वैदिक सिद्धान्त

मूर्ति में प्राण-प्रतिष्ठा-बडा ही बहकावा :-
किसी मूर्ति की पूजा तब तक नहीं की जाती जब तक उसमें प्राण-प्रतिष्ठा नहीं हो जाती। साधारण व्यक्ति समझने लगता है कि प्राण-प्रतिष्ठा के बाद मूर्ति ईश्वर-रूप में जीवित हो जाती है। भोले लोग इसे सत्य मान कर, मूर्ति पर चावल, गेहूं, घी, गुङ, दूध, पंखा, कपङा, रजाई, पैसे आदि को भोग रूप में चढाते हैं। ये ठग पुजारी सारे चढावे को डकार जाते हैं। परन्तु मूर्ति में कही भी हरकत और चेतना नहीं दिखती। पौराणिक पण्डितो को मूर्ति में प्राण-प्रतिष्ठा करते देख,ईश्वर हंसता होगा “इस पाखण्डी की प्राण प्रतिष्ठा तो मैंने की है और यह दुष्ट मेरी ही प्राण प्रतिष्ठा कर रहा है।” सोचिऐ, लोगों के साथ कितना विश्वासघात कर रहे हैं।, ये धूर्त? यहां यह प्रश्न उठता है कि पौराणिक-पण्डितों के परिवार में जब कोई सदस्य मर जाता है तो ये ठग उस युवा के मृत शरीर में प्राण-प्रतिष्ठा कर उसे जीवित क्यों नहीं करते?
अन्त में इन आचार-भ्रष्ट पाषाण-पूजको से यही कहेगे कि मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा बहुत बडा बहकावा है, धोखा है। अत: देश व जनहित में इस कुकृत्य को तुरंत त्याग दें।
# वैदिक क्रांति दल
कर्म -व्यवस्था
*जो लोग ईश्वर को चौथे और सातवें आसमान पर मानते हैं वे भी भारी भ्रम में हैं।इस अशुद्ध एवं दूषित कल्पना से भी पाप को प्रोत्साहन मिलता है।कैसे ? सुनिए-*

*एक दिन किसी पादरी को एक डाकू मिल गया।डाकू ने कड़ककर कहा, “जो कुछ है यहाँ रख दे !”पादरी ने उसे उपदेश देना आरम्भ किया और कहा, “ईश्वर से डर !” डाकू ने पूछा, “ईश्वर कहाँ रहता है?” पादरी ने कहा, “चौथे आसमान पर ।”डाकू ने कहा, “वहाँ से आने में तो उसे काफी समय लगेगा,इतनी देर में तो मैं भाग जाऊँगा ।”यह कहकर उसने पादरी का सारा धन छीन लिया और भाग गया।*

यदि ईश्वर के वास्तविक स्वरुप को समझकर उसे सर्वद्रष्टा,सर्वव्यापक और सर्वनियन्ता स्वीकार कर लिया जाए तो मनुष्य पापों से बच सकता


सिक्ख गुरू और यज्ञोपवीत संस्कार ( जनेऊ ) :–

ਤਿਲਕ ਜੰਝੂ ਰਾਖਾ ਪ੍ਰਭ ਤਾਕਾ । ਕੀਨੋ ਬਡੌ ਕਲੂ ਮਹਿ ਸਾਕਾ ।। ( ਵਿਚਿਤੱਰ ਨਾਟਕ 5/13 )
अर्थ :- उनके ( गुरू तेग बहादुर जी के ) …तिलक जनेऊ की रक्षा प्रभु ने स्वयं की ।

दिल्ली के लाल किला में गुरू तेग बहादुर जी का चित्र है । उस चित्र में उनके माथे पर गोल बिंदु का तिलक है ।

यही बात आगे ज्ञानी ज्ञान सिंह जी ने पंथ प्रकाश में लिखी है :–

ਜਾ ਦਿਨ ਤੇ ਗੁਰੂ ਸਾਕਾ ਕਰਿਉ । ਵਿਪਤਾ ਵਿੱਚ ਨੌਰੰਗਾ ਰਹਿਉ ।
ਹਿੰਦੂ ਤੁਰਕ ਨਾ ਕਰਨੇ ਪਾਇਉ ਤਗ ਤਿਲਕ ਗੁਰੂ ਰੱਖ ਦਿਖਾਇਉ ।। ( ਪੰਥ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਪੰਨਾ 445 )

आगे ज्ञानी जी ने गुरू गोविंद सिंह जी के विवाह प्रकरण में लिखा है :–

ਪੀਤ ਪੁਨੀਤ ਉਪਾਰਨਾ ਧੋਤੀ ਰਵਿ ਨਵ ਛਵਿ ਛਾਜੇ ।
ਪੀਤ ਜਨੇਉ ਮਨੋ ਵਦਨ ਸਸਿ ਪੈ ਵਿਜਰੀ ਵਿਜੁਰੀ ਭ੍ਰਾਜੈ ।। ( ਪੰਥ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਪੰਨਾ 510 )

इसमें ज्ञानी जी ने साफ ही ( ਪੀਤ ਜਨੇਉ ) पीत जनेऊ लिखा है जिससे स्पष्ट है कि गुरूजन जनेऊ धारण करते थे ।

आगे संस्कार विधी में ऋषि दयानंद लिखते हैं :–

अष्टमें वर्षे ब्राह्मणमुपनयेत् । गर्भाष्टमे वा । एकादशे क्षत्रियम् । द्वादशे वैश्यम् ।।

आठवें वर्ष में ब्राह्मण का । ग्यारवें में क्षत्रिय का । बाहरवें में वैश्य का यज्ञोपवीत हो जाना चाहिए ।

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Rajendra P.Arya
Sangrur
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शहीदे आज़म पं० लेखराम जी “आर्य मुसाफिर
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महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के दिशा निर्देश के अन्तर्गत हिन्दू जाति की रक्षा के लिए शुद्धि आन्दोलन में सक्रिय भाग लेकर अपना जीवन समर्पित कर दिया ।…
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लिफाफा हाथ में लेकर, दिया जिस वक्त माता ने ।
लगे झट खोलकर पढ़ने, दिया है छोड़ खाने को ॥
लिखा था उसमें कुछ हिन्दू मुसलमां होने वाले हैं ।
तो धोकर हाथ जल्दी से , हुए तैयार जाने को ॥
कहा माता ने “ऐ बेटा ! अभी तो आके बैठा है । ”
अभी फिर हो गया तैयार , तू परदेस जा ने को ॥
तू माता और पत्नी को , कुछ ऐसा भूल जाता है ।
नहीं आता महीनों ही , हमें सूरत दिखाने को ॥
यदि सुध बुध हमारी तू , न लेता है , न ले बेटा
” तेरा बेटा लबेदम है, नहीं खाता है खाने को ॥”
मेरा इकलौता बेटा मरता है, तो मरने दे लेकिन ।
मैं जाता सैंकड़ों ही लाल, जाति के बचाने को ॥
सेवक मुसाफ़िर भी सवारी, उस समयलेके आ पहुँचा।
“लो माताजी नमस्ते , मैं हूँ तैयार जाने को ।”
सुबह को तार यह पहुँचा , कि बेटा चल बसा घर से
तो बोले ” फिक्र क्या है ? हर इक आता है जाने को
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पुत्र मोह ! जिसने दशरथ को मरते देखा ,
पुत्र मोह ! मानवता की कोमलतम रेखा ।
छोड़ न पाये थे प्रताप भी जिस ममता को ,
लेखराम ! तुम जीत गए उस दुर्बलता को ॥


लव कुश के जन्म की यथार्थ कहानी…
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लेखक – स्वामी विद्यानंद जी सरस्वती

राम द्वारा अयोध्या यज्ञ में महर्षि वाल्मीकि आये उन्होंने अपने दो हष्ट पुष्ट शिष्यों से कहा – तुम दोनों भाई सब ओर घूम फिर कर बड़े आनंदपूर्वक सम्पूर्ण रामायण का गान करो। यदि श्री रघुनाथ पूछें – बच्चो ! तुम दोनों किसके पुत्र हो तो महाराज से कह देना कि हम दोनों भाई महर्षि वाल्मीकि के शिष्य हैं । ९३ /५

उन दोनों को देख सुन कर लोग परस्पर कहने लगे – इन दोनों कुमारों की आकृति बिल्कुल रामचंद्र जी से मिलती है ये बिम्ब से प्रगट हुए प्रतिबिम्ब के सामान प्रतीत होते हैं । ९४/१४

यदि इनके सर पर जटाएं न होतीं और ये वल्कल वस्त्र न पहने होते तो हमें रामचन्द्र जी में और गायन करने वाले इन कुमारों में कोई अंतर दिखाई नहीं देता। ९४/१४

बीस सर्गों तक गायन सुनाने के बाद श्री राम ने अपने छोटे भाई भरत से दोनों भाइयों को १८ -१८ हजार मुद्राएं पुरस्कार रूप में देने को कह दिया। यह भी कह दिया कि और जो कुछ वे चाहें वह भी दे देना । पर दिए जाने पर भी दोनों भाइयों ने लेना स्वीकार नहीं किया । वे बोले – इस धन की क्या आवश्यकता है ? हम वनवासी हैं । जंगली फूल से निर्वाह करते हैं सोना चांदी लेकर क्या करेंगे । उनके ऐसा कहने पर श्रोताओं के मन में बड़ा कुतूहल हुआ । रामचंद्र जी सहित सभी श्रोता आश्चर्य चकित रह गए । रचयिता का नाम पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि हमारे गुरु वाल्मीकि जी ने सब रचना की है । उन्होंने आपके चरित्र को महाकाव्य रूप दिया है इसमें आपके जीवन की सब बातें आ गयी हैं ९४/१८ – २८

उस कथा से रामचंद्र जी को मालूम हुआ कि कुश और लव दोनों सीता के पुत्र हैं । कालिदास के दुष्यंत के मन में शकुंतला के पुत्र नन्हे भरत को देखते ही जिन भावों का उद्रेक हुआ था , क्या राम के मन में लव और कुश को देख – सुनकर कुछ वैसी ही प्रतिक्रिया नहीं होनी चाहिए थी ? आदि कवि ऐसे मार्मिक प्रसंग को अछूता कैसे छोड़ देते । निश्चय ही यह समूचा प्रसंग सर्वथा कल्पित एवं प्रक्षिप्त है । यह जानकारी सभा के बीच बैठे हुए रामचन्द्र जी ने तो शुद्ध आचार विचार वाले दूतों को बुलाकर इतना ही कहा – तुम लोग भगवन वाल्मीकि के पास जाकर कहो कि यदि सीता का चरित्र शुध्द है और उनमें कोई पाप नहीं है तो वह महामुनि से अनुमति ले यहाँ जन समुदाय के सामने अपनी पवित्रता प्रमाणित करें।

इस प्रकरण के अनुसार रामचन्द्र जी को यज्ञ में आये कुमारों के रामायण पाठ से ही लव कुश के उनके अपने पुत्र होने का पता चला था । परन्तु इसी उत्तर काण्ड के सर्ग ६५-६६ के अनुसार शत्रुघ्न को लव कुश के जन्म लेने का बहुत पहले पता था | सीता के प्रसव काल में शत्रुघ्न वाल्मीकि के आश्रय में उपस्थित थे । जिस रात को शत्रुघ्न ने महर्षि की पर्णशाला में प्रवेश किया था। उसी रात सीता ने दो पुत्रों को जन्म दिया था । आधी रात के समय कुछ मुनि कुमारों ने वाल्मीकि जी के पास आकर बताया – “भगवन ! रामचन्द्र जी की पत्नी ने दो पुत्रों को जन्म दिया है । ” उन कुमारों की बात सुनकर महर्षि उस स्थान पर गए। सीता जी के वे दोनों पुत्र बाल चन्द्रमा के सामान सुन्दर तथा देवकुमारों के सामान तेजस्वी थे।

आधी रात को शत्रुघ्न को सीता के दो पुत्रों के होने का संवाद मिला। तब वे सीता की पर्णशाला में गए और बोले – माता जी यह बड़े सौभाग्य की बात है ” महात्मा शत्रुघ्न उस समय इतने प्रसन्न थे कि उनकी वह वर्षाकालीन सावन की रात बात की बात में बीत गई । सवेरा होने पर महापराक्रमी शत्रुघ्न हाथ जोड़ मुनि की आज्ञा लेकर पश्चिम दिशा की और चल दिए | 66/12-14

यह कैसे हो सकता है कि शत्रुघ्न ने वर्षों तक रामचंद्र जी को ही नहीं । सारे परिवार को सीता के पुत्रों के होने का शुभ समाचार न दिया हो । महर्षि वाल्मीकि का आश्रय भी अयोद्ध्या से कौन दूर था – उनका अयोध्या में आना जाना भी लगा रहता था । इसलिए यज्ञ के अवसर पर लव कुश के सार्वजानिक रूप से रामायण के गाये जाने के समय तक राम को अपने पुत्रों के पैदा होने का पता न चला हो, यह कैसे हो सकता है ? इससे उत्तरकाण्ड के प्रक्षिप्त होने के साथ साथ यह भी स्पष्ट हो जाता है कि वह किसी एक व्यक्ति की रचना भी नहीं है अन्यथा उसमें पूर्वापर विरोध न होता ।

प्रक्षिप्त उत्तरकाण्ड के अंतर्गत होने से लव कुश का राम की संतान होना भी संदिग्ध है । नारद द्वारा प्रस्तुत कथावस्तु के अनुसार ही वाल्मीकि कृत रामायण में उसका कोई उल्लेख नहीं है ।