब्रह्मा ने सृष्टि का सृजन किया था।इस तिथि को रेवती नक्षत्र में, विष्कुंभ योग में दिन के समय भगवान का प्रथम अवतार मत्स्यरूप का प्रादुर्भाव भी माना जाता है-
कृते च प्रभवे चैत्रे प्रतिपच्छुक्लपक्षगा ।
रेवत्यां योग-विष्कुम्भे दिवा द्वादश-नाड़िका: ।।
मत्स्यरूपकुमार्यांच अवतीर्णो हरि: स्वयम् ।।
प्रकृति खुद स्वागत करती है इस दिन का
चैत्र शुक्ल पक्ष आरंभ होने के पूर्व ही प्रकृति नववर्ष आगमन का संदेश देने लगती है। प्रकृति की पुकार, दस्तक, गंध, दर्शन आदि को देखने, सुनने, समझने का प्रयास करें तो हमें लगेगा कि प्रकृति पुकार-पुकार कर कह रही है कि पुरातन का समापन हो रहा है और नवीन बदलाव आ रहा है, नववर्ष दस्तक दे रहा है। वृक्ष-पौधे अपने जीर्ण वस्त्रों को त्याग रहे हैं, जीर्ण-शीर्ण पत्ते पतझड़ के साथ वृक्ष शाखाओं से पृथक हो रहे हैं, वायु के द्वारा सफाई अभियान चल रहा है, प्रकृति के रचयिता अंकुरित-पल्लवित-पुष्पित कर बोराने की ओर ले जा रहे हैं, मानो पुरातन वस्त्रों का त्याग कर नूतन वस्त्र धारण कर रहे हैं। पलाश खिल रहे हैं, वृक्ष पुष्पित हो रहे हैं, आम बौरा रहे हैं, सरसों नृत्य कर रही है, वायु में सुगंध और मादकता की मस्ती अनुभव हो रही है।
सोचिये और जबाब दीजिये।
क्यों न हम सब मिलकर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के प्रात: सूर्योदय पर नववर्ष का महोत्सव मनायेन और इसके लिये अन्य लोगों को भी प्रेरित करें???
(कल्पादी-सृष्ट्यादि-युगादि महोत्सव)
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा नववर्ष आरम्भ
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के प्रात: सूर्योदय की प्रथम रश्मि के दर्शन के साथ नववर्ष का आरंभ होता है।
“मधौ सितादेर्दिनमासवर्षयुगादिकानां युगपत्प्रवृत्ति:”
महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने प्रतिपादित किया है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से दिन-मास-वर्ष और युगादि का आरंभ हुआ है। युगों में प्रथम सतयुग का आरंभ भी इसी दिन से हुआ है। कल्पादि-सृष्ट्यादि-युगादि आरंभ को लेकर इस दिवस के साथ अति प्राचीनता जुड़ी हुई है। सृष्टि की रचना को लेकर इसी दिवस से गणना की गई है, लिखा है-
चैत्र-मासि जगद् ब्रह्मा ससर्ज प्रथमे%हनि ।
शुक्लपक्षे समग्रे तु तदा सूर्योदये सति ।।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि के सूर्योदय के समय से नवसंवत्सर का आरंभ होता है, यह अत्यंत पवित्र तिथि है। इसी दिवस से पितामह ब्रह्मा ने सृष्टि का सृजन किया था।इस तिथि को रेवती नक्षत्र में, विष्कुंभ योग में दिन के समय भगवान का प्रथम अवतार मत्स्यरूप का प्रादुर्भाव भी माना जाता है-
कृते च प्रभवे चैत्रे प्रतिपच्छुक्लपक्षगा ।
रेवत्यां योग-विष्कुम्भे दिवा द्वादश-नाड़िका: ।।
मत्स्यरूपकुमार्यांच अवतीर्णो हरि: स्वयम् ।।
हमारे वर्ष के आरंभ दिवस का प्रकृति खुद स्वागत करती है,उत्सव मनाती है इस दिन और हम साधारण-मनुष्य ठंढक के देह-विरोधी प्रतिकूल,अप्राकृतिक मौसम में एक अविज्ञानिक कैलेण्डर को पूजने में लग जाते हैं।
नव-वर्ष चैत्र-प्रतिपदा का धूम-धड़ाके से मनाएंगे इस बार क्योंकि मैं तो आजाद हूँ,…कानूनी रूप से भी,दिमागी रूप से भी!!

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navvaesh.jpg 8आप सभी को नववर्ष, सनातन नववर्ष, वैदिक नववर्ष 2074 (विक्रम् सम्वत्) की हार्दिक शुभकामनाऐं।…..
इस दिन सृष्टि की उत्पत्ति के 1960853117 वर्ष पूरे हो जायेंगे व कलियुग के 432000 वर्ष में से 5117 वर्ष पूरे हो जायेंगे व सृष्टि सम्वत् 1960853118 वां चालू हो जायेगा।
प्रिय मित्रो !….
हमारे पूर्वज ऋषि-मुनि, राजे महाराजे इस दिन विशेष कार्य की शुरुआत करते थे।…
राजा युधिष्ठिर जी ने राजकार्य इसी दिन से शुरु किया था।
वेदों की उत्पत्ति इसी दिन हुई थी।
आर्यसमाज की स्थापना इसी दिन हुई थी।
आइये जाने सृष्टि सम्वत् आता कैसे है-
चार युग होते हैं सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग
कलियुग 432000 वर्ष का होता है और द्वापर कलियुग का दो गुना, त्रेतायुग तीन गुना और सतयुग चार गुना होता है। 71 चतुर्युगियों का एक मन्वन्तर कहलाता है। और
सृष्टिकाल 14 मन्वन्तर का होता है। और प्रलय काल भी इतने का।
वर्तमान मे 6 मन्वन्तर स्वायम्भव, स्वारोचिष, औत्तमि, तामस, रैवत और चाक्षुष पूरे हो चुके हैं। और सातवां वैवस्तव वर्त्त चल रहा है।
7वें मन्वन्तर के 71में से 27 चतुर्युग पूरे हो चुके हैं और वर्तमान में 28वें चतुर्युग का आखिरी युग कलियुग चल रहा है।
1मन्वन्तर= 71×चतुर्युग=71×4320000=306720000 वर्ष
6 मन्वन्तर मे वर्ष=6×306720000=1840320000 वर्ष
7 वें मन्वन्तर के 27 चतुर्युगो के वर्ष
27×4320000=116640000
और 28 चतुर्युग के सतयुग द्वापर और त्रेता जो समाप्त हो चुके हैं के वर्ष
1728000+1296000+864000=3888000 वर्ष
और कलियुग के बीते वर्ष=5117
अत: कुल वर्ष जो बीत चुके हैं
1840320000+116640000+3888000+5117= 1960853117 वर्ष
दिनांक 28 मार्च से 1960853118 वें वर्ष का प्रारम्भ है।

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# चैत्र प्रति पदा शुक्ल व भारतीय सनातन वैदिक नव वर्ष की ढेर सारी शुभ कामनाएं । सभी धार्मिक बन्धू व योग साधक व साधिकाओं को

सूर्य संवेदना पुष्पे:, दीप्ति कारुण्यगंधने
लब्ध्वा शुभम् नववर्षेअस्मिन् कुर्यात्सर्वस्य मंगलम् ।।

जिस तरह सूर्य प्रकाश देता है, संवेदना करुणा को जन्म देती है, पुष्प सदैव महकता रहता है, उसी तरह यह नूतन वर्ष आपके लिए हर दिन, हर पल के लिए मंगलमय हो।

*नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें !*
🙏🌷🌷🌷🙏

सनातन वैदिक नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा।।*

१.आज चैत्र प्रतिपदा के दिन ही परम पिता परमात्मा ने १९६०८५३११८ वर्ष पूर्व यौवनावस्था प्राप्त मानव की प्रथम पीढ़ी को इस पृथ्वी माता के गर्भ से जन्म दिया था। इस कारण यह “मानव सृष्टि संवत” है।
२. इसी दिन परमात्मा ने अग्नि वायु आदित्य अंगिरा चार ऋषियों को समस्त ज्ञान विज्ञान का मूल रूप में संदेश क्रमशः ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद और अथर्ववेद के रूप में दिया था। इस कारण इस वर्ष को ही वेद संवत भी कहते हैं।
३.आज के दिन ही मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने लंका पर विजय प्राप्त कर वैदिक धर्म की ध्वजा फहराई थी। (ज्ञातव्य है कि भगवान श्रीराम का राज्याभिषेक चैत्र शुक्ल षष्ठी को हुआ था ना की प्रतिपदा अथवा दीपावली पर) (विजयादशमी व दीपावली का श्रीराम से कोई संबंध नहीं है देखे श्रीमद् वाल्मीकि रामायण)
४. आज ही से कली संवत् तथा भारतीय विक्रम संवत् युधिष्ठिर संवत् प्रारंभ होता है।
५.आज ही के शुभ दिन विश्व वंद्य अद्वितीय वेद द्रष्टा महर्षि दयानन्द सरस्वती ने संसार में सत्य वेद धर्म के माध्यम से सब के कल्याणार्थ “आर्य समाज” की स्थापना की थी। इसी भावना को ऋषि ने आर्य समाज के छठे नियम में अभिव्यक्त करते हुए लिखा “संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है अर्थात शारीरिक आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना”
महानुभावो! इन सब कारणों से यह संवत् केवल भारतीय या किसी पंथ विशेष के मानने वालों का नहीं अपितु संपूर्ण विश्व मानवों के लिए है। आइए! हम सार्वभौम संवत् को निम्न प्रकार से उत्साह पूर्वक मनाएं –
१. यह संवत् मानव संवत् है इस कारण हम सब स्वयं को एक परमात्मा की संतान समझकर मानव मात्र से प्रेम करना सीखें। जन्मना ऊंच-नीच की भावना, सांप्रदायिकता, भाषावाद, क्षेत्रीयता, संकीर्णता आदि भेदभाव को पाप मानकर विश्वबंधुत्व एवं प्राणी मात्र के प्रति मैत्री भाव जगाएं। अमानवीयता व दानवता का नाश तथा मानवता की रक्षा का व्रत लें।
२. आज वेद संवत् भी प्रारंभ है। इस कारण हम सब अनेक मत पंथों के जाल से निकलकर संपूर्ण भूमंडल पर एक वेद धर्म को अपनाकर प्रभु कार्य के ही पथिक बनें। हम भिन्न-भिन्न समयों पर मानवों से चलाए पंथों के जाल में न फसकर मानव को मानव से दूर न करें। जिस वेद धर्म का लगभग 2 अरब वर्ष से सुराज्य इस भूमंडल पर रहा उस समय (महाभारत से पूर्व तक) संपूर्ण विश्व त्रिविध तापों से मुक्त होकर मानव सुखी समृद्धि व आनंदित था। किसी मजहब का नाम मात्र तक ना था। इसलिए उस वैदिक युग को वापस लाने हेतु सर्वात्मना समर्पण का व्रत लें। स्मरण रहे धर्म मानव मात्र का एक ही है, वह है वैदिक धर्म।
३. वैदिक धर्म के प्रतिपालक मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की विजय दिवस पर हम आज उस महापुरुष की स्मृति में उनके आदर्शों को अपनाकर ईश्वर भक्त, आर्य संस्कृति के रक्षक, वेद भक्त, सच्चे वेदज्ञ गुरु भक्त, मित्र व भातृवत्सल, दुष्ट संहारक, वीर, साहसी, आर्य पुरुष व प्राणी मात्र के प्रिय बने । रावण की भोगवादी सभ्यता के पोषक ना बनें।
४. आज राष्ट्रीय संवत् पर महाराज युधिष्ठिर विक्रमादित्य आदि की स्मृति में अपने प्यारे आर्यावर्त भारत देश की एकता अखंडता एवं समृद्धि की रक्षा का व्रत लें। राष्ट्रीय स्वाभिमान का संचार करते हुए देश की संपत्ति की सुरक्षा संरक्षा के व्रति बनें। जर्जरीभूत होते एवं जलते उजड़ते देश में इमानदारी, प्राचीन सांस्कृतिक गौरव, सत्यनिष्ठा, देशभक्ति, कर्तव्यपरायणता व वीरता का संचार करें।
५. आज आर्य समाज स्थापना दिवस होने के कारण “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” वेद के आदेशानुसार सच्चे अर्थों में आर्य बनें एवं संसार को आर्य बनाए न की नामधारी आर्य। आर्य शब्द का अर्थ है- सत्य विज्ञान न्याय से युक्त वैदिक अर्थात ईश्वरीय मर्यादाओं का पूर्ण पालक, सत्याग्रही, न्यायकारी, दयालु, निश्छल, परोपकारी, मानवतावादी व्यक्ति। इस दिवस पर हम ऐसा ही बनने का व्रत लें तभी सच्चे अर्थों में आर्य (श्रेष्ठ मानव) कहलाने योग्य होंगे। आर्यत्व आत्मा व अंतःकरण का विषय है। न कि कथन मात्र का।
आइये ! संसार भर के प्यारे मित्रों विचारिये कि क्या नव वर्ष सब को मनाना योग्य नहीं है ? तब आइए जागीये तथा अपने धर्म व कर्तव्य को स्मरण करके अपने अपने दोषों को दूर करने तथा सत्य गुण ग्रहण करने का व्रत लेकर उपर्युक्त पांच विधियों से नव वर्ष का स्वागत घर में यज्ञ करके करें, घरों के ऊपर ओम का ध्वज लगाएं, रात्रि में घी के दीपक जलाएं। परमात्मा हम सब मानवों को ऐसी ही सुमति व शक्ति प्रदान करें। इसी के साथ ही मैं राहुल देव आचार्य नव वर्ष के पावन अवसर पर आप को नव वर्ष की बहुत-बहुत बधाई एवं ढेरों शुभकामनाएं प्रेषित कर रहा हूं। आने वाला नव वर्ष आपके जीवन को सुख-समृद्धि ऐश्वर्य से भरने वाला हो। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ व्यस्त रहें स्वस्थ रहें मस्त रहें।

आचार्य विश्वामित्रार्य दर्शनाचार्य ( पुनाराम साहू) योग प्रचारक पतंजलि योग पीठ हरिद्वार

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🌞 ओम् 🌞

नमस्ते जी

नव सृष्टि संवत्सर 1,96,08,53,118 (एक अरब छियानवें करोड़ आठ लाख तरेपन हजार एक सौ अट्ठारहवां वर्ष)
विक्रमी सम्वत् 2074
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की मंगल कामनाओं के साथ नवसंवत्सर की आपको व आपके परिवार को हार्दिक शुभकामनाएं, ईश्वर आपको जीवन में सुख और समृद्धि प्राप्त करायें, व आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो, इन्हीं कामनाओं के साथ पुनः नव सृष्टि संवत्सर की हार्दिक शुभकामनाएं।

💐💐💐💐💐💐💐
आओ अपना नववर्ष मनाएं |
जीवन में नवज्योति जलाएं |
प्राणी मात्र को सुख पहुँचाएं |
आओ मिलकर राष्ट्र बनाएं |
💐💐💐💐💐💐💐
-आर्य नरेंद्र

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April 2017

dayanand.1

dayanand💐 नव पल्लव , नव कुसुम , नव है अन्न भंडार l नव उमंग, नव चेतना, छाई बसंत बहार ll नया नया है प्रकृती, का ये नया उपहार l आओ मनायें नव वर्ष हम, ध्वाजा लगा के द्वार ll 💐

🙏 चैत्र शुक्ल प्रतिपदा – सम्वत – 2074 का प्रारंभ इस नूतन वर्ष की आप को हार्दिक शुभ कामनायेँ 🙏

💐 नव वर्ष मंगल मय हो💐

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