Yajya

* ।।ओ३म् ।।*
*मानव जीवन में संस्कारों का महत्व*
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सभी धर्म प्रेमी सज्जनों से अपील है कि ईस पोस्ट को ध्यान से पढ़ें और अपने जीवन में अपनाएं ।
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संस्कार का अर्थ यह है कि किसी वस्तु के रूप को बदल देना उसे नया रूप दे देना । वैदिक संस्कृति में मानव जीवन के लिए सोलह संस्कारों का विधान हैं। इसका अर्थ यह है कि जीवन में सोलह बार मानव को बदलने का , उसके नव-निर्माण का प्रयत्न किया जाता है। जैसे सुनार अशुद्ध सोने को अग्नि में डाल कर उसका संस्कार करता है । ठीक उसी प्रकार बालक के जन्म होते ही उसे संस्कारों की भट्टी में डाल कर उसके दुर्गुणों को निकाल कर उसमें सद्गुण डालने के प्रयत्न को वैदिक विचारधारा में *संस्कार*कहा गया है । चरक ऋषि ने कहा है।*संस्कारो हि गुणान्तराधानमुच्यते*अर्थात् पहले से विद्यमान दुर्गुणों को हटाकर उसकी जगह सद्गुणों का आधान कर देने का नाम *संस्कार* है ।
🌞मानव के नव निर्माण की योजना 🌞
👉👶बालक जब जन्म होता है तब वह दो प्रकार के संस्कारों को लेकर आता है । एक प्रकार के संस्कार तो वे हैं जिन्हें वह जन्म-जन्मान्तरों से अपने साथ लाता है , दूसरे प्रकार के संस्कार वे हैं जिन्हें वह अपने माता-पिता के संस्कारों के रूप में वंश परम्परा से प्राप्त करता है । ये संस्कार अच्छे भी हो सकते हैं , बुरे भी हो सकते हैं । संस्कारों द्वारा मानव के नव निर्माण की योजना वह योजना है.. जिसमें 👶बालक को ऐसे पर्यावरण से घेर दिया जाय जिसमें अच्छे संस्कारों को पनपने का अवसर प्राप्त हो , बुरे संस्कारों को चाहे जन्मों जन्मान्तर , चाहे माता-पिता से प्राप्त हो, चाहे आस-पास के समाज व पर्यावरण से हो उसे निष्क्रिय कर दिया जाय । औपचारिक रूप से तथा कथित समाजों में हमारी योजनाएँ भौतिक योजनाएँ है संस्कारों की योजनाएँ अध्यात्मिक योजना है हम हमारे बच्चों को खूब पढ़ाना लिखाना चाहते हैं । डाँक्टर ईन्जिनियर व खेब पैसा कमाने वाला बनाना चाहते है, परन्तु हम संस्कार वान मनुष्य बनाना नहीं चाहते । आईए हम सब हमारी योजनाएँ भौतिक न बनाकर अध्यात्मिक योजनाएँ बनाएँ हम सब अपने परिवारों में सोलह संस्कारों को अपनाएँ ।। *गर्भाधानंम्*👉 विवाह के पश्चात् शुक्ल पक्ष में पति पत्नि प्रसन्न होकर हवन करके उत्तम सन्तान के प्राप्ति हेतु सहवाग करें ।।१।।
*पुंसवनम्*👉 माता के गर्भ में गर्भठहरने के दूसरे या तीसरे माह में पुंसवन संस्कार करना चाहिए । उस समय माता को उत्तम खान पान व आचार विचार ठीक प्रकार से रखे ।।२।। *सीमन्तोन्नययनम्*👉गर्भिणी स्त्री के छठवे या आठवें माह में सीमन्तोन्नयन संस्कार करना चाहिए अर्थात् जिसको हम बोल चाल के भाषा में गोद भराई कहते हैं ।।३।।
*जातकर्म*👉👶बालक के जन्म होते ही उनके जीभ में ओ३म् शब्द लिखे और उनके कानों में चारों वेद के नाम बोले तथा नाभि को चार अंगुल ऊपर सूति धागे से बाँधकर नाडी छेदन करे।। ४।।।
*नामकरण*👉👶बालक के जन्म के पश्चात् ग्यारहवें दिन या एक सौ एक दिन में नाम करण संस्कार करे ।और लडका हो तो सम अक्षर तथा लड़की हो तो विषम अक्षर से नाम करण करे ।।५।।
*निष्क्रमणम्*👉बालक के जन्म के बाद चौथे महिने के शुक्ल पक्ष में हवन कर बालक को घर से बाहर शुद्ध वायु में निकाले तथा भ्रमण कराये ।।६।।
*अन्नप्रासनम्*👉जन्म के छठवे माह में हवन कर उत्तम षौष्टिक युक्त खीर बनाकर बालक को सोने या चाँदी के पात्रों से प्रेम पूर्वक खिलावें ।।७।।
*मुण्डन संस्कार*👉👶� जन्म के पश्चात् पहले या तीसरे साल मुण्डन संस्कार करना चाहिए। इस संस्कार में हवन कर उत्तम दही, मक्खन तथा उड़द का दाल व कुशा को लेकर बालक का केश छेदन करें ।।८।।
*कर्णवेध संस्कार*👉👧 तीसरे वर्ष में शुद्ध जल से स्नान कराकर उत्तम वस्त्र पहनाकर तथा हवन कर दोनों कानों का छेदन करें ।। ९।।
*उपनयन संस्कार*👉💫बालक के जन्म के बाद ब्रह्मण पुत्र का ८वें , क्षत्रिय के पुत्र का १२वें तथा वैश्य के पुत्र का १६वें वर्ष में यज्ञकुण्ड के समीप आहुति पूर्वक यज्ञोपवित करना चहिए तथा गायत्री मंत्र का उच्चारण करा अक्षर ज्ञान करावें ।।१०।।। *वेदारम्भ संस्कार*👉📖 जिस दिन उपनयन करावे उसी दिन वेदारम्भ करे। ये संस्कार गुरूकुल में आचार्य के सानिध्य में करें ।।११।।
*समावर्तन संस्कार*👉👦 २५वर्ष तक वेदों का सागोंपांग अध्ययन कर शिक्षा पूरी करके आचार्य को उत्तम वस्त्रादि गुरू दक्षिणा देकर करें ।१२।
*विवाह संस्कार* 👉👫 २५ वर्ष के बाद अथवा ४८ वर्ष के बाद उत्तम आचारण वाले युवक और युवतियाँ प्रसन्नता पूर्वक वैदिक विधान से चाहिये। अपने गोत्र के आठ पीढ़ी में विवाह नहीं करना चाहिये ।।१३।।।
*वानप्रस्थ संस्कार*👉👨�👪 जब केश स्वेत हो जाय तथा बेटे का बेटा हो जाय , ५० वर्ष पूरा हो जाय तब अपने गृह का भार बेटे को सौप कर पीले कपड़े धारण कर पति पत्नि यज्ञ में आहुति पूर्वक वानप्रस्थ संस्कार करवाए और आश्रमों में रहकर नित्य यज्ञ व वेदों का स्वाध्याय करते रहे ।व समाज की उन्नत्ति में योगदान दे ।।१४।।
*सन्यास संस्कार*👉🎅 ७५ वर्ष हो जानेपर जिस दिन पूणर्ण वैराग्य होजाने पर कषाय वस्त्र धारण कर समाज की उन्नत्ति में शेष जीवन को ईश्वर उपासनापूर्वक व्यतीत करे१५
*अन्त्येष्टि संस्कार* 👉मृत्यु के पश्चात् मृत शरीर को उत्तम घी सामग्री से वैदिक मंत्रों से दाह संस्कार करना चाहिए ।।१६।।
उपरोक्त सभी संस्कार सब बालक एवं बालिकाओं का कर उत्तम संस्कार वान मानव का निर्माण कर अपने दाईत्व को पूरा कर सुख शान्ति व समृद्धि को प्राप्त करे ।।
इस पोस्ट को पढ़कर अपनी प्रति क्रिया देकर हमें अनुग्रहीत करें ।।
✍ *आचार्य विश्वामित्रार्य*

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“‘आयुष्काम (महामृत्युंजय) यज्ञ और हम’”

। सभी प्राणियों को ईश्वर ने बनाया है। ईश्वर सत्य, चेतन, निराकार, सर्वव्यापक, सर्वान्तरयामी, सर्वातिसूक्ष्म, नित्य, अनादि, अजन्मा, अमर, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान है। जीवात्मा सत्य, चेतन, अल्पज्ञ, एकदेशी, आकार रहित, सूक्ष्म, जन्म व मरण धर्मा, कर्मों को करने वाला व उनके फलों को भोगने वाला आदि स्वरूप वाला है। संसार में एक तीसरा एवं अन्तिम पदार्थ प्रकृति है। इसकी दो अवस्थायें हैं एक कारण प्रकृति और दूसरी कार्य प्रकृति। कार्य प्रकृति यह हमारी सृष्टि वा ब्रह्माण्ड है। मूल अर्थात् कारण प्रकृति भी सूक्ष्म व जड़ तत्व है जिसमें ईश्वर व जीवात्मा की तरह किसी प्रकार की संवेदना नहीं होती। जीवात्मायें अनन्त संख्या में हमारे इस ब्रह्माण्ड में हैं। इनका स्वरूप जन्म को धारण करना व मृत्यु को प्राप्त करना है। मनुष्य जीवन में यह जिन कर्मों को करता है उनमें जो क्रियमाण कर्म होते हैं उसका फल उसको इसी जन्म में मिल जाता है। कुछ संचित कर्म होते हैं जिनका फल भोगना शेष रहता है जो जीवात्मा को पुनर्जन्म प्राप्त कर अगले जन्म में भोगने होते हैं। कर्मानुसार ही जीवों को मनुष्य व इतर पशु, पक्षी आदि योनियां प्राप्त होती हैं। मनुष्य योनि कर्म व भोग योनि दोनो है तथा इतर सभी पशु व पक्षी योनियां केवल भोग योनियां है। यह पशु पक्षी योनियां एक प्रकार से ईश्वर की जेल है जिसमें अनुचित, अधर्म अथवा पाप कर्मों के फलों को भोगा जाता है। हम, सभी स्त्री व पुरूष, अत्यन्त भाग्यशाली हैं जिन्हें ईश्वर की कृपा, दया तथा हमारे पूर्व जन्म के संचित कर्मों अथवा प्रारब्ध के अनुसार मनुष्य योनि प्राप्त हुई। इसका कारण है कि मनुष्य योनि सुख विशेष से परिपूर्ण हैं तथा इसमें दुख कम हैं जबकि इतर योनियों में सुख तो हैं परन्तु सुख विशेष नहीं है और दुःख अधिक हैं। वह उन्नति नहीं कर सकते हैं जिस प्रकार से मनुष्य योनि में हुआ करती है। हमें मनुष्य जन्म ईश्वर से प्राप्त हुआ है। यह क्यों प्राप्त हुआ? इसका या तो हमें ज्ञान नहीं है या हम उसे भूले हुए हैं। पहला कारण व उद्देश्य तो यह है कि हमें पूर्व जन्मों के अवशिष्ट कर्मों अर्थात् अपने प्रारब्ध के अच्छे व बुरे कर्मों के फलों के अनुरूप सुख व दुःखों को भोगना है। दूसरा कारण व उद्देश्य अधिक से अधिक अच्छे कर्म यथा, ईश्वर भाक्ति अर्थात् उसकी ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना करने के साथ यज्ञ-अग्निहोत्र, सेवा, परोपकार, दान आदि पुण्य कर्मों को करना है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमें अपना ज्ञान भी अधिक से अधिक बढ़ाना होगा अन्यथा न तो हम अच्छे कर्म ही कर पायेंगे जिसका कारण हमारा यह जीवन व मृत्यु के बाद का भावी जीवन भी दुःखों से पूर्ण होगा। ज्ञान की वृद्धि केवल आजकल की स्कूली शिक्षा से सम्भव नहीं है। यह यथार्थ ज्ञान व विद्या वेदों व वैदिक साहित्य के अध्ययन से प्राप्त होती हैं जिनमें जहां वेद, दर्शन, उपनिषद, मनुस्मृति आदि ग्रन्थ हैं वहीं सरलतम व अपरिहार्य ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश, आर्याभिविनय, ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका, व्यवहारभानु, संस्कार विधि आदि भी हैं। इन ग्रन्थों के अध्ययन से हमें अपने जीवन का वास्तविक उद्देश्य पता चलता है। वह क्या है, वह है धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष। अन्तिम लक्ष्य मोक्ष है जो विचारणीय है। यह जीवात्मा की ऐसी अवस्था है जिसमें जीवन जन्म-मरण के चक्र से छूट कर मुक्त हो जाता है। परमात्मा के सान्निध्य में रहता है और 31 नील 10 खरब व 40 अरब वर्षों (3,11,04,000 मिलियन वर्ष) की अवधि तक सुखों व आनन्द को भोगता है। इसको विस्तार से जानने के लिए सत्यार्थ प्रकाश का अध्ययन करना चाहिये। ईश्वर ने सृष्टि के आरम्भ में चार वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद का ज्ञान दिया और उसके माध्यम से यज्ञ-अग्निहोत्र करने की प्रेरणा और आज्ञा दी। ईश्वर हमारा माता-पिता, आचार्य, राजा व न्यायाधीश है। उसकी आज्ञा का पालन करना हमारा परम कर्तव्य है। हम सब मनुष्य, स्त्री व पुरूष वा गृहस्थी, यज्ञ क्यों करें? इसलिए की इससे वायु शुद्ध होती है। शुद्ध वायु में श्वांस लेने से हमारा स्वास्थ्य अच्छा रहता है, हम बीमार नहीं पड़ते और असाध्य रोगों से बचे रहते हैं। हमारे यज्ञ करने से जो वायु शुद्ध होती है उसका लाभ सभी प्राणियों को होता है। दूसरा लाभ यह भी है कि यज्ञ करने से आवश्यकता व इच्छानुसार वर्षा होती है और हमारी वनस्पतियां व ओषधियां पुष्ट व अधिक प्रभावशाली होकर हमारे जीवन व स्वास्थ्य के अनुकूल होती हैं। यज्ञ करने से 3 लाभ यह भी होते हैं कि यज्ञ में उपस्थित विद्वानों जो कि देव कहलाते हैं, उनका सत्कार किया जाता है व उनके अनुभव व ज्ञान से परिपूर्ण उपदेशामृत श्रवण करने का अवसर मिलता है। यज्ञ करना एक प्रकार का उत्कृष्ट दान है। हम जो पदार्थ यज्ञ में आहुत करते हैं और जो दक्षिणा पुरोहित व विद्वानों को देते हैं उससे यज्ञ की परम्परा जारी रहती है जिससे हमें उसका पुण्य लाभ मिलता है। यज्ञ में वेद मन्त्रों का उच्चारण होता है जिसमें हमारे जीवन के सुखों की प्राप्ति, धन ऐश्वर्य की वृद्धि, यश व कीर्ति की प्राप्ति, ईश्वर आज्ञा के पालन से पुण्यों की प्राप्ति जिससे प्रारब्ध बनता है और जो हमारे परजन्म में लाभ देने के साथ हमारे मोक्ष रूपी अभीष्ट व उद्देश्य की पूर्ति में सहायक होने के साथ हमें मोक्ष के निकट ले जाता है। हमारे आदर्श मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम तथा श्री योगेश्वर कृष्ण सहित महर्षि दयानन्द भी यज्ञ करते कराते रहे हैं। महर्षि दयानन्द ने आदि ऋषि व राजा मनु का उल्लेख कर प्रत्येक गृहस्थी के लिए प्रातः सायं ईश्वरोपासना-ब्रह्मयज्ञ-सन्ध्या व दैनिक अग्निहोत्र को अनिवार्य कर्तव्य बताया है। हम ऋषि-मुनियों व विद्वान पूर्वजों की सन्ततियां हैं। हमें अपने इन पूर्वजों का अनुकरण व अनुसरण करना है तभी हम उनके योग्य उत्तराधिकारी कहे जा सकते हैं। यह सब लाभ यज्ञ व अग्निहोत्र करने से होते हैं। अन्य बातों को छोड़ते हुए अपने अनुभव के आधार पर हम यह भी कहना चाहते हैं कि यज्ञ करने से अभीष्ट की प्राप्ति व सिद्धि होती है। उदाहरणार्थ यदि हम रोग मुक्ति, सुख प्राप्ति व लम्बी आयु के लिए यज्ञ करते हैं तो हमारे कर्म व भावना के अनुरूप ईश्वर से हमें हमारी प्रार्थना व पात्रता के अनुसार फल मिलता है अर्थात् हमारी सभी सात्विक इच्छायें पूरी होती हैं और प्रार्थना से भी कई बार अधिक पदार्थों की प्राप्ति होती है। इसके लिए अध्ययन व अखण्ड ईश्वर विश्वास की आवश्यकता है। मृत्युंजय मन्त्र ‘त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिम् पुष्टिवर्धनम्। उर्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।’ में कहा गया है कि हम आत्मा और शरीर को बढ़ानेवाले तथा तीनों कालों, भूत, वर्तमान व भविष्य के ज्ञाता परमेश्वर की प्रतिदिन अच्छी प्रकार वेद विधि से उपासना करें। जैसे लता से जुड़ा हुआ खरबूजा पककर सुगन्धित एवं मधुर स्वाद वाला होकर बेल से स्वतः छूट जाता है वैसे ही हे परमेश्वर ! हम यशस्वी जीवनवाले होकर जन्म-मरण के बन्धन से छूटकर आपकी कृपा से मोक्ष को प्राप्त करें। यह मन्त्र ईश्वर ने ही रचा है और हमें इस आशय से प्रदान किया कि हम ईश्वर से इसके द्वारा प्रार्थना करें और स्वस्थ जीवन के आयुर्वेद आदि ग्रन्थों में दिए गये सभी नियमों का पालन करते हुए ईश्वर स्तुति-प्रार्थना-उपासना को करके बन्धनों से छूट कर मुक्ति को प्राप्त हों। हम शिक्षित बन्धुओं से अनुरोध करते हैं कि वह यज्ञ विज्ञान को जानकर उससे लाभ उठायें। -मन मोहन कुमार आर्य ,http://indorearyasamaj.com/wp-con

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